लिंचिंग राजकीय आतंकवाद का ही हिस्सा है!

पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न प्रांतों से भीड़ द्वारा अचानक बेगुनाह लोगों की बेरहमी से हत्या की खबरें लगातार आ रही हैं। ऐसी हत्याओं को लिंचिंग कहा जा रहा है। ऐसी हत्याओं को सही ठहराने के लिये मारे गये व्यक्ति पर कोई न कोई झूठा आरोप लगाया जाता है - जैसे कि वह गाय तस्करी कर रहा था, या फिर गाय का मांस खा रहा था, या फिर “लव जिहाद” कर रहा था। इस हत्याकांड का विडियो बनाकर हत्यारे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे समाज में उसका प्रचार करते हैं। इन दिनों, लिंचिग का शिकार ज्यादातर मुसलमान समुदाय के लोग और खाल उतारने वाले दलित हो रहे हैं।

लिंचिंग की ये घटनायें न तो अचानक होती हैं, न ही स्वतः स्फूर्त होती हैं। ये सुनियोजित होती हैं। कालांतर से ऐसा होता आया है कि जिस समुदाय के लोगों को राज्य आतंकित करना चाहता है उसके ख़िलाफ पहले से झूठा प्रचार करता है ताकि लोगों की मानसिकता को उस समुदाय के खिलाफ़ मोड़ा जा सके और उनकी हत्याओं के विरोध में लोग खड़े न हों। जहां भी लिंचिंग की घटना होती है उसके पीछे प्रशासन का पूरा समर्थन होता है। मंत्री, सांसद और विधायक हत्यारे को सही ठहरा कर उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसे कातिलों को कोई सज़ा नहीं मिलती है। इससे यह साफ साबित होता है कि लिंचिंग करने वाले लोगों को राज्य का पूरा समर्थन प्राप्त है।

लिंचिंग राजकीय आतंकवाद का एक हिस्सा है। इसके ज़रिये राज्य किसी खास समुदाय को शिकार बनाता है और उसमें दहशत फैलाता है। हिन्दोस्तानी राज्य “फूट डालो और राज करो” की नीति को लगातार लागू करता आया है। देश के लोगों को धर्म, जाति, भाषा, राष्ट्रीयता, क्षेत्रीयता, इत्यादि के आधार पर बांटकर रखने की कोशिश करता है ताकि लोग अपने हक़ों के लिये एकजुट होकर राज्य के खि़लाफ़ संघर्ष न करें। इस नीति के तहत पूंजीपति वर्ग और उसकी पार्टियां लोगों को एक दूसरे के खि़लाफ़ भड़काने के लिये लगातार प्रचार करती हैं। एक समुदाय के खि़लाफ़ दूसरे समुदाय में झूठा प्रचार करती हैं। ऐसा महौल खड़ा करने की कोशिश की जाती हैं कि जब राज्य किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर उसको आतंकित करता है तो दूसरे समुदाय के लोग उसका विरोध करने की हिम्मत न करें।

जैसा कि आज मुसलमान समुदाय के साथ हो रहा है, 80 और 90 के दशकों में राज्य सिख कौम को आतंकित करने के लिये वैसा ही करता था। सिखों को आतंकवादी कहा जाता था और सोची-समझी नीति के तहत राज्य उनके खि़लाफ़, देश के अन्य लोगों के मन में नफ़रत फैलाता था। नवम्बर 1984 में राज्य द्वारा आयोजित सिखों के नरसंहार को जायज़ ठराने के लिये झूठा प्रचार किया गया था कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख समुदाय के लोग मिठाइयां बांट रहे थे या सिखों ने पीने के पानी में जहर मिला दिया था। हाल के दशकों में उत्तरपूर्व के लोगों के खि़लाफ़, हिन्दोस्तान के अन्य प्रांतों के लोगों में तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गई हैं। कई जगहों पर उत्तरपूर्व के छात्रों और छात्राओं को लिंचिंग का शिकार बनया गया है। इसी तरह देश में पढ़ने के लिये अफ्रीका से आये हुये छात्र राज्य के नस्लवादी प्रचार के शिकार बने हैं।

लिंचिंग शब्द अमरीका से आया है। अमरीका में दास प्रथा से जब एफ्रो-अमरीकी लोगों ने आज़ादी पायी थी, तो उसके बाद भी अमरीका का शासक वर्ग उनको गुलामों के जैसे ही रखना चाहता था, उनको नागरिकता और बराबरी के अधिकार नहीं देना चाहता था। अमरीकी राज्य लिंचिंग द्वारा एफ्रो-अमरीकी लोगों को चुन-चुनकर उनकी हत्या करता था और पूरे समुदाय में दहषत फैलाता था।

हिन्दोस्तान में 1857 के महान ग़दर को बेरहमी से कुचलने के बाद बर्तानवी बस्तीवादियों ने करोड़ों लोगों का कत्ल किया था। उन्होंने हिन्दोस्तान के लोगों में दहशत फैलाने के लिये कलकत्ता से पेशावर तक पूरे महामार्ग के हर एक पेड़ पर हिन्दोस्तानी लोगों को फांसी देकर उनकी लाशों को लटकाकर रखा था।

सांप्रदायिकता के आधार पर दहशत फैलाना राज्य का पसंदीदा तरीका है। ऐसा करके राज्य लोगों के विरोध संघर्षों को कुचलता है, लोगों की एकता को तोड़ता है।

धर्म, जाति, भाषा, राष्ट्रीयता और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर पूरे देश में लोग लिंचिंग और सांप्रदायिक हिंसा का खंडन कर रहे हैं। वे राज्य को दोषी ठहरा रहे हैं। लोग समझ रहे हैं कि एक पर हमला, सब पर हमला है। वक्त की मांग है कि हम सभी लोग राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़ एकजुट होकर संघर्ष को तेज़ करें।

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लिंचिंग    राजकीय आतंकवाद    Aug 16-31 2018    Voice of the Party    Popular Movements     Rights     War & Peace     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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