मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2017 : सड़क यातायात क्षेत्र को बड़े इजारेदार कंपनियों के लिए खोला जा रहा है

मोटर वाहन संशोधन विधेयक, 2017 को 10 अप्रैल, 2017 को लोक सभा में पारित किया जा चुका है और अब इसको राज्यसभा में पारित किया जाना बाकि है। मोटर वाहन अधिनियम को 1988 में पहली बार बनाया गया था। 

वैसे तो इस विधेयक का घोषित लक्ष्य सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना, दुर्घटना  और लाइसेंस, परमिट, वाहन फिटनेस सर्टिफिकेट, बीमा, और करों की व्यवस्था आदि से भ्रष्टाचार को मिटाना है, असलियत में इस विधेयक में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनके तहत सार्वजनिक परिवहन क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया गया है।

इस विधेयक का असली लक्ष्य परिवहन के अलग-अलग क्षेत्रों को निजी कंपनियों द्वारा अपने कब्ज़े में लेने की प्रक्रिया को आसान बनाना है।  इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस क्षेत्र में निजी पूंजी की इजारेदारी को और ज्यादा बढ़ाने, और सार्वजनिक परिवहन और उससे जुड़े तमाम अन्य व्यवसायों को बर्बाद करने की दिशा में कदम उठाये जा रहे हैं। इस विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं जिससे छोटे मैकेनिक, भारी और हल्के मोटर वाहन के चालक से लेकर ऑटो ड्राईवर, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के मजदूर, स्वयं रोजगार करने वाले मजदूर, इन सभी के काम खत्म हो जाने का ख़तरा है। परिवहन मज़दूरों की यूनियनों का अनुमान है कि यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो देश भर में 4 करोड़ से अधिक लोगों पर इसका प्रतिकूल असर होगा।

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों के हितों को पूरा करने के लिए छोटे मोटर मैकेनिक, और मोटर वाहन के कलपुर्जो के उत्पादक इन सब की दुकाने बंद कर दी जाएंगी। इस विधेयक में यह कहा गया है कि किसी भी मोटर वाहन की रिपेयरिंग केवल उस कंपनी की रिपेयरिंग दुकानों में ही किये जाने की इजाज़त होगी। यदि किसी मोटर वाहन में कोई गड़बड़ी आती है तो उसे पास के मैकेनिक की दुकान में ठीक नहीं किया जा सकता है, बल्कि उसे कंपनी द्वारा चलायी जा रही दुकान में ही ले जाना होगा। इसके लिए यह तर्क दिया जा रहा है कि छोटी दुकानें गलत कलपुर्जे लगा सकती है और इससे सड़क दुर्घटना हो सकती है! दरअसल अधिकतम सड़क दुर्घटनाओं के लिए सड़कों की खस्ता हालत जिम्मेदार है जिनका रखरखाव करना केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन विधेयक में इस मसले का कोई हल नहीं दिया गया है, जबकि यह दावा किया जा रहा है कि सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना इस विधेयक का लक्ष्य है।

इस विधेयक के तहत सड़क परिवहन नियमों और कानून का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माने और सज़ा का प्रावधान किया गया है, जो कि मौजूदा स्तर से कई गुना अधिक है। इस विधेयक के तहत थर्ड पार्टी बीमा पर लगायी गयी सीमा को हटाया गया है। इसकी वजह से वाहन चालक और छोटी परिवहन कंपनियों पर बीमे की भारी रकम लगाये जाने का ख़तरा है, जो उनके बस के बाहर होगा, और बड़ी बीमा कंपनियों को इससे बहुत फायदा होगा। यदि सरकार वाकई में सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने में दिलचस्पी रखती है तो उसे मौजूदा नियमों और कानूनों को हर जगह सही तरीके से लागू करना चाहिए। असलियत में इन कानूनों का पलान कम होता है और उल्लंघन ज्यादा, और वह भी मनमाने तरीके से किया जाता है। हमारा अनुभव यही दिखाता है कि आम तौर से अमीर और ताकतवर लोग, खास तौर से बड़े पूंजीपति और राजनीतिज्ञ बड़े-बड़े गुनाह करके भी बच निकलते हैं, जबकि सामान्य लोग, और खास तौर से गरीब लोगों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है और सज़ा दी जाती है। यदि सरकार यह चाहती है कि परिवहन नियमों का उल्लंघन रोकने के लिए जुर्माने की रकम और सज़ा को बढ़ाया जाये, तो यह 1980 के मौजूदा अधिनियम के दायरे में भी किया जा सकता है।

इस समय सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था राज्य सरकार के तहत आती है और उसी के सीधे नियंत्रण में राज्य परिवहन उपक्रम (एस.टी.यू.) द्वारा इसको चलाया जाता है। एस.टी.यू. निजी परिवहन की तुलना में कम दामों पर लोगों को यह सुविधा देती है। इस क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश का मतलब है किराये को बढ़ाया जाना, जिसका बोझ आम लोगों पर पड़ेगा। हमारा अनुभव यही दिखता है कि कोई भी निजी कंपनी केवल अपने मुनाफ़ों के लिए यह सेवा चलाएगी न कि सार्वजनिक सेवा की तरह। मजदूरों के लिए इसका मतलब है काम के अधिक लम्बे घंटे, कम वेतन, और यूनियन बनाने के अधिकार पर पाबन्दी।

ऑटो और टैक्सी चालकों पर भी इसका बहुत बुरा असर होगा। वो खुद अपना ऑटो या अपनी टैक्सी नहीं चला पायेंगे, जैसे की अब तक करते आये है। नये विधेयक के अनुसार ऑटो और टैक्सी को केवल बड़े व्यवसाय के हिस्सा बतौर ही चलाया जा सकेगा। ऐसे नियमों का नतीजा क्या हो सकता है इसका उदहारण सिंगापुर में देखा जा सकता है। इस शहर में 30,000 टैक्सी है, लेकिन यह केवल छः कंपनियों के हाथों में है।  

चार साल पहले सरकार ने सड़क परिवहन एवं सुरक्षा विधेयक 2014 लाने की कोशिश की थी जो कि मोटर वाहन अधिनियम 1988 की जगह लेने वाला था। लेकिन देश भर के परिवहन क्षेत्र मज़दूरों ने इस विधेयक का जोरदार विरोध किया और सरकार को उसे वापस लेना पड़ा था। सरकार फिर से इस विधेयक को पारित करने की कोशिश कर रही है और देशभर के मज़दूर इसका फिर एक बार जोरदार विरोध कर रहे हैं।

7 अगस्त को देश भर के 3 करोड़ से अधिक राज्य-परिवहन मज़दूर, निजी परिवहन मज़दूर, माल ढुलाई परिवहन मज़दूर तथा ऑटो व टैक्सी इत्यादि जैसे छोटे वाहनों के चालकों ने देशभर में इस विधेयक के खिलाफ़ हड़ताल आयोजित की गई थी। ऑल इंडिया कोआर्डिनेशन कमिटी ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स आर्गेनाईजेशन के तहत यह हड़ताल आयोजित की। इस कमिटी में सी.आई.टी.यू. (सीटू), ए.आई.टी.यू.सी. (एटक), आई.एन.टी.यू,सी. (इंटक), हिन्द मजदूर सभा (एच.एम.एस.), ए.आई.यू.टी.यू.सी., ए.आई.सी.सी.टी.यू., एल.पी.एफ., यू.टी.यू.सी. और टी.यू.सी.सी., इन संगठनों से जुडी परिवहन मज़दूरों की यूनियनें शामिल हैं। कई राज्यों में यह हड़ताल पूरी तरह से सफल रही। कई राज्यों में राज्य परिवहन पूरी तरह से बंद रहा, और कई निजी चालकों ने भी इस हड़ताल का समर्थन किया। ऑटो, टैक्सी और ट्रक मजदूरों ने भी इस हड़ताल के समर्थन में काम बंद रखा। उनकी मांगें हैं कि “मोटर वाहन अधिनियम के प्रस्तावित संशोधनों को वापस लिया जाये” और “डीजल और पेट्रोल के दामों में कटौती की जाये”।

हाल के वर्षों में पंजाब और हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, और तमिलनाडु के राज्य परिवहन के मज़दूरों ने विशाल हड़ताल आयोजित की है। यह मज़दूर सार्वजनिक परिवहन के निजीकरण के तमाम कदमों के खिलाफ़ और अपने काम के हालातों को बेहतर बनाने और वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर संघर्ष करते आये हैं। इस विधेयक के द्वारा सरकार लोगों के संघर्ष को तोड़ना चाहती है और मज़दूरों के यूनियन बनाने के अधिकार पर पाबन्दी लगाना चाहती है।

इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय परिवहन नीति बनाना चाहती है, जिससे देश भर में परिवहन से संबंधित सभी मामलों में केंद्र सरकार के पास सबसे अधिक अधिकार होंगे। इस वजह से कुछ राज्य सरकारें भी इसका विरोध कर रही हैं क्योंकि इस विधेयक से उनके अधिकार क्षेत्र पर भी चोट पहुंचेगी। इस विधेयक के द्वारा केंद्र सरकार राज्य सरकारों से कई अधिकारों को छीनकर उसे राष्ट्रीय प्राधिकरण के हाथों में सौंप देगी। इस राष्ट्रीय प्राधिकरण का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जायेगा।

संक्षिप्त में कहा जाये तो इस विधेयक के पारित हो जाने से परिवहन के क्षेत्र में बड़ी निजी कंपनियों का प्रवेश और भी आसान हो जायेगा और अधिकारों के केन्द्रीकरण से इजारेदार कंपनियों का वर्चस्व बढ़ जायेगा। अपने मुनाफ़ों को और अधिक बढ़ाने के लिए वित्त पूंजी की नज़र इस क्षेत्र पर लगी हुई है। वाहनों के मालिकों को लूटकर बीमा कंपनियां पहले से ही बड़े मुनाफे बना रही हैं। पॉइंट सिस्टम और बड़े जुर्माने जैसे काले प्रावधानों से बड़ी निजी देशी और विदेशी कंपनियां मोटे मुनाफे बनायेंगी। 

यदि राज्य वाकई में लोगों के लिए सड़कों को सुरक्षित करने में दिलचस्पी रखता है तो उसे सड़कों की हालत सुधारने और ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करने में निवेश करना होगा, न की परिवहन सेवाओं का निजीकरण। यह विधेयक खास तौर से परिवहन सेवाओं का निजीकरण करने के लक्ष्य से लाया गया है। परिवहन सेवाओं का निजीकरण करने से किसी भी तरह से सुरक्षित और पर्याप्त मात्रा में परिवहन सेवा, उचित किराया सेवा नहीं दी जा सकती, बल्कि ऐसा करने से आम लोगों के लिए परिवहन सेवा और अधिक महंगी हो जाएगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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