मज़दूर-किसान संघर्ष रैली : मज़दूरों और किसानों के राज की ओर बढ़े चलें!

5 सितम्बर, 2018 को देश के लाखों मज़दूरों और किसानों ने देश की राजधानी में आकर हुक्मरान पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार के प्रति अपने गुस्से का इजहार किया। उन्होंने सरकार की राष्ट्र-विरोधी, जन-विरोधी, मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी नीतियों का जमकर विरोध किया।

विभिन्न राज्यों में आयी बाढ़ और दिल्ली की मूसलाधार बारिश रैली में आने से मज़दूरों और किसानों के क़दमों को रोक न सकी। रैली में मज़दूरों और किसानों की ताक़त देखने को मिली।

5 Sep18_ Mazdoor Kisar Rally in Delhi सुबह से ही मज़दूर और किसान संसद मार्ग पर एकत्रित होने लगे। जुलूस रामलीला मैदान से संसद मार्ग की ओर चला और दोपहर तक चलता रहा। मज़दूरों और किसानों के बड़े-बड़े समूह एक हाथ में लाल झंडा तो दूसरे हाथ में अपनी मांगों की तख्तियां लिए चले आ रहे थे। देखते ही देखते पूरा संसद मार्ग भर गया। जंतर-मंतर रोड और जयसिंह रोड खचाखच भर गये। कनॉट प्लेस, रेलवे स्टेशन, आसपास के मेट्रो स्टेशनों सहित पूरी केन्द्रीय दिल्ली की सभी जगहों पर लाल झंडे और बैनर लहरा रहे थे। हर तरफ इंक़लाब का नारा बुलंद हो रहा था। फोटो कैमरे लोगों की संख्या को कैद करने में एकदम बेबस थे। पुलिस की नाकेबंदी और बंदोबस्त खुद-ब-खुद ढीले पड़ गए। रैली बहुत ही अनुशासित थी। रैली में आये लोगों की अनुमानित संख्या 2 लाख से ऊपर पहुंच गयी।

इस रैली में विभिन्न राज्यों के किसानों और खेत मज़दूरों सहित, बैंक, दूरसंचार, खनिज़, परिवहन, डाक, विनिर्माण, कोयला, इस्पात, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में काम कर रही यूनियनों और फेडरेशनों ने भाग लिया।

रैली के आयोजक संगठनों में थे सी.आई.टी.यू., अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन। इनके नेताओं सहित अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की यूनियनों व फेडरेशनों के प्रतिनिधियों ने रैली को संबोधित किया। उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की नीति को मज़दूर-विरोधी, जन-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी व किसान-विरोधी बताया। उन्होंने इन नीतियों के खि़लाफ़ संयुक्त संघर्ष को तेज़ करने की कसम खाई।

देशभर के मज़दूरों और किसानों की ज़ुबान से ...

मज़दूर एकता लहर ने मज़दूर-किसान संघर्ष रैली में भाग ले रहे सैकड़ों मज़दूरों और किसानों से बातचीत की। अधिकांश लोगों ने बहुत गर्मजोशी से कहा कि हमें देश में सरमायदारी राज को ख़त्म करके मज़दूरों-किसानों का राज स्थापित करना चाहिए। यही शोषण-दमन को ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता है। मज़दूरों-किसानों का राज ही इस देश के मज़दूरों, किसानों और सभी शोषित-पीड़ित लोगों के भविष्य को उज्ज्वल बना सकता है। आज पूंजीपतियों का राज है। जो भी पार्टी सरकार बनाती है, वह पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को लागू करती है। आज तक जो भी सरकारें आयी हैं, उन्होंने मज़दूरों और किसानों को लूटकर पूंजीपतियों की जेबों को ही भरा है। 70 साल का लंबा अनुभव हमें दिखाता है कि देश का अन्नदाता खुद भूखा मर रहा है। देश को चलाने वाला, देश की सारी दौलत को पैदा करने वाला मज़दूर खुद भूखा और कंगाल है। सिर्फ मज़दूरों-किसानों का राज ही देश में मौलिक तब्दीली ला सकता है। हमें मज़दूरों-किसानों का राज स्थापित करने के उद्देश्य के साथ देश के तमाम मज़दूरों-किसानों, महिलाओं और नौजवानों को संगठित करना चाहिये। हमें खुद हुक्मरान बनना चाहिए।

अखिल भारतीय किसान सभा के कोषाध्यक्ष कृष्ण प्रकाश ने बताया कि यह रैली मज़दूर-किसान आंदोलन की भावी दिशा को तय करेगी। हमारी मांग है कि बढ़ती महंगाई पर रोक हो। सभी को उचित रोज़गार मिले। किसानों के लिए स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू हों। किसानों को उत्पादों की बिक्री से लागत का कम से कम डेढ़ गुना मिले। खेत मज़दूरों और ग़रीब किसानों का कर्ज़ माफ़ हो। खेत मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित किया जाये। हम 2019 के लोकसभा चुनाव में, मज़दूरों और किसानों की मांगों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि देश में मज़दूरों-किसानों की सरकार बने।

Ashok kumarउत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए, अखिल भारतीय डाक कर्मचारी संघ (ग्रामीण डाक सेवा) से जुड़े अशोक कुमार सिंह ने बताया कि सरकार, ग्रामीण डाक सेवकों को 4 घंटे का मज़दूर मानती है और काम लेती है 8 घंटे का। हमारी एकमुश्त तनख्वाह 12,000 से लेकर 14,000 हजार रुपए महीना होती है। हमारी मांग है कि हमें स्थायी किया जाए और मज़दूर की मान्यता दी जाए।
अखिल भारतीय डाक कर्मचारी संगठन (गु्रप सी) के गाजीपुर मंडल सचिव, रविन्द्र कुमार राव ने बताया कि हम यहां Ravinder kumarसरकार की उदारीकरण, निजीकरण की नीतियों के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करने आए हैं। नई पेंशन स्कीम को ख़त्म किया जाए। नई पेंशन स्कीम में हम अपनी ओर से राशि जमा कर रहे हैं, लेकिन सरकार कितना जमा करती है, हमें पता नहीं चल रहा है। जब हम रिटायर होंगे तो कितनी पेंशन मिलेगी कुछ पता नहीं है। हमारा भविष्य अंधकार में है। दूसरा कि हम श्रम कानूनों में हो रहे बदलाव के खि़लाफ़ हैं। स्टाफ की कमी है। नयी भर्ती नहीं हो रही है। हम पर ज्यादा से ज्यादा काम का बोझ लादा जा रहा है
Satish kumarखेत मज़दूर यूनियन उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष सतीश कुमार ने बताया कि खेत मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए केन्द्रीय कानून बने। मनरेगा के फंड में कटौती रोकी जाए। मनरेगा के तहत, 300 दिन का काम और 300 रुपए दिहाड़ी दी जाए। 60 साल से ऊपर के सभी खेत मज़दूरों और किसानों को 5,000 रुपए मासिक पेंशन दी जाए। मैं उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हूं। पहले यहां, निराई, गुड़ाई और मुड़ाई का काम खेत मज़दूर करते थे। अब पूंजीवादी विकास के चलते, यह काम भी ख़त्म हो रहा है। खेत मज़दूर और किसान शहरों की ओर भाग रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी ने ग्रामीण कारोबारियों और किसानों तथा खेत मज़दूरों की कमर तोड़ दी है। यह पूंजीपतियों की सरकार है। हम चाहते हैं कि मज़दूरों और किसानों की सरकार बने।
Ram jiअखिल भारतीय किसान सभा के वाराणसी सचिव रामजी सिंह ने कहा कि किसानों की हर स्तर पर लूट हो रही है। उदाहरण के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1650 रुपया है। लेकिन हमें गेहूं को 1450 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से व्यापारियों को बेचना पड़ता है। सरकारी ख़रीद केन्द्र कम हैं। दूसरा कि 50 किलोग्राम उर्वरक की थैली की सरकारी क़ीमत 1100 रुपये है जबकि यह किसानों को 1300 रुपए में मिलती है। उसी तरीके से यूरिया का 50 किलोग्राम का पैकेट 320 रुपए का है, लेकिन किसानों को 350-370 रुपए में मिलता है। डीजल का दाम बढ़ने से सिंचाई महंगी हो गयी है। कहने का मतलब है कि लागत दिनों-दिन बढ़ रही है। लागत के सामान की क़ीमत भी पूंजीपति तय करते हैं और किसानों की फसल का दाम भी। कहां जाएगा किसान? हमारे प्रदेश और पूरे देश की कमोबेश यही हालत है।
Sandip सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा के संदीप सांगवान ने कहा कि हमारी मांग है कि समान काम का समान वेतन मिले। अस्थाई कर्मचारी का वेतन पक्के कर्मचारी के समान होना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में मिड-डे-मील का खाना बनाने वाले मज़दूर को 3,500 रुपए महीना मिलता है और चैकीदार को सिर्फ 1000 रुपए महीना।
Nepalदामोदर वेली कारपारेशन पश्चिम बंगाल से आए नेपाल डे का कहना है कि सारे देश में श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। सभी को नौकरी मिले। सभी मज़दूरों का न्यूनतम वेतन 18,000 हजार रुपए महीना हो। हम सभी मांगों का समर्थन करते हैं, जो यहां उठ रही हैं। हम पूंजीपति वर्ग की फूट डालो और राज करो की नीति की निंदा करते हैं। हम देश के लोगों के बीच सांप्रदायिक आधार पर बंटवारे का विरोध करने आए हैं।
Malya Sarkarसड़क परिवहन फेडरेशन पश्चिम बंगाल से आये मलय सरकार ने कहा कि सड़क परिवहन क्षेत्र के मज़दूरों की हालत बहुत खराब है। न उन्हें न्यूनतम वेतन मिलता है और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा मिलती है। बंगाल की सरकार परिवहन विभाग की भूमि और इमारतों को पूंजीपतियों के हवाले कर रही है। यही हालत पूरे देश में है।

Gyaneshwar choudharyराजस्थान मेडिकल एंड सेल्स रेप्रिजेंटेटिव यूनियन के ज्ञानेश्वर चैधरी ने कहा कि हम डाक्टरों को दवाइयां और मेडिकल उपकरण बेचते हैं। हमारा फील्ड का काम है। हमारे लिए काम के नियम बनने चाहिएं। हमारी मांग है कि हमें न्यूनतम वेतन मिले। हमारी 7000-8000 रुपए की तनख्वाह होती है। इस पेशे में आने के लिए न्यूनतम योग्यता साइंस के साथ 12वीं कक्षा पास है, जबकि ज्यादातर मेडिकल रेप्रिजेंटेटिव, बीएससी, एमएससी, डीफार्मा, बीफार्मा तक की योग्यता रखते हैं। सरकारें सिर्फ पूंजीपतियों के हितों की रखवाली करती हैं। उनके मुनाफ़ों के लिए नीतियां बनाती हैं। हम मज़दूरों का हक़ मारती हैं।

Mohit Ranjanएलआईसी आॅफ इंडिया एजेंट्स आरगेनाइजेशन, पश्चिम बंगाल से आए मोहित रंजन दासगुप्ता ने बताया कि हम मज़दूर हैं। देश के सभी मज़दूरों को 18,000 रुपये न्यूतनम वेतन मिले।

Kunj Mohanभारत दूरसंचार निगम लि. असम से आए कुंज मोहन दास ने बताया कि आज हमारी पीढ़ी के लिये परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो रहा है। भारत दूरसंचार निगम में कैजुअल और ठेके मज़दूर, स्थायी मज़दूरों के बराबर काम करते हैं, लेकिन बराबर का वेतन नहीं मिलता है। श्रम कानूनों का पालन नहीं होता है। हमारी मांग है कि समान काम का समान वेतन मिलना चाहिए।
Madhusudhanइनकम टैक्स इम्पालॉइज़ फेडरेशन पश्चिम बंगाल के सेक्रेटरी सुमीत बोस ने कहा कि कई मुद्दे हैं। न्यू पेंशन स्कीम ख़त्म होनी चाहिये। हमारे डिपार्टमेंट में इस वक्त 40 प्रतिशत पद खाली हैं। जबकि टैक्स देने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 7वां वेतन आयोग अभी तक लागू नहीं किया गया है। ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों को पक्का करने की हमारी मांग है।

रैली में आये मज़दूरों और किसानों की बातों से यह साफ़ दिखता है कि लोग समझ रहे हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था देश के उत्पादक वर्ग, श्रमिक वर्ग का शोषण और विनाश कर रही है। रैली में आये अधिकांश मज़दूरों और किसानों की यह राय थी कि एक सरमायदारी पार्टी की जगह पर दूसरी सरमायदारी पार्टी या गठबंधन को चुनकर लाने से इसमें कोई तब्दीली नहीं होने वाली है। यह भी स्पष्ट है कि अगर अर्थव्यवस्था की दिशा को मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकश लोगों के हित में मोड़ना है तो देश के मेहनतकश लोगों को मज़दूरों और किसानों का राज लाने के लिये संघर्ष में एकजुट होना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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