अमरीकी साम्राज्यवाद मानव जाति का सबसे भयंकर दुश्मन है

शीत युद्ध के अंत के समय से, अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में विश्व साम्राज्यवाद ने मज़दूर वर्ग और लोगों के खि़लाफ़, राष्ट्रों की आज़ादी के खि़लाफ़ और क्रांति व सामाजिक प्रगति की मांग कर रहे लोगों के खि़लाफ़ भयानक हमला छेड़ दिया है।

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अमरीका और दूसरे पूंजीवादी देशों में शासक वर्ग ने नस्लवाद छेड़ दिया है। वहां मज़दूर वर्ग व लोगों के एकजुट संघर्षों को चूर-चूर करने के लिए नस्ल, धर्म और राष्ट्रीय मूल के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। साम्राज्यवाद बीसवीं सदी में मानव जाति की सारी उपलब्धियों पर हमला कर रहा है और दुनिया को मध्यकालीन युग में पीछे खींचने की कोशिश कर रहा है।

पूरी दुनिया में, मज़दूर वर्ग और लोग उन पर थोपी जा रही बेहद असहनीय जीवन के हालातों के खि़लाफ़, ज़ोरदार संघर्ष कर रहे हैं। लोग पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण और लूट के खि़लाफ़, राष्ट्रीय संप्रभुता की हिफाज़त में और साम्राज्यवादी व प्रतिक्रियावादी जंग के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे हैं।

साम्राज्यवाद और मज़दूर वर्ग व लोगों के बीच इस जीवन और मौत के संघर्ष में अमरीकी साम्राज्यवाद साम्राज्यवादी छावनी का नेता है।

8 सितम्बर, 2018 को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने भाषण में यह ऐलान किया कि अमरीका दुनिया की पुलिस बन कर खड़ा है, अपने सहयोगी देशों की रक्षा कर रहा है, जिसकी क़ीमत सहयोगी देशों को चुकानी चाहिए। “... उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी चाहिए। हम सारी दुनिया पर नज़र रख रहे हैं, पर वे इसे कोई अहमियत ही नहीं देते हैं। सालों-सालों से हम इन देशों की रक्षा करते आ रहे हैं। वे खूब दौलत कमा रहे हैं। उनका सैनिक खर्च बहुत कम है। हमारा दुनिया में सबसे ज्यादा सैनिक खर्च है। अधिकतर खर्चा दूसरे देशों की रक्षा करने पर होता है, परन्तु उनमें से कुछ देश तो हमें पसंद भी नहीं करते”, ऐसा ट्रम्प ने कहा।

अमरीकी राष्ट्रपति के भाषण का निशाना नाटो सदस्य देशों पर, जापान और अमरीका के अन्य सहयोगी देशों - सऊदी अरब व दक्षिण कोरिया - पर था। अमरीकी राष्ट्रपति के अनुसार, उनकी सेनायें इन देशों की “रक्षा” करती आ रही हैं। पर सच तो यह है कि इन देशों में तैनात अमरीकी सेनायें वहां के प्रतिक्रियावादी सरमायदारों को क्रांति के ख़तरे से बचाती रही हैं। इन देशों में तैनात अमरीकी सेनायें कब्ज़ाकारी सेनायें हैं। वे इन देशों को अमरीकी साम्राज्यवाद की छावनी में कस के बांधकर रखने का काम करती हैं। इन देशों की अपनी सेनायें अमरीकी कमान के तले काम करती हैं और उन्हें दूसरे देशों में अमरीका की सैनिक कार्यवाहियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरा विश्व युद्ध और उसके पश्चात

साम्राज्यवादियों ने समाजवादी सोवियत संघ को ख़त्म करने और दुनिया को आपस में बांटने के इरादे से, दूसरा विश्व युद्ध शुरू किया था। परन्तु साम्राज्यवादियों की योजनाएं नाक़ामयाब हुईं। समाजवादी सोवियत संघ के लोगों के संघर्ष और कब्ज़ा किये हुए देशों के कम्युनिस्टों की अगुवाई में लोगों के बहादुर संघर्ष की वजह से, जर्मनी, इटली और जापान की फासीवादी ताक़तें हार गयीं। फासीवाद पर जीत के बाद, यूरोप और एशिया में लोक जनवाद के नए राज्य स्थापित हुए। सोवियत संघ की अगुवाई में समाजवादी छावनी की स्थापना हुयी।

दूसरे विश्व युद्ध के अंत में पूंजीवादी व्यवस्था भारी संकट में फंसी हुयी थी। जर्मनी, जापान और इटली पराजित हो गये थे और उनकी अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो गयी थीं। ब्रिटेन और फ्रांस बहुत कमज़ोर हो गए थे। उपनिवेशवादी व्यवस्था के विनाश के साथ-साथ, पूंजीवाद का आम संकट और भी गहरा हो रहा था। उपनिवेशों में साम्राज्यवाद के खि़लाफ़ मुक्ति संघर्ष बहुत तेज़ हो रहा था और कई नए राष्ट्रीय राज्य पैदा हुए। कई पूंजीवादी राज्यों में क्रांतिकारी बग़ावत होने जा रही थी।

इन परिस्थितियों में अमरीकी साम्राज्यवाद ने पूंजीवादी दुनिया की अगुवाई करने का बीड़ा उठाया। उसने मार्शल प्लान के ज़रिये यूरोपीय और जापानी पूंजीवाद को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की। ख़त्म हो चुकी उपनिवेशवादी व्यवस्था की जगह पर उसने नव-उपनिवेशवादी शोषण और लूट की व्यवस्था स्थापित की। उसने क्रांति के ख़तरे से पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने, सोवियत संघ और लोक जनवाद के देशों में समाजवाद को नष्ट करने और सारी दुनिया पर अपना आधिपत्य जमाने की योजना को लागू किया।

अपने इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवाद ने दुतरफा रास्ता अपनाया।

एक रास्ता था खुलेआम सैनिक हमले का रास्ता। उन्होंने नाटो जैसे हमलावर सैनिक गठबंधन बनाए, शक्तिशाली नौसैनिक बेड़े बनाकर उन्हें दुनिया के सभी समुद्रों और महासागरों में तैनात किये और अनेक देशों में सैनिक अड्डे स्थापित किये। अमरीकी सेनाओं ने यूनान के लोगों के क्रांतिकारी संघर्ष को कुचल दिया और उस देश में वहशी सैनिक हुकूमत स्थापित की, जो कई दशकों तक टिकी रही। अमरीका ने वियतनामी लोगों के खि़लाफ़ बेरहम युद्ध किया, जिसमें दसों-लाखों लोग मारे गए, और अंत में वियतनाम के बहादुर लोगों ने उसे हराया। कोरिया के लोगों के राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष को कुचलने के लिए, जापान में सामाजिक क्रांति को रोकने और चीन को धमकाने के लिए, अमरीकी फ़ौज जापान और दक्षिण कोरिया में बीते सात दशकों से तैनात है।

दूसरा रास्ता था विचारधारात्मक हमले का, समाजवादी देशों और कम्युनिस्ट पार्टियों का विनाश करने और उनका पतन करने का रास्ता। सोवियत संघ का एक समाजवादी देश से एक सामाजिक साम्राज्यवादी देश में तब्दील हो जाना, जो दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए अमरीका के साथ कभी सहयोग तो कभी स्पर्धा करता हो, यह विश्व साम्राज्यवाद के लिए बहुत बड़ी जीत थी। शीत युद्ध के दौरान, दोनों महाशक्तियों ने मिलकर, समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष को नष्ट करने का काम किया।

सोवियत संघ के विघटन के साथ, क्रांति के पीछे हटने की एक नयी अवधि शुरू हो गयी। अमरीकी साम्राज्यवाद और सारी दुनिया के प्रतिक्रियावादी सरमायदारों ने कम्युनिज्म पर भयानक हमला शुरू कर दिया। उन्होंने “कम्युनिज्म का अंत” घोषित कर दिया। परन्तु अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में प्रतिक्रियावादी सरमायदार आज भी इस बात से बहुत डरे हुए हैं कि श्रमजीवी वर्ग और लोग इस शोषण-दमन की व्यवस्था के खि़लाफ़ क्रांति लायेंगे।

वर्तमान अवधि

अमरीकी साम्राज्यवाद सारी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने, यानी अपनी हुक्मशाही के तले एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए अनवरत कोशिश करता रहा है। उसने अपने अस्त्रागार से सारे हथियारों का इस्तेमाल किया है - उसकी विशाल आर्थिक ताक़त, प्रचंड सैनिक ताक़त, आतंकवाद को प्रश्रय देना और साथ ही साथ मज़दूर वर्ग और लोगों के खि़लाफ़ भयानक विचारधारात्मक हमला करना।

दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के उद्देश्य को हासिल करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवाद “सभ्यताओं की टक्कर” के प्रतिक्रियावादी सिद्धांत का प्रचार करता रहा है। इस सिद्धांत के अनुसार, सारी दुनिया में मुख्य संघर्ष शोषक और शोषित वर्गों के बीच में नहीं बल्कि “सभ्य” ईसाइयों  और “असभ्य” इस्लामी राष्ट्रों और लोगों के बीच में है। अपने साम्राज्यवादी इरादों को हासिल करने के लिए, लोगों को धोखा देने और आतंकित करने के लिए, नाजायज़ जंग को जायज़ ठहराने के लिए, राष्ट्रों के विनाश, बढ़ते फासीवादी दमन और झूठे प्रचार को उचित ठहराने के लिए, एक इस्लामी विश्वव्यापी ताक़त का हव्वा खड़ा किया जा रहा है।

अमरीकी साम्राज्यवाद सारी दुनिया में कई आतंकवादी गिरोहों को गुप्त रूप से समर्थन और प्रश्रय देता रहा है। उन गिरोहों द्वारा फैलाई गयी हिंसा और अराजकता को बहाना बनाकर पूंजीवादी राज्य “आतंकवाद पर जंग” के नाम पर, कठोर कानून लागू करके पुलिस की ताक़त को बहुत बढ़ाना तथा राजकीय आतंकवाद को खूब तेज़ कर देना जायज़ ठहराते हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद ने जान-बूझकर उन आतंकवादी गिरोहों को इस्लाम मजहब के साथ संबंधित करार दिया है, ताकि दुनियाभर में मुसलमान लोगों को निशाना बनाना और पश्चिम एशिया व उत्तरी अफ्रीका के लोगों के खि़लाफ़ बेरहम जंग चलाना उचित ठहराया जा सके।

शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद, अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके पूंजीवादी-साम्राज्यवादी मित्रों ने, पेरिस चार्टर के ज़रिये, यह मांग की कि सभी देशों को बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र और “मुक्त बाज़ार” की व्यवस्थाएं अपनानी होंगी। जिन-जिन देशों ने ऐसा करने से इनकार किया है, जिन्होंने अपनी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का पालन करने की कोशिश की है, उन्हें “दुष्ट राज्य” घोषित किया गया है और साम्राज्यवादियों द्वारा आयोजित शासन परिवर्तन का शिकार बनाया गया है।

दिन-ब-दिन यह साफ होता जा रहा है कि बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र जनता के ऊपर इजारेदार पूंजीपतियों की बेरहम हुक्मशाही के अलावा और कुछ नहीं है। अनेक देशों में मज़दूर वर्ग और लोग उसे ठुकरा रहे हैं और एक ऐसे आधुनिक लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी।

इन परिस्थितियों में अमरीकी साम्राज्यवाद अलग-अलग देशों में “लोकतंत्र-परस्त” और “भ्रष्टाचार-विरोधी” आन्दोलनों को गुप्त रूप से प्रश्रय देता रहा है। उनका इरादा है लोकतंत्र का नव-निर्माण करने के लिए श्रमजीवी वर्ग और लोगों के असली संघर्ष को गुमराह करना और ख़त्म करना। उनका यह भी मकसद है कि अलग-अलग देशों की सरकारों पर अमरीकी लाइन के अनुसार चलने का दबाव डाला जाए और सभी देशों में ऐसी सरकारें सत्ता पर लाई जाएं, जो अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ नजदीकी से जुड़ी हों।

अमरीकी साम्राज्यवाद इस धरती पर सबसे बड़ी आर्थिक और सैनिक ताक़त है। सेना पर अमरीका का खर्च दुनिया के बाकी सारे देशों के मिले-जुले सैनिक खर्च से ज़्यादा है। अमरीका की सेनायें दुनिया के कोने-कोने में तैनात हैं। अमरीका ने अपनी आर्थिक और सैनिक ताक़त का इस्तेमाल करके, कई संप्रभु देशों को धमकाया है और तबाह किया है।

शीत युद्ध के ख़त्म होने के बाद, अमरीका की अगुवाई में सैनिक दख़लंदाजी की वजह से, यूगोस्लाविया, अफ़गानिस्तान, इराक और लीबिया नष्ट हो गए हैं। बीते कई वर्षों से अमरीका सीरिया में बेरहम युद्ध चला रहा है। अमरीका ने दुनिया के कई देशों में अलग-अलग “रंगीन क्रांतियां” आयोजित की हैं, गृह युद्ध छेड़े हैं और वहां शासन परिवर्तन करके, ऐसी सरकारें लाया है जो अमरीका के साथ नजदीकी के संबंध रखती हों। उसने क्यूबा, उत्तरी कोरिया और ईरान समेत कई देशों पर अमानवीय आर्थिक नाकेबंदी थोप रखी है। यह सब “आज़ादी और लोकतंत्र”, “मानव अधिकार”, “आतंकवाद पर जंग”, “दुष्ट राज्य” आदि जैसे नारों के साथ किया जाता रहा है।

सभी देशों के बाज़ारों और कच्चे माल के स्रोतों पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए अमरीका ने यह मांग की है कि सभी देशों के बाज़ार साम्राज्यवादियों के लिए खोल दिए जाएं। “मुक्त बाज़ार” और “व्यापर की बाधाओं को तोड़ गिराने” के नाम पर अमरीका ने विश्व साम्राज्यवादी छावनी के नेता बतौर, सभी देशों में और अधिक निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण को बढ़ावा दिया है। उसने पूंजीनिवेश तथा व्यापार और वाणिज्य में, वित्त पूंजी के आने-जाने में सारी बाधाओं को हटाने की कोशिश की है। अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके मित्रों का मकसद है दूसरे देशों के संसाधनों को और ज्यादा लूटने के लिए, उनमें और ज्यादा वित्त पूंजी निवेश करने के लिए और उन पर सस्ती उपभोज्य वस्तुओं को लादने के लिए, उनकी अर्थव्यवस्थाओं के दरवाज़ों को खोलकर, सभी देशों के मज़दूर-मेहनतकशों का अधिक से अधिक शोषण और लूट करना। इन सब तरीकों से अमरीकी साम्राज्यवाद ने दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को तबाह किया है, उनकी आत्म-निर्भरता को नष्ट किया है और उनकी जनता के हित में उनके संसाधनों को इस्तेमाल करने के उनके संप्रभु अधिकार का हनन किया है।

शीत युद्ध के ख़त्म होने के बाद की अवधि में, पूंजीवादी विकास के चलते, कई ताक़तें उभर कर आगे आ रही हैं, जो सभी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को निर्धारित करने की कोशिश कर रही हैं। अपने वर्चस्व में एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने की अमरीकी साम्राज्यवाद की हमलावर कोशिश और बहु-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने की जर्मनी, रूस, चीन, जापान, हिन्दोस्तान, ब्राज़ील और दूसरे राज्यों की कोशिशों के बीच कई अंतर्विरोध खड़े हो रहे हैं। बाज़ारों, कच्चे माल के स्रोतों और प्रभाव क्षेत्रों पर अन्तर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध और तीखे होते जा रहे हैं। दुनिया के कई देशों के लोगों पर प्रतिक्रियावादी युद्ध में फंसने का ख़तरा मंडरा रहा है।

दुनिया के ऊर्जा संसाधनों, खास तौर पर तेल और प्राकृतिक गैस के स्रोतों पर कब्ज़ा करना, यह दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने की अमरीका की रणनीति का मुख्य उद्देश्य है। इसका यह कारण है कि जर्मनी, फ्रांस, इटली, चीन, जापान और हिन्दोस्तान, ये सभी देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को चलाने के लिए तेल और गैस के आयात पर बहुत निर्भर हैं। कब्ज़ाकारी जंग, “रंगीन क्रांतियां”, नाकेबंदी, ये सभी क़दम पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण अमरीका के तेल और गैस निर्यात करने वाले देशों के खि़लाफ़ इस्तेमाल किये जा चुके हैं। रूस, जो एक प्रमुख तेल और गैस निर्यातक देश है, को भी इसी उद्देश्य से घेरने और तोड़ने के प्रयास किये जा रहे हैं। 

अमरीका एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र में अपनी सैनिक शक्ति को बड़े हमलावर तरीके से बढ़ा रहा है। वह चीन को घेरने के इरादे से, अपनी अगुवाई में जापान, ऑस्ट्रेलिया और हिन्दोस्तान का सैनिक गठबंधन बना रहा है। एशिया पर अपना सम्पूर्ण वर्चस्व जमाने की अमरीका की रणनीति में, हिन्दोस्तान के शासक वर्ग के साथ उसका रणनैतिक सैनिक गठबंधन बहुत महत्वपूर्ण है। हिन्दोस्तान की फ़ौज और खुफिया एजेंसियों को अमरीका की फ़ौज और खुफिया एजेंसियों के साथ सम्मिलित करने के ज़ोर-शोर से प्रयास चल रहे हैं। अमरीका जानबूझकर, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के आपसी झगड़े में, आग में घी डालने का काम कर रहा है। अमरीका हिन्दोस्तान के शासक वर्ग को चीन से दुश्मनी मोल लेने को उकसा रहा है।

सभी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देशों में हुक्मरान सरमायदार मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों के अधिकारों पर भयानक हमले कर रहे हैं, उनका शोषण खूब बढ़ा रहे हैं। वे अपने-अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवाद और दूसरे साम्राज्यवादियों के साथ कभी सहयोग करते हैं तो कभी टकराते हैं। उन्होंने स्पष्ट दिखा दिया है कि देश की आज़ादी और संप्रभुता के झंडे को वे पांव तले रौंदने को भी तैयार हैं। वे दुनिया को आपस में बांटने के लिए, साम्राज्यवादी जंग में भाग लेने की बड़ी सरगर्मी के साथ तैयारी कर रहे हैं।

सिर्फ मज़दूर-मेहनतकश ही अपने-अपने देशों को साम्राज्यवादियों और प्रतिक्रियावादी सरमायदारों के ख़तरनाक रास्ते से बचा सकते हैं। इसके लिए, मज़दूरों-मेहनतकशों को अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेनी होगी और पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को, जो चारों तरफ मौत और तबाही फैला रही है, ख़त्म करना होगा। अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई में, मज़दूर वर्ग सभी शोषित और उत्पीड़ित लोगों को संघर्ष में नेतृत्व देगा और समाजवाद की नयी दुनिया को जन्म देगा - जिसमें न तो इंसान द्वारा इंसान का शोषण होगा, न ही एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्रों का शोषण होगा। इसी से शांति, खुशहाली और प्रगति सुनिश्चित होगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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