सीवर में मल साफ करने वालों की मौत के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन

देश के अलग-अलग भागों में सीवर में मल साफ करने वालों की मौतों का विरोध करने के लिये नई दिल्ली में 25 सितंबर, 2018 को संसद पर एक रैली आयोजित की गई। अनेक राजनीतिक पार्टियों और संगठनों के कार्यकर्ता तथा बड़ी संख्या में छात्र और नौजवान रैली में उपस्थित थे।

प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर थे जिन पर नारे लिखे हुये थे जैसे कि - “हमें मारना बंद करो!”, “सीवर में मरते महीने में पचास, किसका साथ, किसका विकास?”, “सरकार भेजे मंगलयान हम गंवायें सीवर में जान!”, “लोग गंवाते सीवर में जान, कैसा ये स्वच्छ भारत अभियान?”, आदि।

प्रदर्शनकारियों में हाथ से मल साफ करने वाले कई मज़दूर शामिल थे और उन मज़दूरों के परिजन भी, जो सीवर व सेपटिक टैंक साफ करते हुये मर गये थे। उन्होंने विवरण किया कि किस तरह प्रतिदिन और प्रति घंटे उन्हें राज्य के अधिकारियों के हाथों अमानवीय बर्ताव सहना पड़ता है। उन्होंने अपनी बेहद ग़रीबी, जातिवादी भेदभाव और दमन तथा जीवन की निराशाजनक हालतों के बारे में बताया, जिनके कारण वे इस काम को करने को मजबूर हैं। उन्होंने साफ-साफ बताया कि जब भी ऐसी मौतें होती हैं तो राज्य के अधिकारी ठीक से जांच नहीं करते। बल्कि राज्य के इन अपराधों पर परदा डालने की पूरी कोशिश की जाती है और मृत मज़दूरों के परिवारों को कोई मुआवज़ा भी नहीं दिया जाता।

Sewres worker

Sewres worker  

रैली में वक्ताओं ने सरकार के “स्वच्छता अभियान” के खोखले दावों का पर्दाफाश किया और हमारे शहरों और गांवों को साफ रखने वाले लाखों-लाखों मज़दूरों को इंसान लायक सम्मानजनक जीवन देने में सरकार की नाकामयाबी की कड़ी निन्दा की। उन्होंने कहा कि हिन्दोस्तानी राज्य अपने प्रौद्योगिक विकास का जोर-शोर से प्रचार करता है परन्तु मल साफ करने वाले मज़दूरों को ज़रूरी यंत्र व सुरक्षा साधन तक नहीं दिला सकता है। वक्ताओं ने मल साफ करने वालों की दुर्दशा को सबकी नज़र में लाने और इस अमानवीय अभ्यास को खत्म करने के लिये, आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

सिर्फ बीते दो हफ्तों में ही एनसीआर इलाके में 6 सीवर साफ करने वालों की मौतों की खबर आई है जबकि छत्तीसगढ़ से 5 ऐसी मौतों की खबर आई है।

हाथ से मल साफ करना, यह हिन्दोस्तानी समाज में आज तक प्रचलित एक बहुत ही घिनावना अभ्यास है। इसमें मज़दूरों को सीवरों और सूखे लैट्रिन से हाथ से मल साफ करने को मजबूर किया जाता है। इस काम के लिये सिर्फ कुछ मामूली साधन, जैसे कि बाल्टी, झाड़ू, टोकरी और हाथ इस्तेमाल करने पड़ते हैं। साथ ही साथ, हाथ से मल साफ करने का यह अभ्यास हिन्दोस्तानी समाज में जाति प्रथा की एक भयंकर अभिव्यक्ति है, जिसमें सबसे निचले वर्ग, दलितों, में सबसे ग़रीब लोगों को यह काम करने को मजबूर किया जाता है।

हिन्दोस्तान में आज़ादी के लगभग 46 वर्ष बाद, 1993 में हाथ से मल साफ करने के अभ्यास को आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित किया गया। परन्तु उसके 25 वर्ष बाद, आज भी यह अमानवीय अभ्यास देश में विस्तृत तौर पर प्रचलित है। 2013 में सरकार ने इस काम को रोकने और इन मज़दूरों को पुनः स्थापित करने के लिये एक अधिनियम जारी किया था। अधिनियम जारी करते समय सरकार ने दावा किया था कि हाथ से मल साफ करने वालों की असली संख्या पता की जायेगी और उन्हें पुनः स्थापित करने के कदम लिये जायेंगे। परन्तु आज तक हाथ से मल साफ करने वालों की संख्या पर कोई पक्के सरकारी आंकड़े नहीं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, देशभर में 7,40,078 परिवार हैं जिनमें एक या अनेक सदस्य इस काम में लगे हुये हैं और देहाती इलाकों में महिलाओं की बड़ी संख्या इस काम में लगी हुई है। परन्तु सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये आंकड़े हकीकत से बहुत कम हैं।

मल साफ करने वाले मज़दूरों, खासकर शहरों में सीवर साफ करने वालों को बहुत ही खतरनाक और अमानवीय हालतों में काम करना पड़ता है। उन्हें प्रशासन की ओर से किसी भी प्रकार के सुरक्षा साधन नहीं दिये जाते - न कोई विशेष पहनावा, न दस्ताने, न बूट, न सीवर से निकलने वाली घातक गैसों से रक्षा के लिये मास्क। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में जब हाथ से मल साफ करने वालों के पंजीकरण के लिये एक कैंप आयोजित किया गया था तो उसमें भाग लेने वालों ने पत्रकारों को बताया कि उन्हें इस घिनावने और खतरनाक काम के लिये, शहरों में प्रतिदिन 40-90 रुपये मात्र दिया जाता है। ग्रामीण इलाकों में उन्हें कोई पैसा नहीं दिया जाता, सिर्फ हर दिन दो रोटी और हर 6 महीने में थोड़ा सा अनाज।

सीवर में काम करते हुये मज़दूरों के मरने की खबरें रोज़ मिलती हैं। कानून और सरकारी दावों के बावजूद, यह काम खुलेआम, राज्य के अधिकारियों की पूरी जानकारी और इजाज़त के साथ, चलता है। हाथ से मल साफ करने वाले अधिकतम मज़दूरों के पास रोज़गार का कोई और साधन नहीं है। वे खुद को व अपने परिवारों को ज़िन्दा रखने के लिये इस अमानवीय काम को करने को मजबूर हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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