जीने लायक वेतन के लिए मज़दूरों का संघर्ष : शोषक पूंजीवादी व्यवस्था को ख़त्म करने के नज़रिये से संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा

देश के मज़दूर बार-बार यह मांग करते आ रहे हैं कि हिन्दोस्तानी राज्य को सभी मज़दूरों के लिए जीने लायक वेतन सुनिश्चित करना चाहिए। मज़दूर एक ऐसे वेतन के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिससे वे अपने परिवार सहित सम्मान का जीवन जी सकें। मज़दूर सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा व पेंशन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ताकि नौकरी छूट जाने पर, बीमार पड़ने पर, विकलांग होने पर या वृद्धावस्था में उन्हें कुछ सुरक्षा मिले।

हिन्दोस्तान के संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अध्याय में यह ऐलान किया गया है कि :

Annual Wage Rate_2018अनुच्छेद 43: राज्य उपयुक्त कानून या आर्थिक संगठन या किसी अन्य तरीके से, सभी कृषि, औद्योगिक या अन्य श्रमिकों को काम, एक जीने लायक वेतन, सम्मानजनक जीवन स्तर तथा आराम व सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों से भरपूर जीवन सुनिश्चित करने के लिए काम की स्थितियों को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा...”

यह नीति निदेशक तत्व, कई दूसरे ऐसे तत्वों की तरह, सिर्फ शब्दों में ही रह गया है। बीते 68 वर्षों में राज्य ने सभी श्रमिकों को काम, एक जीने लायक वेतन और आज की हालतों में सम्मानजनक कहलाये जाने लायक जीवन स्तर सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त कानून या आर्थिक संगठन या किसी अन्य तरीके से कोई कदम नहीं उठाया है।

काम के विषय को लीजिये। हिन्दोस्तानी राज्य ने काम के अधिकार को सुनिश्चित करने से इनकार कर दिया है। करोड़ों मज़दूर बेरोज़गार हैं या उनके पास बहुत कम काम है। उनके पास रोज़ी-रोटी का कोई साधन नहीं है। राज्य ने अब एक कानून पास किया है जिसके अनुसार, सभी क्षेत्रों में पूंजीपतियों को, ‘फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट’ के नाम से, मज़दूरों को जब मर्ज़ी काम पर रखने और जब मर्ज़ी काम से निकाल देने की पूरी छूट दी गयी है। राज्य ऐसे कानून पास करने की कोशिश कर रहा है जिनसे पूंजीपतियों को अधिक से अधिक मज़दूरों को, कोई कानूनी हक़ दिए बिना, ठेके पर या प्रशिक्षु या अपरेंटिस बतौर रखने की पूरी छूट दी जा सके।

Minimum wages per monthजीने लायक वेतन के विषय को लीजिये। केंद्र और राज्य सरकारें न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत आने वाले उद्यमों और कारोबारों में न्यूनतम वेतन तय करती हैं, जिसे देने को हर मालिक बाध्य होता है। बीते कई वर्षों से मज़दूर वर्ग आन्दोलन यह मांग करता आ रहा है कि केंद्र सरकार को राष्ट्रीय फ्लोर लेवल न्यूनतम वेतन प्रति माह 18,000 रुपए निर्धारित करना चाहिए और उसमें परिवर्तनशील महंगाई भत्ता (वी.डी.ए.) जोड़ना चाहिए, ताकि बढ़ती महंगाई का सामना किया जा सके। मज़दूर वर्ग यह मांग करता आ रहा है कि देश के किसी भी मज़दूर को इससे कम वेतन नहीं मिलना चाहिए।

परन्तु, इस मांग का खंडन करते हुए, केंद्र सरकार ने 1 जुलाई, 2017 से, राष्ट्रीय फ्लोर लेवल न्यूनतम वेतन को प्रतिदिन 176 रुपए निर्धारित कर रखा है। यह प्रति माह मात्र 4576 रुपए बनता है। यह अत्यंत कम वेतन भी सिर्फ ‘सिफारिश’ है; राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी नहीं है कि सब मज़दूरों को यह वेतन दिया जाए!

निम्नलिखित तालिका में अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित बेहद कम न्यूनतम वेतनों को दिखाया गया है। ये उद्योग और सेवा क्षेत्रों में अकुशल कहलाये जाने वाले मज़दूरों के वेतन हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग न्यूनतम वेतन निर्धारित हैं, पर यहां उनमें से सबसे कम वेतन लिए गए हैं। हर राज्य में, खेत मज़दूरों के वेतन इनसे कम हैं। ये 2018 के आंकड़े हैं।

अप्रैल 2017 से, दिल्ली सरकार ने न्यूनतम वेतन को प्रति माह 9,724 रुपये से बढ़ाकर, 13,350 रुपये कर दिया था। परन्तु अगस्त 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया, यह कहकर कि उस फैसले में मालिकों के साथ सलाह नहीं की गयी थी। कर्णाटक ने बीते पांच वर्षों से वेतनों को स्थगित रखने के बाद, इसी वर्ष अप्रैल में न्यूनतम वेतनों को बढ़ाया।

प्रोफेसर बिनो पॉल आदि द्वारा इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली (26 जुलाई, 2014) में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, फैक्ट्री मज़दूर का असली औसतन वेतन 1999 और 2012 के बीच के 12 वर्षों की अवधि में स्थगित रहा या घट गया। घोषित वेतन दर क्रमशः बढ़ता रही। परन्तु असली वेतन 12 वर्ष की अवधि के दौरान 45,000 रुपए प्रति वर्ष पर स्थगित रहा। (निम्न ग्राफ देखिये)।

जबकि सबसे बड़े पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग बेशुमार धन कमाता रहा है, तो दूसरी ओर मज़दूर जनसमुदाय बेहद कठिन हालतों में जीने को मजबूर है। निम्न तालिका में औसतन वेतन दिए गए हैं। मज़दूरों की बहुत बड़ी संख्या इस औसतन वेतन के कम और सरकारी तौर पर घोषित न्यूनतम वेतन से कम वेतन पर काम करने को मजबूर है।

राज्य का घोषित न्यूनतम वेतन वास्तव में क्या है?

1948 में राज्य द्वारा न्यूनतम वेतन अधिनियम को पास किया गया। उचित वेतन निर्धारित करने के लिए एक कमेटी बिठाई गयी। उस समय दूसरे विश्व युद्ध का अंत हुआ था। सोवियत संघ की अगुवाई में एक समाजवादी मोर्चा स्थापित हुआ था और क्रांति की लहर तेज़ गति से आगे बढ़ रही थी। हिन्दोस्तान तभी आज़ाद हुआ था और हिन्दोस्तान के पूंजीपतियों को यह डर था कि कहीं सम्पूर्ण सामाजिक क्रांति न हो जाए।

उचित वेतन निर्धारित करने के लिए बनायी गयी कमेटी ने तीन अलग-अलग वेतन स्तर निर्धारित किये: (1) जीने लायक वेतन (2) उचित वेतन (3) न्यूनतम वेतन।

कमेटी की परिभाषा के अनुसार, जीने लायक वेतन वह वेतन है जिसके साथ मज़दूर अपने व अपने परिवार के लिए न सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान की मूल ज़रूरतें बल्कि बच्चों की शिक्षा, बीमारियों से रक्षा, आवश्यक सामाजिक ज़रूरतों की पूर्ती तथा बुढ़ापा और अन्य दुर्भाग्यों से कुछ हद तक सुरक्षा मुहैया करा सकें। कमेटी ने ऐलान किया था कि जीने लायक वेतन अंतिम उद्देश्य होना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय आमदनी बहुत कम है और उद्योग के पास इतना वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। यानी, हिन्दोस्तानी राज्य ने ऐलान किया था कि मज़दूरों को जीने लायक वेतन सुनिश्चित कराना एक दूर का नीतिगत उद्देश्य है। परन्तु आज तक यह जीने लायक वेतन एक दूर का नीतिगत उद्देश्य ही बना रहा है, हालांकि बीते 70 वर्षों में राष्ट्रीय आमदनी कई गुना बढ़ गयी है।

कमेटी ने न्यूनतम वेतन की यह परिभाषा दी कि इस वेतन से न सिर्फ जीवन की मूल ज़रूरतें पूरी होनी चाहियें, बल्कि मज़दूर की कार्यकुशलता भी बनी रहनी चाहिए। इसलिए, न्यूनतम वेतन से कुछ हद तक शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य ज़रूरतें भी पूरी होनी चाहियें।

कमेटी की परिभाषा के अनुसार, उचित वेतन को जीने लायक वेतन और न्यूनतम वेतन के बीच में होना चाहिए। पूंजीपतियों, मज़दूरों और सरकार के प्रतिनिधियों के गठित वेज बोर्ड को उचित वेतन निर्धारित करना था।

किसी भी समय पर सरकार द्वारा निर्धारित किया गया न्यूनतम वेतन सम्पूर्ण मज़दूर वर्ग के औसतन वेतन को निर्धारित करता है।

जुलाई 1957 में नयी दिल्ली में हुए इंडियन लेबर कांफ्रेंस के 15वें सत्र में यह तय किया गया था कि न्यूनतम वेतन को ज़रूरत पर आधारित होना चाहिए और उससे औद्योगिक मज़दूर की न्यूनतम मानवीय ज़रूरतों की पूर्ती सुनिश्चित होनी चाहिए। उस कांफ्रेंस में न्यूनतम वेतन कमेटी और वेज बोर्ड समेत सभी वेतन निर्धारित करने वाले अधिकारियों के लिए कायदे तय किये गए थे। यह तय हुआ था कि न्यूनतम वेतन की गणना करने का आधार होगा 2700 कैलोरी उपभोग, प्रति वर्ष 18 गज कपड़ा, कम आमदनी समूह (लो इनकम ग्रुप) के लिए सरकारी आवास के किराये के बराबर किराया, तथा ईंधन, बिजली, आदि के लिए अतिरिक्त 20 प्रतिशत।

1991 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला किया कि न्यूनतम वेतन तय करने में, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, थोड़ा मनोरंजन, बुढ़ापा और शादी-विवाह के लिए अतिरिक्त 25 प्रतिशत दिया जाना चाहिए।

केंद्र और राज्य सरकारों ने 15वें इंडियन लेबर कांफ्रेंस की सिफारिशों या 1991 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कभी नहीं लागू किया है। “न्यूनतम वेतन” को किस तरह निर्धारित किया जाना चाहिए, उस विषय पर और उसे लागू करवाने के लिए बीते इतने वर्षों से संघर्ष चल रहा है। परन्तु इंडियन लेबर कांफ्रेंस की 1957 की सिफारिशों के 60 वर्ष बाद आज भी, अधिकतम मज़दूर गंदी झुग्गी-बस्तियों में, साफ पीने का पानी और शौच प्रबंध के बिना, रहने को मजबूर हैं। न तो इन मज़दूरों की स्वास्थ्य सेवा के लिए कोई प्रावधान है, न ही बच्चों की शिक्षा के लिए या वृद्धावस्था या शादी-विवाह के लिए। ये मज़दूर अपने परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन भी नहीं सुनिश्चित कर पाते हैं।

इसकी वजह पूंजीवादी व्यवस्था है। इसमें अर्थव्यवस्था की दिशा है मज़दूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण करके इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के अधिक से अधिक मुनाफ़ों को सुनिश्चित करना।

किसानों और अन्य छोटे उत्पादकों को लगातार तबाह करके और उन्हें मज़दूर वर्ग की श्रेणियों में धकेल कर ही पूंजीवाद का विकास हुआ है। मज़दूरों को जिं़दा रहने के लिए, पूंजीपतियों के हाथों अपना श्रम बेचना पड़ता है। पूंजीवादी संबंधों के विकास के साथ-साथ, बेरोज़गारों की फ़ौज की संख्या भी बढ़ती रही है। नौकरी के लिए और जीने के लिए मज़दूरों के आपस-बीच स्पर्धा का इस्तेमाल करके, शासक वर्ग पूरे मज़दूर वर्ग के शोषण को खूब बढ़ा देता है और वेतनों को कम से कम बनाए रखता है।

हिन्दोस्तानी राज्य न्यूनतम वेतन को बहुत ही कम रखकर, इसे वैधता देता है। हिन्दोस्तानी राज्य पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को बरकरार रखने के लिए, उनके हाथों में एक हथकंडा है। हिन्दोस्तानी राज्य पूंजीवादी शोषण की इस व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है, हालांकि वह लगातार झूठा प्रचार करता है कि राज्य के सहारे मज़दूरों के हितों की रक्षा की जा सकती है।

सच तो यह है कि पूंजीपति वर्ग अपने नियंत्रण में राज्य तंत्र का इस्तेमाल करके, निरंतर मज़दूरों के अधिकारों पर हमला करता है तथा मज़दूर वर्ग के शोषण को और तेज़ करता है। उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के झंडे तले, मज़दूर वर्ग के शोषण को कई गुना बढ़ा दिया गया है। इतने वर्षों तक निरंतर संघर्ष करके मज़दूरों ने जो अधिकार जीते थे, उन्हें अब बेरहमी से पांव तले रौंद दिया जा रहा है।

एक ऐसा सर्व हिन्द फ्लोर लेवल वेतन निर्धारित करना, जो जीने लायक वेतन होगा, जो सभी मज़दूरों पर लागू होगा, जो मज़दूरों और उनके परिवारों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करेगा, यह हुक्मरान पूंजीपति वर्ग और उसके राज्य का इरादा नहीं है। हुक्मरान पूंजीपति वर्ग ने सोच-समझकर यह सुनिश्चित किया है कि हरेक राज्य सरकार को अपने राज्य में कम-से-कम न्यूनतम वेतन निर्धारित करने की पूरी छूट दी जाए। न्यूनतम वेतन को कम से कम बनाए रखने के पक्ष में प्रत्येक राज्य सरकार यह बहाना देती है कि अगर न्यूनतम वेतन बढ़ा दिया जाता है तो पूंजी किसी दूसरे राज्य में भाग जायेगी। इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए, केंद्र सरकार कहती है कि अगर विदेशी पूंजी को हिन्दोस्तान में आकर्षित करना है तो हमारे मज़दूरों को अतिशोषण की हालतों को मान लेना पड़ेगा और कम से कम वेतन पर काम करने को तैयार रहना होगा।

जीने लायक वेतन के लिए मज़दूरों का संघर्ष एक जायज़ संघर्ष है। इस संघर्ष से यह सुनिश्चित होगा कि मज़दूर वर्ग, जो सारी दौलत का उत्पादनकर्ता है, अपने उत्पादों का कुछ ज्यादा हिस्सा प्राप्त कर सकेगा और आधुनिक परिस्थितियों के अनुसार एक सम्मानजनक जीवन जी सकेगा। यह संघर्ष सम्पूर्ण मज़दूर वर्ग के हित में है क्योंकि इससे पूरे मज़दूर वर्ग के वेतन बढ़ेंगे।

मज़दूर वर्ग को जीने लायक वेतन के लिए संघर्ष को इस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ाना होगा कि इस पूंजीवादी व्यवस्था को ख़त्म करना है, जिसमें मज़दूर वेतनभोगी गुलाम हैं। पूंजीपति वर्ग के शासन की जगह पर मज़दूर-किसान की हुकूमत स्थापित करनी होगी। उत्पादन और विनिमय के प्रमुख साधनों को पूंजीपति वर्ग के हाथों से लेकर समाज के नियंत्रण में लाना होगा। मज़दूरों और किसानों का राज्य समाज के सभी सदस्यों की बढ़ती भौतिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिलाएगा।

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जीने लायक वेतन    शोषक पूंजीवादी    Oct 1-15 2018    Voice of the Party    Economy     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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