आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना : स्वास्थ्य और बीमा क्षेत्र में बड़ी-बड़ी इजारेदार कंपनियों के मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने का इरादा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 23 सितम्बर को झारखण्ड से आयुष्मान भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना का उद्घाटन किया।

सरकारी प्रचार माध्यम के अनुसार, आयुष्मान भारत दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का पहला सत्र 2018-2020 में लागू किया जाएगा। इस योजना के तहत मुख्य पहलकदमियां हैं देश के कोने-कोने में हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर की स्थापना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, जिसे प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का नाम दिया गया है। सम्पूर्ण आयुष्मान भारत योजना को लागू करने वाली सरकारी निकाय नेशनल हेल्थ एजेंसी (एन.एच.ए.) होगी।

हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर्स के बारे में यह प्रचार किया जा रहा है कि इनसे “स्वास्थ्य सेवा जनता के और करीब आ जायेगी”। ये हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर्स वास्तव में मातृत्व और बाल स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए बनाए गए सरकारी स्वास्थ्य उप-केन्द्रों के “उन्नत” अवतार होंगे। ऐसा कहा जा रहा है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत, इन वैलनेस सेंटरों में ढांचागत विस्तार किया जायेगा, कि इनमें सभी ज़रूरी सुविधायें मुहैया कराई जायेंगी और पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्य कर्मी नियुक्त किये जायेंगे, ताकि ये मातृत्व और बाल स्वास्थ्य सेवा समेत सर्वव्यापक स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर सकेंगे और आवश्यक दवाएं व जांच सेवाएं मुफ्त में दिला सकेंगे। परन्तु इनके लिए बजट में मात्र 1200 करोड़ रुपए निर्धारित किये गए हैं, यानी कि प्रत्येक हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर पर मात्र 80,000 रुपये का निवेश किया जायेगा।

कौन-कौन से परिवार आयुष्मान भारत योजना के पात्र नहीं हैं:

सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस (2011) के अनुसार

  • परिवार जिसका सदस्य सरकारी नौकरी करता था।
  • परिवार जिसका गैर कृषि कारोबार सरकार में रजिस्टर्ड था।
  • परिवार जिसके पास 2.5 एकड़ से ज्यादा सिंचित भूमि इसके साथ 1 सिंचाई यंत्र था उसे भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।
  • परिवार जिसके पास 5 एकड़ से ज्यादा 2 फसल सीजन वाली सिंचित भूमि थी।
  • परिवार जो प्रोफेशनल टैक्स भरता था।
  • पास 3 या उससे अधिक कमरे का पक्की दीवार और छत वाला मकान था।
  • पास रेफ्रिजरेटर और लैंडलाइन फोन था।
  • परिवार जिसके पास 2 पहिया, 3 पहिया, 4 पहिया वाहन और फिशिंग बोट था।
  • परिवार जिसके पास 50 हजार रुपए से ज्यादा की लिमिट का क्रेडिट कार्ड था।
  • में अगर घर का कोई सदस्य 10 हजार रुपए से अधिक कमाता था।
  • परिवार जो उस समय (2011) में इनकम टैक्स भरा करता था उनको भी इस योजना में शामिल नहीं किया गया है।
  • परिवार जिसके पास 3 पहिया और 4 पहिया एग्रीकल्चर इक्विपमेंट (ट्रैक्टर) था।
  • परिवार जिसके पास एक सिंचाई यंत्र के साथ 7.5 एकड़ या उससे ज्यादा ज़मीन थी।

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत, हर परिवार को 5 लाख रुपए का बीमा कवरेज दिलाने का वादा किया गया है। यह हिन्दोस्तान के गांवों और शहरों में 10 करोड़ ग़रीब परिवारों (यानी लगभग 50 करोड़ लोगों) को दिया जायेगा। इसके तहत, अस्पताल में भर्ती होने पर सेवाओं के लिए बीमा कवरेज दिया जायेगा परन्तु प्राथमिक सेवा व बाह्य रोगी सेवाओं के लिए नहीं। ख़बरों के अनुसार, अब तक लगभग 8700 सरकारी और निजी अस्पताल इस योजना के पैनल में जुड़े हैं। 2018-19 के लिए, बजट में इसके लिए 2000 करोड़ रुपए निर्धारित किये गए हैं। वार्षिक बीमा प्रीमियम का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार देगी और 40 प्रतिशत राज्य सरकार देगी।

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के पात्र होने के लिए परिवार को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। ग्रामीण इलाकों में सोशियो इकोनोमिक कास्ट सेंसस (2011) की 5 ग़रीबी श्रेणियों के आधार पर पात्रता तय की जायेगी, जबकि शहरों में 11 रोज़गार श्रेणियों के आधार पर पात्रता तय की जायेगी। आयुष्मान भारत की आधिकारिक वेबसाइट पर लिखा हुआ है कि कौन-कौन से परिवार आयुष्मान भारत योजना के पात्र नहीं हैं।

इन शर्तों से बहुत स्पष्ट हो जाता है कि यह योजना सर्वव्यापक तो है ही नहीं। शहरों और गांवों में ग़रीब जनसमुदाय का बहुत बड़ा हिस्सा इस योजना का लाभ नहीं उठा पाएगा (देखिये बॉक्स: कौन-कौन से परिवार आयुष्मान भारत योजना के पात्र नहीं हैं)। मिसाल के तौर पर, अगर किसी परिवार का कोई एक सदस्य 10,000 रुपए से ज्यादा कमाता हो, या पक्के घर में रहता हो या उसके पास दुपहिया गाड़ी हो, तो वह परिवार इस योजना का पात्र नहीं है! पात्रता की इन शर्तों के ज़रिये बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के लिए द्वार खोल दिए गए हैं, यह निर्धारित करने के लिए कि कौन सा परिवार पात्र है और कौन सा नहीं।

सरकार यह प्रचार कर रही है कि यह योजना जनता को एक बहुत बड़ा तोहफा है, जो ग़रीब से ग़रीब आबादी को उच्च स्वास्थ्य सेवा पाने के क़ाबिल बना देगा। परन्तु कई तथ्यों से यह साफ़ हो जाता है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत सर्वव्यापक स्वास्थ्य सेवा का वादा सरासर फरेब है।

सरकारी स्वास्थ्य उपकेन्द्रों में से मात्र 11 प्रतिशत इस समय इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टेंडर्ड के मापदंडों के अनुसार काम कर रहे हैं। मौजूदा उपकेन्द्रों में ढांचागत सुविधाओं, दवाइयों, यंत्रों, सेवाओं, डाक्टरों व नर्सों की भारी कमी है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य कर्मियों को बहुत कम पैसा दिया जाता है, उन पर ढेर सारी दूसरी ज़िम्मेदारियां लाद दी जाती हैं और उनके अधिकार या रोज़गार की कोई सुरक्षा नहीं होती। मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की भी ऐसी ही ख़राब हालत है। जब तक स्वास्थ्य कर्मियों के काम की हालतों को सुधारने और पर्याप्त ढांचागत सुविधाओं व दवा आदि की सप्लाई बेहतर करने की ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा, तब तक “स्वास्थ्य सेवा जनता के और करीब” लाने का दावा खोखला ही रह जायेगा। हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के लिये प्रस्तावित 1200 करोड़ रुपये का प्रस्तावित सरकारी निवेश इतना कम है कि इससे ये बुनियादी ज़रूरतें कभी पूरी नहीं होंगी।

स्वास्थ्य बीमा योजना का अनुभव

राजस्थान में दिसंबर 2015 को भामाशाह स्वास्थ्य योजना का उद्घाटन किया गया था। बीमा क्लेम पहले वर्ष में 90 प्रतिशत से छलांग लगाकर, दूसरे वर्ष में 170 प्रतिशत हो गया। इसे देखते हुये, जब दो वर्षों की योजना का प्रथम सत्र समाप्त हुआ, तब बीमा कंपनी ने प्रीमियम की राशि को लगभग तिगुना कर दिया, यानी 370 रुपये प्रति परिवार प्रति वर्ष से 1263 रुपये कर दिया। न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी, जिसे बीमा का ठेका मिला था, उसने इनमें से कुछ अस्पतालों को फरेबी क्लेम करने के कारण, योजना के पैनल से हटाने की मांग की। परन्तु राजस्थान सरकार ने इस मांग को खारिज़ कर दिया। ऐसा होना अनिवार्य है, क्योंकि इन स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का असली मक़सद है जनता को स्वास्थ्य सेवा देने का झूठा वादा करके, निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के अधिक से अधिक मुनाफ़ों को सुनिश्चित करना।

सरकार यह दावा कर रही है कि इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के सहारे ग़रीब से ग़रीब लोग अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य सेवा पा सकेंगे, सरकारी अस्पतालों में और निजी अस्पतालों में भी, जो आमतौर पर उनकी पहुंच से बाहर होती है। परन्तु अगर सरकार को वास्तव में ग़रीब जनता को अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने में रुचि है, तो उसे गांवों और शहरों में सरकारी अस्पतालों में निवेश करना चाहिये, जहां ग़रीब जनता निःशुल्क या कम शुल्क पर अच्छे स्वास्थ्य उपचार प्राप्त कर सकेगी। परन्तु सरकार ऐसा न करके, इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना को बढ़ावा दे रही है, जिसका असली मकसद है निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के लिये बढ़ते बाज़ार और आसमान छूते मुनाफ़ों की गारंटी देना। इस योजना के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और बाह्य रोगी सेवाओं को बीमा कवरेज नहीं मिलेगा क्योंकि इन सेवाओं से निजी अस्पतालों के मुनाफे़ नहीं बढ़ेंगे। कई राज्यों में जहां पहले से स्वास्थ्य बीमा योजनायें चल रही हैं, वहां का अनुभव यही दिखाता है। (देखिये बाक्स: स्वास्थ्य बीमा योजना का अनुभव)

हिन्दोस्तानी राज्य ने जनता की स्वास्थ्य सेवा की दर्दनाक हालतों को हल करने के लिये कोई गंभीर क़दम नहीं लिया है। 60 और 70 के दशक में गांव-गांव, शहर-शहर और जिला-जिला में सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और उपकेन्द्रों की जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था स्थापित की गई थी, उसे मेहनतकश लोगों के श्रम से उत्पन्न धन, यानी सरकारी धन का निवेश करके बनाया गया था। उसका घोषित उद्देश्य था समाज के सभी सदस्यों के लिये मुफ्त में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराना। पूंजीपति शासक वर्ग की हरेक सरकार ने इस सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को जानबूझकर बिगड़ने दिया है, इसके लिये धन नहीं खर्च किया है और इसकी बिगड़ती हालतों को नज़रंदाज़ किया है।

दूसरी ओर, निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग को पनपने की पूरी छूट दी गई है। निजी स्वास्थ्य उद्योग की बड़ी-बड़ी इजारेदार कंपनियों ने आज देशभर में अस्पतालों की चेन खोल रखी हैं। इन अस्पतालों में मरीजों को सही उपचार दिये बिना उनसे लाखों-लाखों रुपये लूटे जाते हैं और मरीजों के प्रति अस्पताल की कोई जवाबदेही नहीं होती। राज्य इन बड़ी-बड़ी इजारेदार कंपनियों के हितों की बड़ी सरगर्मी से रक्षा करता है।

हमारी जनता ने लगातार यह मांग की है कि राज्य द्वारा संचालित एक सर्वव्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था स्थापित की जाये, जिसके तहत सभी को अपना अधिकार बतौर, मुनासिब दाम पर अच्छी स्वास्थ्य सेवा मिल सके। आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवा योजना की घोषणा करके सरकार यह दिखावा कर रही है कि वह जनता की इस ज़रूरी मांग को पूरा करने वाली है। परन्तु वह लोगों को धोखा दे रही है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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