जम्मू-कश्मीर में निगम व पंचायत चुनाव : अनवरत राजकीय आतंकवाद के बीच में “लोकतंत्र” का ढोंग

कश्मीर में हिन्दोस्तानी राज्य के बर्बर आतंक का राज अनवरत जारी है।

एक तरफ, पुलिस, सेना व अर्धसैनिक बल बेकसूर लोगों, महिलाओं व बच्चों पर गोली चलाते जा रहे हैं, बेधड़क बलात्कार और लूट-पाट करते जा रहे हैं। बेकसूर लोगों को “भयानक आतंकवादी” करार दिया जाता है, फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मार डाला जाता है, “तलाशी” लेने के बहाने घरों को लूटा और तहस-नहस कर दिया जाता है, नौजवान “लापता” होते रहते हैं या हिरासत में उनकी “मौत हो जाती है”। “पथराव करने वालों का मुकाबला करने” के नाम पर सैकड़ों लोगों को पेलेट बुलेट से अंधा बना देना, निहत्थे नौजवानों को सेना की गाड़ी पर बांध कर “मानव ढाल” की तरह इस्तेमाल करना - इन सारे क़दमों को सेनाध्यक्ष और केंद्र सरकार के प्रवक्ताओं ने जायज़ ठहराया है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफ्सपा) के चलते, कश्मीर में सेना को शक के आधार पर गोली चलाने, बलात्कार और अत्याचार करने की निरंकुश ताक़तें दी गयी हैं, और उसे किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही से बचाव मिलता है। जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 नामक काले कानून के तहत, नाबालिग बच्चों समेत सैकड़ों लोगों को किसी भी सबूत के बिना सालों-सालों तक जेल में बंद कर दिया जाता है और उनकी कोई सुनवाई नहीं होती।

राजकीय आतंक के साये में “लोकतान्त्रिक” चुनाव

“सुनियोजित चुनाव” कराने के नाम पर, एरिया डोमिनेटिंग ऑपरेशन (क्षेत्रीय नियंत्रण की सामूहिक कार्यवाहियां) किये जा रहे हैं। ये कार्यवाहियां सेना, सी.आर.पी.एफ. और जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप की संयुक्त घेराबंदी और तलाशी की कार्यवाहियां हैं। कई गांवों के समूह पर एक ही समय छापा मारा जाता है और घर-घर की तलाशी ली जाती है। आम तौर पर ऐसी कार्यवाही लगभग 10 घंटों तक चलती है।

आते-जाते लोगों की तलाशी, गाड़ियों की तलाशी, खोजी कुत्तों का इस्तेमाल, यह सब पूरे राज्य में ज़ोर-शोर से किया जा रहा है। जाना जाता है कि हर मतदान केन्द्र पर सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी है।

“सुरक्षा देने” के नाम पर, अधिकतम उम्मीदवारों को सुरक्षा बलों ने अनजान जगहों पर घेरबंदी में रखा है। अब तक किसी भी उम्मीदवार का कोई चुनाव अभियान नहीं हुआ है।

पूरे कश्मीर में लोगों की यह शिकायत है कि उन्हें यह मालूम नहीं है कि उनके उम्मीदवार कौन हैं, कि उन्हें कब और कहां मतदान करने जाना है। सरकार ने भी निर्वाचन आयोग की वेब साइट पर उम्मीदवारों के नाम, पता आदि नहीं चढ़ाये हैं। सिर्फ खुद उम्मीदवारों को, उनके परिजनों और उनकी पार्टी के सदस्यों को ही यह मालूम है कि वे चुनाव में खड़े हो रहे हैं, और सिर्फ वे ही उनके लिये वोट डालने जायेंगे, ऐसा लोगों का कहना है।

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, कश्मीर में कुल 624 नगर-निगम वार्डों में से 177 वार्डों में किसी उम्मीदवार के नामांकन पत्र दर्ज़ नहीं हुए हैं। कम से कम 215 वार्डों में उम्मीदवार निर्विवादित चुने जायेंगे। “अति संवेदनशील” कश्मीर चुनाव क्षेत्र में, 138 मतदान केन्द्रों में 78 उम्मीदवार अब तक निर्विवादित चुने जा चुके हैं, ऐसा घोषित किया गया है।

दूसरी तरफ, कश्मीर में लोग इस क्रूर राजकीय आतंक को चुनौती देते हुए, भारी तादाद में सड़कों पर उतर रहे हैं। ख़बरों के अनुसार, जब सेना “तलाशी” लेने और बेगुनाह नौजवानों को गिरफ़्तार करने आती है, तब सैकड़ों लोग बाहर आकर सेना को रोकते हैं। “लापता” लोगों के परिजन जांच और गुनहगारों को सज़ा की मांग उठाते हुए, बार-बार सड़कों पर प्रदर्शन करते आ रहे हैं। जब भी किसी फ़र्ज़ी मुठभेड़ में किसी नौजवान को मारा जाता है, तो गुस्साए लोगों की भीड़ और सुरक्षा बलों के बीच घमासान लड़ाई होती है। कश्मीर में जनता और सुरक्षा बलों के बीच टकराव रोज़ की घटना बन गयी है।

31 अगस्त को, दक्षिण कश्मीर के चार जिलों के अलग-अलग गांवों से पुलिस वालों के 11 परिजनों का अपहरण किया गया था। ये पुलिस वाले राज्य के उन “विशेष” पुलिस अफ़सरों में से थे, जो बेकसूर गांव-वासियों को गिरफ़्तार करने और मारने-पीटने, उनके घरों को लूटने और जलाने के लिए बदनाम हैं। हालांकि अपहृत परिजनों को कुछ ही घंटों में रिहा कर दिया गया था, परन्तु ऐसा लगता है कि उस घटना ने अधिकारियों को काफी झकझोर दिया और जम्मू-कश्मीर पुलिस अध्यक्ष का फ़ौरन तबादला कर दिया गया। एक और घटना में, 21 सितम्बर को शोपियां में तीन पुलिस वालों का अपहरण करके उन्हें मार डाला गया। जाना जाता है कि ये पुलिस वाले इख्वान गिरोह के सदस्य थे। इख्वान लोगों को आतंकित और उत्पीड़ित करने के मक़सद से राज्य द्वारा निर्मित और समर्थित एक आतंकवादी गिरोह है।

कश्मीर में जल रही आग में घी डालते हुए, अगस्त के आरम्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के धारा 35ए को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई शुरू कर दी। धारा 35ए के तहत कश्मीर के निवासियों को कुछ विशेष अधिकार दिए जाते हैं। कश्मीर की सभी राजनीतिक पार्टियों और जनांदोलनों ने फौरन सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई का विरोध किया। 6 अगस्त को, पूरे कश्मीर में बंद आयोजित किया गया। अनेक विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का विरोध किया गया और केंद्र सरकार की इस दुष्ट हरकत की कड़ी निंदा की गयी। इन जनप्रदर्शनों की वजह से, सुप्रीम कोर्ट को जनवरी 2019 तक अगली सुनवाई को स्थगित करना पड़ा।

कश्मीर में ऐसे माहौल के चलते, केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में निगम चुनावों की घोषणा कर दी। ये चुनाव चार सत्रों में - 8, 10, 13 और 16 अक्तूबर को - होंगे। इसके बाद पंचायत के चुनाव होंगे। कश्मीर की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियों - नेशनल कांफरेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी - तथा वहां की तमाम राजनीतिक ताक़तों ने राजकीय आतंक की इन हालतों में किये जा रहे चुनावों का बहिष्कार करने का बुलावा दिया है। ख़बरों के अनुसार, चुनावों का बहिष्कार करने का बुलावा देने वाले कई नेताओं और राजनीतिक ताक़तों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और उन्हें उत्पीड़ित किया जा रहा है। इन तथाकथित “मुक्त और निष्पक्ष” चुनावों को कराने के लिए कश्मीर में सैकड़ों-हजारों फ़ौजियों को तैनात कर दिया गया है। (देखिये बॉक्स: राजकीय आतंक के साये में “लोकतान्त्रिक” चुनाव)

कश्मीर में लोग इन चुनावों का जमकर विरोध कर रहे हैं। जॉइंट रेज़िस्टेंस (संयुक्त प्रतिरोध) के नेताओं ने कश्मीर के लोगों से आह्वान किया है कि चारों दिनों पर चुनावों का बहिष्कार करें और इस तरह केंद्र के सैनिक शासन के प्रति अपने विरोध व केंद्रीय राज्य से कश्मीर की जनता के सम्पूर्ण अलगावपन को दर्शायें।

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जॉइंट रेज़िस्टेंस के 8 अक्तूबर के बंद और चुनाव बहिष्कार के आह्वान का समर्थन किया। बार एसोसिएशन ने सभी वकीलों को उस दिन काम पर न आने को कहा। समाचार सूत्रों से जाना जाता है कि 8 अक्तूबर को हुए चुनावों के प्रथम सत्र में 8 प्रतिशत से कम मतदाताओं ने मतदान किया।

इन हालतों में, ये चुनाव लोकतंत्र का मज़ाक हैं। ये चुनाव किसी भी अंदाज़े से, जनमत की अभिव्यक्ति नहीं हैं। बल्कि, ये चुनाव “लोगों द्वारा चुनी गयी” सरकार के परदे के पीछे, सैनिक शासन की निरंतरता को वैधता देने की प्रक्रिया है। जब कश्मीर के लोग हिन्दोस्तानी राज्य से खुद को इतना अलग महसूस करते हैं, तो इन हालतों में उन पर चुनावों को थोपना फिर से यही दिखाता है कि हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग और हिन्दोस्तानी राज्य को कश्मीर के लोगों की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है।

कश्मीर में निर्वाचित सरकार एक परदा है, जिसके पीछे केंद्र सरकार अपने सेनाध्यक्षों के ज़रिये राज करती है। राज्य की मुख्य राजनीतिक पार्टियों, नेशनल कांफरेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, के पास वास्तव में कोई ताक़त नहीं है। कश्मीर के हर मामले में केंद्र सरकार का नियंत्रण होता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “कश्मीरियत, इंसानियत, जम्हूरियत” के बारे में बड़े-बड़े भाषण देते रहते हैं। केंद्र सरकार अपने वार्ताकारों को कश्मीर भेजने और “कश्मीरी लोगों तक पहुंचने” का बार-बार नाटक करती रहती है। परन्तु केंद्र सरकार ने कश्मीर की समस्या का राजनीतिक समाधान निकालने में कश्मीरी लोगों के साथ बातचीत करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। केंद्र में जो भी सरकार आयी है, उसने कश्मीरी लोगों को खुद अपना भविष्य तय करने के अधिकार से वंचित किया है। हर केंद्र सरकार ने कश्मीर की समस्या के राजनीतिक समाधान की ज़रूरत को नकारा है। हर केंद्र सरकार ने कश्मीर को एक “कानून और व्यवस्था” की समस्या जैसे माना है, जिसे बलपूर्वक कुचल देना चाहिए।

कश्मीर में राजकीय आतंक, सैनिक शासन और आफ्सपा को जायज़ ठहराने के लिए केंद्र सरकार ने हमेशा “सीमा-पार आतंकवाद” और अलगाववाद का बहाना दिया है। हाल ही में, सितम्बर में, जम्मू-कश्मीर की यात्रा करते हुए गृहमंत्री ने हिन्द-पाक सरहद पर दो स्मार्ट फेंस पायलट परियोजनाओं का उद्घाटन किया और फिर से “सीमा-पार आतंकवाद रोकने” के लिए उच्च प्रौद्योगिकी की बात की। कश्मीर के लोगों के सम्मान के साथ जीने और खुद अपना भविष्य निर्धारित करने के संघर्ष को “अलगाववादी” और “पाकिस्तान प्रेरित” बताया जाता है। जो भी कश्मीर में आफ्सपा और सैनिक शासन की ज़रूरत पर सवाल उठाता है या वहशी राजकीय आतंकवाद का विरोध करता है, उसे “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता” के लिये ख़तरा बताया जाता है और उसे उत्पीड़ित किया जाता है। बार-बार यह प्रचार किया जाता है कि कश्मीर के लोग “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तानी एजेंट” हैं। इस प्रचार के ज़रिये कश्मीर में सैनिक शासन को बरकरार रखना जायज़ ठहराया जाता है और देशभर में कश्मीरी लोगों का दमन सही ठहराया जाता है।

हमारे लोगों की एकता को ख़तरा ज़रूर है, परन्तु यह ख़तरा कश्मीरी लोगों से नहीं है, जैसा कि हिन्दोस्तान का हुक्मरान वर्ग प्रचार करता है। हमारे लोगों की एकता को ख़तरा हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग से ही है। हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग ने हमेशा धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता या राष्ट्रीयता के आधार पर लोगों के बीच में विवाद भड़काकर, हमारे लोगों की एकता और सद्भावना को तोड़ने की नीति अपनाई है। ऐसा करके उसने बर्तानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों को हिन्दोस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने और हमारे देश को अस्थाई व कमजोर करने के लिये पूरा मौका दे रखा है।

कश्मीर के लोगों के साथ राष्ट्र के “दुश्मन” जैसा बर्ताव करने और उन्हें बेहद पाश्विकता के साथ कुचलने की हिन्दोस्तानी राज्य की नीति का देश के सभी जनवादी और आज़ादी-पसंद लोगों को डटकर विरोध करना चाहिये। हमें यह मांग करनी चाहिए कि आफ्सपा को फ़ौरन रद्द किया जाये और हिन्दोस्तानी सेना को वापस बुलाया जाये। हमें कश्मीर के लोगों की समस्या के फ़ौरी राजनीतिक समाधान के लिये संघर्ष करना चाहिये।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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