यौन अत्याचार के पीड़ितों का समर्थन करें

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 20 अक्तूबर, 2018

बीते चार हफ्तों से हम कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार बनी बीसियों महिलाओं के दुःख-दर्दों के बारे में पढ़ रहे हैं व सुन रहे हैं। तमाम कार्यक्षेत्रों, मीडिया व पत्रकारिता, मनोरंजन उद्योग, कला व संस्कृति, शिक्षा, राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों, निजी कंपनियों, आदि से अनेक महिलायें इनमें शामिल हैं। वे बड़ी बहादुरी के साथ आगे आकर, अपनी-अपनी आपबीती के भयानक अनुभवों का विवरण दे रही हैं, कि किस तरह आधिकारिक पदों पर बैठे पुरुष महिला कर्मचारियों का यौन उत्पीड़न करना अपना “हक़” मानते हैं।

रुमीटू के झंडे तले आगे आ रही इन महिलाओं ने अपने अनुभवों को बताने का यह बहुत ही दिलेर क़दम उठाया है। सबके सामने अपने अनुभवों को बताते हुए, वे अपने दुःख-दर्द को फिर से महसूस करती हैं। उन्हें भली-भांति मालूम है कि इस व्यवस्था की सारी ताक़तें उनके खि़लाफ़ होंगी, परन्तु इसके बावजूद उन्होंने यह क़दम उठाया है। उनके खि़लाफ़ तरह-तरह के प्रचार किये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे झूठ बोल रही हैं। यह सवाल उठाया जा रहा है कि उन्होंने घटना के इतने साल बाद क्यों अपना मुंह खोला, जिसकी उन्हें सफाई देनी पड़ रही है। अनेकों साल पहले उन पर यौन उत्पीड़न करने वाले पुरुषों से भी उन्हें तरह-तरह के अपमानों व हमलों, जैसे कि अदालत में आपराधिक मानहानि की कानूनी कार्यवाही, का सामना करना पड़ रहा है।

हम अपने अनुभव से जानते हैं कि यौन दुष्कर्म की पीड़ित महिला को जब अपनी आपबीती का विवरण देना पड़ता है, तो यह उसके लिए यह बहुत ही मुश्किल होता है। पीड़िता के गहरे घाव आसानी से नहीं भरे जाते, और अब मुंह खोलते हुए वही घाव फिर से ताजे होने लगते हैं। समाज उसे शक और असम्मान की नज़रों से देखने लगता है। महिला और इंसान बतौर उसकी ईमानदारी पर सवाल उठाये जाते हैं। इसके बाद, अगर उसे अदालत में अपने बयान की सफाई देनी पड़े, तो यह और भी दर्दनाक होता है।

इसलिए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि महिलाओं के साथ यौन दुष्कर्म के बहुत कम मामले ही सामने आते हैं। आम तौर पर, यौन उत्पीड़न करने वाला पुरुष कार्यक्षेत्र में किसी आधिकारिक पद पर होता है, इसलिए पीड़िता उसके सामने खुद को शक्तिहीन महसूस करती है। उस पर फिर से यौन हमला होने का ख़तरा मंडराता रहता है। अगर वह अपनी आवाज़ उठाती है तो अपनी नौकरी खो सकती है। कार्यक्षेत्र में किसी और अधिकारी से उसे समर्थन मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी यौन हमलों से पीड़ित इन महिलाओं का पूरा-पूरा समर्थन करती है। जिन पुरुषों ने अपने सामाजिक दर्जों और कार्यक्षेत्र में आधिकारिक पदों का फायदा उठाकर उनका यौन उत्पीड़न किया है, उन पुरुषों का पर्दाफ़ाश करने और उन्हें शर्मिंदा करने के इन महिलाओं के अधिकार का हम पूरा-पूरा समर्थन करते हैं। पूरे समाज को इन यौन हमलों की निंदा करनी चाहिए और इनका खुलासा करने के इन महिलाओं के संघर्ष का समर्थन करना चाहिए। हमें इन महिलाओं की हिम्मत की सराहना करनी चाहिए और नाइंसाफी के खि़लाफ़ संघर्ष में इनका साथ देना चाहिए। यह बहुत ही आशाजनक है कि इनके कार्यक्षेत्रों में तथा समाज में बहुत सी और महिलाओं व पुरुषों ने इन पीड़िताओं का खुलकर समर्थन किया है।

हमारे समाज के हर तबके की महिलायें यौन उत्पीड़न और यौनिक हमलों का शिकार बनती हैं, घर के अन्दर, कार्यस्थल पर और सड़कों पर भी। समाज में महिलाओं को पुरुषों से निचला दर्ज़ा दिया जाता है और इंसान की मान्यता भी नहीं दी जाती। हमारी आर्थिक व्यवस्था महिलाओं के असम्मान और अतिशोषण को बरकरार रखती है तथा उन पर पनपती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था इस शोषण का विरोध करने वालों को कुचल देती है तथा शोषकों के हितों की ही रक्षा करती है।

जब-जब लोग महिलाओं पर यौन हमलों के कांडों से क्रोधित होकर आन्दोलन में उतर आते हैं, तब-तब राज्य लोगों के गुस्से को ठंडा करने के लिए, इंसाफ की मांग को ठंडा करने के लिए, कुछ जांच कमेटियां बिठा देता है या कुछ दिशा-निर्देश जारी कर देता है। महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोषण) अधिनियम 2013 को लागू करके हिन्दोस्तानी राज्य यह दावा करता है कि उसने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए संस्थागत और न्यायिक तंत्र स्थापित कर दिये हैं। इस अधिनियम के अनुसार, सभी सरकारी और निजी संस्थानों को इन मामलों की शिकायतों को दर्ज़ करने के लिए एक कमेटी गठित करनी चाहिए। अधिनियम में इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले मालिकों को दंड देने की बात भी कही गयी है। परन्तु कई सरकारी और निजी संस्थानों में यौन उत्पीड़न की अंदरूनी शिकायतों को दर्ज़ करने के लिए ऐसी कमेटियां गठित नहीं की गयी हैं और उन पर अब तक कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गयी है। सोशल मीडिया पर पीड़िताओं के विवरणों से और अनगिनत महिलाओं की अनकही घटनाओं से यह साफ पता चलता है कि जहां ऐसी कमिटियां हैं भी, वे पीड़ित महिलाओं को इन्साफ दिलाने और अपराधियों को सज़ा दिलाने में पूरी तरह नाक़ामयाब रही हैं। पीड़िताओं की शिकायतों को या तो नज़रंदाज कर दिया गया है या खारिज़ कर दिया गया है; पीड़िताओं को यह सलाह दी गयी है कि दुष्कर्मों की परवाह न करो और अपनी शिकायतों को वापस ले लो, क्योंकि आरोपित “बहुत ज्यादा शक्तिशाली” व्यक्ति हैं!

आज कार्यक्षेत्र में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। कामकाजी महिलाओं को यौन उत्पीड़न से कोई रक्षा नहीं मिलती है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए, कामकाजी महिलाओं को अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ मिलकर, अपने कार्यस्थलों पर संगठित होना होगा। इन संगठनों में महिला कर्मियों को आगे आकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे तंत्र स्थापित किये जाएं ताकि उन पर किसी भी प्रकार का यौन उत्पीड़न न हो सके।

एक क्रांतिकारी परिवर्तन की ज़रूरत है, एक ऐसे नए समाज की स्थापना करने की ज़रूरत है, जिसमें मानव श्रम को सम्मान दिया जायेगा, सभी मेहनतकश महिलाओं और पुरुषों को सम्मान दिया जायेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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