राफेल घोटाला : राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक धन की लूट

एक फ्रांसीसी कंपनी से राफेल लड़ाकू विमानों को खरीदने के हिन्दोस्तानी राज्य के फैसले में उच्चतम स्तर पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाये जा रहे हैं, उनसे एक बार फिर वह गलाकाट स्पर्धा और बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी सामने आ रही है, जो वर्तमान वैश्विक हथियार बाज़ार की विशेषता बन गई है।

वैश्विक हथियारों के व्यापार के हर क्षेत्र में विशाल इजारेदार निगमों का प्रभुत्व है। लड़ाकू विमानों के बाज़ार में हथियारों के 6 प्रमुख निर्माताओं का प्रभुत्व है, जिनके नाम हैं: बोइंग (अमरीका), लॉकहीड मार्टिन (अमरीका), डेसॉल्ट एविएशन (फ्रांस), यूरोफाइटर (जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और स्पेन), साब (स्वीडन) और यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (रूस)।

हिन्दोस्तानी राज्य उच्च तकनीक वाले हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा ख़रीदार है। हिन्दोस्तान के इस बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए दुनिया के सभी बड़े अंतर्राष्ट्रीय हथियार निर्माताओं के बीच भयंकर टक्कर है। इन सभी ने हिन्दोस्तान में अपने एजेंट रखे हैं, जो हर प्रमुख अनुबंध के समय फैसले को अपने निर्माताओं की तरफ़ मोड़ने के लिए बोली लगाते हैं।

दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्माताओं के बीच इस गलाकाट स्पर्धा जिसमें हिन्दोस्तानी सुरक्षा अनुबंधों को हासिल करने की दौड़ लगी रहती है, इसके चलते सर्वोच्च सरकारी अधिकारियों, सुरक्षा बलों के अधिकारियों और सत्ताधारी पार्टियों को रिश्वत देना कोई अपवाद नहीं बल्कि आम बात है।

जो कंपनियां अनुबंध हासिल नहीं कर पाती हैं, वे अनुबंध हासिल करने वाली कंपनी द्वारा दी गई रिश्वत का पर्दाफाश करने का प्रयास करती हैं। उदाहरण के लिए, हिन्दोस्तान के साथ हेलीकॉप्टर के सौदे को लेकर इतालवी कंपनी ऑगस्टा वेस्टलैंड द्वारा दी गई रिश्वत का पर्दाफाश, उसकी एक प्रतिद्वंदी अमरीकी कंपनी द्वारा किया गया था। इसके चलते 2013 में यूपीए सरकार को यह सौदा रद्द करना पड़ा था।

रक्षा ख़रीदारी से इकट्ठा होने वाला धन हमेशा से ही सत्ताधारी पार्टियों के लिये धन का सबसे पसंदीदा स्रोत रहा है। ख़रीद की क़ीमत बढ़ाकर, सार्वजनिक खजाने को लूटने का यह सबसे आसान तरीका है। ख़रीदारी की शर्तें “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर लोगों से छुपाई जाती हैं। बाज़ार के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, हर हथियार अनुबंध की क़ीमत का लगभग पांचवां हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कोष में जाता है। संसद में विरोधी पार्टी भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने का ढोंग करती है ताकि सत्ताधारी पार्टी को बदनाम करके वह उसकी जगह ले सके।

30 साल पहले, भाजपा तथा अन्य विपक्षी पार्टियों ने राजीव गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली सरकार पर बोफोर्स सौदे में बड़ी रिश्वतखोरी से होने वाले फायदे का आरोप लगाया था। आज, नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार पर कांग्रेस पार्टी राफेल सौदे में बड़ी रिश्वतखोरी से होने वाले फायदे का आरोप लगा रही है।

हिन्दोस्तानी पूंजीवादी इजारेदारों ने पिछले दशक में रक्षा उत्पादन क्षेत्र में प्रवेश किया है। वे इस क्षेत्र को बड़े व सुनिश्चित मुनाफ़े वाले क्षेत्र के रूप में देखते हैं। हिन्दोस्तानी इजारेदार घराने भविष्य में हथियारों के प्रमुख निर्यातक बनना चाहते हैं। वे हथियारों का निर्माण करने वाली विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रमों में शामिल हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, टाटा समूह का लॉकहीड मार्टिन के साथ किया गया हाल ही का सौदा, जिसके तहत टाटा कंपनी लॉकहीड मार्टिन द्वारा बनाए गए विमानों के पंखों का उत्पादन व आपूर्ति करेगी।

राफेल सौदे के बारे में तथ्य

2004 में संप्रग सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने के लिए टेंडर जारी किये थे। लंबी प्रक्रिया के बाद, फ्रांसीसी कंपनी डेसॉल्ट एविएशन द्वारा उत्पादित राफेल लड़ाकू विमान को चुना गया था। योजना यह थी कि 126 लड़ाकू विमानों में से 108 विमान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.) द्वारा, हिन्दोस्तान में बनाए जाएंगे। उत्पादन का 70 प्रतिशत हिस्सा एच.ए.एल. और 30 प्रतिशत डेसॉल्ट एविएशन संभालने वाले थे। शेष 18 विमानों को “उड़ने के लिए तैयार स्थिति” में खरीदा जाना था।

अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस की यात्रा के दौरान, एक नए सौदे की घोषणा की। इस सौदे के तहत 36 “उड़ने के लिए तैयार स्थिति में” राफेल लड़ाकू विमानों की सरकारी ख़रीद की जाएगी। हिन्दोस्तान में राफेल विमानों के उत्पादन की योजना को रद्द कर दिया गया। हालांकि सरकार ने लागत का खुलासा नहीं किया है, लेकिन ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि पिछले सौदे के मुक़ाबले जिसमें प्रत्येक विमान की अनुमानित क़ीमत 526 करोड़ रुपये बताई गई थी, अब संभावना है कि वह क़ीमत 1670 करोड़ रुपये हो जायेगी।

यह बताया जा रहा है कि समझौते की शर्तों के मुताबिक 60,000 करोड़ रुपये के सौदे का 50 प्रतिशत (लगभग 30,000 करोड़ रुपये की राशि) का डेसॉल्ट द्वारा हिन्दोस्तान में पुनर्निवेश किया जाएगा। ऐसी ख़बर है कि इस राशि में से लगभग 21,000 करोड़ रुपये डेसॉल्ट और अनिल अंबानी समूह द्वारा स्थापित एक नई रक्षा उत्पादन कंपनी, रिलायंस डिफेंस, के बीच साझेदारी में निवेश किया जाएगा। रिलायंस डिफेंस को इसके पूर्व सुरक्षा हथियारों तथा एयरोस्पेस उपकरणों के उत्पादन का कोई अनुभव नहीं है। रिलायंस डिफेन्स को डेसॉल्ट और रिलायंस के बीच हुए अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से कुछ दिन पहले ही बनाया गया था। अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के दो सप्ताह बाद, डेसॉल्ट के साथ संयुक्त उद्यम के लिए, रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड नामक एक और नई कंपनी का गठन किया गया।

हिन्दोस्तानी राज्य ने एक निश्चित मूल्य से अधिक विदेशी सैन्य ख़रीदी पर एक “ऑफसेट शर्त“ लागू किया है। इस शर्त के अनुसार, जो विदेशी कंपनी सबसे प्रमुख हथियार अनुबंध प्राप्त करेगी, उसे अनुबंध के मूल्य का कुछ निश्चित प्रतिशत राशि का निवेश हिन्दोस्तान में करना होगा। यह निवेश, हिन्दोस्तान के अंदर, हथियारों का उत्पादन करने के लिए किसी हिन्दोस्तानी कंपनी के साथ संयुक्त उपक्रम में करना होगा।

हिन्दोस्तान के जिन पूंजीवादी इजारेदारों ने हथियार उत्पादन क्षेत्र में अपने पैर जमाने शुरू किये हैं वे हैं, टाटा, रिलायंस (मुकेश अम्बानी ग्रुप), महिंद्रा, लार्सन एंड टुब्रो, रिलायंस (अनिल अम्बानी ग्रुप), हीरो, भारत फोर्ज और हिंदुजा।

विदेशी हथियार विक्रेताओं के बीच टक्कर के साथ-साथ, हथियार अनुबंधों के लिए इन हिन्दोस्तानी इजारेदार घरानों के आपस में भी गंभीर टक्कर हैं। ये कंपनियां अपने विदेशी भागीदारों की तरफदारी करती हैं। वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़कर, अपने मुनाफ़ा कमाने के इरादों को बढ़ावा देने के लिए, मंत्रियों, अधिकारियों तथा पार्टी के उच्च नेताओं को बड़ी-बड़ी रिश्वत या और भी हर मुमकिन तरीका अपनाती हैं।

जब भी भ्रष्ट सौदों का खुलासा हो जाता है और एक बड़ा घोटाला सामने आता है, तो यह एक संकेत होता है कि प्रतिस्पर्धी इजारेदार समूहों के बीच अंतर्विरोध बहुत तीव्र हो गए हैं।

राफेल सौदे में 126 विमानों की संख्या को 36 तक कम करने के बाद, सरकार ने 110 और लड़ाकू विमानों के लिए एक नया टेंडर जारी किया है। लड़ाकू विमान का निर्माण करने वाली दुनिया की सभी 6 प्रमुख कंपिनयों ने इसमें अपनी रुचि व्यक्त की है। लॉकहीड मार्टिन ने यह भी घोषणा की है कि अगर हिन्दोस्तान इन विमानों को उससे खरीदने की गारंटी देगा तो वह एफ-16 लड़ाकू विमानों का उत्पादन हिन्दोस्तान में करेगा। फ्रांस से खरीदे गये राफेल विमानों की संख्या को कम करने का निर्णय अमरीकी और अन्य प्रतिद्वंद्वियों द्वारा हिन्दोस्तान पर दबाव का परिणाम है, क्योंकि ये सभी हिन्दोस्तानी सुरक्षा अनुबंधों के अधिक से अधिक हिस्से पर अपना कब्ज़ा जमाने की इच्छा रखते हैं।

राफेल घोटाला एक बार फिर साम्राज्यवादी हथियार बाज़ार में अत्यधिक इजारेदारी और भ्रष्टाचार को सामने लाता है। यह सरकार द्वारा प्रचारित सभी भ्रमों को दूर करता है, जैसे कि हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा ख़रीदे गए हथियार “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिये ख़रीदे जाते हैं। देश की सुरक्षा को प्राथमिकता देना हिन्दोस्तानी राज्य का दूर-दूर तक लक्ष्य नहीं है। हिन्दोस्तानी राज्य तो देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे कि सुरक्षा सौदों के ज़रिये वे गारंटी के साथ ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमा सकें। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने के नाम पर देश की इजारेदार पूंजीवादी लूट को आसान बना रही है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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