सिखों के जनसंहार की 34वीं बरसी पर :

1984 के जनसंहार को हम नहीं भूलेंगे!

गुनहगारों को सज़ा देने का संघर्ष जारी रहेगा!

1 नवम्बर को 1984 के जनसंहार की 34वीं बरसी के दिन, सिख फोरम ने कांस्टीट्यूशन क्लब में एक पैनल चर्चा का आयोजन किया, जिसमें बहुत से लोगों ने भाग लिया। पैनल में पंजाब विधानसभा के सदस्य, श्री एच.एस. फूल्का; पूर्व राजदूत, श्री के.सी. सिंह; मानव अधिकार कार्यकर्ता श्रीमती उमा चक्रवर्ती, जाॅन दयाल व उर्वशी बूतालिया तथा पत्रकार हरतोश सिंह बाल शामिल थे।

इससे पहले, उसी दिन लोक राज संगठन ने संसद के सामने एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। प्रदर्शन को संबोधित करने वालों में शामिल थे लोक राज संगठन के अध्यक्ष, श्री एस. राघवन, यूनाइटेड मुस्लिम्स फ्रंट के श्री शाहिद अली, सिख फोरम के श्री इंदरजीत सिंह, दिल्ली विधानसभा के पूर्व सदस्य श्री जरनैल सिंह, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के श्री सिराज तालिब, अधिवक्ता श्री एच.एस. फूल्का, जमात-ए-इस्लामी हिन्द के श्री इनाम-उर-रहमान और कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रवक्ता कामरेड प्रकाश राव।

Jarnail Singh
Demostarion Victim of 1984 
The sikh forum program 
Inamur Rahaman

Inamur Rahaman

Demostarion Victim of 1984
1984
1984

कानपुर से आये, जनसंहार के पीड़ितों के परिवारों ने अपनी बेहद बुरी परिस्थिति पर प्रकाश डालने के लिये संसद के सामने एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया। दिल्ली, चंडीगढ़ व देश के अन्य भागों में 1 नवम्बर, 2018 को अनेक दूसरे प्रदर्शन हुए।

इन सभाओं व विरोध प्रदर्शनों में वक्ताओं ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के तीन दिनों में होने वाली दहशत को बयान किया। तीन दिन और रात दिल्ली, कानपुर और अन्य स्थानों की सड़कों पर खून की नदियां बही थीं। सिख धर्म के पुरुषों व लड़कों को ज़िंदा जला दिया गया था। महिलाओं और लड़कियों का सामूहिक बलात्कार किया गया था। सिखों की जायदाद को लूटा गया था। घरों व गुरुद्वारों में आग लगाई गयी थी।

हत्यारे गिरोहों को उस वक्त सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने उकसाया था। दूरदर्शन में बार-बार “खून का बदला खून” का खूंखार बुलावा दोहराया जा रहा था, जिससे खूनी भीड़ को यह संकेत मिल रहा था कि उनको हिन्दोस्तानी राज्य से पूरी सुरक्षा मिलेगी। जनसंहार में पुलिस ने पूरी तरह हिस्सा लिया था और सेना को छावनी में रहने का आदेश दिया गया था जबकि शहर जल रहा था। उस वक्त के गृहमंत्री नरसिम्हा राव ने कत्लेआम को तुरंत रोकने की लोगों की मांग पर अमल करने से इनकार किया था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जनसंहार की सफाई, देश के नाम अपने पहले भाषण में इन शब्दों में दी थी, “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है”।

Jarnail singh

Jarnail Singh

HS phulka

HS Phulka

Shahid Ali

Shahid Ali

Inamur Rahman

Inamur Rahman

Siraj Talib

Siraj Taalib

Inderjit singh

Inderjit Singh

श्री शाहीद अली और श्री सिराज तालिब ने अस्सी के दशक में हुए उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा कत्लेआम व असम के नेल्ली जनसंहार और 1992-93 में बाबरी मस्जिद के बाद के जनसंहार पर ध्यान दिलाया, जो कि कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में किये गये थे।

श्री फूल्का ने ध्यान दिलाया कि 1984 का जनसंहार, जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के पहले ही राज्य की खुफिया एजेंसियों द्वारा बारीकी से योजनाबद्ध किया जा चुका था। सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों के सामने 31 अक्तूबर, 1984 की शाम को राष्ट्रपति जैल सिंह की कार पर जानबूझकर हमला किया गया था, जिसे सुरक्षाकर्मियों ने रोकने की कोई कोशिश नहीं की। यह एक संकेत था कि कोई सिख ज़िन्दा नहीं बचेगा और पुलिस को उन्हें बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। 1985 में गठित मारवाह कमेटी के सामने जनसंहार में भाग लेने वाले बहुत से पुलिसकर्मियों ने गवाही दी थी कि उन्हें ऊपर से आदेश दिये गये थे। इस कमेटी को सरकार ने बर्ख़ास्त कर दिया था ताकि जनसाधारण को इस सच्चाई पता न चल सके।

श्रीमती उमा चक्रवर्ती ने ध्यान दिलाया कि पूरी मीडिया में भाजपा और कांग्रेस पार्टी के बीच “तू-तू मैं-मैं” की बहसें बेहद घिनौनी हैं, जिनमें दोनों पक्ष यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि दूसरा ज्यादा बड़ा अपराधी है। जहां तक लोगों का प्रश्न है, उनके लिये मुद्दा यह है कि जनसंहारों के लिये दोनों ही ज़िम्मेदार हैं और इनके बीच “कम बुरे”  को चुनने का सवाल ही नहीं उठता।

सभी वक्ता पूरी तरह से एकमत थे कि 1984 में जो हुआ, वह साम्प्रदायिक हिंसा नहीं था बल्कि यह राज्य का आतंकवाद था।

श्री जरनैल सिंह ने तर्क दिया कि साम्प्रदायिक हिंसा में दो समुदायों के बीच मुठभेड़ होती है जैसा कि 1984 में नहीं हुआ था। जो हुआ था वह सिखों का जनसंहार था जिसका आयोजन केन्द्रीय राज्य ने किया था। इसीलिये 34 लंबे वर्षों के बाद भी और सरकार द्वारा नियुक्त 10 अलग-अलग आयोगों व कमेटियों के बावजूद गुनहगारों को सज़ा नहीं दी गयी है।

न केवल जनसंहार को बारीकी से आयोजित किया गया था और अमल में लाया गया था, बल्कि इस पर पर्दा डालने की योजना भी सावधानी से बनाई और अमल में लाई गयी थी। चाहे प्रशासन हो या पुलिस या न्यायपालिका, सभी ने जनसंहार संबंधित मामलों को ख़ारिज़ करने का रवैया अपनाया और “माफ़ करो और भूल जाओ” की नीति के उपदेश दिये। पूरी की पूरी राज्य व्यवस्था गुनहगारों को बचाने में उतरी न कि उनके गुनाहों को साबित करके उन्हें सज़ा दिलाने में।

बहुत सी सरकारें आयीं और गयीं, पार्टियां बदलीं, परन्तु गुनहगारों को सज़ा नहीं हुई। 2014 में भाजपा इस वादे के साथ सत्ता में आयी थी कि वह गुनहगारों को सज़ा देगी, परन्तु उसने भी कुछ नहीं किया।

एक के बाद, एक वक्ताओं ने ध्यान दिलाया कि कांग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों ने सुनियोजित तरीके से साम्प्रदायिक उन्माद को भड़काया है और राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करके साम्प्रदायिक हिंसा आयोजित की है। इन दोनों पार्टियों में एक को “ज्यादा बुरी” या “कम बुरी” सोचना बड़ी गलती होगी।

कामरेड प्रकाश राव ने ध्यान दिलाया कि किसी खास समुदाय को बदनाम करना ताकि उन पर साम्प्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराया जा सके, यह हमारे देश में राज करने का एक पसंदीदा तरीका बन गया है। 1984 में जो सत्ता में थे उन्होंने राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराने के लिये सिखों को “आतंकवादी”, “देशद्रोही” और “पाकिस्तानी एजेंट” घोषित किया था। उसके बाद एक के बाद एक सरकारें उसी रास्ते पर चल रही हैं। आज भाजपा नीत केन्द्र सरकार बेकसूर मुसलमानों की लिंचिंग, दलितों के खि़लाफ़ अत्याचार और मनमाने ढंग से मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी को जायज़ बताने के लिये उन पर “आतंकवादी”, “देशद्रोही” और “पाकिस्तानी एजेंट” का ठप्पा लगा रही है। कॉमरेड प्रकाश राव ने लोगों को बुलावा दिया कि अधिकारों की रक्षा में और राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़, अपने विचारधारात्मक मतभेदों को परे रखकर एकजुट हों।

हिन्दोस्तानी लोगों ने हमेशा ही इस सिद्धांत की पुष्टि की है कि सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। जो सत्ता में हैं वे चाहते हैं कि इस दायित्व को निभाने में राज्य की नाक़ामयाबी से लोगों का ध्यान भटकाया जाये। वे अराजकता और राजकीय आतंकवाद को फैला रहे हैं ताकि अधिकारों के लिये लोगों के संघर्ष को तोड़ा और कुचला जा सके।

न्याय के लिये, कत्लेआमों के गुनहगारों के गुनाहों को साबित करके सज़ा दिलाने का संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक हम, हिन्दोस्तानी लोग एक नये समाज की व्यवस्था को स्थापित करने में सफल नहीं होते। हमें नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट होने की ज़रूरत है - एक ऐसे हिन्दोस्तान की रचना करने के लिये, जिसमें राज्य सभी के मानव अधिकार और खुशहाली सुनिश्चित करेगा और जिसमें सभी के ज़मीर के अधिकार की रक्षा होगी।

Tag:   

Share Everywhere

सिखों के जनसंहार    34वीं बरसी    Nov 16-30 2018    Voice of the Party    Communalism     Popular Movements     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

thumb

 

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)