2018 : मज़दूर वर्ग और किसानों के बढ़ते संघर्ष

मज़दूर, किसान और सभी तबकों के मेहनतकश लोग ज्यादा से ज्यादा तादाद में सड़कों पर उतर आये और अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों के लिये उन्होंने बढ़-चढ़कर संघर्ष किये।

मेहनतकशों ने स्वास्थ्य सेवा, परिवहन, शिक्षा और अन्य सेवाओं के निजीकरण का विरोध किया, श्रम कानूनों में पूंजीवाद परस्त संशोधनों का विरोध किया।

पार्टी संबंधों से ऊपर उठकर ट्रेड यूनियनों ने निजीकरण के खि़लाफ़ और रोज़ी-रोटी व मज़दूरों के अधिकारों पर हो रहे बढ़ते हमलों के खि़़लाफ़ कई संयुक्त विरोध कार्यक्रम आयोजित किये।

Roudup_2018

कई ट्रेड यूनियनों, मज़दूर संगठनों और फेडरेशनों ने दिल्ली में 28 सितंबर, 2018 को एक सर्व हिन्द मज़दूर अधिवेशन आयोजित किया। रक्षा, बैंकिंग, बीमा, रेलवे, सड़क परिवहन, जल यातायात, डाक, बंदरगाह, तेल, ऊर्जा, टेलिकॉम, खदान, इस्पात, कोयला, भारी इंजीनियरिंग, आंगनवाड़ी और आशा मज़दूरों की यूनियनों समेत, अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया।

अधिवेशन में फैसला किया गया कि शासक पूंजीपति वर्ग की जन-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी नीतियों के खि़लाफ़ संघर्ष को तेज़ किया जायेगा। सभी मज़दूर संगठनों को जनवरी 2019 में सर्व हिन्द हड़ताल की तैयारी करने का आह्वान दिया गया।

इससे पूर्व, मज़दूरों ने पूरे देश में संयुक्त विरोध प्रदर्शनों और सभाओं के माध्यम से मई दिवस को मनाया। उन्होंने निजीकरण, ठेका मज़दूरी के बढ़ते प्रयोग और श्रम कानूनों के मज़दूर-विरोधी संशोधनों का विरोध किया। उन्होंने कार्य स्थल पर सुरक्षा, सुनिश्चित रोज़गार और सम्मानजनक मानव जीवन के लायक वेतन की मांग की।

रेल मज़दूर - लोको पायलट, लाइंस मैन, स्टेशन मास्टर - काम की अति शोषक हालतों के खि़लाफ़, सुरक्षित हालतों के लिये तथा निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष करते रहे हैं।

राजस्थान रोडवेज़ और हरियाणा रोडवेज़ के सड़क परिवहन मज़दूरों ने सड़क परिवहन के निजीकरण के विरोध में लंबे संघर्ष किये।

एअर इंडिया मज़दूरों की ट्रेड यूनियन एअर इंडिया का निजीकरण करने के सरकार के फैसले का विरोध करते रहे।

बैक मज़दूरों ने अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में तथा निजीकरण के खि़लाफ़ कई सर्व हिन्द विरोध प्रदर्शन किये।

दिल्ली में लाखों-लाखों मज़दूरों ने 20 जुलाई को ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर आयोजित एक दिवसीय हड़ताल में भाग लिया। उन्होंने जीने लायक वेतन, ठेका मज़दूरी का अंत और मज़दूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करने की मांग की।

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आटोमोबील क्षेत्र के मज़दूर अपने काम की अतिशोषक हालतों के खिलाफ़ और यूनियन बनाने के अधिकार के लिये संघर्ष करते रहे हैं। सितंबर 2018 में चेन्नई के निकट स्थित ओरागादाम औद्योगिक क्षेत्र में यामाहा इंडिया, म्योउंग शिन आटोमोटिव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और रॉयल एनफील्ड के मज़दूरों ने हड़ताल की। मानेसर स्थित मारुति-सुज़ुकी प्लांट के मज़दूर फ़र्ज़ी आरोपों के आधार पर आजीवन कारावास में बंद अपने 13 साथियों की हिफ़ाज़त में बहादुरी से संघर्ष करते रहे हैं।

देशभर के निर्माण मज़दूर सामाजिक सुरक्षा कानून, जो कई वर्षों के संघर्ष के बाद पास हुआ, को लागू करने की मांग को लेकर तथा उसमें मज़दूर-विरोधी तब्दीली लाने की कोशिशों के विरोध में संघर्ष करते रहे हैं। दिल्ली में निर्माण मज़दूरों ने इस विषय पर 4 अक्तूबर, 2018 को एक प्रदर्शन किया।

सरकारी स्कूलों के शिक्षक स्कूलों के निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष करते रहे हैं। वे ठेका पर रखे गये शिक्षकों को नियमित करने की मांग उठा रहे हैं।

विश्वविद्यालयों के शिक्षक और छात्र उच्च शिक्षा के निजीकरण के खि़लाफ़ सघर्ष करते रहे हैं। 5 सितंबर, 2018 को देशभर में विश्वविद्यालयों और कालेजों के शिक्षकों ने ‘शिक्षक दिवस’ के अवसर पर सरकारी समारोहों का बहिष्कार किया और उच्च शिक्षा के निजीकरण, शिक्षा पर सरकारी खर्च में कटौती तथा शिक्षकों के अधिकारों पर बढ़ते हमलों के खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शन किये।

डाक्टर और नर्स अपने काम की बेहद शोषक हालतों के खिलाफ़ संघर्ष करते रहे हैं।

आशा और आंगनवाड़ी मज़दूर तथा पंचायती राज मज़दूर अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करते रहे हैं।

बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन के ठेका मज़दूर प्लांट के बंद किये जाने और उनकी अवैध छंटनी के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे हैं।

बेरोज़गार नौजवान नौकरी मांग रहे हैं।

2018 में देश के कई राज्यों में बड़े-बड़े किसान आंदोलन हुये। अलग-अलग राज्यों के 200 से अधिक किसान संगठन मिलकर संघर्ष करने के लिये एक झंडे तले जुड़ गये हैं।

किसान अपने उत्पादों के लिये लागत की कीमत के डेढ़ गुना दाम मांग रहे हैं, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने, उत्पादों के लिये राज्य द्वारा सुनिश्चित खरीदी, पुराने कज़ों को माफ़ करने और सिंचाई के लिये पानी की मांग कर रहे हैं।

राजस्थान के किसान लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे हैं, यह मांग लेकर कि सरकारी बैंक और निजी बीमा कंपनियां किसानों को लूटना बंद करें और किसानों को देने योग्य बीमा राशि का फौरन भुगतान करें।

5 सितंबर, 2018 को देशभर के मज़दूरो और किसानों ने पूंजीपतियों और उनकी सरकार पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुये, दिल्ली में एक विरोध रैली की। उन्होंने सरकार की राष्ट्र-विरोधी, मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी नीतियों का डटकर विरोध किया।

30 नवंबर को किसानों ने आल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी (ए.आई.के.एस.सी.सी.) के झंडे तले, किसानों की लंबे समय से उठाई जा रही मांगों को लेकर संसद पर प्रदर्शन किया।

महिलाओं ने बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ़ तथा कार्यस्थल में महिलाओं पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कई विरोध प्रदर्शन आयोजित किये। कठुआ और उन्नाव के घिनावने बलात्कार कांडों के बाद देशभर में बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन हुये।

इन संघर्षों के दौरान मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के अधिक से अधिक संगठन अपने अधिकारों के संघर्ष के लिये एक झंडे तले आ रहे हैं।

लोगों में यह जागरुकता बढ़ रही है कि सबसे बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों की अगुवाई में शासक पूंजीपति वर्ग ही सभी मज़दूरों, किसानों और मेहनतकशों का सांझा दुश्मन है। लोग यह भी समझ रहे हैं कि यह शासक वर्ग मज़दूरों और किसानों के अधिकारों के एकजुट संघर्ष को तोड़ने के लिये, बड़े सुनियोजित तरीके से अराजकता और हिंसा फैला रहा है तथा सांप्रदायिकता फैला रहा है।

मज़दूर और किसान, औरत और जवान इस बढ़ती अराजकता, हिंसा और सांप्रादायिकता फैलाने की कोशिशों का मिलकर विरोध कर रहे हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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