अमरीका के आतंकवाद-विरोध की रणनीति दक्षिण एशिया में शांति के लिये ख़तरा

आतंकवाद-विरोध के लिये अमरीकी राष्ट्रीय रणनीति (नेशनल स्ट्रेटजी फार काउंटर टेररिज़्म), जिसे हाल ही में अपनाया गया है, ईरान को “आतंकवाद का मुख्य आयोजक राज्य” बताती है। यह रणनीति पाकिस्तान पर भी निशाना साधती है और अमरीकी “आतंकवाद-विरोध” की रणनीति को बढ़ावा देने के लिये हिन्दोस्तान के साथ सहयोग को मजबूत करने की मांग करती है। इस रणनीति की घोषणा के साथ-साथ, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान को आतंकवादियों का समर्थन करने और अमरीकी मदद का दुरुपयोग करने के लिये दोषी ठहराया है।

आतंकवाद का विरोध करने का बहाना देकर ही अमरीका ने अफ़गानिस्तान, इराक और लिबिया पर हमला और कब्ज़ा किया था। इसी आतंकवाद-विरोध के झंडे तले अमरीका सिरिया में हथियारबंद बाग़ी गिरोहों को समर्थन देता रहा है। इतिहास का अनुभव यह दिखाता है कि आतंकवाद-विरोध एक पर्दा है जिसके पीछे एशिया पर कब्ज़ा करने तथा सारी दुनिया पर हावी होने की अमरीका की हमलावर कोशिश छिपी हुई है।

ऐतिहासिक घटनाओं के विश्लेषण से यह साफ होता है कि पाकिस्तान की धरती से काम करने वाले ज्यादातर आतंकवादी गिरोहों के पीछे अमरीकी साम्राज्यवाद का हाथ है।

जब ईरान में 1979 में क्रांति हुई और शाह पहलवी की अमरीका परस्त सत्ता का तख्ता पलट किया गया था, तो उसके बाद से अमरीका व उसकी खुफिया एजेंसियों ने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ स्पर्धा में, पाकिस्तान को अपना अड्डा बनाने पर खूब ध्यान दिया। अमरीका ने पाकिस्तान में तरह-तरह के हथियारबंद गिरोहों को प्रशिक्षण देने पर अरबों डॉलर खर्च किये। उन गिरोहों को शिक्षण-प्रशिक्षण दिया गया, पहले अफ़गानिस्तान में सोवियत-परस्त सत्ता के खिलाफ़ लड़ने के लिये और बाद में अफ़गानिस्तान पर कब्ज़ा करने वाली सोवियत सेना, जिसे “इस्लाम का दुश्मन” बताया गया, के ख़िलाफ़ लड़ने के लिये। इस तरह, अमरीका ने सोवियत कब्ज़ाकारी ताक़त के ख़िलाफ़ अफ़गान लोगों के मुक्ति संघर्ष के साथ दांवपेंच करके, अपना उल्लू सीध किया।

इस्लाम की रक्षा करने के नाम पर तथाकथित धर्मयुद्ध के लिये जिन-जिन लोगों को लामबंध किया गया, उनसे यह सच्चाई छुपाना ज़रूरी था कि वास्तव में वे अमरीका का कार्यक्रम पूरा कर रहे थे। इसलिये अमरीका ने पाकिस्तानी राज्य के सहारे अपने नापाक इरादों को अंजाम दिया। पाकिस्तान के आई.एस.आई. के ज़रिये, अमरीका के सी.आई.ए. ने अल कायदा नामक प्रशिक्षित आतंकवादियों का पूरा जाल बिछाया। जब सोवियत सेना अफ़गानिस्तान से हट गई तो इस आतंकवादी जाल का इस्तेमाल करके अमरीका ने दुनिया की अन्य जगहों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं। (देखिये बाक्स: अमरीका प्रेरित आतंकवाद के बारे में कुछ सच्चाईयां)

अमरीका प्रेरित आतंकवाद के बारे में कुछ सच्चाइयां

लगभग 1990 से, कई सउदी और दूसरे अरब राष्ट्रों के लोगों, जिन्हें अल कायदा में भर्ती किया गया था, को सी.आई.ए. के विमानों में बिठाकर अज़रबैजान लाया गया। सी.आई.ए. ने युगोस्लाविया में, बोस्निया-हर्जगोविना से कोसोवो तक, युद्ध की आग को भड़काने के इरादे से, हथियारबंद गिरोहों को वहां घुसाया। रूसी तेल पाइपलाइन की राहों में तोड़फोड़ करने के लिये भी हथियारबंद गिरोहों को चेचेन्या और डागेस्तान में लाया गया।

राजनीतिक वैज्ञानिक, इकबाल अहमद ने अक्तूबर 1998 में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो, बोल्डर में भाषण देते हुये कहा था कि :

“इस्लाम के इतिहास में जिहाद, जो कि एक हिंसक अंतर्राष्ट्रीय गतिविधि मानी जाती है, बीते 400 वर्षों में लगभग ख़त्म हो चुकी थी। पर 1980 के दशक में, अमरीका की मदद के साथ उसे अचानक नया जीवन दिया गया... सी.आई.ए. के एजेंट सभी मुसलमान बहुल देशों में जा-जाकर महान जिहाद में लड़ने के लिये लोगों को भर्ती करने लगे। भर्ती किये गये शुरुआती होनहार सदस्यों में एक था ओसामा बिन लादेन। वह न सिर्फ अरब था बल्कि सऊदी भी था। वह न सिर्फ सऊदी था बल्कि करोड़पति भी था जो इस काम के लिये अपना पैसा डालने को तैयार था। बिन लादेन कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ जिहाद के लिये लोगों को भर्ती करने लगा।”

सुश्री हिलेरी क्लिंटन ने, अमरीका के विदेश सचिव के पद पर होते हुये, 2009 में फौक्स न्यूज़ को एक साक्षात्कार में कहा था कि :

“हमने समस्या को पैदा करने में मदद की थी... हमें यह बढ़िया सोच आई कि हम पाकिस्तान जायेंगे, वहां मुजाहिदीन फ़ौज तैयार करेंगे और उन्हें स्टिंगर मिसाइल व बाकी सबकुछ मुहैया करायेंगे, ताकि वे अफ़गानिस्तान में सोवियतों का पीछा कर सकें।”

बराक ओबामा की अगुवाई में अमरीकी सरकार ने “सिरिया के बाग़ी गिरोहों”, मुख्यतः अल नुस्राह, के लिये अपने समर्थन का खुलेआम ऐलान किया। यह तुर्की, कतर, सऊदी अरब और इस्राइल के वैत्तिक समर्थन से और नाटो व पेंटागन से सलाह-मशवरा करके बनाये गये आतंकवादी गिरोहों का एक जाल है।

आई.एस.आई.एस. नामक आतंकवादी गिरोह को अमरीका ने, पश्चिम एशिया के नक्शे को अपनी योजना के अनुसार नया रूप देने के इरादे से, सुन्नी-शिया दुश्मनी को भड़काकर, स्थापित किया था। यह आतंकवादी गिरोह तब कुख्यात हो गया जब यू-ट्यूब में एक अमरीकी पत्रकार के सर काटे जाने की विडियो क्लिप सारी दुनिया में दिखाई गई। बाद में, विधि चिकित्साकारी (फोरेंसिक) जांच के बाद यह साबित हुआ कि वह विडियो क्लिप फ़र्ज़ी था और भाड़े के अभिनेताओं का इस्तेमाल करके बनाया गया था। परन्तु जिस समय उसे फैलाया गया था, उस समय इराक और सिरिया में अमरीका नीत नाटो द्वारा सैनिक हमले के एक नये दौर के पक्ष में जनमत पैदा करने में इससे बहुत मदद मिली थी।

बीते चार दशकों में अमरीका की खुफिया एजेंसियां पाकिस्तानी राज्य में गहराई तक घुस गई हैं। जब अमरीका की अगुवाई में नाटो की सेनाओं ने अफगानिस्तान पर सैनिक कब्ज़ा किया, तो उसके बाद अमरीका ने अफ़गानिस्तान को भी आतंकवादी गिरोहों के प्रशिक्षण का अड्डा बना दिया है, जिनके सहारे वह उस देश के पड़ोसियों - पाकिस्तान, ईरान, रूस और मध्य एशियाई गणराज्यों - पर निशाना साधता है। ये आतंकवादी गिरोह अराजकता और हिंसा फैलाकर तथा बेगुनाह लोगों का कत्लेआम करके, इस इलाके के सभी देशों में अस्थाई हालतें पैदा करने के कार्यक्रम को लागू कर रहे हैं। इस समय अमरीका के सी.आई.ए. द्वारा प्रशिक्षित आतंकवादी गिरोह पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान, दोनों देशों से काम करते हैं।

पाकिस्तान और हिन्दोस्तान में बार-बार आतंकवादी हमले आयोजित किये जाते हैं ताकि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच एकता और सहयोग न हो सके। 2008 के मुंबई के आतंकवादी हमले, 2016 के पठानकोट के हमले और हाल ही में अमृतसर व कराची में हुये आतंकवादी कांडों को इस नज़रिये से समझना होगा।

“फरेबी झंडों के तले कार्यवाहियां” आयोजित करना अमरीका की विशेषता है। सी.आई.ए. जब आतंकवादी हरकतें आयोजित करता है तो किसी और को उसका दोषी बताया जाता है। उसके बाद, इन हरकतों का बहाना देकर, आतंकवाद-विरोध के नाम से खुलेआम हथियारबंद हमले किये जाते हैं।

अमरीका का एक फौरी लक्ष्य है चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (चाइना-पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर, सी.पी.ई.सी.) को नाकामयाब करना। अमरीका यह नहीं चाहता है कि सी.पी.ई.सी. एक स्थाई और सुरक्षित आर्थिक क्षेत्र बतौर विकसित हो, क्योंकि वैसा होने से एशिया में चीन का प्रभाव-क्षेत्र विस्तृत होगा। अगर इस इलाके में बार-बार आतंकवादी हमले और “आतंकवाद-विरोधी” हमले होते रहेंगे तो यहां आग लगी रहेगी और संभावित निवेशक डरकर यहां से भाग जायेंगे।

अमरीका अपनी इस ख़तरनाक और पैशाचिक रणनीति में हिन्दोस्तान को एक प्रमुख सांझेदार बनाने की कोशिश कर रहा है। क्या हिन्दोस्तान के शासक उसी गलती को दोहरायेंगे, जिसे पाकिस्तान के शासकों ने 40 वर्ष पहले किया था? अगर वे ऐसा करते हैं तो यह हिन्दोस्तानी लोगों के लिये विनाशकारी होगा।

अगर हिन्दोस्तानी राज्य अमरीका की तथाकथित आतंकवाद-विरोध की रणनीति में उसका सहयोग करता है, तो यह हिन्दोस्तानी लोगों के हितों और दक्षिण एशिया में शांति के ख़िलाफ़ जायेगा। दक्षिण एशिया के सभी लोगों के हित तभी पूरे होंगे और यहां शांति बनाये रखने का उद्देश्य तभी क़ामयाब होगा जब हिन्दोस्तानी राज्य अमरीका की खुफिया एजेंसियों और युद्ध मशीनरी के साथ सारा नाता तोड़ देगा। यह उद्देश्य तभी क़ामयाब होगा जब हिन्दोस्तान दक्षिण एशिया में बढ़ती अमरीकी दखलंदाज़ी को रोकने के लिये, पाकिस्तान के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनायेगा और सभी पड़ोसी देशों का सहयोग करेगा।

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Dec 1-15 2018    World/Geopolitics    Communalism     Rights     War & Peace     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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