बाबरी मस्जिद के विध्वंस के 26 वर्ष बाद :

बड़े सरमायदार और उनका राज्य लोगों की एकता और भाईचारे को बर्बाद कर रहे हैं

26 वर्ष पहले, 6 दिसम्बर, 1992 को दिन-दहाड़े टीवी कैमरों के सामने बाबरी मस्जिद को गिराया गया था और उस नज़ारे को टीवी के ज़रिये पूरी दुनिया में प्रसारित किया गया था। भाजपा के सर्वोच्च नेताओं के उकसावे पर, एक हथियारबंद भीड़ ने उस घिनौनी कार्यवाही को अंजाम दिया था। केंद्र में नरसिंह राव की कांग्रेस पार्टी नीत सरकार और राज्य में भाजपा नीत सरकार की आंखों के सामने, पांच सदी से अधिक पुराने उस ऐतिहासिक स्मारक को गिराया गया था। केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों ने उस घिनौनी कार्यवाही को अंजाम देने वाली हथियारबंद भीड़ को सुरक्षा प्रदान की। वह राजकीय आतंक का कांड था।

बाबरी मस्जिद का विध्वंस इस्लाम धर्म को मानने वालों को जलील करने के मकसद से किया गया था। उस निर्दयतापूर्ण हरकत के खि़लाफ़ जब इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग सड़कों पर उतर आये तब हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने देशभर में उन पर सांप्रदायिक हिंसा छेड़ दी। राज्य द्वारा आयोजित उस सांप्रदायिक हिंसा में हजारों की संख्या में बेगुनाह मुसलमान और हिन्दू लोग मारे गए। बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद आयोजित की गयी सांप्रदायिक हिंसा ने यह साफ दिखा दिया कि हिन्दोस्तानी राज्य एक सांप्रदायिक राज्य है जो धर्म के आधार पर लोगों के बीच बंटवारा करके अपनी हुकूमत को चलाता है।

बाबरी मस्जिद का विध्वंस हिन्दोस्तानी लोगों की एकता और भाईचारे के दिल पर खंजर का वार था। लोगों की एकता पर मंडरा रहे ख़तरे को भांपते हुए, सैकड़ों-हजारों महिलाओं और पुरुषों ने अपने विचारधारात्मक मतभेदों और धार्मिक आस्थाओं से ऊपर उठकर, उस घिनौनी कार्यवाही की निंदा की। उन्होंने उस घिनौनी कार्यवाही के लिए हिन्दोस्तानी राज्य और इसकी दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, कांग्रेस पार्टी और भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराया। उस हरकत के खि़लाफ़ लोगों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा देने की मांग की।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, आज कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ भाजपा भी हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग की प्रमुख पार्टी बनकर आगे आई है। पिछले 26 वर्षों में समय-समय पर चुनाव आयोजित कराने के साथ-साथ लोगों के बीच अराजकता और हिंसा फैलाना, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा सहित राजकीय आतंकवाद छेड़ना, यह हमारे हुक्मरान वर्ग का राज करने का पसंदीदा तरीका बन गया है। मुसलमान आबादी को “आतंकवादी”, “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तान-परस्त” इत्यादि करार दिया जाता है। मुसलमान समुदाय के सैकड़ों-हजारों नौजवानों को टाडा, पोटा और यू.ए.पी.ए. जैसे फासीवादी काले कानूनों के तहत गिरफ़्तार किया गया है और उन्हें तड़पाया गया है। कई नौजवानों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मार डाला गया है।

आज हमारे देश के लोग बेहद ख़तरनाक हालात का सामना कर रहे हैं। देश के हुक्मरान एक बार फिर जानबूझकर सांप्रदायिक उन्माद को हवा दे रहे हैं, जैसा कि उन्होंने 6 दिसम्बर, 1992 से कुछ दिनों और महीने पहले किया था। पर्दे के पीछे से भाजपा और कांग्रेस पार्टी दोनों ही साधुओं और संतों को उकसा रही हैं कि वे मांग करें कि राम मंदिर ठीक उसी जगह पर तुरंत बनाया जाये जहां कभी बाबरी मस्जिद खड़ी थी। ये पार्टियां खुद को एक दूसरे से बड़ा “राम-भक्त” साबित करने की होड़ में लगी हुई हैं। भीड़ द्वारा हिंसा में “गौ रक्षक” बेगुनाह लोगों का क़त्ल कर रहे हैं। सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर जानबूझकर विवाद खड़ा किया गया है। देशभर में जहां कहीं लोग एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोज़गार के लिए गए हुए हैं, उनको “घुसपैठिये” बताकर उनके खि़लाफ़ हमले आयोजित किये जा रहे हैं और उनपर आरोप लगाया जा रहा है कि वे स्थानीय लोगों का “रोज़गार छीन रहे हैं”। रोज़गार के घटते मौकों का इस्तेमाल करके और जाति पर आधारित आरक्षण का वादा करते हुए जातिवादी बंटवारे को और अधिक गहरा बनाया जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस पार्टी, ये दोनों पार्टियां लोगों को धर्म, जाति, प्रांत आदि के आधार पर बांटने का खेल खेल रही हैं। ये दोनों ही पार्टियां लोगों की एकता और भाईचारे को ख़तरे में डाल रही हैं।

दिनभर यह प्रचार चलाया जा रहा है कि बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद दो समुदायों - हिन्दू और मुसलमान, के बीच का “झगड़ा” है। ऐसा दिखावा किया जा रहा है कि यदि मुसलमान समुदाय बाबरी मस्जिद पर अपना दावा छोड़ देता है और बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर राम मंदिर बनाने की इजाज़त दे देता है, तो हिन्दोस्तान में सांप्रदायिक हिंसा की समस्या हल हो जाएगी। लेकिन ये दोनों ही दावे सरासर झूठे हैं।

इस प्रचार का मकसद है इस समस्या के लिये लोगों और उनकी धार्मिक आस्थाओं को दोषी ठहराना। इस प्रचार का मकसद है लोगों को सुनियोजित तरीके से धर्म के आधार पर बांटने में हुक्मरान वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियों व राज्य की भूमिका पर पर्दा डालना।

हिन्दोस्तान में जो टकराव चल रहा है, यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक झगड़ा कतई भी नहीं है। यह टकराव है हिन्दोस्तान के लोगों, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, और शासक वर्ग व उसके राज्य के बीच टकराव।

हिन्दोस्तान में मुट्ठीभर शोषक हैं, जिनकी अगुवाई देश के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपति करते हैं। उन्हीं का हिन्दोस्तानी राज्य पर नियंत्रण और दबदबा है। इस हिन्दोस्तानी राज्य के तमाम तंत्र - कार्यपालिका, जिसमें शामिल है खुफिया एजेंसियां और सशस्त्र बल, विधिपालिका में बैठी सत्ताधारी और विपक्षी राजनीतिक पार्टियां और न्यायपालिका - ये तमाम तंत्र और संस्थाएं मुट्ठीभर शोषकों के हित में काम करती हैं।

1980 के दशक में हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग ने “समाजवादी नमूने के समाज का निर्माण करने” का अपना पुराना नकाब उतार दिया, जिसके ज़रिये वह उस समय तक लोगों को बेवकूफ बनाकर खुद की तिजोरियां भरता आया था। हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग ने निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम की शुरुआत की। यह कार्यक्रम हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों द्वारा मज़दूरों का और तेज़ी से शोषण करने, किसानों पर डाका डालने और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम का यह मकसद था कि आगे से लोगों की ज़रूरतें पूरी करने की राज्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। इसके बजाय, राज्य अब उस शोषण और लूट को आसान बनाने और बढ़ाने का काम खुलेआम करेगा।

कांग्रेस पार्टी और भाजपा की तमाम सरकारों ने इसी कार्यक्रम को लागू किया है। इसका नतीजा है मुट्ठीभर अति अमीरों और बहुसंख्य मज़दूरों और किसानों के बीच लगातार गहराती खाई। इस कार्यक्रम की वजह से छोटे उत्पादकों का सर्वनाश हुआ है। इस शोषण और लूट के खि़लाफ़ समाज के तमाम तबकों के लोगों का विरोध बढ़ता ही जा रहा है।

लोगों की बढ़ती एकता को कुचलने के लिये और उनका ध्यान समस्या के असली स्रोत से भटकाने के लिए, हुक्मरान वर्ग जानबूझकर अराजकता और हिंसा फैला रहा है, राजकीय आतंकवाद बढ़ा रहा है और धर्म, जाति, भाषा और प्रांत के आधार पर लोगों को एक दूसरे के खि़लाफ़ भड़का रहा है।

इसी हुक्मरान वर्ग ने और इसकी राजनीतिक पार्टियों तथा राज्य ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को आयोजित किया था और इस मसले पर लगातार उन्माद भड़काते आ रहे हैं, ताकि वे जन-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र- विरोधी निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकें।

इसलिए केन्द्र में चाहे जो भी पार्टी सत्ता में आई हो, इस भयानक गुनाह के आयोजनकर्ताओं को कभी सज़ा नहीं हुई है।

हमारा देश, हमारे लोगों का वर्तमान और भविष्य, इस हुक्मरान वर्ग और इसके राज्य के हाथों में बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है।

हुक्मरान वर्ग ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर एक दूसरे के खि़लाफ़ भड़काकर राज करने के तौर-तरीके बर्तानवी बस्तीवादियों से विरासत में हासिल किये हैं तथा उनको और अधिक विकसित किया है। बस्तीवादियों ने जानबूझकर यह झूठ फैलाया था कि हिन्दोस्तान के लोग धार्मिक समुदायों में बंटे हुए हैं, जो आपस में लड़ते रहते हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी व मुस्लिम लीग जैसी राजनीतिक पार्टियों और हिन्दू महासभा, आर्य समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) जैसे संगठनों को बढ़ावा दिया। हिन्दू लोगों के बीच उन्होंने यह झूठ फैलाया कि उनके दमन का स्रोत इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग हैं। उन्होंने मुसलमान लोगों के बीच यह झूठ फैलाया कि उनकी तमाम समस्याएं हिन्दू लोगों की वजह से हैं। बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष में लोगों की एकता को तोड़ने के लिए बस्तीवादी राज्य ने सांप्रदायिक क़त्लेआम आयोजित किये। हिन्दोस्तान का दुखद बंटवारा इन्हीं कार्यवाहियों का नतीजा था।

पिछले 71 वर्षों से हमारे देश का हुक्मरान वर्ग, उसकी राजनीतिक पार्टियां और उसका राज्य इस झूठ को बार-बार दोहराते आये हैं। उन्होंने यह झूठा प्रचार किया है कि हमारा समाज “हिन्दू बहुसंख्या” और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों में बंटा हुआ है। वे प्रवचन देते रहते हैं कि “बहुसंख्यक समुदाय” को “अल्पसंख्यक समुदायों” के प्रति “सहनशील” होना चाहिये। इसी “सहनशीलता” के नाम पर राज्य लोगों को उनकी धार्मिक आस्थाओं के आधार पर उत्पीड़ित करता है। कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टियां लोगों की एकता को तोड़ने के लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करती हैं।

हुक्मरान वर्ग और उसका राज्य न तो सभी लोगों के लिए सुख और सुरक्षा प्रदान करना चाहता है और न ही कर सकता है। हिन्दोस्तान के सभी लोगों को मौजूदा राज्य की जगह पर एक नया राज्य स्थापित करने के लक्ष्य के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा, एक ऐसा राज्य जो धर्म के आधार पर लोगों में बंटवारा करने की बस्तीवादी विरासत से पूरी तरह से नाता तोड़ देगा।

मौजूदा गहरे संकट के दौर में हिन्दोस्तान के लोगों को आज़ादी के बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष के बहादुर योद्धाओं से प्रेरणा लेनी होगी। 

1857 के महान ग़दर में हिन्दोस्तान के लोग - किसान, सैनिक, मौलवी और पंडित - घृणित बस्तीवादी राज को उखाड़ फेंकने के लिए एक साथ मिलकर उठ खड़े हुए थे। “हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा” के नारे के साथ वे एकजुट होकर लड़े थे। उस महान ग़दर को अगुवाई देने वालों ने लोगों को बर्तानवियों की चालबाजी के बारे में सावधान किया था, कि किस तरह से बर्तानवी राज्य धर्म के आधार पर लोगों को आपस में लड़वाने के लिए अपने एजेंटों का इस्तेमाल करता है।  

हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने दमनकारी और शोषक बस्तीवादी राज के खि़लाफ़ लोगों को एकजुट होकर उठ खड़े होने के लिए लामबंध किया था। लोगों के मुक्ति संघर्ष को कुचलने के लिए उन्हें सांप्रदायिक आधार पर बांटने की बस्तीवादियों के शैतानी खेल का उन्होंने पर्दाफाश किया था। सभी धर्मों के लोग हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी से जुड़े थे और हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष में आगे आये। शहीद भगत सिंह और बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष के हमारे अन्य बहादुर शहीदों ने भी सांप्रदायिक आधार पर लोगों में बंटवारा करने की बर्तानवी राज्य की चालबाज हरकतों के बारे में लोगों को सावधान किया था।

आज समय की मांग है कि हमारे देश के लोग मौजूदा शोषक, दमनकारी और सांप्रदायिक राज्य को बदलकर उसकी जगह पर एक ऐसे राज्य की स्थापना करने के लक्ष्य के साथ एकजुट हों, जो सभी के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी देगा। ऐसा राज्य व्यक्तिगत और सामूहिक हितों के आपस बीच तालमेल स्थापित करेगा। हमें नयी बुनियादों पर एक नया राज्य स्थापित करना होगा ताकि समाज के सभी सदस्यों के मानव अधिकारों की गारंटी दी जा सके और किसी के साथ धर्म, भाषा, जाति, राष्ट्रीयता या किसी अन्य आधार पर भेदभाव या उत्पीड़न न हो।

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बाबरी मस्जिद के विध्वंस    भाईचारे    बर्बाद    Dec 1-15 2018    Political-Economy    Communalism     History    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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