प्रथम विश्व युद्ध के अंत की 100वीं सालगिरह : साम्राज्यवादी व्यवस्था को ख़त्म करके ही दुनिया में शान्ति सुनिश्चित की जा सकती है

यह वर्ष प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति की 100वीं सालगिरह है। 11 नवम्बर, 1918 को, सुबह 11 बजकर 11 मिनट पर की गयी संधि के साथ, 1914 से चल रहे चार वर्षों का जनसंहार ख़त्म हुआ। सारी दुनिया में युद्ध-विरोधी रैलियां और शांति प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे हैं, जिनमें उस युद्ध की भयंकरता को याद करते हुए, भविष्य में हर प्रकार के युद्ध को रोकने के तौर-तरीकों पर चर्चा की जा रही है।

1914-18 का जनसंहार कुछ लुटेरी साम्राज्यवादी ताक़तों के गिरोह द्वारा अंजाम दिया गया खूंखार क़त्लेआम था। ये साम्राज्यवादी ताक़तें दुनिया के इलाकों, बाज़ारों और संसाधनों पर कब्ज़ा करने और उन्हें आपस में बांटने के घमासान संघर्ष में फंसी हुयी थीं।

20वीं सदी की शुरुआत तक, पूंजीवाद मुट्ठीभर “अगुवा” देशों द्वारा दुनिया की अधिकतम आबादी के उपनिवेशवादी दमन और वित्तीय शोषण की एक विश्वव्यापक व्यवस्था बन गयी थी। दुनिया को फिर से बांटने के इरादे से, अलग-अलग साम्राज्यवादी ताक़तों और उनके समूहों के बीच अंतर्विरोध बहुत तीखा हो गया था।

जर्मनी, जो उस समय उदीयमान औद्योगिक ताक़त थी और बरतानवी व फ्रांसीसी साम्राज्यों से अपना हिस्सा मांग रही थी, उसने नए उपनिवेशों पर अपना कब्ज़ा जमाने के इरादे से जंग में प्रवेश किया। दूसरी साम्राज्यवादी ताक़तें, जैसे कि ऑस्ट्रिया-हंगरी और रूस, टूटते हुए ओटोमन साम्राज्य के अलग-अलग भागों पर कब्ज़ा करना चाहती थीं। यूरोप की सभी साम्राज्यवादी ताक़तें उस कातिलाना बर्बरता के लिए ज़िम्मेदार थीं। बरतानवी साम्राज्यवाद ने अपने स्वाभाविक घमंड के साथ उस हत्याकांड को जायज़ ठहराते हुए, यह दावा किया कि वह लोकतंत्र, अंतर्राष्ट्रीय कानून और छोटे राष्ट्रों के अधिकारों की हिफ़ाज़त कर रहा था।

जिन-जिन राज्यों ने युद्ध में भाग लिया था, उन सभी ने अपने-अपने उपनिवेशों में राष्ट्रों और लोगों के अधिकारों का बहुत ही हिंसात्मक तरीके से दमन किया था। 1914 के पहले के दशकों में बरतानवी हिन्दोस्तान में जब उपनिवेशवादी प्रशासन ने “मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए”, बलपूर्वक खाद्य का निर्यात लागू किया था, तो 3 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी से मारे गए थे। ब्रिटेन के मित्र बेल्जियम के शासन काल में, कुछ दशकों पहले, कांगो के 1 करोड़ गुलाम मज़दूरों को मौत के घाट उतारा गया था। उसी अवधि में जर्मन साम्राज्यवादियों ने वर्तमान नामीबिया के इलाके में सुनियोजित जनसंहार किया था। इस “उदारवादी विश्व व्यवस्था” को स्थापित करने के लिए इन साम्राज्यवादी ताक़तों ने अपनी आधे से अधिक नौजवान आबादी को कुर्बान कर दिया था।

जब युद्ध का अंत हुआ तो ब्रिटेन और फ्रांस ने, फिलिस्तीन से कैमरून तक, पराजित जर्मन और ओटोमन साम्राज्यों के इलाकों को आपस में बांट लिया। राष्ट्रों के अधिकारों को पैरों तले रौंद दिया गया और आने वाली पीढ़ियों के लिए और भयानक मुसीबतों की तैयारी की गयी।

एम.के. गाँधी, जिन्हें जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से हिन्दोस्तान को वापस लाया गया था, युद्ध में ब्रिटिश के समर्थक थे। हिन्दोस्तान के सबसे अमीर पूंजीपतियों में से अनेकों ने ब्रिटेन के युद्ध के लिए सामग्रियों और सेवाओं की सप्लाई से खूब मुनाफ़े कमाने की उम्मीद के साथ, युद्ध का समर्थन किया था। दूसरी ओर, उपनिवेशवादी प्रशासन ने 13 लाख हिन्दोस्तानी सैनिकों को ब्रिटेन के पक्ष में लड़ने और तोंप का चारा बनने के लिए भेज दिया था। (देखिये बॉक्स: प्रथम विश्व युद्ध में हिन्दोस्तानी सैनिक)।

कर्ज़ और मुद्रास्फीति के असहनीय बोझ के तले, हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गयी थी। युद्ध से व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया था, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी फैल गयी थी। युद्ध के ठीक बाद, 1918-19 में इन्फ्लुएंज़ा की महामारी फैल गयी थी, जिसमें 1-2 करोड़ लोग मारे गए थे। उन वर्षों में, हिन्दोस्तान में गुरबत, बीमारी और सबतरफा उत्पीड़न फैला हुआ था।

हिन्दोस्तान के तत्कालीन विदेश सचिव, सर एडविन मोनतागु ने युद्ध में हिन्दोस्तानी सरमायदारों के समर्थन के बदले में, यह घोषित कर दिया था कि “बरतानवी साम्राज्य के अभिन्न हिस्सा बतौर हिन्दोस्तान में क्रमशः ज़िम्मेदार सरकार स्थापित करने के लिए, प्रशासन की हर शाखा में और आत्म-प्रशासन के संस्थानों को विकसित करने में अधिक से अधिक संख्या में हिन्दोस्तानियों को शामिल किया जाएगा”। हिन्दोस्तानी सरमायादार बरतानवी साम्राज्य के अन्दर औपनिवेशिक पद (डोमिनियन स्टेटस) से संतुष्ट थे। परन्तु जब युद्ध समाप्त हुआ, तब ब्रिटिश राज ने दमनकारी रावलेट एक्ट को लागू किया, जिसके तहत वाइसराय की सरकार को साम्राज्य के ख़िलाफ़ “राजद्रोह” को कुचलने की निरंकुश ताक़तें दी गयीं - प्रेस को चुप कराने या सेंसर करने, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना सुनवाई जेल में बंद करने, साम्राज्य के साथ विश्वासघात के शक पर किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ़्तार करने की ताक़तें, इत्यादि। उस कठोर कानून के ख़िलाफ़ जनता के विरोध को बेरहमी से कुचल दिया गया।

हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने अपने सभी सदस्यों और सभी देशभक्त हिन्दोस्तानियों को यह आह्वान किया कि अंतर- साम्राज्यवादी युद्ध का फ़ायदा उठाकर उस मौके का सही इस्तेमाल करें। हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने सम्पूर्ण आज़ादी की मांग रखी - राजकोष, विदेशी मामलों और सेना पर हिन्दोस्तानी लोगों के सम्पूर्ण नियंत्रण की मांग रखी। हिन्दोस्तानी लोगों को एक खुले पत्र में यह स्पष्ट किया गया कि “हमारे नारे इस प्रकार के होने चाहियें: सम्पूर्ण आज़ादी या असहयोग! आज़ादी के सिवाय और कुछ नहीं! आज़ादी नहीं तो हिन्दोस्तान से कोई सैनिक नहीं! आज़ादी नहीं तो हिन्दोस्तान से कोई पैसा नहीं! आज़ादी या प्रतिरोध!”

युद्ध के दौरान, लेनिन और रूस की बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध के खिलाफ़ एक असूलन मार्क्सवादी रवैया अपनाया था, जो कि दूसरे इंटरनेशनल की कई अन्य समाजवादी पार्टियों के नेताओं की बेशर्म मौकापरस्ती से बिल्कुल अलग था। उन पार्टियों ने “पितृभूमि की रक्षा” के नाम पर अपने-अपने देशों के पूंजीपतियों का समर्थन किया था।

लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने रूस के मज़दूर वर्ग और जनसमुदाय को “भूमि, रोटी और शांति!” के नारे के इर्द-गिर्द लामबंध किया। उन्होंने श्रमजीवी क्रांति को क़ामयाब किया और रूस को युद्ध से बाहर निकाला। इस प्रकार से उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि श्रमजीवी क्रांति का रास्ता ही शांति का एकमात्र विश्वसनीय रास्ता है।

जब तक साम्राज्यवादी व्यवस्था मौजूद है, तब तक विनाशकारी विश्व युद्धों का ख़तरा बना रहेगा। पूंजीवाद के असमान विकास के नियम की वजह से, सत्ता का संतुलन अनिवार्यतः अस्थायी होगा। प्रमुख साम्राज्यवादी ताक़तों के आपस बीच तथा उनके और नयी या उदीयमान साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच स्पर्धा की वजह से युद्ध का होना अनिवार्य है। पर साथ ही साथ, साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच स्पर्धा, अपने-अपने देशों में मज़दूरों पर उनके हमलों, दूसरे देशों के मज़दूरों व लोगों पर हमलों, इन सबकी वजह से वर्तमान व्यवस्था के सारे अंतर्विरोध और तीखे हो जायेंगे। हरेक देश के अन्दर शोषकों और शोषितों के बीच अंतर्विरोध, साम्राज्यवाद और दबे-कुचले लोगों के बीच अंतर्विरोध और अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध, ये सभी और तीखे हो जायेंगे। इन सभी अंतर्विरोधों के तीखे होने से, एक या अनेक देशों में श्रमजीवी क्रांति की फतह की हालतें पैदा होंगी, जहां भी साम्राज्यवाद की जंजीर की कड़ी सबसे कमज़ोर होगी, जैसा कि रूस में हुआ था।

आज भी, दुनिया के संसाधनों, बाज़ारों, प्रभाव क्षेत्रों और इलाकों के अधिक से अधिक हिस्सों पर कब्ज़ा करने के लिए, प्रतिस्पर्धी साम्राज्यवादी ताक़तों और इजारेदार पूंजीवादी समूहों के बीच भीषण स्पर्धा है। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने एक हानिकारक व्यापार युद्ध शुरू किया है, जो सारी दुनिया को एक और विश्व युद्ध की कगार पर ला सकता है।

इन हालतों में, यह अत्यावश्यक है कि सभी देशों के मज़दूर वर्ग और लोग सौ वर्ष पहले ख़त्म हुए उस युद्ध से सही सबक सीखें। सारी दुनिया में, यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था ही है जो युद्ध और हमले का स्रोत है। साम्राज्यवादी युद्ध पूंजीवाद के वर्तमान पड़ाव की एक आवश्यक और अनिवार्य विशेषता है। हमलावर युद्धों को ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता यही है कि हर देश में मज़दूर वर्ग संगठित हो जाये और क्रांति के ज़रिये पूंजीवाद का तख्तापलट करने के लिए सभी लोगों को लामबंध करे।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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