मानव अधिकार दिवस की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर :

मानव अधिकारों की आधुनिक अवधारणा के आधार पर हिन्दोस्तानी समाज का नव-निर्माण करने की फौरी ज़रूरत

इस वर्ष के 10 दिसम्बर को मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा के ऐलान किये जाने और अपनाये जाने की 70वीं वर्षगांठ थी। यह घोषणा संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा 1948 को, दूसरे विश्व युद्ध के ख़त्म होने के ठीक बाद, की गई थी। युद्ध के दौरान, दुनिया के लोगों ने सोवियत संघ की अगुवाई में, जर्मनी, जापान और इटली के फासीवादी राज्यों के ख़िलाफ़ बहादुर संघर्ष किया था। उस संघर्ष में 12 करोड़ से अधिक लोगों की मौत हुई थी। लोग फासीवाद, साम्राज्यवादी जंग और उपनिवेशवादी गुलामी को ख़त्म करने की मांग कर रहे थे।

लोगों के उन जज़बातों के साथ विश्वासघात किया गया है। अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी ताक़तें दूसरे देशों की संप्रभुता का खुलेआम हनन करती हैं। उन्होंने दूसरे देशों पर कब्ज़ा करने और वहां शासन परिवर्तन करने के इरादे से तमाम युद्ध छेड़े हैं। लाखों-लाखों लोगों को शरणार्थी बनाया गया है। यूरोप और उत्तरी अमरीका के तथाकथित लोकतंत्रवादी राज्यों में शासक अल्पसंख्यक लोगों के ख़िलाफ़ सुनियोजित नस्लवादी और फासीवादी हमले करते रहते हैं। राज्य का पर्दाफ़ाश करने या राज्य की आलोचना करने की जुर्रत करने वाले लोगों को फासीवादी कानूनों के तहत जेल में बंद किया जाता है।

एक तरफ, अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस के अवसर पर पूंजीवादी और साम्राज्यवादी राज्यों की सरकारें और संगठन यह झूठा प्रचार करते हैं कि वे अपने नागरिकों के मानव अधिकारों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। दूसरी तरफ, दुनिया के लोग सड़कों पर उतरकर यह आवाज़ बुलंद करते हैं कि लोगों को मानव अधिकार नहीं मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी राज्य लोगों को वे सभी मानव अधिकार, जो मानव समाज के सदस्य होने के नाते मिलने चाहिएं, सुनिश्चित करने में नाकामयाब हैं और उन्हें सुनिश्चित करना चाहते भी नहीं हैं।

मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा में शानदार शब्दों में लिखा गया है कि सरकारों को सभी लोगों को न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। परन्तु घोषणा में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इन मानव अधिकारों की हिफ़ाज़त और अमल के लिये संविधानीय गारंटी देना राज्य का फ़र्ज़ है। साथ ही साथ, घोषणा में श्रम का शोषण करने के पूंजीपतियों के “अधिकार” और दूसरे देशों और लोगों पर अपनी व्यवस्था को थोपने के साम्राज्यवादियों के “अधिकार” को बरकरार रखा गया है। मानव अधिकारों के साम्राज्यवादी नज़रिये और अधिकारों की आधुनिक परिभाषा के बीच संघर्ष मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा को लिखने के समय ही शुरू हो गया था और आज तक यह संघर्ष जारी है। (देखिये बॉक्स: अधिकारों की साम्राज्यवादी और आधुनिक अवधारणाओं के बीच संघर्ष)

हिन्दोस्तान ने मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा पर हस्ताक्षर किया है। परन्तु मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा में जिन-जिन अधिकारों का जिक्र किया गया है, उन सभी का अपने देश में खुलेआम हनन होता है। हरेक सरकार यह ऐलान करती है कि लोगों के सभी अधिकारों को सुनिश्चित करना उसका इरादा है, परन्तु सभी सरकारें अधिकारों की गारंटी देने से इंकार करती हैं। हिन्दोस्तान में मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों की हालतें यह साफ़-साफ़ दिखाती हैं कि मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा में बताये गये अधिकारों को हासिल करने में हम 70 वर्ष बाद भी बहुत दूर हैं।

अगर आज लोगों को 21वीं सदी के अनुकूल, सम्मानजनक मानव जीवन जीना है, तो अर्थव्यवस्था की दिशा मानव-केंद्रित होनी चाहिये। परन्तु हिन्दोस्तानी राज्य अर्थव्यवस्था की पूंजी-केंद्रित दिशा को बरकरार रखता है। हिन्दोस्तानी राज्य ने यह सुनिश्चित कर रखा है कि देश के संसाधनों पर सबसे पहला हक़ बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी इजारेदार कंपनियों को होगा, न कि देश के करोड़ों मज़दूरों, किसानों और श्रमिकों को। अगर कोई बड़ा पूंजीपति कर्ज़ा नहीं चुकाता है तो उसका कर्ज़ा या तो माफ़ कर दिया जाता है या फिर उसे चुकाने के पुनर्गठित या आसान तरीके निकाले जाते हैं। परन्तु अगर कोई मज़दूर, छोटे धंधे वाले या किसान कर्ज़ा नहीं चुका पाता है तो उसके पूरे परिवार की संपत्ति को ज़ब्त कर लिया जाता है। यही कारण है कि लाखों-लाखों किसानों ने असम्मान का जीवन जीने के बजाय, खुदकुशी करने का रास्ता अपनाया है। अर्थव्यवस्था की पूंजी केंद्रित दिशा मानव अधिकारों की गारंटी के बिल्कुल प्रतिकूल है।

पूंजीवादी सरकारों के दावों और हक़क़ीत के बीच इस चैड़ी खाई का क्या कारण है? 1947 में जब हिन्दोस्तानी लोगों ने उपनिवेशवादी गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंका था, तब नई सरकार उपनिवेशवादी राज्य और उनकी अधिकारों की अवधारणा से नाता तोड़ सकती थी। परन्तु उसने ऐसा करने से इंकार किया था। उपनिवेश्वादी शासन के चलते, हमारे लोगों की भूमि, श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट होती थी। जनसमुदाय के कोई अधिकार नहीं हुआ करते थे। उपनिवेशवादी राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों को राज्य का दुश्मन बताकर उन्हें दमन का शिकार बनाया जाता था।

आज तक हमारे देश में यही स्थिति चल रही है। हिन्दोस्तानी राज्य देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा हमारे लोगों की भूमि, श्रम और संसाधनों की लूट की हिफ़ाज़त करता है। जो भी इस लूट का विरोध करता है, उसे फासीवादी कानूनों का शिकार बनाया जाता है। संविधान में लिखा गया है कि जीवन का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, परन्तु उसी संविधान में कुछ ऐसे अतिरिक्त प्रावधान हैं जो राज्य को आफस्पा और यू.ए.पी.ए. जैसे कठोर कानूनों को लागू करने का अधिकार देते हैं। इन कठोर कानूनों के तहत, जब भी लोग अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ तथा अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिये लड़ने की जुर्रत करते हैं, तो उन्हें मनमानी से जेल में बंद किया जाता है या गोलियों से उड़ा दिया जाता है। हमारे देश में मानव अधिकारों, जनवादी और राष्ट्रीय अधिकारों का हनन स्वाभाविक स्थिति ही है, न कि कोई अपवाद।

1947 में आज़ादी के बाद स्थापित की गई सरमायदारों की सरकार ने आज़ाद हिन्दोस्तानी राज्य के संविधान को आधिकारिक रूप दिया था। उपनिवेशवादी राज्य और उसके संस्थानों की उन विशेषताओं को, जो अधिकारों की आधुनिक परिभाषा के अनुकूल नहीं हैं, बरकरार रखा गया। संविधान में मानव अधिकारों के सर्वव्यापक, अलंघनीय और अविभाज्य चरित्र को नकारा गया। इसके बजाय, अधिकारों की एक औपचारिक अवधारणा स्थापित की गई। संविधान में अधिकारों को दो वर्गों में बांटा गया - “मौलिक” अधिकार और “नीति निदेशक तत्व”। “मौलिक” अधिकारों को सुनिश्चित करने का वादा किया गया था, जबकि बाकी अधिकार शासकों के लिये सिर्फ नीति निदेशक बनाकर रखे गये, जिन्हें बाद में किसी समय पर मौलिक बनाये जाने का सपना दिखाया गया था। “मौलिक” अधिकारों को भी अमल में लाने के कोई तंत्र नहीं स्थापित किये गये थे। उन्हें कानूनी पंडितों की अपनी-अपनी परिभाषाओं पर छोड़ दिया गया, जिसकी वजह से लोग अपने अधिकारों के हनन को चुनौति देने में आज तक असमर्थ हैं। हिन्दोस्तान के संविधान में अधिकारों का जो पूरा ढांचा गठित किया गया है, उसका मक़सद है लोगों को बुद्धू बनाकर इस भ्रम में रखना कि पूंजीवादी शोषण के चलते, मानव अधिकारों को सुनिश्चित करना मुमकिन है। यह बहाना दिया गया कि अभी-अभी आज़ाद हुये हिन्दोस्तान के पास लोगों की मौलिक ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता नहीं है। यह भ्रम फैलाया गया कि जैसे-जैसे पूंजीवादी संवर्धन होता जायेगा, वैसे-वैसे राज्य के लिये मानव अधिकारों को सुनिश्चित करने की हालतें पैदा होंगी।

सोवियत संघ के पतन के बाद, अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्रों ने पैरिस चार्टर में यह घोषणा की कि दुनिया के सभी राज्यों को “मुक्त बाज़ार” की अर्थव्यवस्था, बहुपार्टीवादी लोकतंत्र और “कानून के शासन” पर आधारित नई विश्व व्यवस्था को स्वीकार करना होगा। अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी ताक़तों ने खुद को दूसरे देशों की संप्रभुता का खुलेआम हनन करने और उन पर एक ऐसी विश्वव्यवस्था थोपने का अधिकार दिया, जिसमें इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जायेगी जबकि लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया जायेगा।

हिन्दोस्तान के शासक वर्ग ने पैरिस चार्टर का पलक पावड़े बिछाकर स्वागत किया। हमारे शासक वर्ग ने निजीकरण और उदारीकरण के जरिये भूमंडलीकरण का कार्यक्रम शुरू कर दिया, जिसका अंजाम लोगों के लिये तबाहकारी रहा। जिन-जिन कार्यों को हिन्दोस्तानी लोग हमेशा राज्य का फ़र्ज माना करते थे, राज्य ने उन्हें पूरा करने का दिखावा भी त्याग दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पीने का पानी, सिंचाई का पानी, जन परिवहन, शौच प्रबंध, बिजली सप्लाई, खेती की लागत, प्राकृतिक संसाधनों जैसे कि जल, जंगल, ज़मीन की मालिकी - हर ऐसे क्षेत्र को, जिसमें इजारेदार पूंजीपति अधिक से अधिक मुनाफ़ें बना सकते हैं, उन्हें सौंपा जा रहा है। परन्तु लोग इसके ख़िलाफ़ बग़ावत कर रहे हैं।

आज के हिन्दोस्तान की व्यवस्था में अधिकार कुछ लोगों के विशेष अधिकार बनकर रह गये हैं। शासक वर्ग और उनके राज्य की मनमर्ज़ी के अनुसार इन्हें दिया या वापस लिया जा सकता है।

मानव अधिकार मूलभूत रूप से, मानव सभ्यता की एक पैदाइश है। जैसे-जैसे मानव समाज का विकास होता रहा है, वैसे-वैसे मानव अधिकारों की परिभाषा भी समाज की प्रगति के स्तर के साथ-साथ बदलती रही है।

आज आज़ादी के 70 वर्ष बाद, हमारे शासक वर्ग का दावा कि रोज़गार का अधिकार, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पेय जल, बिजली और आवास जैसे मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिये उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, यह एक बहुत ही क्रूर मज़ाक है। लोग इस दावे को सीधा चुनौती दे रहे हैं। “देश की एकता और अंखडता को बचाये रखने” के बहाने, जीवन के अधिकार और ज़मीर के अधिकार पर “वाज़िब प्रतिबंध” लगाये गये हैं। विश्व की अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव के सामने लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। आज इस अंतरविरोधी स्थिति को फ़ौरन ख़त्म करने की ज़रूरत है।

हमारे देश में और सारी दुनिया में आज उत्पादक ताक़तों का इतना ज़्यादा विकास हो चुका है कि मानव अधिकारों की आधुनिक परिभाषा को विकसित करना और लोगों के लिये उसे अमल में लाना पूरी तरह संभव है। इनमें वे सारे आर्थिक और राजनीतिक अधिकार शामिल हैं जो आधुनिक समय के अनुकूल हैं और लोगों की लगातार बढ़ती अकांक्षाओं के अनुसार हैं। जब तक इन अधिकारों को सुनिश्चित नहीं किया जायेगा, जब तक समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक हमारा समाज आधुनिक नहीं कहलाया जा सकता है। परन्तु इन अधिकारों को हक़ीक़त में बदलने के रास्ते में रुकावट बनकर खड़ी है वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया। जब तक राज्य हिन्दोस्तान की पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट की हिफाज़त करता रहेगा, तब तक सभी लोगों के मानव अधिकारों को सुनिश्चित करना नामुमकिन होगा, क्योंकि मानव अधिकार और पूंजीवादी शोषण पूरी तरह प्रतिकूल हैं।

मानव अधिकारों को हकीक़त में बदलने के लिये वर्तमान परजीवी पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था की जगह पर एक आधुनिक समाजवादी समाज स्थापित करना होगा। समाजवादी समाज ही पूंजीवादी शोषण को ख़त्म करके और देश के तमाम संसाधनों को मेहनतकशों के हवाले करके, समाज के सभी सदस्यों की ज़रूरतों को पूरा करने के क़ाबिल है। ऐसे समाज में ही मानव अधिकारों की आधुनिक परिभाषा को हक़ीक़त में बदला जा सकता है - वे अधिकार जो सर्वव्यापक, अलंघनीय और अविभाज्य हैं।

नव-निर्माण के कार्यक्रम को लागू करने के लिये इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों और बैंकों को अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाने के “अधिकार” से वंचित करना पड़ेगा तथा समाज के सभी सदस्यों के जनवादी और राष्ट्रीय अधिकारों समेत मानव अधिकारों को संवैधानिक तौर पर सुनिश्चित करना होगा और उन्हें अमल में लाने के लिये तंत्र स्थापित करने होंगे। जबकि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के चलते लोगांे को संप्रभुता से वंचित किया जाता है, तो लोगों के हाथों में संप्रभुता लाना हमारे मानव अधिकारों को अमल में लाने के संघर्ष का एक अनिवार्य हिस्सा है। हिन्दोस्तान को रज़ामंद लोगों की स्वेच्छा पर आधारित संघ के रूप में पुनर्गठित करने की ज़रूरत है, ताकि सभी घटक राष्ट्रों और लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों की पुष्टि हो सके।

मानव अधिकारों की परिभाषा देने और उन्हें हक़ीकत में बदलने के संघर्ष में कम्युनिस्टों की अहम भूमिका है। अधिकारों की आधुनिक परिभाषा पर विस्तार करके, कम्युनिस्ट मेहनतकश लोगों के खुद अपना शासन करने के क्रांतिकारी संघर्ष को बहुत प्रोत्साहन दे सकते हैं। लोगों की सत्ता की स्थापना और देश के नव-निर्माण के हमारे संघर्ष को बहुत ताक़त और प्रोत्साहन मिलेगा अगर हम एक ऐसे नये समाज के लक्ष्य के साथ संघर्ष करेंगे, जिसके संगठन, अर्थव्यवस्था और प्रशासन का मौलिक मार्गदर्शक सिद्धांत होगा मानव अधिकारों की आधुनिक परिभाषा और पुष्टि।

 

अधिकारों की साम्राज्यावादी और आधुनिक अवधारणाओं के बीच संघर्ष

मानव अधिकारों की सर्वव्यापक घोषणा को जब लिखा गया था, तो उस समय अधिकारों की दो भिन्न व आपस में विरोधी अवधारणाओं के बीच में कठोर संघर्ष चल रहा था। एक वह अवधारणा थी जिसे अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस की साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी ताकतें पेश कर रही थीं। दूसरी थी मानव अधिकारों की आधुनिक अवधारणा, जिसे सोवियत संघ पेश कर रहा था। घोषणा को लिखने वाली कमेटी में अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी ताकतों का बहुमत था। इसलिये साम्राज्यवादी ताकतों की अवधारणा ही अंतिम मसौदे में हावी रही। सोवियत संघ अंतिम घोषणा पर मतदान करने से पीछे हट गया था।

आंद्रे वाइशिंस्की की अगुवाई में सोवियत प्रतिनिधिमंडल ने घोषणा में उन प्रवधानों को शामिल करने की बहुत कोशिश की, जो मानव अधिकारों की आधुनिक परिभाषा के अनुकूल होंगे। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की बहुत कोशिश की कि राज्य मानव अधिकारों को हक़ीकत में बदलने की जिम्मेदारी उठायें।

सोवियत प्रतिनिधिमंडल ने यह मांग की कि सभी राज्यों को नस्लवादी और फासीवादी प्रचार, जंगफरोशी और राष्ट्रों के बीच में दुश्मनी भड़काने वाली सभी हरकतों पर रोक लगानी चाहिये। परन्तु अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्रों ने उस मांग को ठुकरा दिया।

सोवियत संघ ने यह मांग की कि घोषणा में सभी राष्ट्रों के आत्मनिर्धारण के अधिकार की हिफ़ाज़त की जानी चाहिए। पर साम्राज्यवादी ताकतों ने आत्मनिर्धारण के अधिकार को ठुकराया।

सोवियत प्रतिनिधिमंडल ने यह मांग रखी कि हर व्यक्ति को अपने राष्ट्र की संस्कृति व भाषा, आदि का अधिकार होना चाहिये। साम्राज्यवादियों को यह मंजूर नहीं था।

सोवियत प्रतिनिधिमंडल “व्यक्ति के जीवन, आज़ादी और सुरक्षा” की गारंटी के प्रावधान में यह संशोधन लाना चाहता था कि राज्य को “हर इंसान को अपराधों से सुरक्षा देनी चाहिये, भूख से मौत के खतरे को रोकना चाहिए, इत्यादी”। पर अमरीकी साम्राज्यवादियों ने उस संशोधन को खारिज़ कर दिया।

सोवियत प्रतिनिधिमंडल ने यह मांग की कि राज्यों को सभी मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। परन्तु इसे ठुकराते हुये, अमरीकी प्रतिनिधिमंडल के नेता, एलेनर रूज़वेल्ट ने कहा कि अमरीका “यह नहीं मानता है कि घोषणा में लिखे गये आर्थिक और सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों का यह मतलब है कि सरकार को सीधा कदम लेकर इन अधिकारों के अमल को सुनिश्चित करना चाहिए”।

जबकि संयुक्त राज्य मानव अधिकार घोषणा में रोजगार का अधिकार, समान काम के लिये समान वेतन का अधिकार और सम्मान के साथ जीने का अधिकार घोषित हैं, परन्तु घोषणा में इन अधिकारों को हक़ीकत में बदलने के लिये राज्यों पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं डाली गयी है। ऐसा इसलिये किया गया ताकि इजारेदार पूंजीपति मेहतनकशों के बेरहम शोषण को निर्विरोध जारी रख सकें।

सोवियत संघ ने पूंजीवादी शोषण को खत्म करके और मानव अधिकारों को सुनिश्चित करके, अपने अभ्यास से यह साबित कर दिया कि समाजवादी समाज में अधिकारों की अवधारणा कितनी उन्नत हो सकती है और इन्हें कैसे हक़ीकत में बदली जा सकती है। दूसरी ओर, साम्राज्यवादियों ने यह दावा किया कि मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था और बहुपार्टीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था ही क्रमशः लोगों के अधिकारों को हासिल कर सकती है।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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