पूरे यूरोप में मेहनतकश लोग कमखर्ची कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं

फ्रांस में बड़े-बड़े जन प्रदर्शन (पीले बनियान के नाम से जाने जाने वाले) जो नवम्बर में और फिर 8-9 दिसम्बर को फिर से फूट पड़े थे, वे पूरे यूरोप में फैल रहे हैं। सभी जगहों पर पूंजीपतियों के समाज-विरोधी व्यापक हमले के खिलाफ़ मेहनतकश लोग और छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं।

फ्रांस में जन-विरोध ऊर्जा पर लगाए गए करों के खिलाफ़ प्रदर्शनों के साथ शुरू हुआ था परंतु इनमें नौकरियों के अभाव और सरमायदारों के सब-तरफा आर्थिक हमले का विरोध भी देखने में आया। ये हमले ओलांद की सरकार के दौरान शुरू हुए थे और अब मैकरोन की सरकार के दौरान चल रहे हैं। नवम्बर में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ़ जो प्रदर्शन हुए थे उनमें तरह-तरह के नारे लगाए गए थे जैसे कि - कर वसूली बंद करो!, मैकरोन पाकेटमार है!, काम पाना एक दुर्लभ सुख बन रहा है!, दायें देखो बाएं देखो सब तरफ कर वसूली!, लूटना बंद करो!, इत्यादि। कर वसूली में इंसाफ, गरीबों से कम कर वसूली, अमीरों की टैक्स कटौती को बंद करना, गरीब व असहाय लोगों पर बोझ को हल्का करने के लिए सामाजिक सुविधाएं, इत्यादि, ये मुख्य मांगें थीं।

Brussels-Yellow

इस आंदोलन में भाग लेने वाले मुख्यतः आम मज़दूर हैं जिनमें अधिकतर असंगठित और कम कौशल के मज़दूर हैं। तरह-तरह के दुख-दर्दों को लेकर लोग इन विरोध प्रदर्शनों में आए। फ्रांस में इस समय देहातों के गरीबों और बेरोजगारों के साथ-साथ, छात्र और मज़दूर भी लगातार अपना विरोध जताने के लिए सड़कें रोक रहे हैं। समाचार सूत्रों के अनुसार, पेरिस में नौकरियों की मांग को लेकर संघर्ष करने वाले अस्पताल कर्मियों ने भी पीले बनियान वालों के विरोध में भाग लिया जबकि इस्पात और तेल के भंडारों में चल रही हड़तालों की वजह से देशभर में गुस्सा और विरोध की लहर तेजी से बढ़ गयी।

इस जन-विरोध पर राज्य के वहशी दमन से लोगों का गुस्सा और भड़क गया। फ्रांसीसी सरकार ने बर्बरता और आतंक के जरिए, जनता को कुचलने और डराने-धमकाने के लिए सशस्त्र पुलिस बल का प्रयोग किया। पुलिस सूत्रों की खबरों के अनुसार, नवम्बर में जन प्रदर्शनों के शुरू होने के समय से अब तक 4500 से अधिक लोग गिरफ्तार किए गए हैं, जिनमें लगभग 4100 अभी भी पुलिस की हिरासत में हैं। 8 दिसम्बर को एक ही दिन में लगभग 2000 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें 300 को छोड़कर बाकी सभी को प्रदर्शनों के शुरू होने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया था। सरकार का कहना है कि ये “निरोधक नियंत्रण” के कदम थे।

दिसम्बर के महीने में ये जन-विरोध बेल्जियम से, जर्मनी से, स्वीडन से,नेदरलैंड्स और ब्रिटेन तक फैल गए। सभी देशों में एक जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं, हालांकि हर देश की हालत में कुछ-कुछ अंतर है। ब्रिटेन के मेहनतकश लोगों ने पूंजीपतियों के समाज-विरोधी हमले के प्रति अपने विरोध को ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने की मांग के माध्यम से जाहिर किया। सभी देशों में लोग बहुत गुस्से में हैं कि उन्हें रोजी-रोटी और आमदनी पर बढ़ते दबाव का सामना कर पड़ रहा है और उनकी सरकारें जनता के खिलाफ़ काम करके जनता के साथ विश्वासघात कर रही हैं। वे मांग कर रहे हैं कि “हम भी अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते हैं जैसा कि पूंजीपति चाहते हैं। हम अपनी नौकरियों को बचाना चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि सरकार हमारे सारे पैसे लूट ले”।

2008 में जब से संकट फूट पड़ा था, तब से हरेक देश के आम लोगों को इसकी कीमत भुगतनी पड़ी है। सरकारी खर्चें में कटौती की गई है, नौकरियों में कटौती की गई है और कर वसूली बढ़ा दी गई है। गरीब और असहाय लोगों, खासकर बच्चों, एकल अभिभावकों और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक समुदायों के साथ-साथ, बड़े शहरों के बाहर व ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़ती जा रही है।

यह स्पष्ट है कि बहुसंख्यक मेहनतकश लोगों और अमीर व राजनीतिक तौर से ताकतवर कुलीन वर्ग के बीच, विवाद तेज हो रहा है। दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे पूंजीपतियों तथा अपने बीच की चौड़ी होती जा रही खाई को देखते हुए लोग बहुत गुस्से में हैं।

यह संकट पूरे यूरोपीय संघ के गहराते संकट का भी अंदेशा देता है। लोग फ्रांस में पुलिस के अत्याचार को जीवन के फौजीकरण का प्रतीक मानते हैं। इसके साथ-साथ अर्थव्यवस्था का भी फौजीकरण हो रहा है और यूरोपीय सेना गठित करने का दबाव बढ़ रहा है, चाहे नाटो के नियंत्रण में हो या यूरोपीय संघ के। रिपोर्टों के अनुसार, फ्रांस राज्य सेना पर प्रति वर्ष लगभग 440 अरब अमरीकी डालर खर्च करता है, जबकि लोग मांग कर रहे हैं कि इस धन को समाज कल्याण के कार्यक्रमों पर खर्च करना चाहिए।

मज़दूर वर्ग और उसके मित्र यह मांग कर रहे हैं कि मेहनतकशों के अधिकारों को मान्यता दी जाए और सरकार अपनी दिशा बदल दे, वर्ना सरकार को जाना होगा। लोग अपने अधिकारों की हिफाजत में संघर्ष कर रहे हैं।

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कमखर्ची    पीले बनियान    Jan 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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