कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षा बलों द्वारा 7 बेकसूर लोगों की हत्या :

व्यापक विरोध प्रदर्शनों में कश्मीर में सैनिक शासन को खत्म करने की मांग की गई

15 दिसंबर की सुबह को, सेना, पुलिस की स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप और अर्धसैनिक बलों ने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा गाँव में “संदिग्ध आतंकवादियों” के साथ एक “मुठभेड़” किया। जैसे ही सुरक्षा बलों की गोलियों की आवाज आयी, वैसे ही आस-पास के इलाकों से सैकड़ों नौजवान हत्याओं का विरोध करने के लिए मुठभेड़ के स्थान पर पहुंचे। सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बुलेट, पेलेट और आंसू गैस से वार किया, जिसकी वजह से, जाना जाता है कि कम से कम 7 नौजवान मारे गए और अस्पतालों के अनुसार, लगभग 40 लोग गंभीर चोटों के साथ भर्ती किये गए हैं।

कश्मीर में सुरक्षा बलों की इस वहशी कार्यवाही की निंदा करते हुए, नई दिल्ली, श्रीनगर और कश्मीर घाटी की अन्य जगहों पर तथा देश के और स्थानों पर बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

कश्मीर घाटी की कई जगहों पर लोग पुलवामा हत्याकांड के विरोध में सड़कों पर उतर आये हैं। पुलवामा हत्याकांड के ठीक बाद, तीन दिन तक लगातार पूरे कश्मीर में बंद और विरोध प्रदर्शन होते रहे। 19 दिसंबर को हंदवारा में सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन करके पुलवामा हत्याकांड का विरोध किया। हाथों में काले झंडे, प्लेकार्ड और बैनर लेते हुए, उन्होंने हंदवारा की बाजारों में प्रदर्शन किया। उन्होंने सुरक्षा बलों के अत्याचार को खत्म करने की मांग की। उन्होंने केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक ताकतों से मांग की कि कश्मीरी लोगों के जज़बातों और आकांक्षाओं का आदर करें।

Dharna on Pulwama killing

 

Dharna on Pulwama killing

 

Dharna on Pulwama killing

विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं ने 19 दिसंबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक जुझारू विरोध प्रदर्शन किया। इसमें सहभागी संगठन थे जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम.), खुदा ए खिदमतगार, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज दिल्ली, लोक राज संगठन, दिल्ली सॉलिडेरिटी ग्रुप, समाजवादी युवजन सभा, सद्भावना मिशन, पाकिस्तान इंडिया पीपल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी, नेशनल मूवमेंट फ्रंट, एन.टी.यू.आई. और अन्य।

प्रदर्शनकारियों ने सेना द्वारा इस वहशी कत्लेआम और कश्मीर में हर रोज हो रहे इस प्रकार के हत्याकांडों के खिलाफ़ नारे बुलंद किये। “कश्मीर में राजकीय आतंकवाद मुर्दाबाद!”, “आफ्सपा हटाओ, कश्मीर में सेना का अत्याचार बंद करो!”, “कश्मीर में बेकसूरों को मारना बंद करो!”, “हजारों कश्मीरी नौजवानों के कत्लेआम के गुनहगारों को सज़ा दो!”, उनके हाथों में प्लेकार्ड पर ये तथा अन्य नारे लिखे थे।

सहभागी संगठनों के प्रतिनिधिओं और कई जागरुक व्यक्तियों ने सभा को संबोधित किया, जिनमें शामिल थे प्रोफेसर, लेखक, कलाकार, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता, आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता, इत्यादि। सभी वक्ताओं ने पुलवामा हत्याकांड की कड़ी निंदा की। केंद्र सरकार की “कश्मीर नीति”, जिसके अनुसार हर कश्मीरी को “राष्ट्र के लिए खतरा” माना जाता है और बेहद पाश्विकता के साथ कुचल दिया जाता है, उसका सभी वक्ताओं ने खंडन किया। उन्होंने बताया कि बीते 29 वर्षों में कश्मीर घाटी में दसों-हजारों लोग मारे गए हैं। हजारों नौजवान “लापता” हैं, हजारों गुमनाम कब्रें पाई गई हैं। वक्ताओं ने विवरण किया कि किस तरह सुरक्षा बलों के हर “मुठभेड़” का लोग भारी संख्या में बाहर निकलकर विरोध करते हैं, किस तरह सुरक्षा बल “उग्रवादियों को पकड़ने” के बहाने बेकसूर लोगों पर गोली चलाते हैं, कि सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए हर व्यक्ति के अंतिम संस्कार पर हजारों-हजारों लोग उपस्थित होते हैं। कश्मीर के लोग खुद को हिन्दोस्तानी राज्य से बिलकुल अलग महसूस करते हैं, वक्ताओं ने ज़ोर दिया। कश्मीर की समस्या को “कानून और व्यवस्था की समस्या” बताकर उसे बेरहम दमन से दबाने की केंद्र सरकार की नीति से कोई समाधान नहीं निकल सकता। केंद्र सरकार और कॉरपोरेट मीडिया घरानों द्वारा कश्मीरी लोगों के बारे में फैलाए गए सारे झूठों का डटकर मुकाबला करना होगा, उन्होंने कहा।

वक्ताओं ने मांग की कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को फौरन रद्द किया जाए, जिसके तहत सेना को कश्मीरी लोगों पर हर तरह का अत्याचार - बलात्कार, कत्ल, लूट, गिरफ़्तारी, प्रताड़ना - करने की पूरी छूट मिलती है। उन्होंने मांग की कि सेना को फौरन वापस बुला लिया जाये। कश्मीर की समस्या बलपूर्वक हल नहीं होगी; उसका राजनीतिक समाधान निकालना जरूरी है, वक्ताओं ने समझाया।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने 19 दिसंबर को कैंपस पर पुलवामा हत्याकांड के खिलाफ़ एक विरोध प्रदर्शन किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र संघ ने एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा कत्लेआम की निंदा की और कश्मीर विवाद के राजनीतिक समाधान की मांग की। छात्र संघ ने राष्ट्रपति को भी कश्मीर की स्थिति पर एक ज्ञापन दिया।

कश्मीरी लोगों की समस्या का स्रोत यह राज्य है जो उनके मानवीय, जनतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों को नकारता है। अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में कश्मीरी लोगों के संघर्ष को “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तान-प्रेरित” बताया जाता है और वहशी बल से उसे कुचल दिया जाता है। दिल्ली, अलीगढ़ और दूसरी जगहों पर हुए इन विरोध प्रदर्शनों से स्पष्ट होता है कि हिन्दोस्तान के लोग कश्मीरी लोगों को अलग करने, बदनाम करने और कुचलने की हिन्दोस्तानी राज्य की कोशिशों को अवश्य ही नाकामयाब कर देंगे।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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