एन.टी.पी.सी. मुख्यालय पर ठेका मज़दूरों का प्रदर्शन: प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने की चेतावनी

21 जनवरी 2019 को नई दिल्ली में स्थित बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन (बी.टी.पी.एस.) के 300 से ज्यादा ठेका मज़दूरों ने अपनी मांगों को लेकर निजामुद्दीन के पास, हुमायूं के मकबरे से लेकर एन.टी.पी.सी. मुख्यालय तक रैली निकाली। यह रैली लोधी रोड और सीजीओ कांप्लेक्स से गुजरते हुये स्कोप बिल्डिंग स्थित एन.टी.पी.सी. मुख्यालय पर पहुंची, जहां रैली प्रदर्शन में बदल गयी। यह कार्यक्रम बदरपुर एन.टी.पी.सी. के कांट्रेक्ट कामगारके बैनर तले किया गया था।

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इन मज़दूरों की मांग है कि बी.टी.पी.एस. को बंद करने का बाकायदा नोटिस दिया जाए, निकाले गये मज़दूरों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र में वैकल्पिक रोज़गार देकर उनका पुनर्वास किया जाए, देय मज़दूरी व अन्य बकाया राशि का तुरंत भुगतान किया जाए और सभी ठेका मजदूरों को काम का अनुभव प्रमाणपत्र दिया जाए।

उपरोक्त मांगों को लेकर ये ठेका मज़दूर बीते तीन महीने से लगातार संघर्ष कर रहे हैं। विदित रहे कि बी.टी.पी.एस. के ठेका मज़दूरों ने अपनी मांगों को लेकर, सबसे पहले 8 नवम्बर, 2018 को मज़दूर एकता कमेटी की अगुवाई में मंडी हाउस से संसद मार्ग तक जुलूस निकाला था। इसके बाद उन्होंने 27 दिसम्बर, 2018 को निजामुद्दीन से लेकर लोधी रोड स्थित आई.एल.. के कार्यालय तक जुलूस निकाला था। ये ठेका मज़दूर अपने संघर्ष में दृढ़ता से डटे हुये हैं।

सरकार ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के नाम पर बी.टी.पी.एस. को अक्तूबर, 2018 में बंद कर दिया था। 15 अक्तूबर, 2018 तक 600 ठेका मज़दूर यहां पर काम कर रहे थे। काम को समेटने के लिए सिर्फ 70 ठेका मज़दूरों को काम पर रखा गया है और बाकी मज़दूरों को बाहर निकाल दिया गया है। ये ठेका मज़दूर पिछले कई सालों से यहां काम कर रहे थे, बेशक इनका ठेकेदार हर साल नया होता था। बी.टीपी.एस. को बंद करने से पहले ठेका मज़दूरों को कोई सूचना नहीं दी गई थी।

मज़दूर एकता कमेटी की तरफ से बिरजू नायक ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुये बताया कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बंद कर रही है। इनकी ज़मीनों और संसाधनों को बड़े-बड़े उद्योगपतियों को सौंप रही है। बी.टी.पी.एस. की कीमती ज़मीन को हड़पने के लिये, इसको बंद किया जा रहा है, जिसके लिये प्रदूषण को बहाना बनाया जा रहा है। जैसा कि दिल्ली क्लाथ मिल्स (डीसीएम) को घाटे के नाम पर बंद कर दिया गया था और अब उसकी ज़मीन पर आलीशान इमारतें खड़ी हैं।

टेड यूनियन नेता और एडवोकेट, ओपी गुप्ता, जो बी.टी.पी.एस. के ठेका मजदूरों के संघर्ष को अगुवाई दे रहे हैं, ने बताया कि सार्वजनिक उपक्रमों में स्थायी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति या मृत्यु के उपरांत खाली हुए पदों पर स्थायी भर्ती नहीं हो रही है। खाली पदों पर ठेका मज़दूरों से काम करवाया जा रहा है। बी.टी.पी.एस. में बारहमासी काम को ठेका कर्मचारियों से करवाया जाता है। कोई छुट्टी और सामाजिक लाभ दिये बिना इन ठेका मज़दूरों से केवल न्यूनतम वेतन पर काम करवाया जाता है। ठेकेदार और सरकार दोनों मिलकर इन कर्मचारियों का शोषण कर रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान एन.टी.पी.सी. के मानव संसाधन मैनेजर सहित चेयरमैन के सचिव प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचे। जब उन्होंने मज़दूरों की मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया तब यह प्रदर्शन समाप्त हुआ।

मज़दूरों के नेता पंकज कुमार ने कहा किए अगर एन.टी.पी.सी. प्रबंधन हमारी मांगों पर गौर नहीं करेगा तो आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री के घर का घेराव किया जाएगा।

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Feb 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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