नागरिकता संशोधन विधेयक: लोगों की एकता और भाईचारे को तोड़ने वाला पैशाचिक कदम

नागरिकता संशोधन विधेयक (2019) को 8 जनवरी, 2019 को लोक सभा में पास किया गया। इससे पहले और बाद में, असम तथा सभी पूर्वाेत्तर राज्यों में बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन हुये। राज्य सभा में इस विधेयक का पास होना नामुमकिन लगता है, क्योंकि भाजपा के अलावा बाकी लगभग सारी राजनीतिक पार्टियां इसके प्रावधानों का विरोध कर रही हैं।

Assam protest by ethnic groups
Assam protest

नागरिकता कानून (1955), जो इस समय लागू है, उसके अनुसार देशीकरण के ज़रिये नागरिकता ऐसे किसी भी विदेशी नागरिक को दी जाती है जिसके पास हिन्दोस्तान में रहने के लिये वैध दस्तावेज़ हैं और जिसने बीते 11 वर्षाें से यहां लगातार निवास किया है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश, इन तीन पड़ोसी देशों से धार्मिक उत्पीड़न का कारण बताकर आये हुये हिन्दुओं, सिखों, ईसाइयों, पारसियों, बौद्धों और जैनों के लिये, इस अवधि को घटाकर 6 वर्ष कर दिया जायेगा। इन्हीं पड़ोसी देशों के मुसलमानों, यहूदियों, बहाई धर्म मानने वालों और नास्तिकों को यह छूट नहीं दी जायेगी। इन तीनों पड़ोसी देशों को छोड़कर, बाकी देशों में जो लोग अपने ज़मीर के अधिकार का समर्थन करने के लिये उत्पीड़न का सामना करते हैं, उन्हें भी यह छूट नहीं दी जायेगी।

नागरिकता कानून (1955), जो इस समय लागू है, के अनुसार सभी विदेशी जो वैध प्रवेश दस्तावेज़ों के बिना, हिन्दोस्तान में अवैध आप्रवासी बतौर रह रहे हैं, उन्हें अपने देशों में वापस भेजा जा सकता है। अवैध आप्रवासियों को विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (हिन्दोस्तान में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत जेल में बंद किया जा सकता है या वापस भेजा जा सकता है।

2015 और 2016 में केन्द्र सरकार ने दो अधिसूचनायें जारी की थीं, जिनमें यह घोषणा की गई थी कि कुछ समुदायों के अवैध आप्रवासियों को 1946 और 1920 के कानूनों से छूट दी जायेगी। ये समुदाय थे अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से, 31 दिसंबर, 2014 से पूर्व हिन्दोस्तान को आये हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई। अधिसूचनाओं में यह कहा गया कि इन समुदायों के अवैध आप्रवासियों को वैध दस्तावेज़ों के बिना हिन्दोस्तान में रहने के लिये जेल में बंद नहीं किया जायेगा और अपने देशों को वापस नहीं भेजा जायेगा। नागरिकता कानून में अब जो संशोधन प्रस्तावित किया जा रहा है, उससे इन तीन पड़ोसी देशों के इन 6 धर्माें के अवैध आप्रवासियों के लिये, हिन्दोस्तान में नागरिकता पाने के योग्य होने के द्वार खुल जायेंगे।

इन अधिसूचनाओं में बहुत सोच-समझकर, मुसलमान लोगों को शामिल नहीं किया गया है। अतः, जिन मुसलमान लोगों को अब अवैध आप्रवासीमाना जाता है, उन पर अभी भी देश से निकाले जाने का खतरा मंडराता रहेगा।

नागरिकता कानून में यह प्रस्तावित संशोधन एक बेहद पैशाचिक कदम है। इसका उद्देश्य है पूरे देश में और खासतौर पर बंगाल, असम तथा दूसरे पूर्वाेत्तर राज्यों में, सांप्रदायिक बंटवारा और तेज़ करना तथा सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना। बांग्लादेश और पाकिस्तान में सांप्रदायिक बंटवारे को और तेज़ करना भी इसका मकसद है।

उपनिवेशवादी शासन के चलते और 1947 में सांप्रदायिक आधार पर देश के बंटवारे की वजह से, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच लोगों का भारी तादाद में विस्थापन हुआ था। बहुत ही क्रूर तरीके से पूरे-पूरे परिवार दोनों देशों के बीच में बंट गए थे। नागरिकता अधिनियम (1955) ने उन मुसलमान लोगों पर बड़ी सारी पाबंदियां लगाईं, जो सांप्रदायिक हत्याकांड के दौरान पाकिस्तान चले गए थे और बाद में हिन्दोस्तान वापस आना चाहते थे। हिन्दोस्तानी राज्य उन्हें शत्रुमानता है। बंटे हुए परिवारों के लोगों को आपस में मिलने के लिए आज भी बहुत सारी कठिनाइयां झेलनी पड़ती हैं।

बंगाल, असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में लाखों-लाखों हिन्दू और मुसलमान लोग हैं जो कई कारणों की वजह से, वर्तमान बांग्लादेश (भूतपूर्व पूर्वी पाकिस्तान) को छोड़कर, हिन्दोस्तान आये हैं। कुछ तो उन बंटे हुए परिवारों के लोग हैं जो अपने बिछड़े परिजनों से मिलने की इच्छा से यहां आये हैं और कुछ लोग रोज़गार की तलाश में यहां आये हैं।

असम में कई पीढ़ियों से अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के लोग, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग तथा अलग-अलग धर्मों का पालन करने वाले लोग बसे हुए हैं। उपनिवेशवादी शासन के दौरान, बिहार और बंगाल से अनेक लोग असम के चाय के बागानों में काम करने के लिए वहां गये थे। 1947 में देश के बंटवारे के बाद, बहुत से लोग पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से शरणार्थी बनकर असम आये थे।1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, जिसकी वजह से बांग्लादेश की स्थापना हुयी थी, उसके परिणामस्वरूप, और बहुत सारे लोग असम में शरणार्थी बनकर आये थे।

हिन्दोस्तान के हुक्मरान बड़े सरमायदारों ने हमेशा ही असम के लोगों के साथ एक उपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी ताक़त की तरह बर्ताव किया है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों ने असम की प्राकृतिक संपदा, उसके तेल संसाधनों और वन संपत्ति का बेरहमी से शोषण-दोहन किया है। असम के अधिकतम नौजवानों के सामने रोज़गार की बड़ी असुरक्षा है। असम के लोगों ने, भाषा, राष्ट्रीयता और धर्म के भेदभावों को भुलाकर, इस शोषण-दमन के खि़लाफ़ तथा अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए अनवरत संघर्ष किया है।

असमीय लोगों के इस संघर्ष को कुचलने के लिए, हिन्दोस्तानी राज्य ने खास तौर पर 1980 के दशक से, उनके जन आन्दोलन पर बड़े सुनियोजित तरीके से साम्प्रदायिकता थोप दी है। हिन्दोस्तानी राज्य ने असम में निवासी विभिन्न लोगों को आपस में भिड़ाने का काम किया है, कभी किसी एक समुदाय के साथ पक्षपात किया है तो कभी किसी दूसरे समुदाय के साथ। हुक्मरान वर्ग ने सुनियोजित तरीके से यह झूठा प्रचार फैलाया है कि असमीय लोगों की समस्याओं का स्रोत बांग्लादेश से आये आप्रवासी हैं।

1985 का असम समझौता, जिसकी भाजपा और कांग्रेस पार्टी दोनों ही कसम खाती हैं, असम के लोगों की समस्याओं का न्यायपूर्ण समाधान करने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। उस समझौते का असली उद्देश्य था वहां के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष को ख़त्म करना। उस समझौते का यह परिणाम हुआ कि असम के लोगों को हमेशा के लिए भाषा के आधार पर बांट कर रखा गया। असम आन्दोलन के कुछ नेताओं को सत्ता और विशेष अधिकार देकर राज्य प्रशासन में शामिल कर लिया गया। आन्दोलन के जिन नेताओं ने राज्य प्रशासन में शामिल होने से इनकार किया था, उन्हें सेना और राज्य की खुफिया एजेंसियों ने बांटकर कुचल दिया। लोगों के अधिकारों के संघर्ष को बदनाम करने के इरादे से, राज्य की खुफिया एजेंसियों ने कई आतंकवादी संगठन गठित किये।

2014 से भाजपा की केन्द्र सरकार बंगाल, असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों की एकता को और टुकड़े-टुकड़े करने के इरादे से, दुतरफा नीति अपना रही है।

एक तरफ, असम के नागरिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर बनाया गया है, जिसके अनुसार 40 लाख से ज्यादा महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को अवैध आप्रवासीघोषित कर दिया गया है। उनमें से अधिकतर बांगला भाषी हैं, उनमें दोनों हिन्दू और मुसलमान लोग हैं, जो कई दशकों से असम में बसे हुए हैं। बंगाल और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा एक अभियान चला रही है कि वहां के नागरिकों के भी ऐसे ही रजिस्टर बनाये जाएं, ताकि अवैध आप्रवासियोंको ढूंढ कर देश से बाहर निकाला जा सके

दूसरी तरफ, भाजपा सरकार बंगाली लोगों को, और उनमें से अवैध आप्रवासीघोषित किये गए लोगों को, सांप्रदायिक आधार पर बांटने के इरादे से, उनसे यह वादा कर रही है कि उनमें जो हिन्दू हैं उनको नागरिकता का अधिकार दिया जायेगा। नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन का असली मकसद इसी बंटवारे को और तीखा करना है।

बंगाल, असम और सभी पूर्वोत्तर राज्यों में एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति पैदा की जा रही है। लोगों को राष्ट्रीयता, धर्म और भाषा के आधार पर, आपस में भिड़ाया जा रहा है।

Assam protest by NESO

असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के सामने यह हव्वा खड़ा किया जा रहा है कि अब बांग्लादेश से बहुत सारे हिन्दू लोग यहां आ जायेंगे। लगभग 1.6 करोड़ हिन्दू लोग बांग्लादेश के नागरिक हैं। बांग्लादेश में अनेक जागरुक मानव अधिकार कार्यकर्ता और धार्मिक अल्पसंख्यकों के जाने-माने नेता हिन्दोस्तानी राज्य के इस प्रस्तावित संशोधन के परिणामों के बारे में बहुत चिंतित हैं। उन्होंने यह आशंका प्रकट की है कि उनके देश की प्रतिक्रियावादी ताक़तें इसे बहाना बनाकर, धार्मिक अल्पसंख्यकों को उत्पीड़ित करेंगी, उनकी जायदाद हड़प लेंगी और उन्हें शरणार्थी बनाकर हिन्दोस्तान भेज देंगी।

नागरिकता संशोधन विधेयक के विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति को अपने विचार देते हुए, इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक ने कहा कि हमारे रिकार्डों के अनुसार, अल्पसंख्यक समुदायों के 31,313 लोग हैं (25,447 हिन्दू; 5,807 सिख; 55 ईसाई; 2 बौद्ध और 2 पारसी) जिन्हें अपने-अपने देशों में धार्मिक उत्पीड़न के दावे के आधार पर, लम्बे समय का वीसा दिया गया है और जो हिन्दोस्तान में नागरिकता चाहते हैं। अतः इन लोगों को इस संशोधन का तुरंत लाभ मिलेगा।उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति को यह भी सूचित किया कि जो अवैध आप्रवासीघोषित किये गए लोग अब धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर नागरिकता के लिए अर्जी भरेंगे, उन्हें राज्य के द्वारा सख्त तहक़ीक़ात किये बिना नागरिकता नहीं मिलेगी। यानी, यह स्पष्ट है कि राज्य हिन्दू अवैध आप्रवासियोंको यह झूठ बोलकर, कि वह उन्हें नागरिकता देना चाहती है, उन्हें बुद्धू बना रही है।

नागरिकता संशोधन विधेयक का असली मकसद अवैध आप्रवासियोंके लिए हिन्दोस्तान की नागरिकता हासिल करना और आसान बनाना नहीं है।

इसका असली मकसद है असम, बंगाल और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में साम्प्रदायिकता फैलाना, धर्म, भाषा और राष्ट्रीयता के आधार पर बंटवारे को और तीखा करना। इसका मकसद है हमारे लोगों की एकता और भाईचारे पर नए-नए हमले करना।

नागरिकता संशोधन विधेयक की कड़ी निंदा करनी होगी और इसे खारिज करना होगा।

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Feb 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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