बिजली वितरण के निजीकरण के ख़िलाफ़: नागरिकों के साथ एम.एस.ई.डी.सी.एल. के मज़दूरों की मज़बूत एकता को सलाम!

हमारे पाठक जानते हैं कि महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (एम.एस..डी.सी.एल.) के मज़दूर कलवा, मुंब्रा और दिवा (ठाणे के उपनगरों) में बिजली वितरण के निजीकरण के ख़िलाफ़ एक बहादुर संघर्ष कर रहे हैं। जैसा कि अन्य क्षेत्रों के मज़दूरों के मामले में होता है, सरकार और इजारेदारों द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उपयोगकर्ताओं को मज़दूरों के ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश की। हालांकि इस बार वे ऐसा करने में असफल रहे। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि कई नागरिक संगठनों को इस तथ्य के बारे में पता था कि निजीकरण केवल मज़दूरों पर ही नहीं बल्कि उपयोगकर्ताओं पर भी हमला है; यह एक समाज-विरोधी हमला है। इन संगठनों ने नागरिकों को इसके प्रति जागरुक करने के लिए एक अभियान चलाया।

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कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की स्थानीय समिति ने इस अभियान के समर्थन में एक बयान निकाला और इसे बड़े पैमाने पर वितरित किया (देखें म..., जनवरी 16-31, 2019)। लोक राज संगठन, सहयोग स्थानिक जन विकास संस्था कलवा और नवक्रांति शतकरी संस्था कलवा के बयान को हज़ारों की संख्या में कलवा-मुंब्रा-दिवा में प्रदर्शनों, बैठकों और चालीस से अधिक गली-नुक्कड़ सभाओं में वितरित किया गया। पर्चे में भिवंडी और अन्य जगहों पर बिजली वितरण के निजीकरण के कड़वे अनुभवों का वर्णन किया गया था। यह भी बताया गया कि रोटी, कपड़ा, मकान की ही तरह पानी की आपूर्ति, बिजली, परिवहन, संचार आदि भी मूलभूत आवश्यकताएं हैं और उन्हें मुहैया कराना सरकार का कर्तव्य है। ये सभी बुनियादी सेवाएं हैं और इन्हें मुनाफ़ा कमाने के नज़रिये से नहीं देखा जा सकता है। इस मुद्दे ने मज़दूरों के साथ-साथ उपयोगकर्ताओं की भी नब्ज़ को पकड़ा।

इन संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया और 3600 से अधिक हस्ताक्षर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक ठाणे जिला कलेक्टर के ज़रिये पहुंचाए गए। ठाणे के नगर आयुक्त को भी इसकी प्रतियां दी गईं। नागरिक न केवल सरकार के बिजली वितरण के निजीकरण के फैसले का विरोध कर रहे थे, बल्कि उन्होंने यह घोषणा भी की कि वे ठाणे में पानी के वितरण के प्रस्तावित निजीकरण को भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

इस अभियान में कार्यकर्ताओं ने एम.एस..डी.सी.एल. के मज़दूरों को होने वाली परेशानियों के बारे में नागिरकों को बताने का बीड़ा उठाया और सरकार के झूठे प्रचार का भी पर्दाफाश किया। जहां तक नुकसान की बात है, सरकार एम.एस..डी.सी.एल. के मज़दूरों को आलसी होने का दोष देते हुए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराती है और यह भी दावा करती है कि गरीब नागरिक बिजली का बिल नहीं भरते इसलिए नुकसान होता है। यह स्पष्ट रूप से झूठ है। सबसे पहले, एम.एस..डी.सी.एल. में मज़दूरों की बहुत कमी है, यानी एम.एस..डी.सी.एल. के 97,000 स्वीकृत कर्मचारी पदों में से 30,000 पद खाली हैं। जबकि, उपयोगकर्ताओं की संख्या में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, हजारों और पदों को स्वीकृत किए जाने की आवश्यकता है! महाराष्ट्र में अधिकांश बकाया राशि चीनी मिलों, बड़े मॉलों, होटलों आदि के मालिकों पर है (जिनमें से बहुतों के राजनीतिक संबंध हैं)। जब एम.एस..डी.सी.एल. के मज़दूर इनसे बिल की बकाया राशि मांगने जाते हैं, तो उन्हें धमकाया जाता है। इन बहादुर मज़दूरों ने इन बड़े उपयोगकर्ताओं का बकाया वसूलने के लिए कलवा और मुंब्रा में कई प्रयास किए। उन्होंने सौ से अधिक एफ.आई.आर. दर्ज करने की कोशिश की, लेकिन शायद पुलिस आदेशों के तहत थी की ऐसी एफ.आई.आर. दर्ज न की जाएं।

एग्री समाज प्रतिष्ठान ने शील में एक बैठक बुलाई, जहां सैकड़ों लोगों ने निजीकरण के ख़िलाफ़ अपना विरोध व्यक्त किया। धर्म राज्य पक्ष के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में एक पर्चा बांटा। इसमें यह समझाया गया था कि कैसे टोरेंट कंपनी राज्य के अधिकारियों की मिली-भगत से भिवंडी के नागरिकों को लूट रही है।

कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के स्थानीय नेताओं ने निजीकरण के ख़िलाफ़ नागरिकों की लड़ाई में उनका समर्थन दिया। शनिवार, 19 जनवरी को संयुक्त रूप से एक विशाल मोर्चा आयोजित किया गया था। बिजली वितरण के निजीकरण के महाराष्ट्र सरकार के फैसले के विरोध में कलवा, मुंब्रा, कौसा, शील से लगभग 5000 लोग, महिलाएं और पुरुष पारसिकनगर में बैनरों के साथ इकट्ठा हुए। उन्होंने कलवा की भीड़ भरी गलियों से गुज़रते हुए पारसिकनगर से लेकर ठाणे के कलेक्टर कार्यालय तक, 6 किलोमीटर की दूरी तय कर मोर्चा निकाला। कई संगठनों और दलों ने बड़े ही जोर-षोर से इस मोर्चे में भाग लिया और यह ऐलान भी किया कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार अपना आदेश वापस नहीं ले लेती।

क्योंकि हजारों नागरिकों ने एम.एस..डी.सी.एल. के मज़दूरों का समर्थन किया था, सरकार के पास निजीकरण के प्रस्ताव पर रोक लगाने की घोषणा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। यह वास्तव में मज़दूरों और उपयोगकर्ताओं की जीत है। हालांकि हमें आगे भी सतर्क रहना होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कई पार्टियों के हाई कमांड जो आज कह रहे हैं कि वे निजीकरण के विरोध में हैं, उन्होंने खुद सत्ता में आने पर बड़े इजारेदार घरानों के इस एजेंडे को लागू किया है। ये पार्टियां शासक वर्ग की प्रबंधक हैं। लोग क्या चाहते हैं यह कहना उनका काम है, खासकर चुनाव से पहले या तब जब वे तथाकथित विपक्ष में होते हैं, लेकिन वे वही करते हैं जो शासक वर्ग चाहता है। निजीकरण के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई बड़े पूंजीपतियों के शासन को मज़दूरों और आम जनता के शासन में बदलने की बड़ी लड़ाई का एक हिस्सा है!

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Feb 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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