मज़दूरों और किसानों की हुकूमत ही सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है

सब का विकास”, जिस नारे के साथ 2014 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी थी, वह एक खोखला वादा रह गया है। वह शहरों और गांवों के करोड़ों-करोड़ों मेहनतकशों के लिए एक क्रूर मज़ाक बन कर रह गया है। वह उतना ही खोखला साबित हुआ है जितना कि कांग्रेस पार्टी का ग़रीबी हटाओका नारा था।

जबकि मेहनतकश लोग देश की सारी दौलत को पैदा करते हैं, तो हमारी अर्थव्यवस्था मेहनतकशों की ज़रूरतों को पूरा नहीं करती है। आर्थिक संवर्धन से टाटा, बिरला, अम्बानी आदि की अगुवाई में मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की लालच ही पूरी हो रही है।

खनन, विनिर्माण, निर्माण, ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, संचार, होटल, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं में काम करने वाले मज़दूर हिन्दोस्तान की दौलत, यानी कुल घरेलू उत्पाद के अधिकतम भाग को पैदा करते हैं। परन्तु उनके श्रम का समाज में जो योगदान होता है, उसके आधे से भी कम हिस्सा उन्हें वापस मिलता है। मज़दूर-मेहनतकश 70 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य पैदा करते हैं, परन्तु उनके वेतनों का मूल्य 35 प्रतिशत से भी कम है।

हिन्दोस्तान की आबादी का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषि व कृषि सम्बंधित कार्यों पर निर्भर है। परन्तु किसानों और खेत मज़दूरों को आमदनी के रूप में कुल अतिरिक्त मूल्य के 15 प्रतिशत से कम मिलता है। दूसरे छोटे उत्पादकों और दुकानदारों को अतिरिक्त मूल्य का लगभग 10 प्रतिशत मिलता है।

उत्पादन से पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य का लगभग 40-45 प्रतिशत उन लोगों की जेबों में जाता है जो पूंजी के मालिक हैं और मुनाफ़ा तथा ब्याज की आमदनी कमाते हैं। उनकी आमदनी का आधार उनका परिश्रम नहीं होता है बल्कि उत्पादन और विनिमय के साधनों पर उनकी मालिकी।

टाटा, अम्बानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने जो पूंजीपति वर्ग की अगुवाई करते हैं, वे बड़ी तेज़ गति से अमीर होते जा रहे हैं और सभी क्षेत्रों पर उनका बोलबाला बढ़ता जा रहा है। इन इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए, अधिकतम लोगों का ज्यादा से ज्यादा शोषण और लूट हो रही है।

अधिकतम मज़दूरों के लिए वेतनों की वृद्धि बढ़ती महंगाई की तुलना में, बहुत कम है और बहुत देर से होती है। काम के घंटे लम्बे होते जा रहे हैं, जिसकी वजह से मज़दूरों को अपने परिवारों के साथ बिताने को बहुत कम समय मिलता है। रोज़गार की असुरक्षा बढ़ रही है। ज्यादा से ज्यादा हद तक, अस्थायी और फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरियां दी जा रही हैं।

अधिकतम किसानों और छोटे उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए मुनासिब दाम नहीं मिल रहे हैं। बाज़ार में हिन्दोस्तानी और विदेशी व्यापारी और पूंजीवादी कम्पनियां उन्हें लूट रही हैं।

हिन्दोस्तान की दौलत को पैदा करने वाले मज़दूर सामाजिक उत्पादों में से अपने जायज़ हिस्से के लिए संघर्ष कर रहे हैं। करोड़ों-करोड़ों मज़दूर और किसान अपनी जायज़ मांगों को लेकर बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं।

किसान यह मांग कर रहे हैं कि राज्य सिंचाई, बीज और दूसरी ज़रूरी चीजों को मुनासिब दामों पर मुहैया कराये। वे अपने उत्पादों के लिए सुनिश्चित लाभदायक दाम और समय पर भुगतान की मांग कर रहे हैं। वे कर्ज़ माफ़ी की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कृषि संकट के विषय पर चर्चा के लिए संसद के एक विशेष सत्र की मांग की है।

हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने कुछ किसानों के कर्ज़ों को माफ़ करने का वादा किया है और किसानों को कुछ थोड़ी सी आमदनी दिलाने का प्रस्ताव किया है, परन्तु ये सरकारें हमें यह नहीं बताती हैं कि समस्या की जड़ क्या है। राज्य द्वारा सीमित मात्रा में गेहूं और चावल खरीदने की जो व्यवस्था थी, उसे भी बाज़ार की ताक़तोंके हाथों में सब कुछ छोड़ देने के नाम पर, सुनियोजित तरीके से ख़त्म कर दिया गया है। किसान निजी कंपनियों और व्यवसायी बैंकों के बेबस शिकार बन गए हैं। ये निजी कम्पनियां और व्यवसायी बैंक किसानों के श्रम के फल को लूटते हैं और उनकी ज़मीन को हड़पने की धमकी भी देते हैं।

किसानों और खेत मज़दूरों को नवम्बर 2016 की नोटबंदी के विनाशकारी परिणामों का भी सामना करना पड़ा है। अचानक उनके हाथ से सारी नगदी धन छीन ली गयी और उनकी रोज़ी-रोटी छीन ली गयी। 2017 से किसानों को उर्वरक, कीटनाशक और दूसरी ज़रूरी चीजों पर जी.एस.टी. देना पड़ रहा है। जबकि पंूजीवादी कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट के रूप में जी.एस.टी. वापस मिल जाता है, किसानों व अन्य छोटे उत्पादकों को जी.एस.टी. का कोई भी हिस्सा वापस नहीं मिलता है क्योंकि पंजीकरण करना और मासिक टैक्स रिटर्न भरना उनके बस की बात नहीं है।

शहरों में छोटे उत्पादकों पर भी नोटबंदी और जी.एस.टी. का बहुत ही नाकारात्मक असर हुआ है। अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में, खुदरा व्यापार में भी, इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां दिन ब दिन हावी होती जा रही हैं और लाखों-लाखों छोटे उत्पादकों व छोटे दुकानदारों के धंधों को चैपट कर रही हैं। आर्थिक संवर्धन का यह असर हो रहा है कि एक धु्रव पर दौलत बढ़ती जा रही है और दूसरे धु्रव पर ग़रीबी फैल रही है।

पूंजीपति वर्ग के मुनाफ़ों और ब्याज की आमदनी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये नहीं लगाई जाती है। पूंजीपति उसी समय और उसी जगह पर पूंजी निवेश करते हैं, जब और जहां उन्हें अधिकतम मुनाफ़ों की संभावना नज़र आती है। वे अपनी पूंजी के बहुत बड़े हिस्से को सट्टा बाज़ार में लगाते हैं या विदेशों में निवेश करते हैं, जबकि देश के अंदर मानव उत्पादक ताक़तों के बहुत बड़े हिस्से को रोज़गार नहीं मिलता है।

प्रधानमंत्री और दूसरे नेता बार-बार इस बात पर बहुत घमंड करते हैं कि हिन्दोस्तान का सबसे कीमती संसाधन हमारी नौजवान श्रम शक्ति है। परन्तु इजारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत के चलते, इस कीमती संसाधन को नष्ट किया जा रहा है। हमारे देश के नौजवानों को उत्पानकारी काम में रोज़गार नहीं मिल रहा है। इसके बजाये, उन्हें नशीले पदार्थाें और तरह-तरह की अपराधी हरकतों की ओर धकेला जा रहा है। पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां भी अपनी अपराधपूर्ण राजनीति के लिये नौजवानों को इस्तेमाल करती हैं।

1990 के दशक से हुक्मरान पार्टियों के नेता यह राग अलापते आ रहे हैं कि बीते दिनों में हिन्दोस्तान के विकास के रास्ते में मुख्य रुकावट राज्य द्वारा अत्यधिक नियंत्रण थी। उन्होंने कहा कि सब कुछ बाज़ार की ताक़तों के हाथों में छोड़ दो। उन्होंने कहा कि अगर हिन्दोस्तान के पूंजीपति जल्दी से जल्दी अपनी अमीरी को बढ़ा लेंगे तो उसमें से थोड़ा सा नीचे टपककर मेहनतकशों तक पहुंच जायेगा। परन्तु आज वे सभी नारे और दावे बदनाम हो चुके हैं।

आज यह स्पष्ट हो गया है कि उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण का कार्यक्रम वास्तव में पूरे समाज की ज़रूरतों को दबाकर, इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने का कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के चलते, राज्य लोगों के प्रति अपने सभी दायित्वों से पीछे हट रहा है।

हर साल राज्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये मज़दूरों, किसानों और दूसरे मेहनतकशों की छोटी-छोटी आमदनियों में से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हड़प लेता। परन्तु राज्य पूंजीवादी कंपनियों को ढेर सारी टैक्स-छूट देता है। जब सरकारी धन के खर्चे की बात आती है, तो प्राथमिकता उन कार्यक्रमों और परियोजनाओं को दी जाती है जिनसे हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों को अधिकतम मुनाफ़ा होगा। मेहनतकशों को ज़रूरी सेवायें मुहैया कराने के लिये, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालतों को सुधारने के लिये, सभी को सुरक्षित आवास और स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित कराने के लिये कोई धन नहीं बचता है।

अर्थव्यवस्था में बार-बार संकट आता रहता है क्योंकि मेहनतकश लोग ग़रीब होते रहते हैं और उन चीजों को खरीद नहीं पाते जिन्हें पूंजीपति बेचना चाहते हैं। पर्याप्त मात्रा में रोज़गार पैदा नहीं किये जा रहे हैं क्योंकि सामाजिक बेशी मूल्य मुट्ठीभर अति-अमीर पूंजीपतियों की जेबों में जा रहा है। ये पूंजीपति उन्हीं क्षेत्रों में निवेश करते हैं जहां से अधिकतम मुनाफ़े मिलते हैं।

जब लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम की बात होती है, तब पूंजीपतियों के विशेषज्ञ अर्थशास्त्री जिस तरह बात करते हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि हमारी सरकार की नीतियों का उद्देश्य पूंजीपतियों के हितों को पूरा करना ही है। ये अर्थशास्त्री कहते हैं कि सारे जनकल्याण के कार्यक्रम देश के संसाधनों की फजूल खर्ची हैं। जब सार्वजनिक विरतण व्यवस्था (राशन) को मजबूत करने या किसानों को लाभकारी दाम दिलाने के लिये सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था को मजबूत करने का सवाल उठता है, तो उसे सबसिडीकहा जाता है। दूसरी ओर, “बैंकों के पुनः पूंजीकरणके नाम पर, बैंकों के कर्ज़ें न चुकाने वाले बड़े पूंजीपतियों की कर्ज़ माफ़ी पर खर्च किये गये जनता के धन को राष्ट्र के लिये अत्यावश्यक माना जाता है!

पूंजीपति वर्ग का यह प्रचार बिल्कुल झूठा है। सभी को पर्याप्त मात्रा में भोजन, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, आदि मुहैया कराने के लिये सरकारी धन को खर्च करना फजूल खर्ची नहीं है। यह तो सबसे आवश्यक निवेश है क्योंकि हमारे लोग ही देश की सबसे कीमती उत्पादक संपत्ति हैं। परन्तु इस आवश्यक निवेश के रास्ते में आज सबसे बड़ी रुकावट इजारेदार पूंजीपतियों की लालच और सामाजिक उत्पादों व सरकारी धन पर उनके भारी दावे हैं।

समस्या की जड़ इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुकूमत में है। समस्या का मूल कारण यह है कि राज्य मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में चलाया जा रहा है सामाजिक उत्पादन की व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है। समाज के सभी सदस्यों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, इस लालची शोषक वर्ग की हुकूमत को हटाकर, उसकी जगह पर मज़दूरों, किसानों तथा अपने हाथों व दिमागों से काम करने वाले सभी मेहनतकशों की हुकूमत स्थापित करनी होगी।

उत्पादन की प्रक्रिया सामाजिक है परन्तु उत्पादन व विनिमय के साधनों की मालिकी तथा नियंत्रण बहुत ही कम निजी हाथों में संकेंद्रित है। इस अंतर्विरोध को हल करना ज़रूरी है। इसे हल करने का एक ही रास्ता यह है कि उत्पादन के साधनों की मालिकी और नियंत्रण को मज़दूर वर्ग के हाथों में लाया जाये और मज़दूर वर्ग के साथ सभी किसानों, अन्य मेहनतकशों व प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का गठबंधन हो। अर्थव्यवस्था का उद्देश्य लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना होना चाहिये, न कि पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करना। लोगों की खुशहाली पर निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

अगर सभी हिन्दोस्तानी लोगों को आवास दिलाना है तो बहुत सारे मकानों का निर्माण करना होगा। उसके लिये इस्पात, सिमेंट, ईंटों, आदि का उत्पादन बहुत बढ़ाना पड़ेगा। उससे उन औद्योगिक क्षेत्रों में लाखों-लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी। सभी लोगों को पर्याप्त भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल और शौच प्रबंध मुहैया कराने के लिये भी लाखों-लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी। इस तरह, जब सामाजिक उत्पादन का लक्ष्य लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना होगा, तब अनेक क्षेत्रों में करोड़ों नई नौकरियां पैदा होंगी।

अर्थव्यवस्था के इस दिशा-परिवर्तन को लागू करने के लिये यह ज़रूरी है कि मज़दूर, किसान और सभी मेहनतकश लोग एकजुट होकर अपने हाथों में राज्य सत्ता लें।

सामाजिक बेशी मूल्य किस तरह इस्तेमाल होगा, लोगों पर कर कैसे लगाया जायेगा तथा सार्वजनिक धन कैसे खर्च किया जायेगा, इन पर फैसले लेने की ताक़त को बड़े पूंजीपतियों और उनकी पार्टियों के हाथों से निकालना होगा। फैसले लेने की ताक़त उनके हाथों में देनी होगी जो काम करते हैं और भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं व सेवाएं प्रदान करते हैं।

जब मेहनतकशों के हाथ में राज्य सत्ता होगी तो वे इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकार पर अंकुश लगा सकेंगे। मेहनतकश लोग इजारेदार पूंजीपतियों को समाज को बेइंतहा लूटने के अधिकार से वंचित कर सकेंगे। तब जाकर मानव अधिकारों की रक्षा हो सकेगी तथा मेहनतकशों के अपने श्रम के फल पर दावों को पूरा किया जा सकेगा।

मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के चलते, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों - इस्पात, ऊर्जा, वित्त, घरेलू और विदेश थोक व्यापार, आदि - पर फौरन समाज की मालिकी और नियंत्रण स्थापित किया जायेगा। इन क्षेत्रों में चलाई जा रही बड़ी निजी कंपनियों का फौरन राष्ट्रीकरण किया जायेगा। पूंजीवादी कंपनियों को दी जा रही टैक्स छूट और अन्य छूटें फौरन ख़त्म की जायेंगी। इससे मेहनतकशों पर टैक्स का बोझ बहुत कम हो जायेगा। न्यूनतम वेतन पर सर्वव्यापक कानून फौरन लागू किया जायेगा और मज़दूरों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले सभी मालिकों को कड़ी सज़ा दी जायेगी।

मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के चलते, सरकारी बजट में किसानों को सिंचाई और दूसरी आवश्यक वस्तुएं मुहैया कराने और किसानों के उत्पादों के लिये लाभकारी दाम सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी जायेगी। अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पानी सप्लाई और शौच प्रबंध सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त धन खर्च किया जायेगा। एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करने पर पर्याप्त धन खर्च किया जायेगा, ताकि सभी के लिये आवश्यक उपभोग की वस्तुएं मुनासिब दाम पर उपलब्ध हों। बैंकों को व्यवसायिक दर पर ब्याज देना, सार्वजनिक संपत्ति को निजी कंपनियों को बेचना, इस प्रकार के जन संसाधनों के अनुत्पादक व्यय पर फौरन रोक लगाई जायेगी।

सारांश में, हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था की सभी समस्याओं का एक ही समाधान है। वह समाधान है कि मज़दूर, किसान और सभी मेहनतकश लोग एकजुट हो जायें और हिन्दोस्तान के मालिक बनने के लिये संगठित हों। हिन्दोस्तान के मालिक बनकर मेहनतकश लोग अर्थव्यवस्था और राज्य की नीति को नई दिशा दिला सकंेगे ताकि लोगों की ज़रूरतें पूरी हों, न कि इजारेदार पूंजीपतियों की लालच।

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Feb 1-15 2019    Voice of the Party    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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