प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना और इन्कम ट्रांस्फर स्कीम : मज़दूरों और किसानों का घोर अपमान

2019-20 के अंतरिम बजट पेश करने के अवसर पर भाजपा सरकार ने दो नयी स्कीमों की घोषणा की। एक, उन मज़दूरों के लिये पेंशन स्कीम, जिनके पास नियमित रोज़गार नहीं है। दूसरी, उन किसानों के लिये इन्कम ट्रांस्फर स्कीम, जिनके पास पांच एकड़ से कम ज़मीन है।

इन स्कीमों का ध्यान से परीक्षण करने से पता चलता है कि उनका मकसद ऐसा नहीं है जैसा कि आधिकारिक तौर पर बताया जा रहा है। मज़दूरों व किसानों की समस्याओं को संबोधित करना तो दूर, इन स्कीमों का उद्देश्य मज़दूरों को और लूटना है तथा किसानों से लूटे हुए धन के बदले में कुछ टुकड़े फेंककर उन्हें शांत करना है।

श्रम योगी मानधन योजना

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन “असंगठित क्षेत्र” के मज़दूरों के लिये एक योगदानकारी पेंशन योजना है। अपने बजट भाषण में, वित्तमंत्री ने खासतौर पर रेहड़ी-पटरी वालों, रिक्शा चालकों, निर्माण मज़दूरों, कूड़ा-कचरा बीनने वालों, खेत मज़दूरों, बीड़ी मज़दूरों व स्वरोज़गारी हथकरघा मज़दूरों, चमड़ा व इस तरह के अन्य क्षेत्र के व्यवसाइयों की बात की। ऐसे मज़दूरों में से जो 18 से 40 साल की आयु के हैं और उनका वेतन 15,000 रुपये से कम है, वे इस योजना के पात्र हो सकते हैं।

इस स्कीम के साथ जुड़ने पर, मज़दूर को अपनी उम्र के हिसाब से मासिक योगदान देना शुरू करना पड़ेगा। 18 वर्ष की आयु के मज़दूर को 55 रुपये, 29 वर्ष की आयु के मज़दूर को 100 रुपये और 40 वर्ष के मज़दूर को 200 रुपये मासिक देना होगा। सरकार हर महीने बराबर का योगदान देगी। 60 साल की उम्र होने पर मज़दूर को 3,000 रुपये प्रति माह पेंशन मिलनी शुरू होगी।

इस पेंशन स्कीम को दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजना बताया जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि 10 करोड़ मज़दूरों को इससे संभावित लाभ मिलेगा। यह शेखी बघारने के अलावा और कुछ नहीं है।

नौजवान मज़दूर कई कारणों से इस स्कीम से नहीं जुड़ेंगे। आज जो मज़दूर 30 वर्ष की आयु का है, उसे इस स्कीम से लाभ पाने के लिये और 30 साल तक योगदान देना होगा। उसकी पेंशन का उसके अंतिम वेतन से कोई संबंध नहीं होगा। सेवानिवृत्त होने पर, जब 3,000 रुपये की पेंशन मिलेगी तब उस पैसे की क्रय शक्ति बहुत ही कम होगी। अगर हम वार्षिक महंगाई दर को 7 प्रतिशत मान कर चलें तो 30 साल के बाद मिलने वाले 3,000 रुपये की क्रय शक्ति आज के मात्र 400 रुपये के बराबर होगी। 20 वर्ष की आयु वाले मज़दूर को 40 वर्ष बाद मिलने वाले 3,000 रुपये की क्रय शक्ति आज की क़ीमतों पर 200 रुपये के बराबर होगी।

अपने देश में अनियमित नौकरी करने वाले मज़दूरों की अपेक्षित आयु करीब 60 वर्ष ही है। इसका मतलब है कि करीब आधे मज़दूर पेंशन का कुछ भी लाभ पाने के लिये जीवित ही नहीं रहेंगे! जो 65 या 70 वर्ष तक जीवित रहेंगे, उन्हें जितना पेंशन से मिलेगा उससे ज्यादा तो वे भुगतान कर चुके होंगे। 40 वर्ष से ज्यादा आयु वाले मज़दूरों को शायद इससे कुछ लाभ मिल सकता था परन्तु उन्हें स्कीम से बाहर रखा गया है।

इस तरह की स्कीमों की घोषणा पहले भी की जा चुकी है। उनमें से किसी में भी इतनी संख्या में लोग कभी शामिल नहीं हुए जितना की स्कीम की घोषणा के समय पर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। उदाहरण के लिये, अटल पेंशन योजना को 9 मई, 2015 में शुरू किया गया था और अनुमान लगाया गया था कि 2.2 करोड़ मज़दूर दिसम्बर 2015 तक उसमें जुड़ जायेंगे। परन्तु लक्ष्य का मात्र 6.5 प्रतिशत ही उस तारीख तक पूरा हुआ। साढ़े तीन साल बाद भी लक्ष्य का आधे से कम ही हासिल हो पाया है।

मज़दूरों की मांग है एक जीवन जीने योग्य वेतन और अकुशल मज़दूरों के लिये 18,000 रुपये प्रति माह न्यूनतम वेतन। वे मांग कर रहे हैं कि हर वर्ष महंगाई के साथ उनके वेतन में बढ़ोतरी होनी चाहिये। वे मांग कर रहे हैं कि वृद्धावस्था में आत्मसम्मान से जीने के लिये उन्हें पर्याप्त पेंशन मिलनी चाहिये।

मज़दूरों की इन जायज़ मांगों को नयी पेंशन योजना पूरा नहीं करती है। इसका असली उद्देश्य ग़रीब मज़दूरों को ठगना है और राज्य के समर्थन से एक कोष तैयार करना है जो भविष्य में टाटा, अंबानी, बिरला व अन्य इजारेदार घरानों के लिये काम आयेगा।

पीएम-किसान योजना

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (जिसे पीएम-किसान योजना का नाम दिया गया है) दो हेक्टेयर (तकरीबन 5 एकड़) तक भूमि पर खेती करने वाले किसानों के लिये एक इन्कम ट्रांस्फर स्कीम है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ऐसे छोटी जोत के करीब 12 करोड़ खेत हैं। 31 मार्च, 2019 के पहले ऐसे छोटी जोत के मालिकों के बैंक खातों में 2,000 करोड़ रुपयों की धनराशि जमा करने की योजना बनाई गयी है। इसकी पहली किश्त दिसम्बर 2018 से चार महीनों की अवधि के लिये है।

सभी 12 करोड़ छोटी जोत वाले किसानों तक स्कीम के पहुंचने की उम्मीद कम ही है क्योंकि वे सभी ज़मीन के मालिक नहीं हैं। किराये पर खेती करने वाले किसानों को स्कीम के बाहर रखा गया है। जिन किसानों के पास ज़मीन के स्पष्ट पट्टे नहीं हैं वे स्कीम के बाहर होंगे। जो दो हेक्टेयर से कम ज़मीन की मालिकी का स्वीकार्य सबूत पेश कर सकते हैं, उन्हें पूरे साल में 2,000 रुपये की तीन किश्तों में 6,000 रुपये मिलेंगे, चाहे उस ज़मीन पर कितना भी उत्पादन हुआ हो।

किसान बिजली की भरोसेमंद सप्लाई, सिंचाई का पानी, मुनासिब दाम पर बीज और लागत की अन्य चीजों की मांग कर रहे हैं। किसान अपने उत्पादों के लिये, लागत का डेढ़ गुना दाम मांग रहे हैं। पर हिन्दोस्तान की सरकार इन जायज़ मांगों को पूरा करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय वह किसानों को प्रतिमाह मात्र 500 रुपये की रकम दे रही है जो कि किसानों के भारी नुकसानों की तुलना में कौड़ियों के बराबर है।

निजी व्यापारियों और पूंजीवादी व्यापारी कंपनियों द्वारा किसानों की लूट को रोकने के क़दम उठाने के बजाय, राज्य उन्हें भीख दे रहा है। ज़मीन जोतने वालों के अधिकारों का आदर और रक्षा करने के बजाय, राज्य उनके साथ भिखारियों के जैसे बर्ताव कर रहा है। निजी कंपनियां बाज़ार में किसानों को लूटती रहेंगी, जबकि राज्य आमदनी समर्थन का ढिंढोरा पीटकर किसानों के सामने कुछ टुकड़े फेंकेगा।

निष्कर्ष

हुक्मरान पूंजीपति वर्ग और उसकी पार्टियों के पास सभी को सुरक्षित रोज़गार और सेवा निवृत्ति पर आर्थिक समर्थन दिलाने की समस्या का कोई समाधान नहीं है। भाजपा कुछ मज़दूरों को बुद्धू बनाकर और ग़रीब किसानों के लिये टुकड़े फेंककर, अपने लिये वोट जीतने की उम्मीद कर रही है। और इसके साथ-साथ, कांग्रेस पार्टी मज़दूरों और किसानों के हितों का समर्थक होने का नाटक कर रही है और यह वादा कर रही है कि अगर वोट देकर उसे जिताया जाये तो मज़दूरों और किसानों की समस्याओं को हल कर देगी।

भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों ही उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को जारी रखने के प्रति वचनबद्ध हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है मज़दूरों और किसानों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों को दांव पर रखकर, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों के अधिक से अधिक मुनाफ़ों की गारंटी देना।

इस समस्या को हल करने के लिये सामाजिक उत्पादन को एक नई दिशा और प्रेरक शक्ति देने की ज़रूरत है। सामाजिक उत्पादन को एक वैज्ञानिक योजना के अनुसार आयोजित करना होगा, जिसका उद्देश्य होगा इंसानों की ज़रूरतों को पूरा करना, न कि पूंजीपतियों के अधिक से अधिक मुनाफ़ों की लालच से प्रेरित होकर अस्त-व्यस्तता फैलाना। सबको सामाजिक उत्पादन में योगदान देने का मौका मिलना चाहिये, काम के अनुसार वेतन मिलना चाहिये और सेवा निवृत्ति के बाद सम्मानजनक पेंशन मिलनी चाहिये। ऐसी व्यवस्था में कोई भी अति धनवान नहीं बन सकेगा। परन्तु समाज के हर सदस्य को वे सभी शर्तें सुनिश्चित होंगी जो इज़्ज़तदार जीवन के लिये ज़रूरी हैं। इस प्रकार से पूरे समाज की समृद्धि बढ़ेगी। सभी परिवारों के जीवन स्तर में निरंतर उन्नति होगी और सभी संकट दूर होंगे।

सामाजिक उत्पादन को यह नई दिशा दिलाने के लिये मज़दूरों, किसानों, अन्य मेहनतकशों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है। हिन्दोस्तान की दौलत का उत्पादन करने वालों को उसका मालिक बनना होगा। किस चीज़ का कितना उत्पादन होना चाहिये और उसका कैसे वितरण होना चाहिये, यह फैसला इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों की अगुवाई में स्पर्धाकारी निजी हितों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। मेहनतकश लोगों को यह फैसला लेने की ताक़त अपने हाथों में लेनी होगी। हम सभी को इस उद्देश्य के साथ अपने दैनिक संघर्षों में आगे आना होगा। 

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Feb 16-28 2019    Voice of the Party    Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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