जंग और दमन से न तो कश्मीर की समस्या हल होगी, न ही आतंकवाद ख़त्म होगा

ख़बरों के अनुसार, 26 फरवरी, 2019 को सुबह-सुबह हिन्दोस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने नियंत्रण रेखा को पार किया और पाकिस्तान में कुछ आतंकवादी छावनियों पर 1000 किलो वजन के लेज़र-निर्दिष्ट बम गिराये। बड़े पूंजीपतियों के नियंत्रण में मीडिया जंग के ढोल बजा रही है और खूब ढिंढोरा पीट रही है कि पुलवामा के आतंवादी हमले के बदले में “पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब” दिया गया है।

कश्मीर के अंदर आतंक की मुहिम को खूब बढ़ा दिया गया है। बी.एस.एफ., सी.आर.पी.एफ. और आई.टी.बी.पी. के दसों-हजारों सैनिकों को विमानों पर बिठाकर श्रीनगर ले जाया गया है। 22 फरवरी की रात को श्रीनगर में सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया। हुर्रियत कांफरेंस के प्रमुख नेताओं को कश्मीर राज्य से बाहर जेलों में ले जाया जा रहा है।

14 फरवरी के आतंकवादी हमले के बाद, पूरे देश में बहुत ही ज्यादा तनाव फैलाया जा रहा है। हुक्मरान पार्टी द्वारा प्रोत्साहित गुंडे देश में जगह-जगह पर कश्मीरियों तथा आम मुसलमान लोगों पर हमले कर रहे हैं। प्रमुख “विपक्ष” की पार्टी इन हमलों पर मौन है और वह कश्मीर में या पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सरकार जो भी कदम लेना चाहती है, उसे अपना पूरा समर्थन दे रही है।

देशभर में लोग चिंतित हैं कि हिन्दोस्तानी राज्य अब आगे क्या करने वाला है। क्या देश को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ संपूर्ण जंग में धकेल दिया जायेगा? क्या मुसलमानों को निशाना बनाकर सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित किया जायेगा? क्या कश्मीर में और खून-खराबा होगा?

कश्मीर के लोगों पर बढ़ते दमन और सीमा-पार हवाई हमलों को “आतंकवाद मिटाने” और पाकिस्तान से बदला लेने के नाम पर जायज़ ठहराया जा रहा है। अगर सभी घटनाओं का ठंडे दिमाग से जांच और विश्लेषण किया जाये तो यह स्पष्ट होगा कि सरकार जो कदम अपना रही है, उससे न तो कश्मीर की समस्या हल होगी और न ही आतंकवाद ख़त्म होगा।

कश्मीर की समस्या

कश्मीर की समस्या एक राजनीतिक समस्या है। यह हिन्दोस्तानी संघ के अंदर कश्मीरी लोगों के अपूर्ण जज़बातों की समस्या है। अगर हिन्दोस्तानी राज्य इन जज़बातों को मान्यता देता है और इन्हें हल करने की कोशिश करता है तो यह संभव है कि कश्मीरी लोगों तथा देश के सभी लोगों के हित में कश्मीर की समस्या हल होगी। परन्तु जब तक हिन्दोस्तानी राज्य इसे “कानून और व्यवस्था” की समस्या मानकर लाठी-गोली के साथ इसका मुकाबला करता रहेगा, तो कश्मीर के घावों से खून बहता रहेगा और बाकी देश में भी शांति और प्रगति नहीं होगी।

कश्मीर और कश्मीरी लोगों की समस्या को लेकर नरेंद्र मोदी की सरकार उसी दिवालिया रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रही है, जिस पर हिन्दोस्तानी राज्य बीते 30 से ज्यादा वर्षों से चलता आ रहा है। कश्मीर के अंदर सेना और अर्ध-सैनिक बलों को यह आदेश दिया जाता है कि वहां की आबादी के साथ एक कब्ज़ाकारी सैन्यबल की तरह बर्ताव करो, उन्हें पूरी तरह दबाओ। देश के बाकी भागों में लोगों को बताया जाता है कि कश्मीरी लोग “आतंकवादी” हैं, “अलगाववादी” हैं, “पाकिस्तानी एजेंट” हैं और राज्य को उन्हें बेरहमी से कुचल देना चाहिये। इस नीति का यह परिणाम हुआ है कि सभी कश्मीरी लोग खुद को हिन्दोस्तानी संघ से पूरी तरह अलग महसूस करते हैं। जब-जब सेना मुठभेड़ों में किसी नौजवान का कत्ल करती है तो कश्मीरी लोग हज़ारों की संख्या में बाहर निकलकर, भयानक राजकीय आतंक से डरे बिना, उसका विरोध करते हैं। हमारो लाखों-लाखों सैनिक, जिनका काम है बाहरी दुश्मनों के हमले से देश की सरहदों की रक्षा करना, आज अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ एक अनन्त जंग में फंसे हुये हैं।

हिन्दोस्तानी सेना के कई सेवानिवृत्त कमांडरों ने साफ-साफ कहा है कि कश्मीर की समस्या का कोई सैनिक समाधान नहीं हो सकता है। उन्होंने इस राजनीतिक समस्या के राजनीतिक समाधान की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। परन्तु आज तक सभी सरकारों ने उनकी बातों को अनसुना किया है।

कश्मीर एक भूखंड मात्र नहीं, एक आबादी है

जब हमारे हुक्मरान ऐलान करते हैं कि “कश्मीर हमारा है”, पर साथ ही साथ, कश्मीरी लोगों को “पाकिस्तानी एजेंट” करार देते हैं और उन्हें सेना के पांव तले दबाकर रखते हैं, तो उनका सोच और काम उपनिवेशवादियों व साम्राज्यवादियों जैसा है। हुक्मरानों को सिर्फ कश्मीर की ज़मीन और संसाधनों से मतलब है, कश्मीर के लोगों से नहीं।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक और मणिपुर से महाराष्ट्र तक, हम हिन्दोस्तानी लोगों ने खुद अपने देश के मालिक बनने के लक्ष्य को लेकर, उपनिपवेशवादी हुकूमत को ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी थी। पर आज़ादी के 70 वर्ष बाद, आज भी हम मज़दूर, किसान, महिला, नौजवान और आदिवासी लोग असली मायने में आज़ाद नहीं हैं। मुट्ठीभर बड़े पूंजीपति अपनी वफादार पार्टियों के ज़रिये हमारे ऊपर शासन करते हैं। बड़ी बेरहमी से हमारा शोषण-दमन होता है। हमारे हुक्मरान धर्म, जाति, भाषा और हर दूसरे आधार पर हमें बांटकर, असली आज़ादी के लिये, देश के मालिक बनने के हमारे संघर्ष को कुचलते हैं।

कश्मीर के लोग उसी आज़ादी के लिये संघर्ष कर रहे हैं, जिसके लिये बाकी देश के मज़दूर, किसान, महिला, नौजवान और आदिवासी लोग संघर्ष कर रहे हैं। हुक्मरान वर्ग और उसकी सरकारें कश्मीरी लोगों के संघर्ष को बड़े अपराधी तरीके से “राष्ट्र-विरोधी” करार देते हैं। अलग-अलग समय पर हुक्मरानों ने ठीक इसी तरह पंजाब, असम, तामिलनाडु, आदि के लोगों के संघर्ष को “राष्ट्र-विरोधी” बताया है। हमें कश्मीरी लोगों के संघर्ष को हमारे शोषकों और ज़ालिमों के चश्मों से नहीं देखना चाहिये। कश्मीर एक भूखंड मात्र नहीं, एक आबादी है। कश्मीर के लोग हमारे ही भाई-बहन, हमारे ही बच्चे हैं। कश्मीर के लोगों का अपना भविष्य तय करने का संघर्ष हमारा भी संघर्ष है।

हमारे हुक्मरान मज़दूरों और किसानों के दिमागों में यह झूठा प्रचार भरते रहते हैं कि कश्मीर की समस्या पाकिस्तान की रचना है। हुक्मरान दावा करते हैं कि अगर पाकिस्तान को कश्मीर के अंदर घुसपैठिये भेजने से रोका जाये तो कश्मीर में कोई समस्या नहीं रहेगी।

यह बहुत भटकाववादी प्रचार है। यह इस सच्चाई को छिपाता है कि कश्मीर की समस्या की प्रमुख वजह हमारे हुक्मरान वर्ग की कश्मीर के प्रति नीति है। इसमें पाकिस्तान की भूमिका प्रमुख नहीं है।

अगर हिन्दोस्तानी राज्य ने कश्मीरी लोगों और देश के सभी लोगों की खुशहाली और सुरक्षा को वास्तव में सुनिश्चित किया होता, तो कोई बाहरी ताक़त कश्मीर में हिन्दोस्तानी राज्य के ख़िलाफ़ बगावत नहीं भड़का सकती। बल्कि आम कश्मीरी लोग गड़बड़ फैलाने वालों को जल्दी से पकड़कर अधिकारियों के हवाले कर देते।

हमारे हुक्मरान इस बात पर अपनी पीठ थपथपाने से कभी नहीं थकते कि उन्होंने पाकिस्तान को सफलतापूर्वक तोड़कर बांग्लादेश की रचना की थी। परन्तु हमारे हुक्मरानों ने उस इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा। बांग्लादेश का पाकिस्तान से अलग होने का मुख्य कारण यह था कि बांग्लादेश के लोगों ने पाकिस्तानी हुक्मरान वर्ग द्वारा अपने राष्ट्रीय दमन के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी। अगर पाकिस्तान ने बांग्लादेश के लोगों की आकांक्षायें पूरी की होती तो हिन्दोस्तान पाकिस्तान को तोड़ने में कभी सफल नहीं हो सकता था।

आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारी सरकार की लड़ाई एक फरेब है

देश के लोग बार-बार होने वाले आतंकवादी हमलों के बारे में बहुत चिंतित हैं। हमारे हुक्मरान देश में होने वाले सभी आतंकवादी हमलों के लिये पाकिस्तान को दोषी ठहराते हैं। पुलवामा में हुये आतंकवादी हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत के बतौर एक विडियो दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान ने उसे फर्ज़ी विडियो बताया है और उस हमले में पाकिस्तानी राज्य के किसी भी तरह से लिप्त होने से इंकार किया है। सच्चाई क्या है?

आतंकवाद अधिकतम पूंजीवादी राज्यों की नीति का एक हथकंडा है। अलग-अलग राज्य अपने-अपने देशों के अंदर तथा दूसरे देशों में आतंकवादी हमले आयोजित करते हैं और उस आधार पर, अपने देश के अंदर बढ़ते राजकीय आतंक तथा दूसरे देशों पर हमलावर जंग को जायज़ ठहराते हैं। इस या उस आतंकवादी गिरोह के नाम से इस प्रकार के हमले करवाये जाते हैं। फर्ज़ी विडियो के आधार पर सैनिक दखलंदाज़ी को जायज़ ठहराया जाता है, जैसा कि अमरीका ने सिरिया में किया था। अमरीका सारी दुनिया में आतंकवाद का सरगना है। यह जानी मानी बात है कि अमरीका ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया में अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को बढ़ावा देने के लिये, पाकिस्तान में तमाम आतंकवादी गिरोहों को धन, प्रशिक्षण और हथियार दे रखे हैं। अमरीका इन गिरोहों को लामबंध करके अलग-अलग देशों की सरकारों के लिये अस्थाई हालतें पैदा करता है, पड़ोसी देशों के बीच युद्ध भड़काता है और दूसरे देशों में शासन परिवर्तन करने के लिये सैनिक हस्तक्षेप को जायज़ ठहराता है।

अमरीकी साम्राज्यवाद दक्षिण एशिया पर अपना प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिये हमेशा ही हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में लड़वाता रहा है। अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान व पाकिस्तान लगातार आपस में लड़ते रहें और अमरीका उनके बीच में “शांतिकर्ता” बनने का नाटक करता रहे। अमरीका ने बीते दो दशकों में, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में लड़वाने के लिये बार-बार आतंकवाद के हथकंडे का इस्तेमाल किया है। आज भी ऐसा ही किया जा रहा है।

जब अमरीका ने 2001 में अपनी सेना को अफगानिस्तान पर कब्ज़ा करने के लिये भेजा था, तब उसने हिन्दोस्तान को पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिये इस्तेमाल किया था ताकि पाकिस्तान अमरीका के जंग का समर्थन करे। संसद पर किये गये आतंवादी हमले को बहाना बनाकर, हिन्दोस्तानी फौज को पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया गया था। पाकिस्तान को मजबूर किया गया था कि वह अपनी पश्चिमी सरहद को अमरीकी सेनाओं के लिये खोल दे, जहां से वे अफगानिस्तान पर आसानी से हमला कर सकें।

इस समय, दूसरे देशों की सत्ताओं को अस्थाई करने की अमरीका की नीति का एक मुख्य निशाना ईरान है। अमरीका इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी गिरोहों का इस्तेमाल कर रहा है। अमरीका अपने ईरान-विरोधी अभियान में पाकिस्तान को शामिल करना चाहता है। पुलवामा में किया गया आतंकवादी हमला पाकिस्तान को अमरीका के इन इरादों के अनुसार चलने को मजबूर करने के लिये, हिन्दोस्तान का इस्तेमाल करने का एक साधन हो सकता है।

हमारे हुक्मरान बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि अमरीका ने अफगानिस्तान, ईरान, सिरिया और तमाम अन्य देशों में अपनी नीतियों को बढ़ावा देने के लिये आतंकवाद के हथकंडे का इस्तेमाल किया है। परन्तु हिन्दोस्तानी राज्य ने कभी भी, किसी भी देश के ख़िलाफ़, अमरीकी साम्राज्यवाद और उसकी आतंकवादी गतिविधियों का विरोध नहीं किया है। इसके विपरीत, हमारे हुक्मरान अमरीका के साथ रणनैतिक सैनिक गठबंधन को और मजबूत करते आ रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दोस्तानी राज्य का इरादा दुनिया में कहीं भी आतंकवाद को ख़त्म करना नहीं है।

हिन्दोस्तानी राज्य का “आतंकवाद पर जंग” लोगों को बुद्धू बनाने के लिये एक फरेब है। हमारे हुक्मरानों द्वारा पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग के ढोल पीटने का आतंकवाद को ख़त्म करने से कोई संबंध नहीं है।

निष्कर्ष

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग से हमारे दोनों देशों में नागरिकों और सैनिकों की कीमती जानें जायेंगी। हमारे देश के हुक्मरान, जो इस समय पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं, हमारे लोगों या हमारे सैनिकों की जानों की कोई परवाह नहीं करते हैं। जंग के बारे में लोगों को उत्तेजित करके, हमारे हुक्मरान देश के मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को अपने अधिकारों के संघर्ष के रास्ते से गुमराह करना चाहते हैं और अपने पीछे लामबंध करना चाहते हैं। हमें उनके इस जाल में नहीं फंसना चाहिये।

हमें यह मांग करनी चाहिये कि हमारी सरकार बिना कोई पूर्व शर्त रखे, सभी विवादास्पद मुद्दों पर और आतंकवाद के विषय पर भी, पाकिस्तान के साथ वार्ता करे। यह हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों के हित में होगा कि हम अपने आपसी मुद्दों को, किसी बाहरी ताकत की दखलंदाज़ी के बिना, आपस में ही हल कर लें।

कश्मीर की समस्या एक राजनीतिक समस्या है और उसके राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है। हमें कश्मीर की समस्या के “सैनिक समाधान” का विरोध करना होगा। हमें पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंगफरोशी और जंग का विरोध करना होगा।

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Mar 1-15 2019    Voice of the Party    War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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