बड़े बैंक काले धन को सफेद करने में और आतंकवादियों को धन दिलाने में शामिल हैं

हाल में यूरोप के बहुत से बड़े बैंकों को निगरानी में लाया गया है क्योंकि इन पर मनी लांडरिंग, यानी कि काले धन को सफेद करने का या अर्थशोधन करने का संदेह है। डॅन्स्के बैंक जो डेनमार्क का सबसे बड़ा बैंक है, उसे मानना पड़ा है कि आंतरिक जांच पड़ताल में उसकी एस्टोनिया शाखा में बहुत से संदेहजनक खाते और लेन-देन के मामले सामने आये हैं। इस शाखा में करीब 15,000 विदेशी ग्राहकों के खाते हैं जिनमें 2007 और 2015 के बीच 235 अरब डॉलर का लेन-देन हुआ है। बैंक ने यह माना कि उनके द्वारा अभी तक जांच पड़ताल किये गये 6,200 ग्राहकों में से अधिकांश संदेहजनकहैं। जांच पड़ताल करने वाले कह रहे हैं कि डॅन्स्के मामला शायद तैरते हुये हिमखंड की सिर्फ दिखने वाली चोटीमात्र है; यानी कि समस्या बहुत बड़ी है।

आम तौर पर अर्थशोधन की लेन-देन साम्राज्यवादी देशों के बैंकों के माध्यम से ही होती है जिनकी कोई शाखा एक बड़े जोख़िम वाले तीसरे देश में होती है। अमरीका और दूसरी बड़ी शक्तियां दुनियाभर में आतंकी गुटों, “विपक्षीया स्वतंत्रता सेनानियोंके गुटों को जन्म देते हैं और उन्हें धन देते हैं। इसके लिये चुपके से उन गुटों के पास धन पहुंचाने की ज़रूरत होती है, इस तरह कि पता ही न चले कि कौन सा राज्य इसके पीछे है। एक देश से दूसरे देश में भौतिक रूप में धन पहुंचाना कठिन होता है; इसीलिये यदाकदा बैंक इस प्रक्रिया में शामिल होते ही हैं। समस्या यह होती है कि अंतरराष्ट्रीय तौर पर बैंकों के लिये अपने ग्राहकों की पहचान रखने (के.वाई.सी.)” के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। खुफिया तौर पर धन भेजने के लिये इन मानदंडों का उल्लंघन होना अनिवार्य है। इस तरह के धन के लेन-देन को अर्थशोधन कहते हैं क्योंकि इसमें काले धन को सफेद करने की कार्यवाई होती है। जिस देश या इलाके या अधिकार क्षेत्र में यह लेन-देन होती है उसे बड़े जोखिम वाला तीसरा देश (हाई रिस्क थर्ड कंट्री या एच.आर.टी.सी.) कहते हैं।

2018 के नवम्बर में, डॉइश बैंक जो जरमनी का सबसे बड़ा बैंक है, उसके फ्रैंकफर्ट मुख्यालय में छापा मारा गया था क्योंकि बैंक की ब्रिटिश वर्जिन आयलैंड शाखा में अर्थशोधन का संदेह था। 2017 में डॉइश बैंक ने 2008 से लेकर अब तक अर्थशोधन संबंधित कानूनी विवादों को निपटाने के लिये 18 अरब अमरीकी डॉलर का जुरमाना भरा था। इसके पहले अमरीकी नियामकों के अर्थशोधन के आरोपों से निपटने के लिये एच.एस.बी.सी. को 1.92 अरब अमरीकी डॉलरों का जुरमाना देना पड़ा था। इसके भी पहले, आई.एन.जी. बैंक को नीदरलैंड के नियामकों को 90 करोड़ अमरीकी डॉलर देने पड़े थे। लैटविया में 13 अरब अमरीकी डॉलरों के काले धन को ट्रस्टा कोमर्सबांका ने दुनिया के अलग-अलग देशों में भेज दिया। जिस तरह से यूरोपीय संघ काम करता है, उससे एक बार काला धन 28 में से एक भी देश में आ जाये तो उसे यूरोप के किसी भी देश में आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

फरवरी 2019 में यूरोपीय संघ के एक आयोग ने जोखिम वाली सूची में और देशों को जोड़ा है और अब उसमें 23 देश हो गये हैं। इनमें अब अमरीकी इलाके शामिल हो गये हैं, जैसे कि पोर्तो रीको, गुवाम, अमरीकी समोआ और अमरीकी वर्जिन आयलैंड्स। इसमें साउदी अरब का नाम भी शामिल किया गया है। यूरोपीय संसद द्वारा जारी की गयी इस नई सूची की अमरीका ने निंदा की है क्योंकि अमरीकी इलाकों का नाम इसमें आ गया है। साऊदी अरब ने अमरीका में अपने मित्र देशों के साथ मिलकर अपना नाम इस सूची से निकालने के लिये यूरोपीय संसद पर दबाव डाला है। हाल में हुई राजनायकों की एक बैठक में ब्रिटेन, फ्रांस और जरमनी जैसे ताक़तवर देशों के राजनायकों ने जोखिम वाले देशों की सूची में नये देशों को शामिल करने पर चिंता व्यक्त की।

जबकि विभिन्न देशों के नियामक आयोग अर्थशोधन के संबंध में बड़े बैंकों पर जुरमाने लगा रहे हैं, आतंकवादियों और तरह-तरह के विपक्षी गुटों के लिये बिना किसी रुकावट के धन पहुंचता रहता है। यह इसीलिये जारी है क्योंकि साम्राज्यवादी ताक़तें दुनिया पर अपनी चैधराहट जमाने के लिये ऐसे गुटों को धन देती हैं।

अर्थशोधन के मामलों का पर्दाफाश तभी होता है जब प्रतिस्पर्धी साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच विवाद ज्यादा हो जाते हैं। बैंकों पर बड़े जुरमाने लगाने का मकसद लोगों के बीच यह ग़लत घारणा पैदा करना होता है कि वित्तीय अनियमितताओं पर काबू रखा जा रहा है। यह इस सच्चाई को छुपाता है कि जब तक साम्राज्यवादी व्यवस्था मौजूद है आतंकवाद और अन्य तरीकों से दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दख़लंदाजी जारी रहेगी।

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Mar 16-31 2019    Political-Economy    Economy     War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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