आदिवासी और वनवासी लोगों को बेदख़ल करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश :

हिन्दोस्तानी राज्य आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता नहीं देता है

13 फरवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को आदेश दिया कि उन आदिवासी लोगों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन से बेदख़ल किया जाये, जिनके वन्य ज़मीन पर दावे ठुकराये गये हैं। इस आदेश की वजह से, देशभर के कई राज्यों में फैले करीब एक करोड़ आदिवासियों और वनवासियों पर अपनी पारंपरिक ज़मीनों और घरों को खोने का ख़तरा मंडरा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाइल्डलाइफ फस्र्ट, नेचर कंसर्वेशन सोसाइटी और टाइगर रिसर्च एंड कंसर्वेशन ट्रस्ट द्वारा दायर की गयी याचिका की प्रतिक्रिया में दिया गया है। इस याचिका में यह तर्क पेश किया गया है कि वन अधिकार अधिनियम (एफ.आर.ए.) के तहत जिन लोगों के दावे ठुकराए गए हैं, वे इस इलाके में अतिक्रमण कर रहे हैं और कानूनी तौर पर इन जंगलों के वास्तविक निवासी नहीं माने जा सकते।

jharkhand-tribals

दिसंबर 2006 में संसद में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 को पारित किया गया था। इस अधिनियम के तहत देशभर के जंगलों में निवासी हज़ारों-लाखों लोगों को वन्य ज़मीन पर अपने व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों के दावे सरकार के पास दर्ज़ कराने थे ताकि उनके अधिकारों को कानूनी मान्यता मिले।

सुप्रीम कोर्ट के 13 फरवरी के इस आदेश का देशभर में तुरंत जोरदार विरोध हुआ। आदिवासी  समुदायों और आदिवासियों के अधिकारों के लिये संघर्ष करने वालों ने इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की। जन अधिकारों के लिए लड़ रहे कार्यकर्ताओं और वकीलों ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि पिछले 11 वर्षों में, जबसे इस अधिनियम को लागू किया गया है, सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनायी जिसके ज़रिये आदिवासियों और वनवासियों के जायज़ दावों का न्यायपूर्ण तरीके से निपटारा सुनिश्चित किया जा सके। इसका नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को 28 फरवरी, 2019 को अपने आदेश पर अस्थायी रूप से रोक लगानी पड़ी।

अब सुप्रीम कोर्ट ने उन 21 राज्यों, जिन पर यह आदेश लागू होगा, की सरकारों से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों और वनवासियों द्वारा किये गए दावों को किस आधार पर स्वीकार किया गया है या ठुकराया गया है। वन अधिकार अधिनियम के तहत आने वाले ये 21 राज्य है: आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल। इन राज्यों की सरकारों को जुलाई 2019 तक का समय दिया गया है, जब कोर्ट में फिर से इस पर सुनवाई होगी।

आदिवासियों और वनवासियों के साथ काम करने वाले कई संगठनों ने कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं जिनमें यह साफ़ नज़र आता है कि राज्यों के अधिकारियों ने इस पूरी प्रक्रिया को बेहद अन्यायपूर्ण, जन-विरोधी और मनमाने ढंग से लागू किया है। ऐसी प्रक्रिया के चलते, जनजाति मामलों के मंत्रालय के दस्तावेजों के मुताबिक, करीब 50 प्रतिशत दावों को ठुकराया गया है।

वन अधिकार अधिनियम के तहत किस तरह से दावों को स्वीकारा या ठुकराया जाता है

वन अधिकार अधिनियम के तहत उन सभी आदिवासियों के व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता दी गयी है, जो यह साबित कर पाते हैं कि वे इस ज़मीन पर 13 दिसंबर, 2005 से पहले से निवास कर रहे हैं। वन्य ज़मीन पर दावों को तीन चरणों में परखा जाता है : ग्राम सभा में, जहां पर सबसे पहले दावा दर्ज़ किया जाता है; फिर एक सरकारी अधिकारी की अगुवाई में सब-डिविज़नल स्तरीय समिति (एस.डी.एल.सी.) में; और आखिर में जिला कलेक्टर की अगुवाई में जिला स्तरीय समिति (डी.एल.सी.) में।

वन्य ज़मीन पर दावे के साथ दो दस्तावेज़ों को सबूत के रूप में जमा करना ज़रूरी है। कानून के मुताबिक किसी भी दावे को ठुकराने से पहले उस व्यक्ति को समिति के सामने अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए और यदि उसका दावा ठुकराया जाता है तो यह बात उसको लिखित रूप में और व्यक्तिगत तौर बताना ज़रूरी है। ऐसे व्यक्ति को 60 दिन के भीतर उस आदेश के ख़िलाफ़ याचिका देने का अधिकार है। किसी भी दावे को तब तक ठुकराया नहीं जा सकता जब तक आवेदनकर्ता को अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया जाता।

लेकिन असलियत में यह देखा गया है कि देशभर में इस कानून का खुलेआम उल्लंघन किया गया है।

राज्य सरकारों ने मनमाने तरीके से राजस्व अधिकारी, जंगल रेंज अधिकारी और जंगल के चैकीदारों को इन दावों का निपटारा करने की छूट दे रखी है। देशभर के कई गांवों में वन अधिकार समितियों का गठन ही नहीं किया गया है, जिन समितियों को वन्य ज़मीन के दावों की जांच करने की ज़िम्मेदारी दी गई है। राज्यों के कई अधिकारियों ने ऐसे दस्तावेज़ों की मांग की है, जिनकी कानूनी तौर पर कोई ज़रूरत नहीं है।

कई राज्यों में सैकड़ों आदिवासियों के वन्य ज़मीन पर दावों को ठुकरा दिया गया है लेकिन उनको इसकी सूचना नहीं दी गयी और न ही उनको इसकी कोई वजह बताई गयी। ऐसा करने से उन लोगों को इस फैसले के ख़िलाफ़ अपील करने का मौका भी नहीं मिला और अब उन पर अपनी ही ज़मीन से बेदखल किये जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। कुछ मामलों में तो लोगों को अब पता चल रहा है कि उनकी फाइलें ही गायब हो गयी हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य जन-विरोधी है

ये सारे तथ्य साफ दिखाते हैं कि हिन्दोस्तानी राज्य आदिवासियों और वनवासियों के आवास और आजीविका के अधिकार को न तो मान्यता देता है और न ही उनका आदर करता है। और जब कभी लोगों के दबाव के चलते, राज्य ऐसे कानून बनाने को मजबूर होता है जो उन अधिकारों की गारंटी देने का दावा करता है, तो भी यह एक दिखावा मात्र रह जाता है क्योंकि उस कानून को लागू करने के कोई तंत्र नहीं बनाये जाते। कानून का उल्लंघन करने वाले राज्य के अधिकारियों को कोई सज़ा भी नहीं होती है।

यह राज्य मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के अधिकारों को न तो मान्यता देता है और न ही उनका आदर करता है। यह राज्य ऐसे अधिकारों को एक विशेषाधिकार मानता है, जो किसी भी समय, राजनीतिक दांव-पेंच बतौर दिये या वापस लिए जा सकते हैं। इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार की अपील चुनावों के ठीक पहले इसलिये दायर की गई ताकि सत्तारूढ़ पार्टी को आदिवासियों के वोट मिल सकें।

हिन्दोस्तानी राज्य केवल हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा अपने निजी मुनाफ़े के लिए हमारे श्रम, ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के अधिकार को स्वीकार करता है और पूरी ताक़त के साथ उसकी हिफ़ाज़त करता है। इस राज्य के पास पूरा अधिकार है कि लोगों को अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जाये और उनकी ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों को छीनकर बड़े इजारेदार पूंजीपतियों को अधिकतम मुनाफ़े बनाने के लिए सौंपा जाये। लोगों की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस राज्य पर बिलकुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता।

वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन : राज्य को और अधिक क्रूर ताक़त देते हैं

मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, केंद्र सरकार भारतीय वन अधिनियम-1927 में कुछ संशोधन करने जा रही है। नए भारतीय वन अधिनियम 2019 के मसौदे में ऐसे प्रस्ताव किये गए हैं जिससे मौजूदा कानून में वन अधिकारियों को दिए गए पुलिसिया और अर्ध-न्यायिक शक्तियों को न केवल बरकरार रखा जायेगा बल्कि और कठोर बनाया जायेगा। वन अधिकारियों को हथियार इस्तेमाल करने का अधिकार भी दिया जायेगा और किसी भी कानूनी मुकदमे से उन्हें बचाव मिलेगा (सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम - आफ्सपा - के समान)।

इस अधिनियम में इस तरह के प्रस्ताव शामिल किये गए हैं जिनके चलते किसी भी वनवासी को जंगल की ज़मीन और वन ऊपजों से वंचित करने की वन अधिकारियों की ताक़त को और अधिक मजबूत किया जायेगा (भले ही उसको वन अधिकार कानून के तहत यह अधिकार क्यों न मिले हों)। ये प्रस्ताव आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों और दावों को तय करने में ग्राम सभा की भूमिका को भी कमजोर बनाते हैं। प्रस्तावित संशोधनों में केंद्र सरकार को वन्य ज़मीन के प्रबंधन में राज्य सरकार के कार्यक्षत्र में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया है और केंद्र सरकार राज्य सरकार पर अपना हुकुम थोप सकती है। एक ऐसा भी प्रस्ताव शामिल किया गया है जिसके तहत जंगलों को व्यवसायिक बागानों के लिए खोल दिया जायेगा। इन बागानों को राज्य का वन विभाग या निजी एजेंसियां चलायेंगी।

अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006

“अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006” यह कानून दिसंबर 2006 में संसद द्वारा पारित किया गया था। इस कानून को वन अधिकार अधिनियम, जनजाति अधिकार अधिनियम, जनजाति अधिनियम और जनजाति भूमि अधिकार अधिनियम के नामों से भी जाना जाता है।

यह कानून आदिवासी और वनवासी समुदायों द्वारा बरसों से चलाये जा रहे संघर्ष का नतीजा था। वे मांग करते आये हैं कि जिन ज़मीनों पर वे लोग पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं उन ज़मीनों पर उनको कानूनी अधिकार दिये जाने चाहिएं। इस कानून के तहत आदिवासी और वनवासी समुदायों के उनकी ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को परिभाषित किया गया है। इससे पहले, बर्तानवी बस्तीवादी काल के भारतीय वन अधिनियम-1927 के तहत, इन लोगों को अपनी ज़मीन और संसाधनों पर कानूनी अधिकार नहीं दिया गया था।

हिन्दोस्तान के जंगलों में आदिवासी और वनवासी समुदायों सहित करीब 2 करोड़, 50 लाख लोग रहते हैं और अपनी आजीविका जुटाते हैं। ये जंगल इन निवासियों को लघु वन उपज, पानी, चरागाह और झूम कृषि के रूप में आजीविका प्रदान करते हैं। कई पीढ़ियों से यहां पर निवास करने वाले आदिवासियों और वनवासियों का इन जंगलों के साथ करीबी और अटूट रिश्ता रहा है और ये लोग अपनी आजीविका और अस्तित्व के लिए इन जंगलों पर निर्भर रहे हैं। इन जंगलों और इनके संसाधनों पर इन समुदायों की सामुदायिक मालिकी रही है और वे इस पर सामुदायिक खेती करते आये हैं। लेकिन जंगलों या उसके संसाधनों पर इन वनवासी लोगों की कोई औपचारिक मालिकी या अधिकार नहीं रहा है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने कभी भी इन आदिवासियों या वनवासियों के, अपनी ज़मीन, आवास या आजीविका के स्रोतों पर अधिकार को मान्यता नहीं दी है और न ही इसका आदर किया है। इंडियन फारेस्ट एक्ट-1927 और वाइल्ड लाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट-1972 राज्य को “संरक्षित क्षेत्र”, “वन्यजीव अभ्यारण्य”, “सामुदायिक संरक्षण क्षेत्र” के नाम पर जंगल के किसी भी हिस्से पर कब्ज़ा जमाने का अधिकार देता है। जंगलों के “संरक्षित क्षेत्रों” में रहने वाले लोगों का अपनी ज़मीन या संसाधनों पर कोई भी दावा जंगल के अधिकारियों की मनमर्जी पर पूरी तरह से निर्भर है। ये अधिकारी उनकी जिंदगी और आजीविका पर अपना हुकुम चलाते हैं। ये लोग पूरी तरह से इन अधिकारियों के रहमो-करम पर जीते हैं और उत्पीड़न, यातना, यौन शोषण और जबरन वसूली के शिकार बने रहते हैं। अपनी ज़मीन से बेदखल किये जाने, घर और आजीविका के उजाड़े जाने का डर उनके सर पर हमेशा मंडराता रहता है। उनको पूरी तरह से हाशिए पर रखा गया है और वन उत्पादों और सामुदायिक स्रोतों पर अधिकारों से वंचित किया गया है।

वन अधिकार अधिनियम-2006 के बारे में यह प्रचार किया गया था कि यह कानून अदिवासियों और वनवासियों के साथ की गई “ऐतिहासिक नाइंसाफी” को ख़त्म करेगा और राज्य के वन अधिकारियों द्वारा उनको जबरन बेदखल किये जाने से रोकेगा।

आदिवासियों और वनवासियों को लघु वन ऊपज पर सामुदायिक अधिकार से वंचित किया गया है

वन अधिकार अधिनियम-2006 औपचारिक तौर पर वनवासियों को सामुदायिक अधिकार प्रदान करता है। कानून इन सामुदायिक अधिकारों में जंगल में पैदा होने वाले लघु वन ऊपजों को इकट्ठा करके बेचने का अधिकार देता है, साथ ही चरागाहों, पानी के स्रोतों पर अधिकार देता है, और वहां की ज़मीन पर स्कूल जैसी सुविधाओं का निर्माण करने का अधिकार देता है। इस समय लघु वन ऊपजों पर वन विभाग का नियंत्रण है।

तेंदू के पत्ते और बांस जैसे लघु वन ऊपजों के लिए ऊंची क़ीमत मिलती है और यह वनवासी समुदायों के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। लघु वन ऊपजों पर अधिकार को लेकर आदिवासियों और वनवासियों का राज्य के साथ हमेशा टकराव रहा है। लेकिन कई रिपोर्टों से पता चलता है कि राज्य के वन अधिकारी इन समुदायों को उनके अधिकारों से वंचित रखने का काम करते हैं। 

जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार वन अधिकार कानून के तहत निपटाए गए 29 लाख दावों में से केवल 1.6 प्रतिशत (46,156) मामलों में ही सामुदायिक अधिकार दिए गए हैं और इनमें से अधिकांश मामलों में लघु वन ऊपजों पर अधिकार नहीं दिया गया है।

इसकी वजह यह है कि राज्य अपने वन अधिकारियों के ज़रिये इन वन ऊपजों पर नियंत्रण करना चाहता है, जो कि राज्य के लिए राजस्व का एक बड़ा स्रोत है। कई राज्यों ने कुछ वन ऊपजों का राष्ट्रीयकरण किया है जैसे कि महुआ, साल के बीज और फूल, तेंदू के पत्ते और कुछ खास तरह का गोंद। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इन वन ऊपजों की कीमत जंगल से मिलने वाले कुल राजस्व का लगभग 50 प्रतिशत है। राज्य लघु वन ऊपजों का यह व्यापार सहकारी संस्थानों और निगमों के ज़रिए चलता है, जबकि वन अधिकार अधिनियम और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) अधिनियम (पेसा), के तहत राज्य द्वारा इन वन ऊपजों का व्यापार “गैर-कानूनी” करार दिया गया है।

 

Tag:   

Share Everywhere

आदिवासी    वनवासी    बेदख़ल    सुप्रीम कोर्ट का आदेश    Apr 1-15 2019    Voice of the Party    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

(Click thumbnail to download PDF)

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)