इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ के काम की कठिन हालतें

इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गेनाईजेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मुकेश गौतम से मज़दूर एकता लहर का साक्षात्कार

मज़दूर एकता लहर : मुकेश जी आपका मज़दूर एकता लहर स्वागत करती है। अपना क़ीमती समय निकालने के लिए आपको धन्यवाद, आप हमें बताएं कि अभी भारतीय रेल में कुल कितने टिकट चेकिंग स्टाफ कार्यरत हैं और उनकी मुख्य समस्याएं क्या हैं?

मुकेश गौतम : मौजूदा वक़्त में कुल 32,000 महिला एवं पुरुष टिकट चेकिंग स्टाफ कार्यरत हैं। अभी के वक़्त में सबसे बड़ी मुख्य समस्या टारगेट की है। रेल प्रबंधन की तरफ से, हर टिकट चेकिंग स्टाफ को कम से कम 20 केस लाने पर मजबूर किया जाता है। अगर यह टारगेट पूरा नहीं होता है तो हमें दूर-दराज के इलाकों में ट्रांसफर कर दिया जाता है जिससे हमें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ-साथ रेल प्रबंधन द्वारा किए गए अन्य मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। दूसरी मुख्य समस्या है कि हमें रनिंग स्टाफ की श्रेणी में नहीं माना जाता है जिसकी वजह से हमें वे सभी सुविधाएं जो गार्ड और ट्रेन चालक साथियों को मिलती हैं वे नहीं मिलतीं, जबकि हमारे मेल तथा एक्सप्रेस गाड़ियों के टिकट चेकिंग स्टाफ के काम करने का समय और काम की परिस्थिति एक ही जैसी है। मेल एवं एक्सप्रेस ट्रेन के टिकट चेकिंग स्टाफ के ड्यूटी घंटे ज्यादा होते हैं और वे घर से काफी दूर रहते हैं लेकिन हमें रेस्ट रूम भी सही से नहीं मिलता। कई सारे स्टेशन पर रेस्ट रूम है ही नहीं और कहीं है तो इंसानों के रहने के लायक नहीं है। बिस्तरों पर कई परतों की धूल मिट्टी जमा रहती है। साफ-सफाई तो होती ही नहीं है। न ही वहां पर शौच की सुविधा है और न ही पीने योग्य पानी की। कई स्टेशनों पर गर्मी के दिनों में रनिंग रूम में पंखों की भी व्यवस्था नहीं है और जहां पर पंखे हैं वे ख़राब पड़े हैं, उनको कोई देखने वाला नहीं है।

सुरक्षा के लिहाज से देखें तो कई बार यात्रियों से वैध टिकट न होने पर झड़प हो जाती है लेकिन हमें कोई सुरक्षा मुहैया नहीं करायी जाती। अगर यात्री हमें देखकर चलती ट्रेन से कूद जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है तो हमें ही दोषी ठहराया जाता है।

मज़दूर एकता लहर : टिकट चेकिंग स्टाफ के ऊपर किस प्रकार का कार्य दवाब और मानसिक तनाव हैं?

मुकेश गौतम : इंडियन रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की बहुत बड़ी कमी है। लगभग 40,000 पद खाली हैं तथा जो सेवानिवृत्त हो रहे हैं वे अलग से। नियमों के अनुसार प्रत्येक 3 कोच पर एक टिकट चेकिंग स्टाफ होना चाहिए परन्तु हमें कम से कम 6 कोच या उससे ज्यादा कोच पर निगरानी रखनी पड़ती है। नियम के अनुसार हमें बिना टिकट यात्री को ट्रेन पर नहीं चढ़ने देना चाहिए तो 6 कोच के 24 दरवाज़ों को निगरानी में रखना तथा बिना टिकट यात्री को ट्रेन में चढ़ने से रोकना कैसे संभव हो सकता है। हर साल बजट के समय गाड़ियों की संख्या में वृद्धि की जाती है और साथ ही त्योहारों में भी अनेक गाड़ियां बढ़ाई जाती हैं परन्तु टिकट चेकिंग स्टाफ की संख्या उतनी की उतनी ही रहती है जिसकी वजह से मौजूदा टिकट चेकिंग कर्मचारियों पर काम का अत्यधिक दवाब रहता है। हमारी हमेशा से ही मांग रही है कि जो भी रिक्त स्थान हो उसको तुरंत से तुरंत भरा जाए।

मज़दूर एकता लहर : क्या टिकट चेकिंग स्टाफ भी अनुबंध पर नियुक्त किया जाता है? रेलवे में निजीकरण को लेकर आपका और आल इंडिया टिकट चेकिंग स्टाफ एसोसिएशन का क्या रुख़ है?

मुकेश गौतम : अभी तक तो अनुबंध पर नियुक्ति नहीं की जा रही है किन्तु इसको नाकारा नहीं जा सकता है, इसे कभी भी शुरू की किया जा सकता है। क्योंकि रेलवे का टुकड़ों-टुकड़ों में निजीकरण किया जा रहा है। और यह निजीकरण का ही एक हिस्सा है। मेरा और मेरी संस्था का यही मानना है कि रेलवे का निजीकरण बहुत ही ख़तरनाक और विनाशकारी है। हम सभी रेल कर्मियों को यह समझने की ज़रूरत है कि निजीकरण का कोई सकारात्मक फायदा नहीं है। निजीकरण से न सुरक्षा और न ही सुविधा मिल सकती है। गुणवत्ता तो बहुत दूर की बात है। उदाहरण के लिए देख लीजिये रेलवे पहले बेड शीट, तकिया और चद्दर मुहैया कराता था परन्तु अब यह सब निजी ठेके पर दे दिया गया है जिससे कि ठेकेदार मुनाफ़ा बनाने के लिए बार-बार वही पुरानी तकिया और चद्दर बिना धोये इस्तेमाल के लिये देता है। आप मेल तथा एक्सप्रेस ट्रेन के खाने को ले लीजिये पहले हर लम्बी दूरी की ट्रेन में रसोइ होती थी जिसमें कुछ गुणवत्ता मिलती थी पर अब उसका भी निजीकरण कर दिया गया है जिससे आप बाहर से खाना मंगा सकते हैं जिसकी गुणवत्ता का कोई ठिकाना नहीं होता है। संक्षेप में कहूं तो रेलवे के निजीकरण के ज़रिये देश को बहुत ही ख़तरनाक दिशा में धकेला जा रहा है।

हम रेल कर्मचारियों की सलाह ली जाये, जो रेलवे को पूर्णतः जानते हैं तो रेलवे को लोगों के लिए बहुत आरामदायक और सुरक्षित बनाया जा सकता है। परन्तु सरकार हम जैसे बुद्धिजीवियों की बात नहीं सुनना चाहती है क्योंकि ये सारे सुझाव आम जनता के लिए फायदेमंद होंगे न कि देशी और विदेशी पूंजीपतियों के लिए।

मौजूदा राजग सरकार ने सत्ता संभालते ही कायाकल्प के नाम से कमेटी का गठन किया था जिसमें रतन टाटा, शिवगोपाल मिश्रा (आल इंडिया रेलवे फेडरेशन), रघुवैया (नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे) शामिल हैं। ऐसे लोगों की कमेटी बनी है जिनका रेलवे से कोई सरोकार नहीं है क्या हम रतन टाटा से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे निजीकरण के खि़लाफ़ हो सकते हैं? नहीं। रेलवे के दो प्रमुख संगठन आल इंडिया रेलवे फेडरेशन तथा नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे से रेलवे के लगभग सारे कर्मचारी नाखुश हैं क्योंकि रेलवे में अत्यधिक शोषण होता है और ये कभी उनके लिए नहीं लड़ते हैं ।

मज़दूर एकता लहर : इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गेनाईजेशन की स्थापना कब हुई थी? अभी आपकी क्या ज़िम्मेदारी और पद है? लम्बी दूरी तथा सबर्बन की रेल यात्रा को कैसे और सुधारा जा सकता है तथा रेल के और क्षेत्रों के मज़दूरों को कैसे एकजुट किया जा सकता है?

मुकेश गौतम : इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गेनाईजेशन की स्थापना 1968 में हुयी थी। मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यभार वर्ष 2012 में संभाला था। जहां तक यात्रियों की सुविधा और सुरक्षित यात्रा का सवाल है यह तभी संभव हो पायेगा जब रेलवे कर्मचारी और यात्री एकजुट होंगे तथा निजीकरण को जड़ से ख़त्म किया जायेगा। यात्रियों और कर्मचारियों की जागरुकता को बढ़ाना पड़ेगा। हमारे कई साथी ऐसे हैं जो वर्षों से काम कर रहे हैं परन्तु उनको अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं है। इसमें उनकी गलती नहीं है, इसमें यूनियन के उच्च पदों पर बैठे नेताओं की गलती है जो अपने सदस्यों की चेतना को नहीं बढ़ाते हैं। हमें अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए अपने कैडर को मजबूत बनाना होगा। उनकी चेतना को बढ़ाना होगा जिससे हम सब एकजुट हो सकें। जब से मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला है तब से अपने साथियों को संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए तैयार करता हूं तथा उनको उचित अवसर दिलाने का प्रयत्न करता हूँ। यही वजह है कि हमारा संगठन मजबूत है, हमारे साथी प्रिंट माध्यम और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को चलाने के लिए प्रशिक्षित हैं।

आज भी सरकार और रेलवे प्रबंधन हमें अंग्रेजी हुकूमत के चश्मे से देखता है जैसे कि मैंने आपको पहले ही बताया कि हमको रनिंग स्टाफ की श्रेणी से वर्ष 1932 में निकाल दिया गया। अंग्रेजी हुकूमत द्वारा यह इसलिए किया गया क्योंकि हमने स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की थी। उसके बाद से हम लगातार संघर्ष करते आये हैं और यह तब तक जारी रहेगा जब तक हमें रनिंग स्टाफ की श्रेणी में न ले लिया जाये।

मज़दूर एकता लहर : हम आपको धन्यवाद देते हैं कि आपने अपना वक़्त निकाला और हमसे बात की। मज़दूर एकता लहर आपके संघर्ष को जायज़ मानती है।

मुकेश गौतम : धन्यवाद।

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इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ    Jun 16-30 2019    Struggle for Rights    Privatisation    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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