जलियांवाला बाग जनसंहार की शताब्दी पर जनसभाएं

ग़दर इंटरनेशनल ने अप्रैल 2019 में ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में जलियांवाला बाग की शताब्दी पर कई आम सभाएं आयोजित कीं।

ब्रिटेन में साउथहॉल और इलफॉर्ड में क्रमशः 13 और 14 अप्रैल को दो सभाओं का आयोजन किया गया। 21 अप्रैल को मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया में पहली सभा का आयोजन किया गया। दूसरी सभा 28 अप्रैल को सिडनी में संपन्न हुई।

इन सभी सभाओं में, जलियांवाला बाग नरसंहार और ग़दरी बाबाओं की बस्तीवादी हुकूमतों के खि़लाफ़ अडिग संघर्षों के बारे में फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। जैसा कि हम सब जानते हैं कि 1947 में, अंग्रेज बस्तीवादियों ने हिन्दोस्तानी शासक वर्ग, बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों को सत्ता सौंप दी। उस समय से आज तक हिन्दोस्तानी लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन प्रदर्शनियों में हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा लोगों के खि़लाफ़ किये गए अत्याचार और दमन की दास्तां को दर्शाया गया।

Exhibition at Sikh sports, Melbourne

इन सभाओं में कामरेड दलविंदर और कामरेड सलविंदर मुख्य वक्ता थे। जलियांवाला बाग के नरसंहार के बारे में उन्होंने बताया कि बैसाखी के पर्व पर 15,000-20,000 लोग बर्तानवी हुक्मरानों के अत्याचार की निंदा करने के लिए इकट्ठा हुए थे। इसके तीन दिन पहले, लोगों के एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए की गई पुलिस फायरिंग में दो दर्जन से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारा गया। यह विरोध प्रदर्शन बस्तीवादी हुकूमत के खि़लाफ़ संघर्ष के दो बड़े नेताओं डा. सत्यपाल और डा. सैयफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और कैद करने के खि़लाफ़ आयोजित किया गया था। हिन्दोस्तानी लोग रोलट एक्ट जैसे काले कानून के पारित होने खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे थे। इस काले कानून के तहत किसी को भी बिना किसी चेतावनी के गिरफ्तार किया जा सकता था और बिना किसी अदालती कार्यवाही के उनको सज़ा दी जा सकती थी।

रोलट एक्ट के बारे में और जानकारी देते हुए वक्ताओं ने बताया यह कानून डिफेन्स ऑफ़ इंडिया एक्ट को ही आगे बढ़ाता था जो कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पारित किया गया था। डिफेन्स ऑफ़ इंडिया एक्ट का इस्तेमाल ख़ास तौर से हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी के क्रांतिकारियों के खि़लाफ़ किया गया था। वक्ताओं ने ग़दर पार्टी के क्रांतिकारी इतिहास के बारे में भी लोगों को अवगत कराया। विदेशों में रहने वाले हिन्दोस्तानियों ने अमरीका में हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी की स्थापना की, अमरीका और कनाडा जैसे देशों में उनके साथ नस्लवादी भेदभाव और अत्याचार इसलिए होता है क्योंकि उनका अपना देश हिन्दोस्तान एक गुलाम देश है। हालांकि बर्तानवी रानी ने 1857 के ग़दर को कुचलने के बाद यह ऐलान किया था कि उसके साम्राज्य में सभी लोग एक बराबर हैं, लेकिन हक़ीक़त में हिन्दोस्तानी लोगों को वे अधिकार नहीं दिए गए जो यूरोपीय नागरिकों को हासिल थे। यहां तक कि जब कनाडा में रहने वाले हिन्दोस्तानियों का एक प्रतिनिधि मंडल बर्तानवी राज्य सचिव से हिन्दोस्तानी लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने की अपील को लेकर गया तब उन्होंने प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया।

Suport in Britain

जैसे ही प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने अपने सभी सदस्यों को हिन्दोस्तान वापस जाने का और मातृभूमि को आज़ाद करने के संघर्ष में जुड़ने का आह्वान किया। 8000 से अधिक ग़दरियों ने इस आह्वान को स्वीकार किया और अपना सब कुछ पार्टी को सौंपकर वापस लौटने का फैसला किया। उन्होंने बर्तानवी सेना में तैनात हिन्दोस्तानी सिपाहियों को प्रेरित करने, और उनको संगठित करने की कोशिश की, जिससे हिन्दोस्तान का दूसरा ग़दर आयोजित किया जा सके और हिन्दोस्तान को आज़ाद किया जा सके। बर्तानवी सेना में तैनात हिन्दोस्तानी सिपाहियों से उन्होंने आह्वान किया कि वह चीन, तुर्की और ईरान जैसे देशों पर बर्तानवियों की गुलामी थोपने के लिए नहीं लड़े।

वक्ताओं ने कांग्रेस पार्टी (इंडियन नेशनल कांग्रेस) की ग़द्दारी का भी पर्दाफाश किया। जबकि हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी प्रथम विश्व युद्ध का इस्तेमाल हिन्दोस्तान की आज़ादी के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए कर रही थी, कांग्रेस पार्टी के नेता ख़ास तौर से एम.के. गांधी हिन्दोस्तानी नौजवानों को बर्तानवी सेना में भर्ती कराने और बर्तानवी साम्राज्य को बचाने में जुटे थे। गांधी ने कांग्रेस पार्टी को अपनी “होमरूल” जैसी मांगों को वापस लेने का निर्देश दिया और विश्व युद्ध में, बर्तानवी हुकूमत और उसके साम्राज्य को जीत दिलाने के लिए दिलो-जान काम करने का आह्वान किया। गांधी, नेहरू और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि बर्तानवी राज्य और उनकी हुकूमत की हिफाज़त करना हिन्दोस्तान के हित में है और विश्व युद्ध में बर्तानवी हुकूमत की जीत के बाद, हिन्दोस्तान को बर्तानवी साम्राज्य के एक साझेदार की हैसियत हासिल होगी।

वक्ताओं ने बताया कि जलियांवाला का नरसंहार हिन्दोस्तान की आज़ादी के संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ था। यहां तक कि 1920 में गांधी को भी असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जलियांवाला बाग के कत्लेआम ने शहीद उधम सिंह जैसे जुझारू नेताओं को जन्म दिया, जिन्होंने 21 साल बाद, सर माइकल ओ ड्वायर को मारकर इस नरसंहार का बदला लिया था। सर माइकल ओ ड्वायर जलियांवाला बाग के कत्लेआम के समय पंजाब का गर्वनर था। शहीद भगत सिंह जो उस समय केवल 12 साल के थे, उनपर जलियांवाला कत्लेआम का बहुत गहरा असर हुआ।

हाल ही में कुछ लोगों द्वारा एक अभियान शुरू किया गया जिसमें ब्रिटिश सरकार को जलियांवाला बाग के कत्लेआम के लिए माफी मांगने की मांग की जा रही है। सभा के वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि ब्रिटिश सरकार सही मायने में अपने द्वारा की गई ऐतिहासिक नाइंसाफी का प्रायश्चित्त करना चाहती है तो उसके द्वारा चलाये जा रहे सभी नाजायज़ युद्ध और लोगों के खि़लाफ़ किए जा रहे अत्याचार और दमन की नीतियों को बंद करना होगा और इन युद्धों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा देनी होगी। वक्ताओं ने याद दिलाया कि ब्रिटिश लोगों के जबरदस्त विरोध के बावजूद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इराक में जंग के लिए ब्रिटिश सेना को तैनात किया था।

वक्ताओं ने बताया कि जब हम इस तरह की ऐतिहासिक घटनाओं को याद करते हैं, तो हमें उन घटनाओं से सबक लेना चाहिए और इस तरह से कार्य करना चाहिए कि इस तरह के कत्लेआम, दमन और अत्याचार की घटनाएं फिर कभी दोबारा न हो सकें।

कामरेड ने बताया कि हमारे शहीदों के बलिदानों ने बर्तानवी हुकूमत को जड़ से हिलाकर रख दिया था और उसे कमजोर कर दिया था। इसके चलते 1947 में बर्तानवी हुक्मरान सत्ता को अपने वफ़ादार वर्ग, हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और ज़मीदारों के हाथों में सौंपने को मजबूर हो गए। इस वर्ग ने उस समय से लेकर आज तक, बर्तानवियों द्वारा बनाये गए हिन्दोस्तानी राज्य को बरकरार रखते हुए हिन्दोस्तान के लोगों की ज़मीन और श्रम की लूट को जारी रखा है। बर्तानवी बस्तीवादियों की जगह पर अब हिन्दोस्तानी “काले साहब” और विदेशी पूंजीपति उसी राज्य का इस्तेमाल हिन्दोस्तानी लोगों के श्रम और संसाधनों का शोषण करने और खुद को और अधिक अमीर बनाने के लिए कर रहे हैं।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने “बांटो और राज करो” की नीति को और भी मजबूत किया है। हिन्दोस्तानी राज्य ने बस्तीवादी राज्य के तमाम काले कानूनों जैसे “देशद्रोह का कानून”, भूमि अधिग्रहण अधिनियम को बरकरार रखा है, और अपने राज को बरकरार रखने के लिए पिछले 72 सालों में कई और काले कानून बनाये हैं जो हिन्दोस्तानी मज़दूरों, किसानों और आम मेहनतकश लोगों को दबाने, उनके संघर्षों को बेहरमी से कुचलने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। उन्होंने जलियांवाला बाग की तरह कई कत्लेआम आयोजित किए हैं। कांग्रेस पार्टी और भाजपा के राज में जनसंहार की कई वारदातें आयोजित की गयी हैं जैसे - अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर सैनिक हमला, बाबरी मस्जिद का विध्वंस, गुजरात में 2002 का कत्लेआम, 1984 में सिखों का कत्लेआम, छत्तीसगढ़, कश्मीर और देश के कई इलाकों में राजकीय आतंकवाद, इत्यादि।

वक्ताओं ने लोगों को याद दिलाया कि सर माइकल ओ ड्वायर ने हुक्मरानों की बात नहीं मनाने के लिए “हिन्दोस्तानियों को सबक सिखाने” की जनरल डायर की नीति की तारीफ की थी और उसे जायज़ ठहराया था। ब्रिटिश हुकूमत को जनरल डायर को समय से पहले रिटायर करने पर मजबूर होना पड़ा। अमृतसर में खून की होली खेलने वाले इस कसाई के लिए केवल यही “सज़ा” दी गयी और उसे बरी कर दिया गया। इंग्लैंड की टोरी पार्टी ने जनरल डायर के लिए 60,000 पौंड का योगदान इकट्ठा किया। ठीक इसी तरह से आज के हिन्दोस्तानी राज्य ने पिछले 72 वर्षों में आयोजित कत्लेआमों के गुनहगारों को सज़ा देने से इंकार किया है - चाहे ये कत्लेआम, सिखों, मुस्लिमों, कश्मीरियों, आसामी, लोगों के हों। आम लोगों का कत्लेआम करने वालों को हिन्दोस्तानी राज्य कभी भी सज़ा नहीं देता है। हिन्दोस्तान के लोगों - मज़दूरों, किसानों, छात्रों, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, छोटे दुकानदारों की दर्दनाक हालातों का ब्यौरा देते हुए, वक्ताओं ने फिर से दोहराया कि आम लोगों की हालत दिन पर दिन और भी बदतर होती जा रही है। हजारों किसान ख़ुदकुशी करने को मजबूर हैं। केवल मुट्ठीभर अमीर घरानों को छोड़कर, हिन्दोस्तान के सभी लोग परेशान हैं और सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हिन्दोस्तान के सबसे बड़े इन अमीरों की वफादार पार्टियों पर से लोगों का भरोसा उठ गया है। कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसी पार्टियां एक ही हल पेश करती हैं - हर एक चुनाव में राज्य और केंद्र स्तर पर एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी को सत्ता में बिठाना।

लेकिन सत्ता में बैठी पार्टी को बदलने से लोगों को सर्वोच्च फैसले लेने की ताक़त हासिल नहीं होती है। आज हिन्दोस्तान में आम लोग न तो देश का अजेंडा तय करते हैं और न ही देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करते हैं। हमने अपने जीवन में कई पार्टियों और गठबंधनों को सत्ता में आते देखा है। अपने अनुभव से हमने क्या सीखा है? हमने यह सीखा है कि ये पार्टियां और गठबंधन केवल इजारेदार पूंजीपतियों का एजेंडा ही लागू करती हैं, चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में बैठी हो। हिन्दोस्तानी राज्य इसी इजारेदार पूंजीपति वर्ग के अधीन है और समय-समय पर वे उस पार्टी को सत्ता में बैठाते हैं, जो सबसे बढ़िया तरीके से लोगों को बेवकूफ बना सकती है। यह पार्टियां भ्रष्टाचार मिटाने, गरीबी मिटाने, इत्यादि का दावा करती हैं, लेकिन हक़ीक़त में अमीरों को और अधिक अमीर बनाने का काम करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं कि वह देश के “चैकीदार” हैं जो देश की दौलत की हिफाज़त करेगा। लेकिन हकीक़त में उन्होंने लूट और शोषण के खि़लाफ़ लड़ने वालों पर बेरहमी से हमला किया है और इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा देश की दौलत को लूटने का काम और भी आसान कर दिया है।

सभी वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यदि जलियांवाला बाग़ जैसी घटनाओं को बार-बार होने से रोकना है तो मौजूदा व्यवस्था की जगह पर एक नयी व्यवस्था को क़ायम करना होगा जहां लोगों का फैसला सर्वोपरि होगा और लोग खुद अपने फैसलों के मालिक होंगे।

तमाम वक्ताओं द्वारा अपने विचारों को पेश करने के बाद इन विषयों पर ज़ोरदार चर्चा हुई। सभा में मौजूद कई लोगों ने देश के मौजूदा हालात पर गहरी चिंता प्रकट की। हमारे हुक्मरानों के एजेंडे के बारे में, लोगों के सामने आ रहे ख़तरों के बारे में, और लोगों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के तरीकों के बारे में कई सवाल भी पूछे गए जिनका वक्ताओं ने जवाब दिया।

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जलियांवाला बाग    जनसंहार    Jun 16-30 2019    Political-Economy    History    Rights     War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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