ईरान बहादुरी से अमरीका के आर्थिक दबावों और हमलों का मुकाबला कर रहा है

ईरान अमरीका की आर्थिक नाकेबंदी और सैनिक घेराबंदी का डटकर मुकाबला कर रहा है। जब अमरीका ने एकमत से ईरान के साथ परमाणु समझौते को रद्द कर दिया और फिर से ईरान पर प्रतिबन्ध लगा दिए, तो ईरान लगातार उसे दुनिया के दूसरे देशों से अलग करने की अमरीकी साम्राज्यवादियों की कोशिशों को हराने के लिए संघर्ष कर रहा है।

Protest in Iran

जे.सी.पी.ओ.ए. समझौता (जॉइंट कॉम्प्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) जुलाई 2015 में ईरान के साथ किया गया था, जिसके अन्य सांझेदार थे अमरीका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, यूरोपीय संघ, रूस और जर्मनी। उस समझौते के अनुसार, ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के बदले में, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 15 साल के लिए रोक लगाई गयी थी। 8 मई, 2018 को अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने जे.सी.पी.ओ.ए. से बाहर निकल जाने की एकतरफा घोषणा की थी, हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ की परमाणु जांच एजेंसी, आई.ए.ई.ए. ने प्रमाण पेश किये थे कि ईरान समझौते की शर्तों को पूरी तरह पालन कर रहा है। समझौते से निकलने के बाद, अमरीका ने फिर से ईरान के साथ व्यापार करने पर प्रतिबन्ध लगा दिए। अब अमरीका बढ़-चढ़कर ईरान पर दबाव डाल रहा है।

जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन अभी भी जे.सी.पी.ओ.ए. के सांझेदार हैं, और अमरीका उन पर खूब दबाव डाल रहा है कि वे ईरान के साथ व्यापार करना बंद कर दें। अगस्त 2018 को, समझौते से निकलने के बाद, ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले सभी देशों पर प्रतिबन्ध लगा दिए कि वे अमरीका के साथ व्यापार नहीं कर सकेंगे।

नवम्बर 2018 को अमरीका ने उन सभी प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिए, जो समझौते से पहले लगाये गए थे। 6 महीने की छूट देने के बाद, 2 मई, 2019 को अमरीका ने ईरान के खि़लाफ़ अपनी भड़काऊ हरकतों का हालिया दौर शुरू कर दिया। उस दिन अमरीका ने घोषणा कर दी कि चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, हिन्दोस्तान और तुर्की को अब तक ईरान के साथ व्यापार करने की जो छूट दी गयी थी, वह खत्म कर दी जायेगी। इसके साथ-साथ, अमरीका ने ईरान से लोहा, इस्पात, एल्युमीनियम और ताम्बा के निर्यात को रोकने वाले नए प्रतिबन्ध लगा दिए।

कुछ यूरोपीय कम्पनियां और बैंक अमरीका के प्रतिबंधों से डरकर, ईरान के साथ अपने-अपने व्यापार और काम-काज को रोकने वाले हैं। यूरोपीय ताक़तें अपने-अपने हितों को देखते हुए, अमरीका के प्रतिबंधों और युद्ध की तैयारियों का विरोध कर रही हैं। एक तरफ अमरीका और दूसरी तरफ यूरोपीय ताक़तें, रूस और चीन - इनके बीच में अंतर्विरोध और तीखे हो रहे हैं।

ईरान पर आर्थिक शिकंजा कसने के साथ-साथ, अमरीका उस देश की सैनिक घेराबंदी भी कर रहा है और उसके खि़लाफ़ फौरन जंग छेड़ने की धमकी भी दे रहा है। अमरीका का इरादा है ईरान की सरकार और लोगों पर ज्यादा से ज्यादा दबाव डालना, ताकि वे अमरीका की हुक्मशाही के सामने घुटने टेक दें।

अमरीका क्रमशः ईरान के ख़िलाफ़ अपने आर्थिक और सैनिक हमले को अंजाम दे रहा है। मई की खबरों के अनुसार, अमरीका पश्चिम एशिया में 120,000 फौजी भेजने वाला था।

अमरीका और उसके मित्र देश एक के बाद दूसरी भड़काऊ हरकत करते जा रहे हैं, ताकि जंग छेड़ने का बहाना मिल जाये। हाल में, 12 मई को यह आरोप फैलाया गया कि ईरान ने संयुक्त अरब अमिरात के तट के पास, दो सऊदी तेल वाहक जहाजों और दो अन्य जहाजों को नष्ट कर दिया है। सऊदी अधिकारियों का कहना था कि वे जहाज अमरीका को ले जाने के लिए सऊदी तेल उठाने वाले थे। दूसरे देशों के खि़लाफ़ भड़काऊ हरकतें करना और फिर उन्हें ही हमलावर बताना, यह अमरीका की पुरानी चाल है। इसलिए यह संभव है कि अमरीका और उसके मित्र देशों ने खुद ही तेल वाहक जहाजों को नष्ट किया और फिर ईरान व उसके मित्रों पर इसका आरोप लगाया। इसका उद्देश्य है ईरान के खि़लाफ़ जंग को जायज़ ठहराना। बीते महीने के दौरान, अमरीका फारस की खाड़ी, लाल सागर और कतर में भारी मात्रा में मिसाइल बैटरी, युद्ध पोत, वायुयान वाहक जहाज, बी-52 बॉम्बर, आदि भेजता रहा है।

ईरान की सरकार ने अमरीका द्वारा सैनिक घेराबंदी और अपनी संप्रभुता व उस क्षेत्र में शांति को खतरे की कड़ी निंदा की है। ईरान की सरकार ने साफ-साफ कह दिया है कि तेल वाहक जहाजों के विनाश में उसका कोई हाथ नहीं था। ईरान ने अमरीका को और मध्य पूर्व इलाके में अमरीका के मित्रों सऊदी अरब व इस्राइल को इन भड़काऊ हरकतों के लिए दोषी बताया है। अमरीका की धमकियों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए, ईरान ने ऐलान किया है कि वह शांति बनाए रखने पर प्रतिबद्ध है। उसने दुनिया को यह सन्देश दिया है कि “ईरान जंग नहीं चाहता है परन्तु जंग से डरता भी नहीं है”।

1979 में ईरान में क्रांति हुयी थी, जिसमें अमरीका समर्थित शाह की अत्याचारी हुकूमत का तख्तापलट किया गया था। उस समय से लेकर आज तक, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने उस इलाके में अपने खोये हुए आस्थान को वापस हासिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसमें उनका एक मुख्य लक्ष्य है ईरान के व्यापक तेल और गैस संसाधनों पर नियंत्रण पाना। विदेशी साम्राज्यवादी दखलंदाजी से मुक्त, अपने आर्थिक और राजनीतिक रास्ते को तय करने के ईरान के संप्रभु अधिकार का हनन करने के लिए अमरीका ने हर तरह के कदम उठाये हैं। अमरीका ईरान में शासन परिवर्तन करने के इरादे से, पश्चिम एशिया में कई राज्यों का सैनिक गठबंधन बना रहा है। उसने अपने मित्रों, इस्राइल और सऊदी अरब को ईरान पर हमले करने और भड़काऊ हरकतें करने के लिए, हथियार और प्रश्रय दे रखा है। हाल में ईरान पर किये जा रहे बढ़-चढ़कर हमले और भड़काऊ हरकतें इसी सिलसिले के अगले कदम हैं।

ईरान पर अपने हमलों को जायज़ ठहराने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवादी और उनके मित्र हमेशा यह झूठा प्रचार करते रहते हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम “विश्व शांति को ख़तरा है”, जिस तरह उन्होंने इराक पर अपने हमले को जायज़ ठहराने के लिए यह झूठा प्रचार किया था कि इराक के पास “जन संहार के हथियार हैं”।

अमरीका पश्चिम एशिया में अपने प्रमुख मित्रों, इस्राइल और सऊदी अरब के सहारे, भड़काऊ हरकतें आयोजित करता रहता है और फिर निशाना बनाए गए देशों को ही इनके लिए दोषी ठहराता है। ऐसा करके अमरीका उस इलाके में अपनी सैनिक घेराबंदी को जायज़ ठहराने की कोशिश करता है। अमरीका दूसरे देशों के बारे में झूठा प्रचार फैलाकर, उन पर हमलावर और कब्ज़ाकारी जंग और उन देशों में शासन परिवर्तन को जायज़ ठहराता है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद का लम्बा और घिनावना इतिहास है।

ईरान पर अमरीका का जंग सिर्फ आर्थिक और सैनिक ही नहीं है। ईरान पर साइबर हमले भी किये गए हैं। उनके वैज्ञानिकों की हत्या की गयी है, उनके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम का विनाश किया गया है। ईरान के भूतपूर्व परमाणु कार्यक्रम और वर्तमान के ‘आतंकवादी संबंधों’ के बारे में झूठा प्रचार फैलाया गया है। ईरान पर अमरीका ने सब-तरफा घेराबंदी लगा रखी है।

ईरान ने बार-बार ऐलान किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण कार्यों के लिए ही है। अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने भी इस बात की पुष्टि की है। सच तो यह है कि परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा भण्डार अमरीकी साम्राज्यवादियों के हाथों में है। इस्राइल राज्य, जिसने फिलिस्तीनी लोगों को अपनी मातृभूमि से निकाल दिया है और उन पर भयानक अत्याचार करता रहता है, उसे भी अमरीकी साम्राज्यवादियों ने परमाणु हथियारों से लैस कर रखा है।

ईरान की सरकार अमरीका और उसके मित्रों के दबावों का डटकर मुकाबला कर रही है। 8 मई, 2019 को अमरीकी साम्राज्यवादियों की बढ़ती धमकियों से अपने हितों की रक्षा करते हुए, ईरान ने जे.सी.पी.ओ.ए. के अन्य सांझेदार देशों - फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, चीन और रूस - को यह घोषणा कर दी कि अगर वे ईरान के तेल के निर्यात और वित्त बाज़ारों के साथ ईरान के कारोबारों की इजाज़त हासिल करने के क़दम नहीं लेते, तो ईरान अगले 60 दिनों के अन्दर ज्यादा उच्च श्रेणी के यूरेनियम के परिष्करण का काम शुरू कर देगा। ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के वक्ता ने साफ-साफ कहा है कि “जब तक उनके देश के प्रति अमरीका का बर्ताव नहीं बदलेगा और उनके देश के अधिकारों का आदर नहीं किया जायेगा”, तब तक उनका देश अमरीका के साथ कोई बातचीत नहीं करेगा।

अमरीकी साम्राज्यवादियों व उनके मित्रों की धमकियों और दबावों के प्रति ईरान का सख्त विरोध पश्चिम एशिया के दूसरे देशों के लोगों के लिए प्रोत्साहन का स्रोत है। उन देशों के लोग अपनी-अपनी साम्राज्यवाद-समर्थित सत्ताओं के दमनकारी शासन से मुक्त होना चाहते हैं। उनकी सत्ताएं ईरान को नष्ट करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादियों का पूरा-पूरा समर्थन कर रही हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी और ये प्रतिक्रियावादी सत्ताएं अपने देशों के साम्राज्यवाद-विरोधी लोगों पर “ईरान के एजेंट” का झूठा आरोप लगाते हैं।

ईरान को पूरा अधिकार है कि अमरीकी हमलों के खि़लाफ़ अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और हितों की रक्षा करे। ईरान के खि़लाफ़ अमरीका की भड़काऊ हरकतें पूरी तरह नाजायज़ हैं। अपनी आज़ादी के लिए, साम्राज्यवादी हुक्मशाही से मुक्त होकर अपना आर्थिक और राजनीतिक रास्ता तय करने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे दुनिया के सभी देशों और लोगों को ईरान के खि़लाफ़ अमरीकी साम्राज्यवादियों की इन नाजायज़ हरकतों का जमकर विरोध करना चाहिए।

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ईरान    बहादुरी    आर्थिक दबावों    Jun 16-30 2019    World/Geopolitics    Rights     War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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