अमरीका के साथ रणनैतिक गठबंधन : हिन्दोस्तान की संप्रभुता और दक्षिण एशिया में शांति के लिए गंभीर ख़तरा

अमरीकी विदेश सचिव माइक पोम्पेओ ने 25-27 जून को हिन्दोस्तान की यात्रा की। हाल के चुनावों में भाजपा के भारी बहुमत के साथ फिर से सत्ता में वापस आने के बाद, यह अमरीकी प्रशासन के एक सर्वोच्च नेता द्वारा हिन्दोस्तान की पहली यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान, पोम्पेओ ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोवल के साथ बातचीत की। सार्वजनिक तौर पर यह कहा गया कि यात्रा का उद्देश्य था हिन्दोस्तान-अमरीका संबंधों में आयी कुछ समस्याओं को हल करना और हमारे दोनों देशों के बीच रणनैतिक गठबंधन को और मजबूत करना।

पोम्पेओ की यात्रा ऐसे समय पर हुयी जब हिन्दोस्तान-अमरीका संबंधों में कई विवादास्पद मुद्दे पैदा हुए हैं। अमरीका ने हिन्दोस्तान को जनरलायिजड सिस्टम ऑफ प्रैफरेंसेज (जी.एस.पी.) - यानि, व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण देशों की सूची से हटा दिया है, जिसकी वजह से हिन्दोस्तान से अमरीका को निर्यात काफी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हिन्दोस्तान की सरकार ने हाल में अमरीका से निर्यातित कुछ वस्तुओं पर शुल्क घोषित किये हैं, जबकि बीते एक साल से जब अमरीका हिन्दोस्तान से खरीदे गए इस्पात और एल्युमीनियम पर शुल्क लगा रहा था, तब हिन्दोस्तान ने उसके बदले में शुल्क लगाने की धमकी तो दी थी पर ऐसा कुछ नहीं किया था। मई के आरम्भ में, ईरान से तेल खरीदने वाले, हिन्दोस्तान समेत सभी देशों को अमरीका द्वारा लगायी गयी पाबंदियों से जो छूट मिली थी, वह खत्म हो गयी।

बहरहाल, यह खतरा है कि अगर हिन्दोस्तान रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदता है तो अमरीका हिन्दोस्तान पर पाबंदियां लगा सकता है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, अमरीका एच 1बी वीजाओं पर हर देश के लिए कोटा निर्धारित करने जा रहा है। अगर ऐसा किया जाता है तो हर साल इस प्रकार के वीजा का लाभ उठाने वाले हिन्दोस्तानी लोगों की संख्या बहुत घट जायेगी। बताया जा रहा है कि हिन्दोस्तान और अमरीका के विदेश मंत्रालयों ने इन सभी मुद्दों पर बातचीत की है।

पोम्पेओ और जयशंकर, दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि इनमें से किसी भी मुद्दे को दोनों देशों के आपसी रणनैतिक संबंधों के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया जायेगा।

अमरीका की रणनीति पूरे एशिया पर अपना सम्पूर्ण प्रभुत्व जमाना है। इसे हासिल करने के लिए वह ईरान पर आर्थिक शिकंजा कस रहा है और सैनिक हस्तक्षेप के ज़रिये उसकी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहा है, चीन और रूस को घेर कर उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहा है और पूरे एशिया में पड़ोसी देशों को आपस में भिड़ा रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, अमरीका हिन्दोस्तान को अपने साथ रणनैतिक गठबंधन में जोड़ना चाहता है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाकर एशिया में अपने खुद के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करना चाहते हैं।

पोम्पेओ की यात्रा ऐसे समय पर हुयी जब फारस की खाड़ी में तनाव बहुत बढ़ रहा है। अमरीका ईरान के खिलाफ़ युद्ध शुरू करने की धमकी दे रहा है। दिल्ली आने से पहले, पोम्पेओ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमिरात के नेताओं से मिलकर आये। उन देशों की यात्रा के दौरान पोम्पेओ ने घोषणा की कि अमरीका अपनी नेतागिरी में, यूरोपीय और एशियाई ताक़तों का गठबंधन बनाना चाहता है। हिन्दोस्तान की यात्रा के दौरान पोम्पेओ यह झूठ दोहराता रहा कि ईरान आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रश्रयकर्ता है और दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। उन्होंने मांग की कि हिन्दोस्तान ईरान के साथ अपने लम्बे समय से चले आ रहे मित्रतापूर्ण संबंधों को तोड़ दे और उस देश को तबाह करने में अमरीका का साथ दे।

अमरीका की मांग, कि हिन्दोस्तान ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे और ईरान के साथ अपने सारे आर्थिक व्यापारों को रोक दे, इसे हम कभी नहीं मान सकते। यह हिन्दोस्तान और ईरान, दोनों देशों के लोगों के हितों के खिलाफ़ है। ईरान हिन्दोस्तान के लिए तेल का एक प्रमुख स्रोत है। हिन्दोस्तान ईरान के चाबहार में एक बंदरगाह बना रहा है, जो रूस और मध्य एशियाई गणराज्यों तक समुद्री और स्थलीय रास्ते का हिस्सा होगा। 2015 में ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया गया था, उसका अमरीका ने 2018 में एक तरफा खंडन कर दिया था। उसके बाद, अमरीका ने ईरान पर बहुत भारी प्रतिबन्ध लगाये, ताकि ईरान किसी और देश को अपना तेल न बेच सके और उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह नष्ट हो जाए। हिन्दोस्तान तथा कुछ और देशों को अमरीका ने इन प्रतिबंधों से जो छूट दी थी, उन प्रतिबंधों को भी अब हटा दिया गया है। अमरीका के दबाव के सामने झुककर, हिन्दोस्तान ने अब 2 मई से ईरान से तेल खरीदना रोक दिया है।

अमरीका ईरान को इसलिए निशाना बना रहा है क्योंकि वह तेल-समृद्ध पश्चिम एशिया क्षेत्र पर अपना पूरा प्रभुत्व जमाना चाहता है। अमरीका ने पश्चिम एशिया के देशों में आग लगाने, उन्हें आपस में भिड़ाने, उनमें गृह युद्ध भड़काने और उन पर कब्ज़ा करने के लिए जंग चलाने की नीति अपनाई है। पश्चिम एशिया के देशों और लोगों के साथ हिन्दोस्तान के ऐतिहासिक परंपरागत सम्बन्ध हैं। पश्चिम एशिया में 80 लाख हिन्दोस्तानी लोग काम करते हैं। हिन्दोस्तान के तेल के आयातों का बहुत बड़ा भाग पश्चिम एशिया से आता है। अमरीकी साम्राज्यवादियों के हितों को बढ़ावा देने के लिए पश्चिम एशिया में अगर युद्ध होता है, तो हमारे लोगों के लिए इसका भयानक अंजाम होगा। पश्चिम एशिया में अमरीका की रणनीति हिन्दोस्तान के राष्ट्रीय हितों के बिलकुल खिलाफ है।

अमरीका सिर्फ ईरान पर ही नहीं बल्कि रूस और वेनेजुएला पर भी प्रतिबन्ध लगा रहा है। इसका एक कारण यह है कि अमरीका तेल का आयात करने वाले यूरोप और एशिया के देशों को अमरीका से तेल खरीदने को मजबूर करना चाहता है। इस समय अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। लेकिन तेल का आयत करने वाले यूरोप और एशिया के प्रमुख देश - जर्मनी, हिन्दोस्तान, जापान, चीन, आदि - अलग-अलग तेल के स्रोतों से खरीदना चाहते हैं। वे तेल के लिए सिर्फ अमरीका पर निर्भर नहीं होना चाहते हैं। ईरान, रूस और वेनेजुएला पर प्रतिबन्ध लगाकर, अमरीका दुनिया के ऊर्जा बाजार पर नियंत्रण करना चाहता है। यह न तो हिन्दोस्तान के हित में है, न ही दूसरे तेल का आयात करने वाले देशों के हित में। बीते वर्ष के दौरान, हिन्दोस्तान ने अमरीका से अपनी तेल की खरीदारी को खूब बढ़ा दिया है। इसके साथ-साथ, हिन्दोस्तान ने ईरान से तेल का आयात घटा दिया है, जब कि ईरान से खरीदा जा रहा तेल बेहतर गुणवत्ता का है, उसका दाम कम है और उसका दाम रुपयों में चुकाया जा सकता है। अब हिन्दोस्तान संभवतः अमरीका से शेल तेल के खरीदी को बढ़ा देगा।

हिन्दोस्तान दुनिया में हथियारों की सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाले देशों में एक है। अमरीका हिन्दोस्तान को हथियार बेचने वालों में प्रमुख है। लेकिन हिन्दोस्तान रूस, फ्रांस, इस्राइल जैसे देशों से भी हथियार खरीदता है। अमरीका हिन्दोस्तान के हथियार बाजार पर पूरी तरह हावी होना चाहता है। इसमें उसका इरादा सिर्फ अमरीकी हथियार उद्योग के लिए अधिकतम मुनाफा कमाना ही नहीं है, बल्कि अमरीकी सेना के साथ हिन्दोस्तान की सेना को पूरी तरह बाँध देना। बीते पांच वर्षों में हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच जो सैनिक संधियां की गयी हैं, जिनके अंतर्गत अमरीकी युद्ध पोतों को हिन्दोस्तान के नौसैनिक अड्डों पर ईंधन लेने, आदि की सुविधाएं उपलब्ध हैं और दोनों देशों की सेनाओं का एक सांझा सिग्नलिंग सिस्टम होने जा रहा है, ये सब इसी दिशा में कदम हैं।

अमरीका यह मांग कर रहा है कि हिन्दोस्तान रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम को खरीदना बंद कर दे। अमरीका हिन्दोस्तान को रूस से अलग करना चाहता है। ख़बरों के अनुसार यह जाना जाता है कि हिन्दोस्तान की सरकार रूस पर अमरीकी प्रतिबंध कानून से बचने का कोई रास्ता तलाश रही है। अमरीका के साथ सौदा करने में हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों का यही स्वाभाविक चरित्र रहा है।

यह भी सूचना मिली है कि अमरीका हिन्दोस्तान पर दबाव डाल रहा है कि चीनी टेलिकॉम कंपनी हुआवे और उसके 5-जी नेटवर्क पर रोक लगायी जाये। अगर हिन्दोस्तान इससे सहमत हो जाता है तो हिन्दोस्तानी टेलिकॉम कंपनियों को भारी नुकसान होगा।

पोम्पेओ की यात्रा के अंत में की गई सार्वजनिक घोषणा के अनुसार, अमरीका और हिन्दोस्तान के बीच में दो विषयों पर सहमति थी। एक विषय था “सीमा पार आतंकवाद” का, जिसे पोम्पेओ ने जयशंकर और दोवल के साथ बातचीत में उठाया। विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में बड़े गर्व के साथ यह घोषणा की कि दोनों देश “सीमा पार आतंकवाद” को बिल्कुल न बर्दाश्त करने पर सहमत हैं। इसका यह मतलब है कि अमरीका ने हिन्दोस्तान को, “सीमा पार आतंकवाद” से लड़ने के बहाने, पाकिस्तान पर हमला करने की हरी झंडी दिखा दी है। याद रखा जाये कि इसी वर्ष फरवरी में पुलवामा में हुये आतंकवादी हमले के ठीक बाद, अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन ने हिन्दोस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोवल को सबके सामने कहा था कि हिन्दोस्तान को “आत्म रक्षा का अधिकार” है। यह हिन्दोस्तानी वायुसेना को संदेश था कि पाकिस्तान में बालाकोट पर अब बम गिराया जा सकता है।

“सीमा पार आतंकवाद” को “न बर्दाश्त करने” पर दिये गये ये बयान अमरीका की तरफ से संदेश हैं कि अगर हिन्दोस्तान ईरान के खिलाफ़ जंग में अमरीका का साथ देगा तो अमरीका पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में हिन्दोस्तान का समर्थन करेगा।

हिन्दोस्तान के सरमायदार अच्छी तरह जानते हैं कि अमरीका दुनियाभर में आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रश्रयकर्ता है। अमरीका ने दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिये, पाकिस्तान और अन्य देशों में कई आतंकवादी गिरोहों को स्थापित किया, हथियार और प्रशिक्षण दिये हैं। हिन्दोस्तानी सरमायदार अच्छी तरह जानते हैं कि हिन्दोस्तान में हुये अनेक आतंकवादी हमलों के पीछे अमरीका का हाथ है। परन्तु इसके बावजूद, हिन्दोस्तान के सरमायदार पाकिस्तान को कमजोर और नष्ट करने के लिये अमरीका का सहयोग मांग रहे हैं। यह हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के लोगों के हितों के खिलाफ़ तथा इस इलाके में शांति के ख़िलाफ़ है।

अमरीका और हिन्दोस्तान के बीच सहमति का एक और विषय था चीन को रोकने का विषय। पोम्पेओ ने कहा कि चीन का बेल्ट एंड रोड़ इनिशियेटिव कई देशों की संप्रभुता के लिये ख़तरा है। सभी जानते हैं कि अमरीका दूसरे देशों की संप्रभुता का खुलेआम हनने करने के लिये हमेशा ही अपनी सैनिक और आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करता रहा है। तो जब अमरीकी विदेश सचिव के मुंह से चीन द्वारा दूसरे देशों की संप्रभुता के हनन की बात आती है, तो यह साफ-साफ चीन की बढ़ती ताकत और प्रभाव के साथ अमरीका की गलाकाट स्पर्धा को ही दर्शाता है।

अमरीका हिन्दोस्तान को अपनी रणनैतिक जकड़ में और कसके बांधने के लिये, हिन्दोस्तानी सरमायदारों के साम्राज्यवादी मंसूबों को उकसा रहा है और इस बात का फायदा उठा रहा है कि अमरीका व्यापार में हिन्दोस्तान का सबसे बड़ा सांझेदार है तथा हिन्दोस्तान में पूंजीनिवेश के सबसे बड़े स्रोतों में एक है। हिन्दोस्तानी सरमायदार अपने अधिकतम मुनाफों के इस स्रोत्र को खोना नहीं चाहते हैं। साथ ही साथ, अमरीका ने हिन्दोस्तान के अंदर, राज्य में तथा शासक वर्ग में काफी गहराई तक अपने पांव जमा रखे हैं। अमरीका ने बीते दिनों में, अपने बताये हुये रास्ते पर हिन्दोस्तानी सरमायदारों को चलने को मजबूर करने के लिये, अराजकता और हिंसा फैलाकर देश में अस्थाई हालतें बनाने की धमकी का प्रयोग किया है। आने वाले दिनों में अमरीका फिर ऐसा कर सकता है।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग अमरीका के साथ-साथ, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, ईरान, इस्राइल, साऊदी अरब, आदि जैसी अलग-अलग ताकतों के साथ मिलकर काम करके, अपने साम्राज्यवादी हितों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। परन्तु अमरीका यह मांग कर रहा है कि एशिया पर अपना वर्चस्व जमाने की अमरीकी रणनीति के साथ हिन्दोस्तान के सरमायदार कदम से कदम मिलाकर चलें।

जबसे सोवियत संघ का विघटन और पतन हुआ, तबसे हिन्दोस्तानी सरमायदार क्रमशः अमरीका के साथ अपना रणनैतिक गठबंधन मजबूत करते रहे हैं। अमरीका के साथ यह बढ़ता रणनैतिक गठबंधन हमारे देश की संप्रभुता के लिये और इस इलाके में शांति के लिये बहुत बड़ा खतरा है। हिन्दोस्तानी सरमायदार यह दर्शा रहे हैं कि वे अपने मुनाफों के खातिर, देश की संप्रभुता को दांव पर लगाने और शांति को खतरे में डालने को तैयार हैं।

Tag:   

Share Everywhere

रणनैतिक गठबंधन    संप्रभुता    दक्षिण एशिया    शांति    Jul 1-15 2019    World/Geopolitics    Rights     War & Peace     2019   

पार्टी के दस्तावेज

thumb

 

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)