दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों का संघर्ष

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक, विश्वविद्यालय के तमाम कॉलेजों में सभी अस्थायी शिक्षकों की पुनः नियुक्ति को, 20 जुलाई, 2019 को नए शिक्षा सत्र के शुरू होने से पहले पूरा करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

15 जुलाई को उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में और 16 जुलाई को यू.जी.सी. के मुख्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। 

दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के बैनर तले शिक्षकों ने अपनी मांगें उठाते हुए उप-कुलपति, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यू.जी.सी. और दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री को कई बार ज्ञापन दिया है। इसके अलावा वे अपनी मांगों के समर्थन में सभी शिक्षकों को लामबंध करने के लिए लगातार अभियान चलाते आये हैं। उन्होंने यू.जी.सी. के दफ्तर, उप-कुलपति के दफ्तर, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, संसद के बाहर जंतर-मंतर पर और दिल्ली सरकार के दफ्तरों के बाहर भी कई बार धरना-प्रदर्शन आयोजित किये हैं। 

dutafile protest

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को 11 जुलाई को लिखे एक पत्र में डूटा ने यह मांग रखी है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि 20 जुलाई, 2019 को नए शिक्षा सत्र के शुरू होने से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों में काम कर रहे अस्थायी शिक्षकों की पुनः नियुक्ति की जाये। पत्र में उन्होंने बताया कि विश्वविद्यायल प्रशासन ने पिछले 2 वर्षों से अधिक समय से एक भी स्थायी शिक्षक की नियुक्ति नहीं की है। पिछले कई वर्षों से अस्थायी शिक्षक ही शिक्षा संबंधी और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संभालते आ रहे हैं। हर वर्ष अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को समाप्त किया जाता है और अगले वर्ष उनकी नियुक्ति होगी या नहीं इस बारे में अनिश्चितता बनी रहती है, जो कि उनके सर पर एक तलवार की तरह लटकती रहती है और यह उनकी आजीविका के लिए एक बड़ा ख़तरा है।

जुलाई 2017 में, जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्थायी नियुक्तियां करने का आश्वासन दिया था उस समय से दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन ने इस दिशा में कोई भी कार्यवाही नहीं की है। अस्थायी शिक्षकों के साथ हो रही इस नाइंसाफी के लिए डूटा ने केंद्र सरकार, यू.जी.सी. और विश्वविद्यालय प्रशासन को ज़िम्मेदार बताया है। डूटा ने यह स्पष्ट किया है कि इन शिक्षकों ने स्थायी शिक्षक के पद पर नियुक्त किये जाने की सभी शर्तों को पूरा किया है और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के अनुसार कई वर्षों से नियमित तौर से पढ़ाते आ रहे हैं।

डूटा ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि शिक्षकों के लिए आजीविका की सुरक्षा प्रदान करना बेहद महत्वपूर्ण है, ताकि वे विश्वविद्यायल के उच्चतम शिक्षा मानदंडों को बरकरार रख सकें। उन्होंने मांग की है कि अस्थायी शिक्षकों की आजीविका की असुरक्षा को ख़त्म किया जाये और तुरंत स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की जाये। इसके अलावा डूटा यह भी मांग कर रही है कि तमाम कॉलेजों में विद्यार्थियों की बढ़ाई गई तादाद और शुरू किये गये नए पाठ्यक्रमों के मद्देनज़र अतिरिक्त शिक्षकों के पद बनाए जाने चाहिएं और उनपर स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए। उन्होंने यू.जी.सी. से यह भी मांग की है कि अतिरिक्त शिक्षकों और गैर-शिक्षक स्टाफ और नए पाठ्यक्रमों के लिए अतिरिक्त शिक्षा निधि का इंतज़ाम किया जाना चाहिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के अस्थायी शिक्षकों की दयनीय हालत

दिल्ली विश्वविद्यालय, जो कि देश के सबसे ऊंचे स्तर के विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है और देशभर के विद्यार्थी यहां पढ़ने की चाह रखते हैं, यह विश्वविद्यायल पिछले दो दशकों से शिक्षकों को अस्थायी आधार पर नियुक्त करता आया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के 80 से अधिक कॉलेजों में से 34 कॉलेजों से इकट्ठा की गयी जानकारी से पता चलता है कि इन कॉलेजों में 57.35 प्रतिशत स्थायी शिक्षक हैं और 42.64 प्रतिशत शिक्षक अस्थायी आधार पर काम कर रहे हैं। यह यू.जी.सी. के कानून का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है जिसके मुताबिक किसी भी कॉलेज में कुल शिक्षकों की संख्या में अस्थायी शिक्षकों का अनुपात 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के मौजूदा नियमों के अनुसार किसी भी अस्थायी शिक्षक की नियुक्ति 120 दिनों के लिए की जाती है। जब उनके अनुबंध की अवधि समाप्त हो जाती है तो उनको एक दिन का अवकाश देकर फिर से नियुक्त किया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कोई स्थायी शिक्षक नियुक्त नहीं किया जाता। उन 120 दिनों के भीतर भी कालेज प्रबंधन की मनमर्जी के अनुसार, उस अस्थायी-शिक्षक की जगह पर किसी और शिक्षक को नियुक्त किया जा सकता है।

शिक्षकों को अस्थायी आधार पर रखना ठेका मज़दूरी प्रथा का सबसे खुल्लम-खुल्ला और शर्मनाक उदाहरण है।

जबकि स्थायी और अस्थायी शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता एक बराबर होती है और अस्थाई शिक्षक अक्सर अधिक कार्यभार भी उठाते हैं, इसके बावजूद उनको बहुत ही कम वेतन दिया जाता है। उनको शिक्षा स्तर में उन्नति होने पर वेतन में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य सुविधा, एल.टी.सी., इत्यादि कोई भी सुविधा नहीं दी जाती, जो कि एक स्थायी शिक्षक को मिलती है। इसके अलावा यदि कोई अस्थायी शिक्षक किसी आपात-कारणवश लंबा अवकाश लेता है तो उसे अपनी नौकरी खोने का ख़तरा रहता है। अस्थायी महिला शिक्षकों को प्रसूति अवकाश नहीं दिया जाता है। एक अस्थायी शिक्षिका को प्रसूति के बाद महज 3-4 दिनों के भीतर नौकरी पर वापस जाना पड़ता है, वर्ना उसकी नौकरी जाने का ख़तरा रहता है।

अधिकांश कॉलेजों में अस्थायी शिक्षकों को तमाम तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्थायी शिक्षकों की तुलना में अधिक कार्यभार दिया जाता है। यू.जी.सी. द्वारा चलाये जा रहे किसी भी करियर एडवांसमेंट कोर्स में हिस्सा लेने की उनको अनुमति नहीं दी जाती है। अधिकांश अस्थायी शिक्षकों को उन विषयों पर क्लास नहीं लेने दी जाती जिस विषय में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है। परीक्षा के दौरान अस्थाई शिक्षकों को अक्सर अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी जाती है।

अस्थायी शिक्षकों को अपनी मांगों के लिए संगठित होने, किसी शिक्षक संघ या एसोसिएशन का सदस्य बनने, किसी संघर्ष, धरना, प्रदर्शन में हिस्सा लेने, इत्यादि की इजाजत नहीं है। यदि वे ऐसा करते हैं तो वे निश्चित तौर पर अपनी नौकरी से हाथ धो बैठेंगे। अस्थायी शिक्षक सबसे कम वेतन पाते हैं, सबसे अधिक काम करने के लिए बाध्य हैं और भेदभाव के शिकार हैं, सभी मूल अधिकारों से वंचित हैं। उनके साथ किसी दास की तरह बर्ताव किया जाता है!

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई अस्थायी शिक्षक पिछले 10-15 वर्षों से वेतन में किसी भी बढ़ोतरी के बगैर काम कर रहे हैं। कई अस्थायी शिक्षक बिना किसी पेंशन या प्रोविडेंट फण्ड की सुविधा के ही सेवानिवृत हो चुके हैं।

अपनी शैक्षणिक योग्यता और लंबी सेवा के आधार पर ये अस्थायी शिक्षक मांग कर रहे हैं कि उनको उसी कॉलेज में स्थायी नौकरी दी जाये जहां वे इतने वर्षों से पढ़ाते आये हैं।

अपनी इस दयनीय हालत और उनके साथ हो रही नाइंसाफी को उजागर करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के अस्थायी शिक्षक 4-13 जनवरी 2019 को भूख-हड़ताल पर बैठने पर मजबूर हो गए थे। डूटा ने अस्थायी शिक्षकों की मांगों का समर्थन किया और 17-18 जनवरी 2019 को दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों को बंद रखने का आह्वान किया था।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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