बी.एस.एन.एल. और एम.टी.एन.एल. के कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन

ख़बरों के अनुसार, राजकीय दूरसंचार कंपनियां, भारत संचार निगम लिमिटेड (बी.एस.एन.एल.) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एम.टी.एन.एल.), अपने 1.9 लाख कर्मचारियों को पिछले 6 महीने में दूसरी बार मासिक वेतन समय पर देने में विफल रही हैं। 5 अगस्त तक जुलाई महीने का वेतन नहीं दिया गया था और वेतन कब मिलेगा इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गयी है। इस वर्ष फरवरी में भी इसी तरह से वेतन देने में देरी हुई थी, कर्मचारियों को मार्च के मध्य में बकाया वेतन दिया गया, जिससे कर्मचारियों को अपनी वित्तीय ज़िम्मेदारी को पूरा करने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा। एम.टी.एन.एल. के 22,000 कर्मचारियों को पिछले 2 महीने से वेतन नहीं दिया गया है और जिसके विरोध में उन्होंने 5 अगस्त को संचार भवन के सामने धरना प्रदर्शन आयोजित किया था। इन दोनों टेलिकॉम कंपनियों के अधिकारियों ने माना है कि ये कंपनियां पर्याप्त आय नहीं कमा पा रही हैं और इस संकट से निकलने के लिए सरकार ने अभी तक कोई भी राहत पैकेज नहीं दिया है।

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वेतन के भुगतान में देरी के अलावा, बी.एस.एन.एल के कर्मचारी अपने वेतन में संशोधन को लेकर 2017 से संघर्ष कर रहे हैं। ठेका मज़दूरों पर इसका सबसे बुरा असर हुआ है।

अगस्त की शुरुआत में बी.एस.एन.एल. सिलिगुड़ी के ठेका मज़दूरों ने बी.एस.एन.एल. के अधिकारियों को कार्यालय में जाने से रोका क्योंकि पिछले 7 महीने से उनके वेतन का भुगतान नहीं किया गया था। इनमें से करीब-करीब सारे ठेका मज़दूर बी.एस.एन.एल. के साथ कम से कम 15 वर्षों से काम कर रहे हैं।

2 जुलाई को बी.एस.एन.एल. तमिलनाडु के ठेका मज़दूरों ने 2 दिन की हड़ताल आयोजित की और पिछले 6 महीने के वेतन का भुगतान करने की मांग की। बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों ने सभी जिलों में बी.एस.एन.एल. भवन के सामने हड़ताल प्रदर्शन आयोजित किये। ठेका मज़दूर अपनी नौकरी को बचाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि अख़बारों में ऐसी ख़बर है कि बी.एस.एन.एल. ठेका मज़दूरों की संख्या को 25-40 प्रतिशत कम करने की योजना बना रहा है।

मीडिया में ख़बरें आ रही हैं कि सरकार इन दोनों ही कंपनियों को बंद करने की योजना बना रही है। इससे इन कंपनियों में काम कर रहे लाखों मज़दूरों के सामने एक अनिश्चित भविष्य है। 18-20 फरवरी को देशभर के बी.एस.एन.एल. मज़दूरों ने हड़ताल करते हुए अपनी लंबित मांगों को सरकार के सामने रखा था। इन मांगों में शामिल हैं - इस सार्वजनिक कंपनी की वित्तीय समस्याओं का सकारात्मक रूप से समाधान करना, बी.एस.एन.एल. को 4जी स्पेक्ट्रम आवंटित करना, वेतन संशोधन समिति की सिफारिशों के अनुसार वेतन का भुगतान करना और सरकारी नियमों के अनुसार पेंशन देना। इस हड़ताल का देश की सभी ट्रेड यूनियनों ने समर्थन किया था और इससे पहले दिसम्बर 2017 में आयोजित हड़ताल का भी समर्थन किया था।

इन दूरसंचार कंपनियों के मज़दूरों ने बताया कि चाहे संप्रग सरकार हो या राजग सरकार, दोनों ही सरकारें टेलिकॉम स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन के मामले में भारती की एयरटेल, अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशन, एयरसेल, आईडिया, वोडाफ़ोन, टाटा टेलीसर्विसेज और एस-टेल जैसी निजी टेलिकॉम कंपनियों की तरफदारी करने की नीति अपनाती रही है, जिससे बी.एस.एन.एल. और एम.टी.एन.एल. को भारी नुकसान हुआ है। जब कभी मज़दूर यूनियनों ने सरकार से कोई कार्यवाही करने की अपील की है तो सरकार आश्वासन देती रही है कि टेलिकॉम विभाग इन कंपनियों को पुनर्जीवित करने के लिए राहत पैकेज तैयार कर रहा है। लेकिन तमाम सरकारों द्वारा अब तक की गयी कार्यवाही से यह साफ़ नज़र आता है कि सरकार इन सार्वजनिक कंपनियों को बंद करने पर तुली हुई है, जिससे लाखों मज़दूर अपना रोज़गार खो बैठेंगे।

दूरसंचार सेवाओं के निजीकरण के इस पूरे दौर में सरकार ने जानबूझकर इस तरह की नीतियां अपनाई हैं जिनके चलते निजी कंपनियों को महानगरों और दूसरे शहरों के सबसे मुनाफ़ेदार क्षेत्रों पर अपना कब्ज़ा जमाने की छूट दी गयी और बी.एस.एन.एल. को ठीक इन्हीं क्षत्रों में कमज़ोर किया गया। देश के देहातों, पहाड़ी और दूर-दराज के इलाकों में केवल बी.एस.एन.एल. की सेवाएं ही काम करती हैं, जबकि बड़े शहरों में बी.एस.एन.एल. की सेवाओं को सबसे कम स्तर पर रखा जाता है ताकि निजी कंपनियों को फायदा हो सके। इसके साथ ही, सरकार ने निजी कंपनियों को बी.एस.एन.एल. के नेटवर्क का इस्तेमाल करने की पूरी छूट दे रखी है और इसके लिए निजी कंपनियों से कोई पैसा भी नहीं वसूल किया जाता है।

वर्ष 2000 में अपनी स्थापना से वर्ष 2009 तक बी.एस.एन.एल. हर वर्ष 10,000 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमा रही थी। 2009 से कंपनी घाटे में चलने लगी, जब से उसके द्वारा जारी किये गए टेंडर को निरस्त किया गया और 2010-2015 के बीच उसे 4जी स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस नहीं दिया गया। जबकि निजी कंपनियां वर्ष 2019 के दूसरे हिस्से में 5जी सेवाएं शुरू करने जा रही हैं तो बी.एस.एन.एल. को अभी तक 4जी स्पेक्ट्रम भी नहीं दिया गया है। ऐसी ख़बर है कि नीति आयोग ने बी.एस.एन.एल. को घाटे में चलने वाली सार्वजनिक कंपनियों की सूची में शामिल कर लिया है, जिनको विनिवेश के लिए खोला जायेगा।

वर्ष 2011 से ही बी.एस.एन.एल. के मज़दूर इस बात का विरोध करते आ रहे हैं कि एक के बाद एक, सारी सरकारें निजी कंपनियों को दूरसंचार क्षेत्र में लाने के लिये फायदा पहुंचाने और बी.एस.एन.एल. को घाटे में डालकर उसका निजीकरण करने की नीति अपनाती आई हैं। उस समय भी बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों ने बताया था कि 2जी घोटाले ने इस बात की पुष्टि की है कि किस तरह से निजी इजारेदार कंपनियां अपने खुदगर्ज़ हितों के लिए सरकार की दूरसंचार नीति को अपने फायदे की दिशा में मोड़ रही हैं। उन्होंने इस बात को भी उजागर किया कि किस तरह से सरकार मुनाफ़े पर चल रही सार्वजनिक कंपनियों को घाटे में डालने के षड्यंत्रों में माहिर हो गई है। ऐसा करके सरकार इन कंपनियों के निजीकरण को जायज़ ठहराती है।

भारतीय रेल का उदाहरण भी यह दिखाता है कि किस तरह से सरकार भारतीय रेल के निजीकरण की दिशा में निर्णायक क़दम बढ़ाते हुए कुछ हिस्सों को अलग कर रही है, कुछ कार्यों की आउटसोर्सिंग कर रही है और कुछ अन्य कार्यों का निगमीकरण कर रही है और साथ ही दावा कर रही है कि भारतीय रेल का निजीकरण नहीं किया जायेगा। सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों के मामले में तमाम सरकारों ने इन कंपनियों के आय के स्रोतों को जानबूझकर सीमित कर दिया है, निजी कंपनियों द्वारा मुनाफ़े बनाने के सारे द्वार खोल दिए हैं, सार्वजनिक कंपनियों को “घाटे में चलने वाली” घोषित कर दिया है और उनको “पुनर्जीवित करने के लिए राहत पैकेज” देने में कोई रुचि भी नहीं दिखाई है। यह सब कुछ इन सार्वजनिक कंपनियों को बंद करने के इरादे से किया जा रहा है।

बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों का संघर्ष पूरी तरह से जायज़ है। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी बी.एस.एन.एल. के संघर्षरत मज़दूरों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ी है और अपनी एकजुटता प्रकट करती है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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