ऑटो उद्योग में अति-उत्पादन का गहरा संकट

पिछले कुछ महीनों से मारुती, अशोक लेलैंड, हीरो, हौंडा, हुंडई, बजाज और अन्य बड़ी कार और दो-पहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों में तैयार दो-पहिया वाहन और कारों की बिक्री कम हो गयी है और बहुत सारा तैयार माल गोदामों में पडा हुआ है। वर्ष 2018-19 में वाहनों की बिक्री धीमी हो गयी थी। अब वर्ष 2019-20 में इनकी बिक्री में प्रत्यक्ष गिरावट आनी शुरू हो गयी है।

Unsold cars piled up

सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरस (एस.आई.ए.एम.) के अनुसार 2018-19 में पैसेंजर वाहनों की बिक्री केवल 3 प्रतिशत से बढ़ी थी, जो कि पिछले एक दशक में सबसे धीमी बढ़ोतरी थी। अगस्त 2019 के आते-आते यह दर शून्य से भी कम हो गयी। अगस्त 2019 में पैसेंजर वाहनों की बिक्री अगस्त 2018 के मुकाबले 41 प्रतिशत कम हुई, जबकि दो-पहिया वाहनों की बिक्री 22 प्रतिशत कम हुई।

घटती बिक्री को देखते हुए ऑटो कंपनियों के पूंजीपति मालिकों ने उत्पादन में कटौती करनी शुरू कर दी है। उन्होंने लाखों कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों और अस्थायी मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया है।

वैसे तो हिन्दोस्तान में केवल कुछ दर्ज़न बड़ी ऑटो कंपनियां कार, दो-पहिया और तीन-पहिया वाहनों की असेंबली करती हैं, लेकिन इन वाहनों में लगाने वाले सैकड़ों कलपुर्जों (ऑटो कंपोनेंट्स) का उत्पादन और उनकी आपूर्ति हजारों अन्य फैक्ट्रियों द्वारा की जाती है। इन फैक्ट्रियों में कई मध्यम और छोटे उद्योग शामिल है। ऑटो कलपुर्जों का उत्पादन करने वाली इन कंपनियों में ऑटोमोबाइल कंपनियों के मुकाबले कई गुना अधिक मज़दूर काम करते हैं। ऑटोमोबाइल कंपनियों द्वारा उत्पादन में कटौती की वजह से ऑटो कलपुर्जों की मांग पर भी असर हुआ है। इसकी वजह से ऑटो कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों में भी उत्पादन में कटौती, तालाबंदी और बड़े पैमाने पर नौकरियां कम हुई है।

ऐसा अनुमान है कि ऑटो उद्योग में करीब 3 लाख नौकरियां नष्ट हुयी हैं, लेकिन ऑटो कलपुर्जों के उद्योग में इसके दुगने से भी अधिक नौकरियां नष्ट होने का अनुमान है। ऐसा अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों और ऑटो कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों को मिलाकर कुल 10 लाख से भी अधिक नौकरियां जा सकती हैं।

गुडगाँव और मानेसर औद्योगिक क्षेत्र देश के सबसे बड़े ऑटो उत्पादन केन्द्रों में से है। यहाँ मारुती सुजुकी, हीरो मोटो कोर्प और हौंडा मोटर साइकिल एंड स्कूटर जैसी बड़ी ऑटो कंपनियां स्थित है। इसी क्षेत्र में करीब 1000 मध्यम और छोटी सहायक (एंसीलरी) यूनिट है जो इन बड़ी कंपनियों को कच्चा माल, और ऑटो कलपुर्जे सप्लाई करते है। इन यूनिटों में 20 से 200 मज़दूर काम करते हैं। ऐसा अनुमान है कि इस एक इलाके में 50,000 से 100,000 मज़दूरों की नौकरी जा चुकी है।

ऑटोमोबाइल के छोटे पुर्जों की आपूर्ति करने वाले कई छोटे सप्लायर ने अपनी कंपनी बंद कर दी है और सभी मज़दूरों को निकाल दिया है। हीरो मोटो कोर्प के जनरल सेक्रेटरी राजेश शुक्ला ने बताया कि “ऑटो कलपुर्जे की आपूर्ति करने वाले सप्लायर, ऑटोमोबाइल उद्योग की रीड की हड्डी है, और अर्थव्यवस्था में हो रही मंदी का असर सबसे पहला इनपर और इनको आपूर्ति करने वाले अन्य छोटे सप्लायर पर पड़ता है”।

ऑटो कलपुर्जे और तैयार माल की ढुलाई करने वालों पर भी इसका बहुत बुरा असर हुआ है। मारुती उद्योग कामगार यूनियन के महासचिव कुलदीप जन्घु ने बताया कि “ट्रक-चालक जो इस पूरे उद्योग के लिए कच्चे माल पहुंचाते थे, और तैयार वाहनों को डीलर तक पहुंचाते थे, वह कई महीनों से खाली बैठे हैं, क्योंकि कोई काम ही नहीं है।’’

पुणे तथा चेन्नई के नजदीक श्रीपेरेंबुदुर और ओरगदम जैसे केन्द्रों में जहां अशोक लेलैंड, टी.वी.एस. के अलावा फोर्ड, टोयोटा, फोल्क्सवागन और कई अन्य बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां स्थित हैं, उन केंद्र में भी हालात कुछ अलग नहीं है। इन सभी कंपनियों में काम के दिनों में कटौती की गयी है और कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों को नौकरी से निकला गया है। बड़े पैमाने पर नौकरियां जाने की वजह से ऑटो उद्योग से जुड़े अन्य उद्योग और सेवाएं भी बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, और उनमें भी गिरावट आई है।

इन बड़ी ऑटो कंपनियों में सबसे अधिक शेयर पर नियंत्रण करने वाले इजारेदार पूंजीपतियों ने केन्द्र सरकार से तुरंत कुछ कदम उठाने की मांग की है। वह चाहते हैं कि सरकार उनके मुनाफों की हिफ़ाजत करने के लिए वाहनों की मांग को बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाये। वे चाहते हंै कि वाहनों पर लागू जी.एस.टी. की दर को कम किया जाये ताकि, उनके द्वारा बेची जा रही कार और दो-पहिया वाहनों की बाज़ार में कीमत कुछ कम हो। उनको उम्मीद है कि कीमत कम हो जाने से ज्यादा लोग नए वाहन खरीदेंगे। इस प्रस्ताव का मतलब है, कुछ मुट्ठीभर हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के निजी मुनाफों की हिफाज़त करने के लिए जनता के पैसों का इस्तेमाल किया जाये।

ऑटो क्षेत्र के पूंजीपतियों की ताकत और उनके प्रभाव को देखते हुए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि केन्द्र सरकार ने तुरंत उनकी मांगों को मान लिया है। सरकार द्वारा नए वाहन खरीदने पर लगाई गयी पाबंदी को हटाया गया है, और 31 मार्च 2020 तक ख़रीदे गए वाहनों पर 15 प्रतिशत अतिरिक्त अवमूल्यन की इजाजत दी गयी है। वित्त मंत्रालय ने जी.एस.टी. परिषद् को वाहनों पर लागू जी.एस.टी. दर को कम करने की सिफारिश की है।

केंद्र सरकार ऑटो क्षेत्र में चल रहे संकट को इस तरह से हल करने की कोशिश कर रही है जैसे कि यह संकट केवल इसी क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। लेकिन तथ्य यह दिखाते हैं कि यह समस्या हमारे देश के बहुसंख्य लोगों की आर्थिक स्थिति से जुडी हुई है। जिन कारणों की वजह से नए वाहनों की खरीदी में गिरावट आ रही है, उन्ही कारणों की वजह से एयर कंडीशनर, टी.वी. सेट और फ्रिज जैसी अन्य उपभोग की वस्तुओं की खरीदी में भी गिरावट आ रही है।

कृषि से होने वाली आमदनी में गिरावट और कर्जे में और अधिक डूब जाने की संभावना की वजह से देहातों में परिवार उपभोग की नई वस्तुओं को खरीद नहीं पा रहे है। देश में दो-पहिया वाहनों की बिक्री में ग्रामीण क्षेत्रों की बहुत बड़ी हिस्सेदारी है।

2016 की नोटबंदी और 2017 में जी.एस.टी. के लागू किये जाने से कई किसान और छोटे व्यापारी परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और इसलिए उन्होंने नए वाहन खरीदने के इरादे को स्थगित कर दिया है। 2017 में आई.टी. क्षेत्र में, और 2018 में टेलिकॉम और अन्य क्षेत्रों में नौकरियों ख़त्म होने की वजह से शहरों में बसे कई परिवारों को क्रेडिट पर नयी खरीदी करने से रोका है।

जब बहुत बड़े पैमाने पर मज़दूर नौकरियां खोते हैं, तो इसका असर सभी मज़दूरों द्वारा नई कोई भी खरीदी करने के फैसले पर भी पड़ता है। जो लोग अभी अपनी नौकरियां बचा पाए हैं, वह भी कोई नयी खरीदी करने से डरते हैं, कि कही उनकी भी नौकरी न चली जाये और वह अपनी क़िस्त (ई.एम.आई.) न दे पाए। इस तरह से धीमी गति से बढ़ते वेतन और बढ़ती बेरोज़गारी के साथ भविष्य में होने वाली आमदनी के बारे में असुरक्षा की वजह से उपभोग की वस्तुओं की मांग पर बहुत बुरा असर हुआ है।

इस समस्या का स्रोत यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था इतनी परजीवी बन गयी है कि आर्थिक संवर्धन की वजह से न केवल एक छोर पर संपत्ति जमा होती जाती है, और दूसरे छोर पर गरीबी बढ़ती है बल्कि यह व्यवस्था जितने रोज़गार पैदा करती है, उससे कई गुना अधिक रोज़गार का विनाश करती है।

जब कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में गठबंधन की सरकार थी तब और अब जबकि भा.जा.पा. की सरकार है, दोनों ही दौर में इजारेदार पूंजीपति हमारे लोगों के श्रम और प्राकृतिक संसाधनों का अत्याधिक शोषण करते हुए अधिकतम मुनाफे बनाते रहे हैं। इसके अलावा वह अपनी ज्यादा से ज्यादा पूँजी विदेशों में निर्यात कर रहे हैं। बेरोज़गारी का बढ़ता स्तर, असली आमदनी में गिरावट, और भविष्य के बारे में असुरक्षा के चलते उपभोग की चीजों की मांग में कमी, उत्पादन की वृद्धि के रास्ते में रूकावट बन गयी है।

यह अतिउत्पादन का संकट है, एक ऐसी घटना जो पूंजीवादी व्यवस्था की विशेषता है। जो कुछ उत्पादन किया जाता है, उसे खरीदने की हैसियत बहुसंख्य आबादी के पास नहीं होती।

विशेष तौर से ऑटोमोबाइल क्षेत्र को दिए जाने वाले प्रोत्साहन पैकेज से हो सकता है कि वाहनों की बिक्री में गिरावट को रोका जा सकेगा। लेकिन, इससे मूल समस्या का हल नहीं होगा, जो कि मज़दूरों और किसानों की बढ़ती गरीबी है।

जब तक उत्पादन के साधन चंद मुट्ठीभर लोगों के पास उनकी निजी संपत्ति बनकर रहेंगे, और उत्पादन पूंजीपति के लिए अधिकतम मुनाफे बनाने की दिशा में चलाया जायेगा, तब तक अर्थव्यवस्था इस अति-उत्पादन के संकट से बार-बार गुजरती रहेगी।

इस समस्या के समाधान के लिए अर्थव्यवस्था की दिशा को पूरी तरह से बदलना बेहद ज़रूरी है। सामाजिक उत्पादन के साधनों की मालिकी को इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों से निकालकर मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकश लोगों के हाथों में देना होगा। जिन लोगों की मेहनत और खून-पसीने से हिन्दोस्तान की दौलत पैदा होती है, उनको इस देश का हुक्मरान बनना होगा। तब जाकर सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरी करने की दिशा में चलायी जा सकेगी। तब जाकर समाज के हर व्यक्ति के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। तब जाकर “सबका विकास” एक हकीक़त बन पायेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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