कार्यस्थल पर मज़दूरों के लिये जानलेवा परिस्थिति

16 सितम्बर को यमुनानगर औद्योगिक क्षेत्र में हुए सिलिंडर धमाके में 12 मज़दूर घायल हो गए। यह धमाका विमल एल्यूमीनियम प्राइवेट लिमिटेड की एल्यूमीनियम फैक्ट्री में हुआ। घायल हुए 12 मज़दूरों में से 8 मज़दूरों की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है।

Gurdaspur blast

इससे पहले 4 सितम्बर को पंजाब के जिला गुरुदासपुर के बटाला में स्थित पटाखे बनाने वाले एक कारखाने में भयानक धमाका होने से मज़दूरों और आस-पास रहने वाले लोगों में से कम से कम 24 की मौत हो गयी। धमाके की वजह से गिरी हुई ईमारत के मलबे के नीचे कई लोग फंस गए थे। यह दुर्घटनाएं तब हुईं जब मज़दूर आने वाली दिवाली के लिए पटाखे बनाने के लिए पोटैशियम पीस रहे थे।

दिवाली के पहले कुछ माह में पटाखे बनाने वाले कारखानों में आग लगना और धमाके होना, अब आम बात हो गयी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पटाखे बनाने के दौरान हुई दुर्घटनाओं में हर वर्ष औसतन 25 मज़दूरों की मौत हो जाती है। मारे गए लोगों में अक्सर बच्चे भी शामिल होते हैं, जिनसे बाल मज़दूरी से संबंधित तमाम कानूनों का उल्लंघन करते हुए, इस ख़तरनाक काम को कराया जाता है।

इस वर्ष अगस्त के महीने में कर्नाटक के उडिपी जिले में 74 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ये लोग देवालाकुंदा गांव में एक मछली के कारखाने में काम करते थे। काम के दौरान कारखाने की अमोनिया गैस की टंकी से गैस रिसाव होने के कारण उन्हें सांस की गंभीर तकलीफों का सामना करना पड़ा था।

ये कुछेक ही उदाहरण हैं जिन्हें मीडिया में रिपोर्ट किया गया।

व्यवसायिक दुर्घटनाएं - जिनमें कार्यस्थल में हुईं “दुर्घटनाओं” में मज़दूर घायल हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है - हमारे देश में इनकी संख्या बहुत अधिक है। रिपोर्ट की गई दुर्घटनाओं के अनुसार हर रोज़ 3 मज़दूरों की मौत हो जाती है और लगभग 50 मज़दूर घायल हो जाते हैं! एक अनुमान के अनुसार, कार्यस्थल पर हुई “दुर्घटनाओं” की वजह से हर वर्ष करीब 80,000 मज़दूर अपनी जान गवां बैठते हैं। इन दुर्घटनाओं में लाखों मज़दूर घायल हो जाते हैं और कई जीवनभर के लिए अपाहिज हो जाते हैं। कारखानों और गोदामों में आग लगना और घमाके होना, भूमिगत खदानों का धंस जाना और उसमें मज़दूरों का फंस जाना, खदानों में पानी भरने से मज़दूरों का डूबकर मर जाना, भट्टियों में धमाके, निर्माण स्थलों पर मज़दूरों का ऊंचाई से गिरकर मर जाना, सीवर की सफाई करते हुए सफाई मज़दूरों का दम घुटकर मर जाना, ये सभी दुर्घटनाएं हमारे देश में हर रोज़ होती हैं। इनमें से कुछ की ही खबरें मीडिया में छपती हैं, अधिकांश दुर्घटनाओं की कोई ख़बर नहीं आती।

इन सभी दुर्घटनाओं की वजह एक जैसी है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था मेहनतकश लोगों की सुरक्षा व खुशहाली पर ध्यान नहीं देती। कार्यस्थलों पर काम के हालात बेहद घटिया स्तर के हैं। अधिकांश कार्यस्थलों पर जगह की कमी होती है और लोगों को बेहद छोटी जगहों में सिमट कर काम करना पड़ता है। काम की जगह हवादार नहीं होती और आग लगने की हालत में सुरक्षित बच निकलने की सुविधा अपवाद स्वरूप ही मिलती है। बहुत ही कम कंपनी प्रबंधन मज़दूरों को सुरक्षा यंत्र देते हैं। देशभर में ऐसे लाखों कार्यस्थल हैं जहां मज़दूरों को बेहद अमानवीय और असुरक्षित हालतों में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ये अपवाद नहीं हैं बल्कि ऐसा आम तौर पर होता है।

संसद के मानसून सत्र में उपजीविकाजन्य (व्यवसायिक) सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता विधेयक पेश किया गया था। इस कानून से देशभर के कार्यस्थलों पर काम के हालातों में कोई सुधार नहीं आने वाला है। यह एक श्रम संहिता मज़दूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की स्थिति से संबंधित 13 अन्य कानूनों की जगह लेगी। यह विधेयक किसी भी मायने में कार्यस्थल पर मज़दूरों के लिए बेहतर काम के हालात, स्वास्थ्य या सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करेगा।

नए कारखानों के लिए लाइसेंस देने, उनकी निगरानी करने और उल्लंघन के लिए सज़ा देने संबंधी मामले में फैक्ट्रीज़ एक्ट में जो प्रावधान हैं, हुबहू वही प्रावधान इस नए विधेयक में भी हैं। नए कारखानों के लिए लाइसेंस जारी करने, निगरानी करने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी शर्तों में कोई भी बदलाव नहीं किया गया है। इसके विपरीत पहले इंस्पेक्टर किसी भी वक्त बिना पूर्व-सूचना के कारखाने की जांच-पड़ताल कर सकता था, लेकिन अब जांच-पड़ताल के लिये आने पहले ही, इंस्पेक्टर के लिये, कारखाने के मालिक को सूचित करना ज़रूरी बना दिया गया है।

स्वास्थ्य, सुरक्षा और काम के हालात के बारे में विधेयक में जो बातें की गयी हैं उनको लागू करने के लिए किसी भी तंत्र का इस विधेयक में उल्लेख नहीं है। मज़दूरों से यह उम्मीद की जा रही है कि यदि काम के हालात असुरक्षित हैं तो वे इसकी शिकायत कंपनी मालिक से करें और यह उम्मीद करें कि उनकी शिकायत पर कार्यवाही की जाएगी! इस तर्क में इस हकीक़त को नज़रंदाज़ किया गया है कि पूंजीवादी व्यवस्था में मज़दूर अपने रोज़गार के लिए पूंजीपति के रहमो-करम पर होता है। यदि कोई मज़दूर काम के असुरक्षित हालात के बारे में कंपनी के मालिक से शिकायत करता है तो उसकी नौकरी जाने का ख़तरा हो सकता है। इस विधेयक के अनुसार काम के सुरक्षित हालात की मांग उठाने में ट्रेड यूनियन की भूमिका को ख़त्म कर दिया गया है।

निर्माण उद्योग का ही उदाहरण लेते हैं, जहां व्यवसायिक दुर्घटनाओं के मामले में खदान उद्योग के बाद सबसे अधिक दुर्घटनायें होती हैं। मौजूदा बी.ओ.सी.डब्ल्यू. कानून के तहत निर्माण मज़दूरों को जो सुविधायें हासिल होती हैं, इस नयी संहिता में उन सुविधाओं को हटाया जा रहा है। 1996 के बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (बी.ओ.सी.डब्ल्यू.) एक्ट को बर्खास्त किये जाने से 36 राज्यों में स्थापित बी.ओ.सी.डब्ल्यू. बोर्ड को भी बर्खास्त कर दिया जायेगा और करीब 4 करोड़ लाभार्थी निर्माण मज़दूरों का पंजीकरण भी रद्द हो जाएगा।

उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता विधेयक की एक सबसे बड़ी आलोचना इस बात पर हो रही है कि यह विधेयक सर्वव्यापी नहीं है। यह विधेयक उन सभी कारखानों, उद्यमों को अपने दायरे से बाहर रखता है जहां 10 से कम मज़दूर काम करते हैं। निर्माण मज़दूरों के पंजीकरण के रद्द हो जाने से लाखों मज़दूर इसके दायरे से बाहर जायेंगे, क्योंकि किसी भी उद्यम या कंपनी में कुल मज़दूरों की संख्या इस संहिता के लागू होने की न्यूनतम सीमा से कम हो जाएगी।

हर एक कार्यक्षेत्र में सुरक्षा नियमनों को सर्वव्यापी तौर से लागू करने के लिए मज़दूरों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा, ताकि इस तरह की दुर्घटनाओं को रोका जा सके।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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