हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था का संकट तथा उसके मूल कारण

हमारे देश की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था सब-तरफा संकट में फंसती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से चल रही मंदी के बाद अब अनेक बड़े उद्योगों में वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन घटने लगा है।

इस वर्ष अप्रैल और अगस्त के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में दुपहिया वाहनों की बिक्री 14 प्रतिशत कम हो गई है। यात्री कारों की बिक्री 22 प्रतिशत कम हुई है। टीवी की बिक्री 10 प्रतिशत कम है। नौ बड़े शहरों में घरों की बिक्री 11 प्रतिशत कम हो गई है।

ज्यादा से ज्यादा परिवार एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन तथा अन्य टिकाऊ सामान कर्ज़ पर खरीदने की अपनी योजनाओं को स्थगित कर रहे हैं। टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के लिए कर्ज़ों में अप्रैल-जून 2019 में 75 प्रतिशत की गिरावट हुई है।

जैसे-जैसे बिक्री में गिरावट हुई, वैसे-वैसे न बिका हुआ माल जमा होता गया। इसकी प्रतिक्रिया में पूंजीवादी कम्पनियां उत्पादन में कटौती कर रही हैं और मज़दूरों को काम से निकाल रही हैं। बेरोज़गारी पिछले 45 वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। किसानों का संकट अभी भी व्यापक है और बद से बदतर होता जा रहा है।

पिछले कई वर्षों से अपने देश के शासक यह मानने से इंकार करते आए हैं कि अर्थ व्यवस्था में कोई समस्या है। मज़दूरों और किसानों के व्यापक और बार-बार हुये प्रदर्शनों के बावजूद, वे गुनगुनाते रहे कि “हमारी अर्थ व्यवस्था के मूल आधार बहुत मजबूत हैं”। यहां तक कि हाल ही में 15 अगस्त, 12019 को प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि हमारी अर्थ व्यवस्था बहुत अच्छी तरह से चल रही है। अब सितम्बर 2019 में सरकार की धुन बदल गई है क्योंकि लाभ की दर कम हो गई है और पूंजीपतियों ने ख़तरे की घंटी बजा दी है।

पूंजीपतियों के मीडिया ने अर्थव्यवस्था में संकट की बात करनी शुरू कर दी है। अब यह मुखपृष्ठ की ख़बर बन गया है।

विभिन्न इजारेदार पूंजीपतियों के समूहों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद, वित्त मंत्री ने कथित रूप से संकट का सामना करने के लिए विभिन्न नीति पैकेजों और कर दरों में बदलाव की घोषणा करनी शुरू कर दी है।

इन क़दमों का असली मक़सद क्या है? क्या ये क़दम अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालेंगे? इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले इस प्रश्न का उत्तर आवश्यक है कि आर्थिक संकट का मूल कारण क्या है?

मूल कारण

उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में विस्तृत गिरावट का मूल कारण मज़दूरों और किसानों की क्रय-शक्ति में गिरावट है, जो कि जनसंख्या का 90 प्रतिशत भाग है।

Hindi Graf-Aनियमित नौकरी करने वाले मज़दूरों का 2017-18 में औसतन वेतन 16,850 रुपये था। मुद्रास्फीति का समायोजन करने के बाद यह वेतन 2011-12 के वेतन से भी कम है, जिस वर्ष में पिछला सर्वे किया गया था (चार्ट ‘क’ को देखिए)। इसका अर्थ है पिछले 7 वर्षों में नियमित नौकरी वाले मज़दूर और गरीब हो गए हैं। अनियमित मज़दूरों को 2011-12 की तुलना में थोड़ा सा अधिक वास्तविक वेतन मिल रहा है परन्तु वह अभी भी नियमित मज़दूरों के वेतन से आधे से भी कम है।

वेतन दर को कम करने वाला एक प्रमुख कारण है नियमित कार्यों के लिए ठेके पर या फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रेक्ट मज़दूरों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग।

हिन्दोस्तानी ऑटो उद्योग में वर्ष 2000 में औसतन वेतन देशभर के उत्पादन उद्योगों में औसतन वेतन से 75 प्रतिशत अधिक था। लेकिन वर्ष 2015 के आने तक ऑटो उद्योग का औसतन वेतन उत्पादन उद्योग के औसतन वेतन से केवल 10 प्रतिशत अधिक रह गया है। कम से कम वेतन पर ठेका मज़दूरों को बहुत बड़ी संख्या में लगाने से इस वेतन अंतर को कम किया गया है।

मज़दूरों के औसतन वेतन में गिरावट के साथ-साथ हाल के वर्षों में एक क्षेत्र के बाद दूसरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियों में कटौती की गई है। नवम्बर 2016 में की गई नोटबंदी का असली उद्देश्य तो डिजिटल भुगतान के माध्यम से पूंजीवादी लाभ के लिए स्थान बढ़ाना था लेकिन उसके कारण मध्यम तथा लघु उद्योग की इकाइयों में उत्पादन बहुत घट गया। लाखों मज़दूरों और लघु-उत्पादकों ने अपनी जीविका के साधन खो दिए। किसान अगली फसल के लिए बीज, उर्वरक, इत्यादि नहीं खरीद सके। 2017 में जी.एस.टी. के प्रवेश ने और भी अधिक लघु उत्पादकों और Hindi Graf-Bव्यापारियों को धंधे से बाहर कर दिया।

2017 और 2018 में बड़ी आई.टी. तथा टेलीकॉम कंपनियों में से दसों हजारों वेतनभोगी मज़दूरों को नौकरी से बाहर कर दिया गया था। और 2019 में हिन्दोस्तानी तथा विदेशी पूंजीवादी ऑटो कंपनियों ने 3 लाख से अधिक ठेका मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया है। ऑटो पुर्जे बनाने वाली इकाइयों में से निकाले जाने वालों की संख्या इसके दुगने से भी ज्यादा होने का अनुमान है। युवकों में बेरोज़गारी भयानक स्तर पर पहुंच गई है (चार्ट ‘ख’ देखिए)।

जब लाखों मज़दूर नौकरी खो देते हैं तो कुछ भी खरीदने से पहले सभी मज़दूरों को कई बार सोचना पड़ता है। जो अभी भी नौकरी में हैं वे भी कुछ भी नया खरीदने से हिचकिचाते हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि यदि उनकी नौकरी चली गई तो वे किश्त नहीं भर पायेंगे।

Hindi Graf-Cमज़दूर वर्ग के बाद उपभोक्ता वस्तुओं की सबसे ज्यादा खपत ज़मीन जोतने वाले किसान परिवारों में होती है। पिछले कई वर्षों में खेती पर खर्च किसानों को मिलने वाली क़ीमत के मुक़ाबले में ज्यादा तेज़ी से बढ़ा है। परिणामस्वरूप खेती से शुद्ध कमाई या तो वहीं के वहीं है या कम हो गई है (चार्ट ‘ग’ देखिए)।

पूंजीपति वर्ग ने न केवल वेतन दर और खेत के उपज की क़ीमतों को कम करके रखा है बल्कि अच्छे वेतनभोगी मज़दूरों की बचत को भी लूटा है। नोटबंदी ने सभी को अपनी पूरी बचत बैंकों में जमा करने पर मजबूर कर दिया। जमा राशि के सैलाब ने बैंक की मियादी जमा राशि पर ब्याज की दर को महंगाई दर से भी काफी कम कर दिया। फिर छोटी बचत करने वालों को अपनी बचत को म्युच्युअल फंडों में लगाने के लिए आकर्षित किया गया। “म्युच्युअल फंड सही है” के बैनर तले एक अधिकृत अभियान चलाया गया। जिन दसों हजारों श्रमजीवी लोगों ने अपनी बचत म्युच्युअल फंडों में लगाई उन्हें नुकसान भुगतना पड़ा, जब 2018 में स्टॉक बाज़ार गिर गया।

बिजनेस स्टेंडर्ड अख़बार के अनुसार, देश की 118 बड़ी पूंजीवादी कंपनियों का मिलकर शुद्ध लाभ 2017-18 में 26.9 प्रतिशत बढ़ा। पूंजीवादी इजारेदार घराने साल दर साल अमीर होते गए हैं, जबकि अधिकांश मेहनतकश लोग ग़रीब होते गए हैं और उन्हें बढ़ती हुई जीविका तथा बचत की असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है।

बढ़ती हुई बेरोज़गारी तथा जीविका की असुरक्षा के साथ-साथ वास्तविक वेतन और किसानों की आमदनी में शिथिलता या गिरावट तथा लोगों की बचत की लूट ही उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में गिरावट के मुख्य कारण हैं। श्रमजीवियों के पास आवश्यक क्रय-शक्ति नहीं है क्योंकि पूंजीपति वर्ग ने उनको बहुत ज्यादा निचोड़ लिया है और बहुत ज्यादा नौकरियों को नष्ट कर दिया है।

बिगड़ती परिस्थिति के कारण

जहां श्रमजीवी लोगों का अधिकतम शोषण और लूट अति-उत्पादन के संकट के मूल कारण हैं, उसे और भी गंभीर बनाने वाले दो अन्य कारण भी हैं - निवेश में गिरावट तथा निर्यात का घटना।

उत्पादन संपत्ति में लगाई गई पूंजी की मात्रा, जिसे “अचल पूंजी संरचना” के नाम से जाना जाता है वह पिछले 10 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद के 28 प्रतिशत से घट कर 20 प्रतिशत हो गई है। 2003-08 के दौरान पूंजीवादी तेज़ी के समय निवेश अधिकतम स्तर पर पहुंच गए थे। 2008-09 के विश्व व्यापी संकट के पश्चात, हिन्दोस्तानी पूंजीवादी कम्पनियां बैंकों के कर्जे़ वापस करने में असफल होने लगीं। उन्होंने अपने घरेलू निवेश में कटौती कर दी। उन्होंने अपनी पूंजी का ज्यादा से ज्यादा निर्यात विदेशों को किया। इसके साथ-साथ उन्होंने अपनी पूंजी का ज्यादा से ज्यादा भाग वित्तीय सट्टेबाजी जैसे पूरी तरह से अनुत्पादक कार्यों में लगाना शुरू कर दिया।

2008-09 के वैश्विक संकट के समय तक निर्यात में वृद्धि से हिन्दोस्तानी वस्तुओं और सेवाओं की खपत बढ़ रही थी। 1991 में निर्यात घरेलू उत्पादन का 7 प्रतिशत था जो 2008 तक बढ़ कर 20 प्रतिशत बन गया। परन्तु उसके बाद से हिन्दोस्तानी निर्यात में काफी गिरावट आई है। सबसे बड़ी पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था में शिथिलता और गिरावट तथा अमरीका द्वारा छेड़े गये सीमा-शुल्क युद्ध और प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारी गिरावट से हिन्दोस्तानी निर्यात वृद्धि पर बुरा असर पड़ा है।

उपभोक्ता वस्तुओं और पूंजीगत वस्तुओं की खपत के अलावा हिन्दोस्तानी निर्यात में गिरावट के कारण बिक्री के लिए तैयार बिन बिके माल का भंडार बहुत बढ़ गया है। बिना बिके माल के बढ़ते हुए भंडार ने पूंजीपतियों को उत्पादन में कटौती करने के लिए प्रेरित किया है। उत्पादन में कटौती की वजह से नौकरियों में कटौती हुई है जिसने क्रय-शक्ति को और भी कम कर दिया है तथा उपभोक्ता वस्तुओं की खपत में और भी गिरावट हुई है।

यह एक दुष्चक्र है जिसका प्रभाव एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में तब तक फैलता जाता है जब तक वह पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी जकड़ में नहीं ले लेता।

निष्कर्ष

हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था में संकट का मूल कारण इस तथ्य में निहित है कि पूंजीपति वर्ग ने मज़दूरों, किसानों तथा अन्य मेहनतकशों से बहुत ज्यादा निचोड़ लिया है। गिरता हुआ निवेश तथा कम होती निर्यात वृद्धि दर अन्य कारण हैं जो संकट को और गंभीर बना रहे हैं।

इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा प्रस्तावित और केंद्र सरकार द्वारा लागू किये जा रहे तथाकथित समाधानों का उद्देश्य पूंजीवादी लाभ दर को बढ़ाना है जिससे कि हिन्दोस्तानी व विदेशी पूंजी निवेश को और ज्यादा आकर्षित किया जा सके एवं निर्यात की वृद्धि दर को बढ़ाया जा सके।

मज़दूरों के वास्तविक वेतन तथा किसानों की शुद्ध आमदनी में गिरावट संकट का मूल कारण है जिसे हल करने का केन्द्र सरकार दिखावा तक नहीं कर रही है। सत्य तो यह है कि इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग को मज़दूरों और किसानों की बढ़ती ग़रीबी को रोकने में न कोई रुचि है और न ही उसमें क़ाबलियत है। उनकी पूरी आर्थिक रणनीति मज़दूरों के वेतन में कमी करना और खेती उत्पादांे की खरीदी मूल्य को कम से कम रखने पर आधारित है। वे हिन्दोस्तानी श्रम शक्ति तथा किसानों की मेहनत को कौड़ी के भाव पर लाकर विश्व की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने देश में निवेश करने के लिए आकर्षित करना चाहते हैं।

जब तक बड़े उत्पादन के साधन इजारेदार पूंजीपतियों की निजी मालिकी में रहते हैं एवं सभी निर्णय ज्यादा से ज्यादा लाभ अर्जित करने के लिए जाते हैं अर्थ व्यवस्था को बार-बार अति उत्पादन के संकट का सामना करना लाजिमी है। अर्थ व्यवस्था बार-बार ऐसी अवस्था में फंसेगी ही, जब-जब उत्पादन की मात्रा जनसंख्या की खरीदने की क्षमता से ज्यादा होगी।

इस संकट को सदैव के लिए समाप्त करने का एक ही मार्ग है कि अर्थ व्यवस्था को पूंजीवादी लालच को पूरा करने की बजाय मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में मोड़ा जाए।

बड़े उत्पादन एवं विनिमय के साधनों को सामाजिक मालिकी तथा नियंत्रण में लाया जाना होगा। उन्हें निजी लाभ को अधिकतम करने का एकमात्र ध्येय रखने वाली इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के हाथों से बाहर निकालना होगा। मानवीय श्रम द्वारा उत्पादित अतिरिक्त धन को श्रमजीवियों के जीवन स्तर तथा उनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने में उपयोग किया जाये। सभी लोगों को एक समस्त सामाजिक योजना के अनुसार लाभकारी रोज़गार में लगाया जाये जिससे कि सम्पूर्ण जनता की बढ़ती भौतिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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