महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव :

पूंजीवादी पार्टियों के उम्मीदवारों को ठुकरायें!

केवल उनका चुनाव करें जो आपके अधिकारों के लिए लड़ते आये हैं!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की महाराष्ट्र क्षेत्रीय समिति का बयान, अक्तूबर, 2019

साथियों और दोस्तों,

लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से भाजपा की जीत के 5 महीने बाद, 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव 21 अक्तूबर, 2019 को होने जा रहे हैं। पिछले दो दशकों से इस राज्य को गठबंधन सरकारें चला रही हैं। भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने 1995 से 1999 के बीच और 2014 से शासन किया है। कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन 1999 से 2014 के बीच 15 वर्षों तक सत्ता में रहा है।

पूंजीपति वर्ग, अपने स्वभाव के अनुकूल विभिन्न गुटों और तबकों के हितों में बंटा हुआ है। महाराष्ट्र में सम्पत्तिवान तबकों के प्रमुख गुटों का प्रतिनिधित्व भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना द्वारा किया जाता है। इन पार्टियों के बीच होड़ पूंजीवादी लूट के बंटवारे पर है, जबकि ये उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के अपने कार्यक्रम में एकजुट हैं। चूंकि इन पार्टियों का उद्देश्य अनिवार्य रूप से एक समान है, इसलिए इनके सदस्य अपने व्यक्तिगत हितों के अनुसार आसानी से एक से दूसरी पार्टी में जा सकते हैं।

महाराष्ट्र में शासन करने वाली चार मुख्य पार्टियों के अलावा, कई अन्य पार्टियां हैं जो विभिन्न क्षेत्रों और तबकों के सम्पत्तिवालों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जैसे कि महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना जो इन चुनावों में भाग ले रही है।

कार्यकर्ताओं, किसानों और मध्यम तबके के लोगों की कई पार्टियां हैं जो विभिन्न मतदाता-क्षेत्रों में चुनाव लड़ रही हैं। लोगों के विभिन्न संगठनों के कई कार्यकर्ता, जिनके पास आम जनता और उत्पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने का लंबा अनुभव है, वे “स्वतंत्र” उम्मीदवारों के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।

30 वर्षों में पहली बार, बड़े पूंजीपति नई दिल्ली में एक ही पार्टी के नेतृत्व में और भी ज्यादा बहुमत वाली सरकार का पुनर्निर्वाचन करने में सफल हुए हैं। वे महाराष्ट्र में वैसे ही परिणाम के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे हैं।

इस साल अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान, बड़े पूंजीपतियों ने पुलवामा आतंकी हमले तथा पाकिस्तान से ख़तरे का इस्तेमाल करके चुनाव परिणामों को भाजपा के पक्ष में मोड़ दिया था। ये चुनाव परिणाम सत्ताधारी भाजपा सरकार के “अच्छे दिन” लाने के खोखले वादों के साथ अधिकांश जनता, मज़दूरों, किसानों तथा महिलाओं के असंतोष को नहीं दर्शाते हैं। सत्ताधारी पार्टी, भाजपा ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार का एजेंडा अनुच्छेद 370 और “राष्ट्र सबसे पहले” रहेंगे।

इस एजेंडे का उपयोग लोगों को उनके वास्तविक मुद्दों और चिंताओं से भटकाने के लिए किया जा रहा है, जैसे कि अमीर और ग़रीब के बीच बढ़ता फासला, घटती आय, नौकरियों की कमी और बेरोज़गारी, बढ़ती महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं का निजीकरण। “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर, अपने अधिकारों के लिए लड़ते आ रहे लोगों पर हुए क्रूर दमन को जायज़ ठहराया जा रहा है। लोगों के उचित और न्यायपूर्ण संघर्ष को “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है। पाकिस्तान के खि़लाफ़ युद्ध भड़काऊ प्रचार का इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने और बांटने के लिए किया जा रहा है।

सच बात तो यह है कि भाजपा या कांग्रेस पार्टी जब राष्ट्रीय हित के बारे में बात करती हैं, तो उनका असली मतलब बड़े पूंजीपतियों के खुदगर्ज़ हितों से है। ये दोनों पार्टियां हिन्दोस्तानी तथा विदेशी पूंजीपतियों के साथ मिलकर महाराष्ट्र सहित पूरे देश में अपने शोषण और लूट की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए वचनबद्ध हैं।

अरबपतियों की सबसे बड़ी संख्या वाले सबसे अमीर राज्य महाराष्ट्र में करोड़ों लोगों की हालत:

नोटबंदी के दौरान, और जी.एस.टी. लागू किये जाने से, मौजूदा आर्थिक मंदी की वजह से, बड़े, मध्यम और छोटे उद्योगों में दसों लाखों नौकरियां बर्बाद हो गई हैं और नौकरियां कम हो गयी हैं।

मज़दूर-विरोधी कानूनों को थोपा जा रहा है। स्थायी नौकरियों के स्थान पर ठेके की नौकरियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

बार-बार होने वाले सूखे, उपज के लिए अलाभकारी मूल्य और खेती के लिए आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती लागत के कारण किसान गहरे संकट में हैं। जिसका परिणाम आत्महत्या और कुपोषण से होने वाली सबसे ज्यादा मौतों का आंकड़ा दर्शाता है।

पूरी तरह से केवल मुनाफ़ों के लिये संचालित पूंजीवादी कृषि पानी के प्राकृतिक स्रोतों को नष्ट कर रही है। राज्य के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गन्ने की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

वर्तमान वर्ष की गर्मियों में सबसे गंभीर सूखे से लगभग आधा राज्य और आबादी प्रभावित हुए हैं। राज्य में भूजल की कमी से पीड़ित गांवों की संख्या दोगुनी होकर 10,000 से 23,000 हो गई है। फिर भी, राज्य ने इस संकट को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया है।

उसी दौरान, पश्चिमी महाराष्ट्र ने बाढ़ के प्रकोप का सामना किया, बांधों से अचानक पानी छोड़े जाने से आई मुसीबत से हालत कई गुना बदतर हो गयी।

2017-18 में राज्य ने प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय औसत 1538 रुपये खर्च की तुलना में केवल 975 रुपये खर्च किये। जबकि सिक्किम जैसे छोटे राज्य ने 5,500 रुपये खर्च किये।

ग्रामीण क्षेत्रों में 17,000 और शहरी क्षेत्रों में 9,000 स्वास्थ्य कर्मियों के पद खाली हैं, लेकिन एक के बाद एक आई सभी सरकारों ने विदेशों से चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा दिया है।

सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हजारों पद खाली पड़े हैं, जबकि शिक्षकों को ठेके पर, घंटे के आधार पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन, सड़कों के निर्माण आदि जैसी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं में निवेश को घटा दिया गया है। इन सभी सार्वजनिक सेवाओं की उपेक्षा की जा रही है और हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को एक के बाद एक आई सभी सरकारों ने सुनियोजित रूप से नष्ट किया है।

उपरोक्त सभी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं में निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। जहां भी बड़े पूंजीपति अधिकतम मुनाफ़े की संभावनाएं देखते हैं उन क्षेत्रों के द्वार खोले जा रहे हैं तथा निजी निवेशकों को लुभाने के लिए प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।

राज्य द्वारा शहरी और ग्रामीण ज़मीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण किया जा रहा है और इन ज़मीनों को पूंजीपतियों को “कलस्टर डेवलपमेंट” के नाम पर बुलेट ट्रेन आदि के लिए सौंपा जा रहा है।

राजकीय खजाने की बेलगाम लूट ने आम जनता के सिर पर सार्वजनिक कर्ज़ का बोझ बढ़ा दिया है। राज्य 4.14 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ के साथ देश के सबसे अधिक कर्ज़दार राज्यों में से एक बन चुका है।

चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी, वहां मज़दूरों, किसानों, छोटे व्यवसायों के साथ-साथ स्वरोज़गार कर रहे लोगों के हितों की बलि चढ़ाकर कृषि, उद्योग, निर्माण, व्यापार और अन्य सेवाओं से जुड़े इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए क़दम उठाए जा रहे हैं।

सभी जन-विरोधी क़दमों का ज़ोरदार विरोध हुआ है। राज्य के लाखों मज़दूर, किसान, युवा और महिलाएं अपनी मांगों के लिए बार-बार बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, 2018 में नाशिक से मुंबई तक किसानों का एक बड़ा मार्च देखने को मिला। परन्तु, उनकी मांगों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।

बार-बार हो रहे तमाम चुनावों से मज़दूरों, किसानों और अन्य लोगों की हालत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है। इसका कारण यह है कि हिन्दोस्तान में सर्वोच्च सत्ता पूंजीपति वर्ग के हाथों में है। राजनीतिक सत्ता के तंत्र जैसे कि कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं - ये सभी लोगों के विशाल जनसमूह पर पूंजीपति शासन के साधन का काम करती हैं। बहुपार्टी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र, मज़दूर वर्ग और लोगों पर पूंजीवादी शासन का बस एक साधन बनकर रह गया है।

इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग अपने एजेंडे को लागू कराने हेतु, चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल एक या दूसरी राजनीतिक पार्टी का चयन करता है और उसे धन देता है। जो पार्टी लोगों को सबसे अधिक बेवकूफ बना सकती है ऐसी पार्टी को पूंजीपतियों का अजेंडा लागू करने के लिये चुना जाता है। बड़े पूंजीपतियों द्वारा दिए गए धन और मीडिया के नियंत्रण का उपयोग करके चुनावों में चयनित पार्टी को स्थापित किया जाता है जो यह दावा करती है कि उसके पास पूंजीपतियों के एजेंडे को लागू करने के लिए लोगों का जनादेश है!

चुनावों में अधिकांश सीटें जीतने के बाद सरकारें बनाने वाली पार्टियां पूंजीपतियों के प्रबंधकों के अलावा और कुछ नहीं हैं। जब एक पार्टी या गठबंधन जनता की नज़रों में बदनाम हो जाता है, तो पूंजीपति वर्ग प्रबंधकों को बदलने के लिए चुनावों का इस्तेमाल करता है, जिससे कि उसी एजेंडा को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। केवल उन पार्टियों और गठबंधनों को ही सत्ता में आने दिया जाता है जिन्होंने अपने कार्यों और शब्दों से साबित किया होता है कि वे बड़े पूंजीपतियों के कार्यक्रम को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इस प्रणाली में मज़दूरों और किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की बहुत कम संभावना है। पूंजीपति वर्ग की पार्टियां चुनावी प्रक्रिया पर हावी हैं। जो सरकार बनती है, वह पूंजीपति वर्ग के प्रति ही उत्तरदायी होती है, जिसका नेतृत्व इजारेदार करते हैं।

मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और चुनावी प्रक्रिया शोषक तथा मुट्ठीभर लोगों के शासन को बनाए रखने का काम करती है। लोगों के शोषक और दमनकर्ता अपने शासन को वैध बनाने और आपसी मतभेदों को निपटाने के लिए चुनाव का इस्तेमाल करते हैं। वे लोगों के बीच बंटवारे को गहरा करने के लिए चुनाव का इस्तेमाल करते हैं, तथा हमें हमारे अधिकारों और समान हितों के लिए लड़ने से रोकते हैं।

महाराष्ट्र के आम मेहनतकश लोगों को इस प्रणाली में उनकी शक्तिहीन स्थिति पर गहरा असंतोष है, जो उन्हें मात्र “वोट बैंक” बना देती है। देश की भौतिक संपत्ति का उत्पादन करने वाले मज़दूरों और किसानों को राजनीतिक सत्ता पूंजीपति वर्ग के हाथों से अपने हाथों में लेने की ज़रूरत है। हमें लोकतंत्र की एक आधुनिक व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथों में हो। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी इस दिशा में तत्काल राजनीतिक सुधारों के लिए लगातार आंदोलन करती आई है और इस मंच को अन्य सभी प्रगतिशील ताक़तों के साथ मिलकर विकसित कर रही है। इस तरह के सुधारों की मुख्य विशेषताएं हैं:

  1. उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार राजनीतिक पार्टियों के हाथों से निकाला जाना चाहिए और मतदाताओं के हाथों में देना चाहिए।
  2. प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक निर्वाचित मतदाता-क्षेत्र समिति की स्थापना की जानी चाहिए, जो सुनिश्चित करे कि लोग उनके राजनीतिक अधिकारों का उपयोग करने में सक्षम हों और जिसमें किसी भी चुनाव से पहले उम्मीदवारों का चयन करने का उनका अधिकार भी शामिल हो।
  3. किसी भी निजी इकाई या राजनीतिक पार्टी को उम्मीदवार के चुनाव अभियान पर धन खर्च करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया के लिए राज्य को धन देना चाहिए, सभी चयनित उम्मीदवारों को मतदाताओं के सामने अपने विचार प्रस्तुत करने का समान अवसर देना चाहिए।
  4. चयनित उम्मीदवार को मतदाता-क्षेत्र समिति के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और निर्वाचित होने पर समिति के निर्देशों के अनुसार काम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
  5. एक बार जब लोग वोट डाल देते हैं, तो उन्हें अपने सभी अधिकार चुने गये प्रतिनिधि को नहीं सौंप देना चाहिए।
  6. जनमत संग्रह के माध्यम से प्रमुख सार्वजनिक निर्णयों को मंजूरी देने, कानून प्रस्तावित करने और किसी भी समय चुने गये प्रतिनिधि को वापस बुलाने के अधिकार को बरकरार रखना चाहिए। कार्यपालिका अर्थात मंत्रिपरिषद, विधायिका के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और विधायिका को मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

साथियों और दोस्तों,

आइए, हम मज़दूरों और किसानों को सत्ता में लाने और हिन्दोस्तान के नव-निर्माण को अंजाम देने के नज़रिए से सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग के हमलों का विरोध करें। नव-निर्माण का अर्थ एक नए संविधान के आधार पर एक नए राज्य की स्थापना करना है जो लोगों के हाथों में संप्रभुता क़ायम करेगा और मानवाधिकारों का हनन न हो इसकी गारंटी देगा। इसका अर्थ है कि पूंजीवादी लालच को पूरा करने की बजाय, यह अर्थव्यवस्था को सभी लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ेगा।

आइए, हम पूंजीवादी पार्टियों के उम्मीदवारों को ठुकरायें!

आइए, हम केवल ऐसे उम्मीदवारों का समर्थन करें जिनके पास लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने का एक प्रमाणित और लंबा अनुभव है!

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नव-निर्माण    बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र    Oct 16-31 2019    Statements    Political Process     2019   

टिप्पणी

महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव

आदरणीय संपादक,

हाल ही में मुझे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ठाणे मतदाता क्षेत्र से खड़े दो उम्मीदवारों के चुनाव अभियान में भाग लेने का मौका मिला। मैं अपने पत्र से पाठकों को अपना अनुभव बताना चाहूँगा।

अभियान के दौरान यह स्पष्ट दिखा कि लोग उनके क्षेत्र से निर्वाचित पिछले विधानसभा सदस्य से बेहद नाराज़ थे। क्योंकि उसने लोगों के लिए कुछ भी काम नहीं किया था। यह भी स्पष्ट था कि लोग भाजपा-शिवसेना तथा कांग्रेस पार्टी-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधनों से नाखुश थे।

दोनों उम्मीदवार ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ पार्टी के टिकट पर खड़े थे। पूंजीवादी राजनीति में वंचित शब्द का प्रयोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की पहचान से जुड़ा है। परन्तु, दोनों उम्मीदवारों ने घोषित किया कि उनकी सोच में वंचित वे सब हैं जो रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, शिक्षा, इत्यादि जैसे मूलभूत अधिकारों तथा लोकतान्त्रिक एवं मानव अधिकारों से वंचित हैं। उन दोनों ने घोषणा की कि वे उन सभी के लिए चुनाव लड़ रहे हैं चाहे उनकी कोई भी जाति या धर्म हो।

दोनों ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि यदि वे चुन कर आते हैं तो वे नियमित समय पर मतदाताओं के साथ मीटिंग करेंगे और मतदाताओं द्वारा दिए गए निर्देशों और सुझावों के अनुसार कार्य करेंगे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उन्होंने पहले ही बेतारीख राजीनामा मतदाता क्षेत्र कमेटी को दे दिया है और यदि वे मतदाताओं के हितों की रक्षा के लिए कार्य नहीं करते हैं तो कमेटी को राजीनामा महाराष्ट्र के राज्यपाल को दे देने का अधिकार है। हर मीटिंग में उनके इस क़दम को लोगों ने सराहा। कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि प्रत्येक उम्मीदवार को हमें इस तरह का क़दम लेने के लिए बाध्य करना चाहिए और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो लोगों को उनका बहिष्कार करना चाहिए।

आपको भेजे इस पत्र के माध्यम से बताना चाहता हूं कि प्रतिनिधियों को मतदाताओं के प्रति ज़िम्मेदार ठहराने के लिए मतदाता क्षेत्र कमेटियां, चुनाव के पहले चयन तथा अन्य विचारों को प्रोत्साहित करते आये हैं। मेरे ख्याल में अब इन जैसे विचारों का समय आ गया है।

आपका पाठक, बी. गिरीष

अंग्रेजी

टिप्पणी

संपादक महोदय,

मज़दूर एकता लहर के 16-31 अक्तूबर, 2019 के अंक में महाराष्ट्र चुनाव पर प्रकाशित बयान में इन चुनावों की असलियत को दर्शाया गया है, जिसे “चुनाव का महोत्सव” के रूप में पेश किया जा रहा है। इस बयान में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि इन चुनावों में महाराष्ट्र के नागरिकों को क्या करना चाहिए। बयान में यह साफ़ दिखाया गया है कि मौजूदा व्यवस्था अमीरों को और अधिक अमीर बनाने के लिए तैयार की गयी है।

सबसे बड़े पूंजीपति अपनी पसंद के उम्मीदवारों और उनकी पार्टियों को धन देते हैं। मीडिया इन पार्टियों को लोगों को बेवकूफ बनाने में मदद करती है, ताकि वे चुने जाने के बाद ऐसी नीतियां बनायें जो लोगों को लूटकर इन अमीर लोगों को और अधिक अमीर बनाने में सहायक हो। ये अमीर ज़मीन पर कब्ज़ा करके, मज़दूरों की छंटनी करके, उपभोग की वस्तुओं के क़ीमत को बढ़ाके, महंगाई और लोगों पर सब-तरफा हमले करके और अधिक अमीर होते जाते हैं। साल दर साल लोगों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। लोगों के ध्यान को भटकाने के लिए भयानक काण्ड आयोजित किये जाते हैं, जैसे कि इससे पहले वाले अंकों में पुलवामा हमलों पर प्रकाशित लेख में बताया गया था।

इन चुनावों में यह देखने को मिला कि किस तरह से बड़ी पार्टियां एक-दूसरे के साथ स्पर्धा के साथ-साथ सांठ-गांठ करती हैं। कुछ सीटों को अपने विरोधियों के लिए छोड़ देती हैं और इसके बदले में विरोधी पार्टी भी ऐसा ही करती है जिससे दोनों बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार जीतकर आयें।

इस बयान में मज़दूर, किसान, औरत, नौजवान और तमाम मेहनतकश लोगों की दयनीय हालत के बारे में भी बताया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता और पर्यावरण इत्यादि जैसे मुद्दों को इस बयान में उजागर किया गया है। तथ्यों के आधार पर बताया गया है कि जहां एक तरफ सूखा पड़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ पानी की कमी वाली जगहों पर सरकार गन्ना खेती को बढ़ावा दे रही है।

यह भी बताया गया है कि किस तरह से ज़मीन और पानी का दोहन किया जाता है, स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्चा बेहद कम है। देश के हुक्मरान पूंजीपति राज्य की तिजोरी को लूट रहे हैं और मेहनतकश लोगों पर कर्ज़ के बोझ को 1.14 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है।

लोगों के सब तरफा विरोध के बावजूद बुनियादी सेवाओं का निजीकरण किया जा रहा है। बिजली वितरण और बी..एस.टी. (बेस्ट) में यह साफ नज़र आता है। चुने हुए प्रतिनिधि जब यह दावा करते हैं कि वे निजीकरण को रोकेंगे, तब समझ लिया जाना चाहिए कि वे लोगों को बेवकूफ बनाने का काम रहे हैं।

इन चुनावों में नागरिकों को क्या करना चाहिए। चुने हुए उम्मीदवारों को जवाबदेह बनाने के लिए प्रत्येक मतदाता क्षेत्र में निर्वाचन कमेटी का गठन किया जाना चाहिए। नागरिकों को ऐसे उम्मीदवारों को वोट देना चाहिए जो लोगों के साथ उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे। हमें बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों को ठुकराना चाहिए जो केवल खुद को और अधिक अमीर बनाने के लिए चुनाव में लड़ रहे हैं।

इस बयान को प्रकाशित करने के लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। मैं उम्मीद करती हूं कि ऐसे लेखों के द्वारा हम बदलाव के दिशा में आगे बढ़ेंगे।

श्रुति, कलवा (ठाणे)

अंग्रेजी

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)