सिखों के जनसंहार को न तो भुलाया जा सकता है और न ही माफ़ किया जा सकता है

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 21 अक्तूबर, 2019

1 नवंबर को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आयोजित किये गए सिखों के जनसंहार की 35वीं सालगिरह है। दिल्ली, कानपुर, बोकारो और देश के कई अन्य स्थानों पर दसों हजारों सिखों का कत्लेआम और बलात्कार किया गया था।

1 से 3 नवंबर 1984 के बीच जो घटित हुआ था उसे सरकारी दस्तावेज़ों में “सिख-विरोधी दंगे” के नाम से दर्ज़ किया गया है। “दंगे” का मतलब है कि यह एक स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया थी। उस समय के कार्यवाहक प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक तौर पर ऐलान किया कि “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तब धरती तो हिलती ही है!” अपने इस बयान से वे यह जताना चाहते थे कि लोगों ने सिखों पर हमला इसलिए किया था, क्योंकि वे इंदिरा गांधी की हत्या का बदला लेना चाहते थे।

लेकिन सभी मौजूदा सबूत यही दिखाते हैं कि सिख लोगों को निशाना बनाते हुए किया गया यह वहशी हमला लोगों की स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया का नतीजा नहीं था। इसे बहुत सोच-समझकर आयोजित किया गया था। इस हक़ीक़त को पिछले वर्ष के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में स्वीकार किया गया, जब कांग्रेस के एक नेता सज्जन कुमार को इस कत्लेआम में उनकी भूमिका के लिए सज़ा सुनाई गई।

इंदिरा गांधी की हत्या के बारे में आधिकारिक रूप से यह बताया गया था कि 31 अक्तूबर को दो अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। इन दोनों अंगरक्षकों को तुरंत गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें निहत्था कर दिया गया। गिरफ़्तारी के दौरान इनमें से एक को मार दिया गया, जो कि एक बेहद संदेहास्पद बात है, जो अभी तक एक राज़ बनी हुई है।

प्रधानमंत्री की गोली मारकर हत्या करना इस बात की ओर इशारा करता है कि इसके पीछे बेहद ताक़तवर हित छुपे हुए हैं। ऐसी कौन सी अंदरूनी देशी और विदेशी ताक़तें थीं जिन्होंने एक प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रची और इसके पीछे उनका क्या मक़सद था? इन सवालों पर गंभीरता से पड़ताल करने की बजाय सत्ता में बैठे लोगों ने इस बात का प्रचार करना शुरू कर दिया कि “सिखों ने हमारे चहेती प्रधानमंत्री की हत्या कर दी है”। तथाकथित तौर पर इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले अंगरक्षक सिख थे, इस बात का इस्तेमाल पूरे सिख समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया गया।

1 नवंबर को एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ के बाहर, जहां प्रधानमंत्री का पार्थिव शरीर रखा गया था, सिखों से बदला लेने का ऐलान किया था। सिखों के घरों की पहचान करने के लिए, हिंसक गुटों के हाथों में मतदाता सूची देकर, सिख लोगों को मारने और उनको जिंदा जला देने के लिए, दिल्ली के कई इलाकों में इन गुटों को खुला छोड़ दिया गया। सत्ताधारी पार्टी के कई जाने-माने नेता इन हिंसक गुटों की अगुवाई कर रहे थे।

सुरक्षा बलों को आदेश दिया गया कि वे निशाना बनाये जा रहे लोगों की रक्षा न करें। कुछ ठिकानों पर हत्यारे गुटों के आने से पहले पुलिस ने निशाना बनाए जा रहे लोगों को निहत्था करने का काम किया।

जनसंहार की इस पूरी अवधि के दौरान कई चिंतित और जाने-माने नागरिकों ने सरकार से अपील की, जिनमें कई कार्यरत न्यायाधीश, सांसद, सेवा निवृत्त सेनाध्यक्ष और एयर मार्शल शामिल थे। उन्होंने देश के गृहमंत्री और राष्ट्रपति से इस जनसंहार को रोकने की अपील की। लेकिन उनकी अपील केवल खामोश दीवारों से टकराती रही। यह जनसंहार 72 घंटों तक लगातार चलता रहा। इस दौरान दिल्ली की सड़कों पर हर एक मिनट में एक सिख का कत्ल किया जाता रहा।

उन दिनों सिखों के पास अपने लिये असली सुरक्षा केवल उनकी अपनी सामूहिक आत्मरक्षा थी या पड़ोसियों द्वारा दी जा रही सहायता थी। जिन सिखों ने जल्दी से अपने आस-पास के गुरुद्वारों में इकट्ठा होकर अपने हाथों की तलवारों के बल पर अपनी रक्षा की, केवल वे ही अपनी जान बचा पाए। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां हिन्दू और मुसलमान लोगों ने अपने सिख पड़ोसियों की हिफ़ाज़त की।

पिछले 35 वर्षों से लोग यह मांग करते आ रहे हैं कि 1984 के सिखों के जनसंहार पर इंसाफ हो। लेकिन इन मांगों पर सरकार का एक ही ज़वाब रहा कि जांच के लिए एक आयोग के बाद दूसरा आयोग गठित करना। जबकि इन आयोगों ने व्यक्तिगत राजनेताओं की भूमिका का पर्दाफ़ाश करने का काम किया है, लेकिन ये आधिकारिक आयोग सम्पूर्ण हक़ीक़त का पर्दाफाश करने में पूरी तरह से नाक़ामयाब रहे हैं। इनमें से किसी भी आयोग ने इस बात की तहक़ीक़ात नहीं की कि 1 से 3 नवंबर के उन काले दिनों के दौरान सबसे ऊंचे स्तर पर, मंत्रिमंडल में और गृह मंत्रालय में क्या चल रहा था।

आधिकारिक रूप से की गयी जांच और विभिन्न अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों ने इस क़त्लेआम को केवल इस नज़र से देखा जैसे कि यह कई अलग-अलग व्यक्तियों और उनकी अगुवाई में क़ातिल भीड़ द्वारा की गयी कई हत्याओं का एक संकलन हो। लेकिन असलियत में यह एक भयानक गुनाह था जिसे सत्ता पर बैठी पार्टी ने सत्ताधारी वर्ग के हितों में आयोजित किया था और इसे संपूर्ण राज्य मशीनरी का पूरा समर्थन था।

आज, नरेद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा नीत सरकार ने कांग्रेसी नेताओं के खि़लाफ़ कुछ व्यक्तिगत मुकदमे फिर से खोल दिए हैं या पुनर्जीवित किये हैं, जिन नेताओं को 1 से 3 नवंबर, 1984 के दौरान दिल्ली की सड़कों पर देखा गया था।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सहित तमाम प्रगतिशील और जनतांत्रिक संगठन बरसों से लगातार यह मांग करते रहे हैं कि सांप्रदायिक हिंसा के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दी जाए। जब कभी राज्य अपने नागरिकों की जान बचाने में नाकाम होता है तब इस नाकामी के लिए उन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया जाए जिनके हाथों में सत्ता की कमान हो।

जबकि 1984 में क़ातिल गुटों को अगुवाई देने वाले व्यक्तियों पर मुक़दमा चलाना और उनको सज़ा दिलाना एक ज़रूरी क़दम है, लेकिन यह काफी नहीं है। इंसाफ का तकाज़ा यह है कि 1984 के जनसंहार, बाबरी मस्जिद के विध्वंस और 1992-93 की सांप्रदायिक हिंसा, 2002 के गुजरात में कत्लेआम और अन्य तमाम सांप्रदायिक हिंसाओं के दौरान जिनके हाथों में सत्ता की कमान थी, उन सभी लोगों को सज़ा मिलनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, इंसाफ़ नहीं होगा।

भाजपा नीत मौजूदा सरकार द्वारा केवल कांग्रेस के कुछ नेताओं को निशाना बनाना, आपसी बदला लेने के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसा करने से इंसाफ़ के लिए लोगों की मांग पूरी नहीं होगी।

भाजपा नीत सरकार ने सांप्रदायिक बंटवारे और सांप्रदायिक उत्पीड़न के हथियार को छोड़ा नहीं है। इसके विपरीत यह सरकार “इस्लामिक आतंकवादियों”, “सिख आतंकवादियों” और बांग्लादेश से आये मुसलमान आप्रवासियों की वजह से तथाकथित ख़तरे के बारे में लगातार प्रचार चला रही है। सांप्रदायिक हिंसा और कई वारदातें आयोजित करने के लिए ज़मीन तैयार की जा रही है।

हमारे इस ऐतिहासिक अनुभव से हमें यह एक सबक मिलता है कि हम इन तथाकथित मुसलमान और सिख आतंकवादियों से देश की एकता और क्षेत्रीय अखंडता पर तथाकथित ख़तरे के बारे में सरकार के प्रचार पर बिलकुल भी यकीन न करें। हमारे देश में लोगों की सुरक्षा और एकता को सबसे बड़ा और मुख्य ख़तरा इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग से है। यह ख़तरा हिन्दोस्तान-अमरीका गठबंधन और हिन्दोस्तान पर एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवादियों के बढ़ते प्रभाव की वजह से और भी बढ़ जाता है।

सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का स्रोत लोग या उनकी आस्था या किसी राजनीतिक पार्टी में नहीं है। इसका स्रोत इजारेदार पूंजीपतियों के गुनहगारी स्वभाव में है, जो अपनी हुकूमत को बरकरार रखने और उसे मजबूत करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसका स्रोत इस तथाकथित धर्म-निरपेक्ष हिन्दोस्तानी राज्य की सांप्रदायिक बुनियाद में है।

इस हिन्दोस्तानी राज्य की तमाम संस्थाएं जिसमें चुने हुए निकाय, नौकरशाही, सुरक्षा बल, न्यायालय और न्याय व्यवस्था शामिल हैं, जिन्हें चंद मुट्ठीभर शोषकों द्वारा बहुसंख्य लोगों को बांटने और उनपर अपनी हुकूमत चलाने के लिए बनाया गया है। 

मौजूदा राज्य लोगों के ज़मीर के अधिकार की या फिर जीवन के अधिकार की, समाज के सभी सदस्यों के सार्वभौमिक और अनुल्लंघनीय अधिकार बतौर हिफ़ाज़त नहीं करता है। यह राज्य पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की हिफ़ाज़त करता है, जो सांप्रदायिक हिंसा और शोषित और दबे-कुचले लोगों के बीच गुटवादी बंटवारे और आपसी लड़ाई को आयोजित करता है, और उससे फ़ायदा उठाता है।

यह राज्य सभी हिन्दोस्तानी लोगों की एकता बनाने या समाज के विभिन्न वर्गों या तबकों के हितों के बीच सामंजस्य बनाने का साधन नहीं है। इसके विपरीत, यह राज्य सभी दब-कुचले लोगों के जनसमुदाय को अपने सांझे शोषकों और दमन करने वालों के खि़लाफ़ एकजुट होने से रोकने का साधन है।

प्राचीन काल से इस उपमहाद्वीप के लोगों ने इस राजनीतिक सिद्धांत की हिफ़ाज़त की है कि प्रजा की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राजा का धर्म है। इसके विपरीत, यदि हुक्मरान राजा अपने लोगों का दमन करता है, उनका क़त्लेआम करता है, तो लोगों का यह अधिकार और फ़र्ज़ है कि ऐसे हुक्मरान का तख़्ता पलट करें। आधुनिक युग में राजा नहीं बल्कि पूंजीपति वर्ग एक केंद्रीकृत राज्य मशीनरी की संस्थाओं के द्वारा लोगों पर हुकूमत चलाता है। हिन्दोस्तान के लोगों का यह अधिकार और फर्ज़ है कि वे इस राज्य का तख़्ता पलट करें और अल्पसंख्यक पूंजीपतियों की हुकूमत को ख़त्म करें। पूंजीवादी हुकूमत के इस सांप्रदायिक तंत्र की जगह पर मज़दूरों और किसानों का एक नया राज्य क़ायम करना होगा, जो सभी लोगों के ज़मीर के अधिकार की हिफ़ाज़त करेगा और सभी लोगों के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी देगा।

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Nov 1-15 2019    Statements    Communalism     Popular Movements     Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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