हिन्दोस्तान-अमरीका व्यापार विवाद

जून 2019 में हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच व्यापार संबंधों में तनाव पैदा हो गया जब अमरीका ने हिन्दोस्तानी निर्यातों को मिलने वाली  6 अरब डॉलर की निशुल्क सुविधा को वापस ले लिया और हिन्दोस्तान ने इसके जवाब में 29 अमरीकी उत्पादों पर शुल्क लगा दिया।

हिन्दोस्तान की यह कार्यवाही मार्च 2018 में अमरीका द्वारा एकतरफा कार्यवाही के जवाब में की गयी थी, जब अमरीका ने हिन्दोस्तान से आयात किये जाने वाले स्टील और एल्युमीनियम उत्पादों पर क्रमशः 25 प्रतिशत और 10 प्रतिशत का अतिरिक्त वैश्विक शुल्क लगाना शुरू किया। वैसे तो यह अतिरिक्त शुल्क खास तौर से चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर लक्षित किया गया था, लेकिन इसका असर हिन्दोस्तान से अमरीका में होने वाले निर्यात पर भी होने वाला था।

लेकिन, दोनों ही देश एक सीमित समझौते पर पहुंचने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं, जो कुछ क्षेत्रों या उत्पादों तक सीमित होगा। इस समझौते के तहत यह उम्मीद की जा रही है कि एक ओर हिन्दोस्तानी निर्यातों पर निःशुल्क सुविधा को बहाल की जायेगी और दूसरी ओर अमरीकी कृषि उत्पादों, दवाइयों की क़ीमत निर्धारण में और इनफार्मेशन एवं टेक्नोलॉजी उत्पादों पर शुल्क संबंधी रियायत दी जाएगी।

प्रधानमंत्री मोदी की हाल की अमरीका यात्रा के दौरान बहुत उम्मीद जताई जा रही थी कि इस यात्रा के दौरान एक नए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किये जायेंगे। हिन्दोस्तान के वाणिज्य मंत्री को प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही अमरीका भेजा गया ताकि इस समझौते का समापन किया जा सके। जबकि इन मुद्दों पर अभी कोई समझौता नहीं हुआ है, दोनों ही देश यह विश्वास जता रहे हैं कि वे बातचीत के ज़रिये इस विवाद को सुलझा लेंगे। अक्तूबर की शुरुआत में हिन्दोस्तान और अमरीका के वाणिज्य मंत्रियों के बीच मुलाक़ात हुई और यह उम्मीद की जा रही है कि वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए अमरीका के व्यापार प्रतिनिधि जल्दी ही हिन्दोस्तान का दौरा करेंगे।

हिन्दोस्तान यह मांग कर रहा है कि उसके कुछ घरेलू उत्पादों पर निर्यात सुविधाओं को पुनः बहाल किया जाये और अमरीका द्वारा कुछ स्टील और अलुमिनियम उत्पादों पर लगाये गए ऊंचे शुल्कों में छूट दी जाये। हिन्दोस्तान यह भी मांग कर रहा है कि उसके कृषि, ऑटोमोबाइल, ऑटो कलपुर्जों एवं इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अमरीकी बाज़ार में और अधिक घुसने की इजाज़त दी जाये।

इसके बदले में अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान कई क्षेत्रों में उसे रियायतें दे। अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान मेडिकल उपकरणों, जैसे हृदय स्टेंट और घुटनों के इम्प्लांट की क़ीमतों पर लगे नियंत्रण को हटाये। यदि किसी कारणवश ऐसा तुरंत नहीं किया जा सकता है तो अमरीका यह चाहता है कि हिन्दोस्तान एक समयबद्ध तरीके से क़ीमतों पर लगे नियंत्रण को हटाने का आश्वासन दे। हार्ले डेविडसन बाइक पर आयात शुल्क को कम करे और अमरीकी कृषि उत्पादों और डेरी उत्पादों को हिन्दोस्तानी बाज़ार में और अधिक घुसने की इजाज़त दे। अमरीका यह भी चाहता है कि हिन्दोस्तान इनफार्मेशन एवं कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (आई.सी.टी.) उत्पादों पर लगे 20 प्रतिशत के मौजूदा शुल्क को पूरी तरह से हटा दे।

इसके साथ ही अमरीका ने हिन्दोस्तान के साथ अपने व्यापार में बेहद ऊंचे घाटे के बारे में भी चिंता व्यक्त की है। 2018-19 में हिन्दोस्तान से अमरीका के लिए निर्यात 52.4 अरब अमरीकी डॉलर था जबकि आयात केवल 35.5 अरब अमरीकी डॉलर था।

एक अन्य मुद्दा जिसे अमरीका ने उठाया, वह है हिन्दोस्तान में ई-कॉमर्स संबंधी नीति। फरवरी 2019 में ई-कॉमर्स क्षेत्र के लिए नए निवेश नियमों की घोषणा की गयी। अमरीका ने अपना तर्क पेश किया कि हिन्दोस्तान की ई-कॉमर्स संबंधी नीति अमेजन और वालमार्ट जैसी अमरीकी कंपनियों को चोट पहुंचा रही है, जो कि खुदरा ई-कॉमर्स क्षेत्र में सबसे बड़ी इजारेदार कंपनियां हैं। अमेजन के पास ई-कॉमर्स बाज़ार की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है और दुनियाभर में 150 अरब डॉलर का कारोबार करती है। हिन्दोस्तान में इस कंपनी का कारोबार लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दूसरी कंपनी है वालमार्ट, जिसकी दुनियाभर में 500 अरब डॉलर की आमदनी है। इस कंपनी ने हाल ही में हिन्दोस्तानी ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट को खरीद लिया है। छोटे खुदरा व्यापारियों को बचाने के नाम पर हिन्दोस्तान की सरकार अपनी नयी ई-कॉमर्स नीति को जायज़ ठहरा रही है। मगर असलियत में यह हिन्दोस्तानी और विदेशी खुदरा व्यापार इजारेदार कंपनियों की आपसी लडाई है, क्योंकि हिन्दोस्तान की सबसे बड़ी खुदरा इजारेदार कंपनी रिलायंस ने ई-कॉमर्स क्षेत्र में उतरने और उनके साथ होड़ लगाने की घोषणा की है।

अमरीकी सरमायदार हिन्दोस्तान की डाटा - लोकलाईजेशन (डाटा- स्थानीयकरण) की नीति का भी विरोध कर रहे हैं। अप्रैल 2018 भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक कानून बनाया, जिसके अनुसार विदेशी भुगतान (पेमेंट) कंपनियों को हिन्दोस्तानी ग्राहकों के साथ किये गए सौदों की सारी जानकारी को केवल हिन्दोस्तान में स्थित सर्वर में रखना अनिवार्य होगा। इस तरह के डाटा की क़ीमत को समझते हुए हिन्दोस्तानी सरमायदार इस जानकारी को हिन्दोस्तान की धरती तक सीमित रखना चाहते हैं। जबकि इस विषय पर हिन्दोस्तान और अमरीकी अधिकारियों के बीच बातचीत चल रही है, डाटा लोकलाईजेशन का मुद्दा हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच आर्थिक संबंधों के संदर्भ में एक रुकावट बन गया है।

डाटा की मालिकी और उसे कहां सुरक्षित किया जा रहा है यह विषय असलियत में अमरीकी और हिन्दोस्तानी सरमायदारों के बीच टकराव का मुद्दा है। जनवरी 2019 में वाइब्रेंट गुजरात को संबोधित करते हुए मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री मोदी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बढ़ते “डाटा उपनिवेशवाद” के ख़िलाफ़ क़दम उठाने के लिये कहा और बताया कि हिन्दोस्तानियों के डाटा पर हिन्दोस्तानियों की मालिकी और नियंत्रण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि “डाटा (इस नयी वैश्विक व्यवस्था में) यह नया तेल है। डाटा नयी दौलत है”, और आगे बताया कि “आज हमें डाटा उपनिवेशवाद के खि़लाफ़ एक नया आन्दोलन छेड़ने की ज़रूरत है। यदि हिन्दोस्तान को इस डाटा-संचालित क्रांति में सफल होना है तो, हमें हिन्दोस्तानी डाटा का नियंत्रण और उसकी मिलकियत को वापस हिन्दोस्तान के हाथों में हस्तांतरित करना होगा, इसका मतलब है, हिन्दोस्तानियों की इस दौलत को वापस हर एक हिन्दोस्तानी के हाथों में देना होगा”। दूसरी ओर गूगल, फेसबुक, ट्विटर, एप्पल, इत्यादि जैसी अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां डाटा पर अपनी वैश्विक इजारेदारी को बरकरार रखना चाहती हैं।

एक अन्य विषय जिसपर हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच तनाव बना हुआ है वह है, अमरीका में काम करने के लिए वीजा के नियमों को सख़्त किया जाना। इसकी वजह से अमरीका में हिन्दोस्तानी तकनीकी मज़दूरों की संख्या में बहुत बड़ी कमी आ सकती है, जो कि एच-1बी वीजा के मुख्य लाभार्थी हैं। अमरीका के इस क़दम की वजह से पहले ही हिन्दोस्तानी कंपनियों को अपने अमरीकी प्रोजेक्ट्स पर अमरीकी पेशेवरों को नौकरी पर रखना पड़ा है, जिससे उनके खर्चे काफी बढ़ गए हैं।

हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच व्यापार पर बातचीत इन दोनों देशों के बीच बढ़ती सैनिकी रणनैतिक सांझेदारी की पृष्ठभूमी में हो रही है। एशिया में हिन्दोस्तान की रणनैतिक स्थिति, बड़ी आबादी और विशाल सशस्त्र बल के मद्देनज़र अमरीका चीन को घेरने और हिन्द-प्रशांत महासागर इलाके में अपने वर्चस्व को क़ायम करने की अपनी योजना में हिन्दोस्तान को एक महत्वपूर्ण सांझेदार के रूप में देखता है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार यह सोचते हैं कि वे अमरीकी साम्राज्यवादियों की मदद से चीन को चुनौती दे सकते हैं और इस इलाकें में एक मुख्य साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर सकते हैं। हिन्दोस्तानी सरमायदार अमरीकी बाज़ारों में और अधिक घुसने की इजाज़त के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं और इसके बदले में अमरीका से हथियार और कच्चा तेल खरीदने की पेशकश पर रहे हैं। इस वजह से दोनों ही अमरीकी साम्राज्यवादी सरमायदार और हिन्दोस्तानी सरमायदार कोशिश कर रहे हैं कि व्यापार विवाद रणनैतिक संबंधों में रुकावट न बन जाये। हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच यह रणनैतिक सांझेदारी पूरी तरह से हिन्दोस्तान के लोगों के हितों और इस इलाके में शांति के खि़लाफ़ है।   

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Nov 1-15 2019    World/Geopolitics    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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