महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए हिन्दोस्तानी राज्य पर निर्भर नहीं किया जा सकता है

हैदराबाद में 27 नवम्बर को एक युवती, जो पशु-चिकित्सक डॉक्टर थी, का बेरहमी से सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर उनका कत्ल करके उनकी लाश को जला दिया गया और नाले में फेंक दिया गया। देशभर में लोगों ने इस जघन्य काण्ड की कड़ी निंदा की है। देश के अनेक शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं और पुरुषों ने भारी संख्या में आगे आकर अपना गुस्सा प्रकट किया और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की असुरक्षा के लिए राज्य को जिम्मेदार ठहराया। लोगों ने मांग की कि पूरे काण्ड की जांच की जाये और दोषी साबित किये गए लोगों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये। महिलाओं को सुरक्षा दिलाने में राज्य की नाक़ामयाबी के लिए, लोगों ने सड़कों पर निकलकर और सोशल मीडिया के ज़रिये, राज्य की खूब निंदा की है। 

Protest against rape and murder of Hyderabad vet
Protest against rape

इस भयावह काण्ड ने लोगों के मन में दिसंबर 2012 में दिल्ली की एक बस में एक युवती के बर्बरतापूर्ण सामूहिक बलात्कार और कत्ल की यादें फिर से ताजी कर दीं। देशभर में महिलाओं के बलात्कार और यौन हमलों के अनगिनत हादसे फिर याद आये। उसी हफ्ते के अन्दर, देश के अलग-अलग भागों से, महिलाओं के बलात्कार के 7 और कांडों की रिपोर्टें मिलीं। इनमें शामिल थीं बच्चियां, पचास बरस से अधिक उम्र की महिलाएं और युवतियां, जिनमें से एक को बलात्कारियों ने ज़िंदा जला दिया। तेलंगाना राज्य में ही इससे पिछले हफ्ते में कई बलात्कार और कत्ल के कांडों की रिपोर्टें आयीं।

हमारे देश की महिलाएं निरंतर बर्बरतापूर्ण यौन हमलों और उत्पीड़न का शिकार बनती रहती हैं। सड़कों पर, सार्वजनिक स्थानों पर, ट्रेनों और बसों पर, महिलाओं को लगातार धमकियों, हमलों, बेइज़्ज़ती और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में, हमलावर खुल्लम-खुल्ला हमले करते हैं, इस भरोसे के साथ कि राज्य उन पर कोई कार्यवाही नहीं करेगा। महिलाओं पर बहुत भारी सामाजिक दबाव होता है। महिला पर हुए हर हमले के लिए महिला को खुद को ही दोषी बताया जाता है। इन हालातों के चलते, बलात्कारियों और हमलावरों को यह आश्वासन होता है कि महिला को बचाने के लिए कोई आगे नहीं आयेगा, कि महिला और उसके परिजन मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करेंगे। ज्यादातर मामलों में, पुलिस और अधिकारी पीड़िता के दुःख-दर्द के प्रति उदासीन और असंवेदनशील होते हैं, पीड़िता व उसके परिवार पर ही शक करते हैं और उन्हें तरह-तरह से तड़पाते हैं। अगर महिला न्याय के लिए संघर्ष करती है, तो उसे अपने दर्दनाक क्षणों से बार-बार गुजरना पड़ता है, बार-बार बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ता है।

कई मंत्री, सरकारी अधिकारी और कई राजनीतिक पार्टियों के उच्च नेता नियमित तौर पर महिलाओं का असम्मान करते हुए और महिलाओं पर  अपराधों को उचित ठहराते हुए, बयान देते रहते हैं। वे महिलाओं पर हमलों के लिए महिलाओं को ही दोषी ठहराते हैं और राज्य व सामाजिक व्यवस्था को, जिसकी वे रक्षा करते हैं, उन्हें वे निर्दोष बताते हैं। ये मंत्री, अधिकारी और नेता अक्सर खुद ही महिलाओं पर जघन्य अपराध करते हैं और फिर, सत्ता और समाज में अपने रुतबे का फायदा उठाकर, बच निकल जाते हैं। धर्म और आस्था के नाम पर भी महिलाओं का यौन शोषण किया जाता है। कार्य स्थल पर महिलाओं को मालिकों और उच्च अधिकारियों द्वारा यौन शोषण का सामना करना पड़ता है। नौकरी खोने के डर से महिला को अक्सर यह सब चुपचाप सहना पड़ता है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खि़लाफ़ महिलाओं के लम्बे संघर्ष की वजह से राज्य को महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर कुछ सुरक्षा क़दमों का वादा करना पड़ा है, परन्तु ये वादे ज्यादातर मामलों में सिर्फ कागज़ पर ही रह जाते हैं।

राज्य के सशस्त्र बल और सुरक्षा बल खुल्लम-खुल्ला महिलाओं पर हमले करते हैं। “घर-घर तलाशी लेने”, “संदिग्ध उग्रवादियों को पकड़ने” आदि के बहाने, महिलाओं का बलात्कार किया जाता है। जिन-जिन इलाकों में सैनिक शासन लागू है, वहां महिलाओं को हमेशा डर लगा रहता है कि कब उनकी इज़्ज़त को लूट लिया जायेगा। सेना व सुरक्षा बलों द्वारा यौन उत्पीड़न को लेकर महिलाएं अदालत में भी नहीं जा सकतीं।

राज्य द्वारा दलितों, आदिवासियों और खास समुदायों के खि़लाफ़ सुनियोजित हमलों में महिलाओं को यौन हिंसा व अन्य प्रकार की हिंसा का निशाना बनाया जाता है। राज्य द्वारा बार-बार आयोजित किये जाने वाले सांप्रदायिक हत्याकांडों में महिलाओं को खास तौर पर निशाना बनाया जाता है।

अपराधियों को सज़ा नहीं दी जाती है। इसलिए महिलाओं पर हिंसा नहीं रुकती। महिलाओं और लोगों के गुस्से का सामना करने के लिए सरकार के घिसे-पिटे तौर-तरीके हैं जांच आयोग बिठाना, पुलिस गश्त को बढ़ाना, महिलाओं के लिए विशेष प्रोग्राम चलाना, हेल्प लाइन चलाना, इत्यादि। हजारों महिलाएं जो हर रोज़ ख़तरों का सामना करके काम पर जाती-आती हैं, वे पुलिस हेल्प लाइन से मदद पाने की अपनी बेअसर कोशिशों की ढेर सारी कहानियां सुना सकती हैं। इन सभी क़दमों के ज़रिये, राज्य इंसाफ और महिलाओं पर हिंसा को रोकने की मांग करने वालों के गुस्से को ठंडा करने की कोशिश करता है। 

इस मामले में भी, तेलंगाना के एक मंत्री ने पीड़िता को दोषी ठहराया, कि उन्होंने मदद के लिए अपनी बहन को फोन किया था, पुलिस हेल्प लाइन को नहीं! पुलिस और अधिकारियों ने पीड़िता के परिजनों को बहुत तंग किया और बेइज़्ज़त किया।

पूरे समाज में, महिलाएं और पुरुष महिलाओं पर इस हिंसा को ख़त्म करने की मांग उठा रहे हैं। लोग सड़कों पर उतरकर यह मांग कर रहे हैं कि राज्य महिलाओं को सुरक्षा दिलाने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाए। लोग यह मांग कर रहे हैं कि महिलाओं पर किये गए हमलों की पूरी जांच होनी चाहिए, जांच में कोई पूर्वाभास नहीं होना चाहिए और पीड़िता का किसी प्रकार का असम्मान नहीं होना चाहिए। अपराधियों का अपराध साबित होने पर उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए, चाहे उनका राजनीतिक या सामाजिक दर्ज़ा कुछ भी हो।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी महिलाओं और पुरुषों से आह्वान करती है कि समानता और इंसाफ के लिए तथा हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए संघर्ष को तेज़ करें - एक ऐसी नयी व्यवस्था की स्थापना के लिए, जिसमें महिलाओं को उत्पादनकारी इंसान बतौर और नयी पीढ़ी को जन्म देने में उनकी विशेष भूमिका के बतौर, सम्मान और आदर मिलेगा।

”महिलाओं को इंसाफ दिलाने“ के नाम पर राजकीय आतंकवाद नहीं!

6 दिसंबर की सुबह को, “इंसाफ” के नाम पर की गई, राजकीय आतंकवाद की एक शर्मनाक हरकत की ख़बर आयी। हैदराबाद बलात्कार और हत्याकाण्ड के लिए जिन चार “संदिग्ध” आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया था, उन्हें पुलिस ने सुबह-सुबह “मुठभेड़” में मार डाला। यह वास्तव में हिरासत में क़त्ल का मामला था, फर्ज़ी “मुठभेड़” थी। आरोपी पुलिस की हिरासत में थे, निहत्थे थे। पुलिस का दावा - कि जब पुलिस आरोपियों को अपराध के घटना स्थल पर ले जा रही थी तब आरोपियों ने “पुलिस पर हमला किया” - यह सरासर झूठ है।

जाना जाता है कि कुछ सांसद पुलिस के इस क़दम की सराहना कर रहे हैं, कह रहे हैं कि “इंसाफ हुआ है”, अपराध का “बदला लिया गया है”, इत्यादि। पर जो किया गया है, वह सरासर अन्याय है, एक वहशी क़दम है।

इस क़दम के ज़रिये हमारे हुक्मरान देश की महिलाओं और लोगों को यह सन्देश दे रहे हैं कि - राज्य तुन्हें सुरक्षा नहीं दे सकता है। राज्य महिलाओं पर किये गए अपराधों की जांच नहीं कर सकता है, अपराध नहीं साबित कर सकता है, अपराधियों को सज़ा नहीं दे सकता है। इन्साफ की मांग करने वाली महिलाओं को राज्य बेइज़्ज़ति और उत्पीड़न से नहीं बचा सकता है। राज्य महिलाओं को डर और असम्मान से मुक्त जीवन नहीं दिला सकता है। इंसाफ की मांग के जवाब में, राज्य सिर्फ कुछ लोगों को शक के आधार पर पकड़ कर, उन्हें मार-पीटकर, उनसे कुछ भी कबूल करवा लेगा। अगर वे साधारण ग़रीब लोग हैं जो अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं, तो पुलिस उन्हें फर्ज़ी मुठभेड़ में मार डालेगी और घोषित कर देगी कि अपराधी मारे गए हैं। इसके लिए ज़रूरी नहीं है कि पुलिस कोई सबूत पेश करे कि अपराधी वे ही थे। वे बेकसूर हो सकते हैं परन्तु राज्य यह दावा करेगा कि “इंसाफ मिल गया है”! राज्य ने अपनी ज़िम्मेदारी निभा ली। पर अगर आरोपी अमीर लोग हों, जिनका सत्ता के साथ संबंध हो, तो उनके खि़लाफ़ बहुत सारे सबूत होने के बावजूद, पुलिस और राज्य के अधिकारी उस सबूत को नष्ट कर देंगे, गवाहों को खरीद लेंगे या चुप करवा देंगे और अपराधी बच जायेंगे।

यही पुलिस और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाये रखने वाली एजेंसियों की स्वाभाविक कार्यप्रणाली है। “न्याय” के नाम पर बार-बार ऐसा होता है। हर प्रकार के अन्याय के पीड़ितों के साथ बार-बार ऐसा होता है।

यह “न्याय” के नाम पर राजकीय आतंकवाद है।

राज्य बड़े सुनियोजित तरीके से लोगों को हिरासत में या फर्ज़ी मुठभेड़ में मार डालता है। फर्ज़ी मुठभेड़ों में अनगिनत बेगुनाह लोग मारे गए हैं।

“लोगों की मांग को पूरा करने” और “जल्दी न्याय दिलाने” के नाम पर इस फर्ज़ी मुठभेड़ और क़त्ल को जायज़ ठहराने वाला यह राज्य आज तक, 27 बरस बाद भी, उन लोगों को सज़ा नहीं दे सका है, जो बाबरी मस्जिद को गिराने और पूरे देश में खून-खराबा फैलाने के अपराधी हैं। सरकार के अपने ही जांच आयोगों ने उनके अपराध के ढेर सारे सबूत पेश किये हैं और लोगों ने लगातार इतने सालों तक उन्हें सज़ा देने की मांग की है।

हमारे देश के लोगों, महिलाओं और पुरुषों, को “इंसाफ” के नाम पर यह राजकीय आतंकवाद मंजूर नहीं है। हम मांग करते हैं कि राज्य और उसके सारे अंग - सरकार, पुलिस, कानून-व्यवस्था बनाये रखने वाली एजेंसियां, न्यायपालिका - लोगों के प्रति जवाबदेह हों और अपनी ज़िम्मेदारी निभाएं। हम चाहते हैं कि लोगों के खि़लाफ़ हर अपराध की पूरी जांच हो। हम मांग करते हैं कि सबूत को सबके सामने रखा जाये और अपराधी साबित होने वालों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी लोगों से आह्वान करती है कि राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़ और देश के नव-निर्माण के लिये संघर्ष को तेज़ करें - एक ऐसी नयी व्यवस्था के लिए, जिसमें ज़मीर के अधिकार समेत सभी मानव अधिकारों को अलंघनीय माना जायेगा और उनका आदर किया जायेगा व उन्हें सुनिश्चित किया जायेगा।

Tag:   

Share Everywhere

Dec 16-31 2019    Voice of the Party    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

(Click thumbnail to download PDF)

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)