पूंजीवादी नुस्खे हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर नहीं निकाल सकते

काफी लम्बे समय से हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था संकट में फंसी हुई है। बढ़ती बेरोज़गारी, मज़दूरों के वास्तविक वेतन में स्थिरता या गिरावट और मेहनतकश लोगों द्वारा वस्तुओं की खपत में गिरावट इस संकट के लक्षण हैं।

हिन्दोस्तान में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य और उसकी हिन्दोस्तान में खपत और उसके निर्यात का मूल्य आर्थिक वृद्धि के मुख्य सूचकांक हैं। पूंजीपतियों और सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश एक और सूचकांक है।

पिछले वर्ष की तुलना में 2019-20 के वित्तीय वर्ष के पहले चतुर्थांश में घरेलू खपत सकल घरेलू उत्पाद के 8.41 प्रतिशत से गिर कर 6.66 प्रतिशत हो गई। निर्यात सकल घरेलू उत्पाद के 20 प्रतिशत अंश से घट कर 19 प्रतिशत हो गया है। एक वर्ष में उत्पादक शक्ति की रचना के लिए किये गए पूंजी निवेश को “अचल पूंजी निर्माण” के नाम से जाना जाता है और यह भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का एक और लक्षण है। इस दौरान अचल पूंजी निर्माण सकल घरेलू उत्पाद के 31 प्रतिशत अंश से घट कर 29.8 प्रतिशत हो गया है।

ये सभी घटक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब बेरोज़गारी ज्यादा है वास्तविक वेतन में गिरावट होती है, लोगों के पास वस्तुएं और सेवाएं खरीदने के लिए कम धन रह जाता है। खपत में इस गिरावट के कारण पूंजीपतियों द्वारा उत्पादन में कटौती की जाती है, कारखाने बंद किये जाते हैं और मज़दूरों की छंटनी की जाती है। जैसे-जैसे और मज़दूर नौकरियां खोते हैं, खपत और कम होती जाती है। 

यह दुष्चक्र है जिससे पूंजीवादी समाज कभी बाहर नहीं निकल सकता है। अधिकतम लाभ का लालच बड़े पूंजीपतियों और इजारेदारों को मज़दूरों से ज्यादा  से ज्यादा अतिरिक्त मूल्य निचोड़ने, कम मज़दूरों से और अधिक उत्पादन करवाने, स्थायी मज़दूरों को काम से निकालने और उनकी जगह ठेका मज़दूरों को काम पर रखने को मजबूर करता है।

इस आर्थिक संकट पर काबू पाने का एक ही मार्ग है कि मज़दूरों और किसानों के शोषण की पूंजीवादी व्यवस्था को हटाया जाए और अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की बजाय लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में मोड़ा जाए।

बड़े इजारेदारों द्वारा नियंत्रित पूंजीवादी राज्य वास्तव में “आर्थिक सुधार” के नाम पर संकट का इस्तेमाल मज़दूरों और किसानों पर और हमले करने के लिए करता है। इजारेदार संकट का इस्तेमाल संकट से प्रभावित प्रतिद्वंदियों को निगल कर और बड़ा बनने के लिए और अर्थव्यवस्था पर अपना कब्ज़ा मजबूत करने के लिए करते हैं। जब समाज में उत्पादन क्षमता की वृद्धि के लिए पूंजी की मांग कम होती है तब ज्यादा से ज्यादा पूंजी लाभ अर्जित करने के लिए सट्टेबाज़ी में लगायी जाती है। आज हम देश में यही होता देख रहे हैं। दोनों ही, हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजी का अर्थव्यवस्था में निवेश हो रहा है लेकिन वह वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए नहीं बल्कि सट्टेबाज़ी के लिए हो रहा है। शेयर बाज़ार नयी ऊंचाई छू रहा है जबकि अर्थव्यवस्था नयी गहराई में धंस रही है। विदेशी निवेशकों ने 2019 में ही हिन्दोस्तानी शेयर बाज़ार में 80,000 करोड़ रुपये से अधिक पूंजी लगायी है। जब मज़दूरों का वेतन घट रहा है और अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है, सबसे अमीर हिन्दोस्तानी की पूंजी केवल एक वर्ष में 50 प्रतिशत बढ़कर 60 बिलियन डॉलर (4,25,000 करोड़ रुपये) हो गई है!

हर क्षेत्र में इजारेदारी बढ़ रही है। टेलीकॉम को उदारीकरण नीति की सबसे बड़ी सफलता बताया जाता है लेकिन उसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा इजारेदारी होने वाली है। दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (आई.बी.सी.) बड़े इजारेदारों को और बड़ा बनने में मदद कर रहा है। टाटा, जिंदल, मित्तल जैसे घरानों ने आई.बी.सी. के माध्यम से दूसरे पूंजीपतियों की बड़ी स्टील कंपनियां खरीद ली हैं।

राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है लेकिन राज्य का खर्चा मज़दूरों और किसानों को सहायता देने के लिए नहीं बल्कि पूंजीपतियों के कर्ज़ को माफ़ करने और उनके लाभ बढ़ाने के लिए विभिन्न क़दमों को लिया जा रहा है।

अगस्त 2019 में वित्त मंत्री ने सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों में और 70,000 करोड़ रुपये पूंजी लगाने की घोषणा की। उन्होंने दावा किया कि इससे बैंक ज़रूरतमंदों को कर्ज़ दे पाएंगे। परन्तु  हक़ीक़त में यह रियल स्टेट, मोटरगाड़ी, टेलीकॉम जैसे उन क्षेत्रों के पूंजीपतियों के फायदे के लिये है जिन क्षेत्रों में बिना बिका भंडार बढ़ रहा है और लाभ दर कम होते जाने के कारण नुकसान हो रहा है।

अगस्त में ही आयकर विभाग ने 25 करोड़ रुपये आमदनी तक की नयी शुरू की गई कंपनियों (स्टार्ट-अप) के लिए ‘आसान शर्तों वाला कर’ (एंजिल टैक्स) माफ करने की घोषणा की। एंजिल कर नयी शुरू की गई कंपनियों द्वारा इकट्ठी की गई उस पूंजी पर लगाया जाता है जो कंपनी के शेयरों के मौजूदा मूल्य से अधिक होती है। अधिकांश नयी शुरू की गई कंपनियों (स्टार्ट-अप) में पूंजी सॉफ्टबैंक जैसे हिन्दोस्तानी और वैश्विक फंडों द्वारा लगायी जाती है। 

नवम्बर में सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये का वैकल्पिक निवेश फंड स्थापित करने की घोषणा की जिसका उद्देश्य है रियल स्टेट की अधूरी परियोजनाओं के लिये पूंजीपतियों को धन देना। सरकार ने इसे यह कह कर उचित ठहराया कि इससे उन हजारों घर खरीदने वालों को अपना घर पाने में मदद मिलेगी। जहां घर खरीदने वालों को देरी के लिए कोई मुआवज़ा नहीं मिलेगा, पूंजीपतियों को इस मदद का पूरा लाभ मिलेगा।

पूंजीवादी इजारेदार सरकार को सलाह दे रहे हैं कि “आर्थिक सुधारों” को तेज़ी से करने के लिए आर्थिक संकट का इस्तेमाल करना चाहिए। आर्थिक सुधारों का उद्देश्य नयी उत्पादन क्षमता की स्थापना के लिए पूंजीपतियों को प्रलोभन देकर पूंजी निवेश को ज्यादा आकर्षक बनाना है। मज़दूरों को बताया जाता है कि यह उनके फायदे के लिए किया जा रहा है क्योंकि इससे नए रोज़गार पैदा होंगे। इस दिशा में अनेक क़दम ले लिए गए हैं और अन्य अनेक क़दमों की योजना बनाई जा रही है।

सितम्बर में सरकार ने कंपनी लाभ पर कर 30 प्रतिशत से 22 प्रतिशत उन कंपनियों के लिए घटाने की घोषणा की जो कोई भी कर रियायत का लाभ नहीं लेते हैं और नए उत्पादकों के लिए कर 25 प्रतिशत से 15 प्रतिशत घटा दिया।

अक्तूबर में रिजर्व बैंक ने इस वर्ष में 5वीं बार ब्याज दर घटाई। अब तक ब्याज में कुल 1.35 प्रतिशत की कमी की गई है। इसे घर के लिये कर्ज़ लेने वाले ग्राहकों के लिए बड़ी मदद बताया गया है। लेकिन जो छुपाया गया, वह है कि ब्याज दर में गिरावट बड़े पूंजीपतियों के लिए बहुत लाभदायक है क्योंकि वे ही बैंकों के सबसे बड़े कर्ज़दार होते हैं। ब्याज दर में गिरावट मुख्यतः पूंजीपतियों और इजारेदारों को वित्तीय खर्च कम करने और उनका लाभ बढ़ाने में मदद करता है। दूसरी तरफ, अपनी ज़िन्दगी की बचत बैंकों में जमा करने वाले करोड़ों लोगों को कम ब्याज मिलता है।

टेलीकाम कंपनियों ने सरकार को 13 अरब डॉलर की बकाया रकम अदा नहीं की है। यह उन्होंने एयरवेव की नीलामी के समय देना मंजूर किया था। अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि टेलीकम्युनिकेशन विभाग की बकाया रकम की मांग उचित है। लेकिन अब टेलीकाम कंपनियों ने सरकार को एक विशेष कमेटी बनाने पर मजबूर कर दिया है जो एयरवेव की क़ीमत घटाने का और सभी गांवों में टेलीकॉम सेवा पहुंचाने के लिए सरकार द्वारा स्थापित फंड को इन इजारेदारों द्वारा दिए जाने वाले हिस्से को कम करने का निर्णय लेगी।

पूंजीपति सार्वजानिक क्षेत्र के उद्यमों के निजीकरण को और आकर्षक बनाने का दवाब डाल रहे हैं। वे चाहते हैं कि एयर इंडिया को बेचने के पहले उसका पूरा कर्ज़ माफ कर दिया जाए। एयर इंडिया बेचने को आसान बनाने के लिए सरकार हवाई यातायात में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने का विचार कर रही है। पूंजीपतियों के लिए 150 निजी ट्रेनें चलाना आकर्षक बनाने के लिए आकर्षक शर्तें रखी जा रही हैं। उन्हें मांग के अनुसार टिकट दर निश्चित करने की छूट दी जा रही है। कुछ दिन पहले ही पूंजीपतियों के लिए यात्री दरों को आकर्षक बनाने के लिए उन्हें बढ़ा दिया गया है।

आर्थिक गतिविधियों में गिरावट के कारण इस वर्ष जी.एस.टी. की वसूली कम हुई है। सरकार ने घोषणा की है कि कम वसूली को पूरा करने के लिए वह जी.एस.टी. करों की दरों को बढ़ाने का विचार कर सकती है। इसका मतलब लोगों पर अप्रत्यक्ष कर बढ़ाने की योजना बनायी जा रही है जबकि कॉर्पोरेट कर की दर कम करके पूंजीपतियों का लाभ बढ़ाया जा रहा है। 

जहां बड़े पूंजीपतियों ने अपना लाभ सुनिश्चित रखने या बढ़ाने के लिए विभिन्न मांगें पेश कर दी हैं, विभिन्न क्षेत्रों के पूंजीपतियों के बीच सरकार द्वारा दी गई सहायता का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हड़पने की लड़ाई चल रही है।

यह सरकार पूंजीपति वर्ग की सरकार है। यह वही कर रही है जिसका उससे अंदेशा है - मज़दूरों और अन्य शोषित वर्गों से ज्यादा से ज्यादा पूंजी पूंजपतियों को हस्तांतरित करना। बजट सलाह प्रक्रिया द्वारा पूंजीपतियों के अंतर्विरोधों को सुलझाने का कार्य भी उसे सौंपा गया है।

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Jan 16-31 2020    Political-Economy    Economy     Privatisation    Rights     2020   

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