दिल्ली विधान सभा चुनाव 2020 :

सांप्रदायिकता और बंटवारे की राजनीति को हराएं!

लोगों की आवाज़ उठाने वाले उम्मीदवारों को जितायें!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की दिल्ली इलाका समिति का बयान, 1 फरवरी, 2020

दिल्ली के लगभग 1.46 करोड़ मतदाता 8 फरवरी, 2020 को अपने प्रतिनिधि चुनने वाले हैं। इन चुनावों में प्रमुख प्रतिस्पर्धी पार्टियां हैं - भाजपा जो इस समय केंद्र सरकार चला रही है, आम आदमी पार्टी (आप) जो इस समय दिल्ली सरकार चला रही है और कांग्रेस पार्टी। भाजपा ने जनता दल (यू) और लोक जन शक्ति पार्टी के साथ गठबंधन बनाया है जबकि कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन बनाया है। 70 सीटों की इस विधान सभा के चुनावों में कई कम्युनिस्ट उम्मीदवार, अन्य छोटी पार्टियों के उम्मीदवार तथा निर्दलीय उम्मीदवार खड़े हो रहे हैं।

भाजपा “देश बचाया, अब दिल्ली बचाओ!” के नारे के साथ, प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर लिए, दिल्ली के मतदाताओं से वोट मांगने आ रही है। अपनी सफलताओं के उदाहरणों में वह बता रही है - कश्मीर में धारा 370 को रद्द किया, नागरिकता संशोधन कानून पास करके देश को ‘घुसपैठियों’ और ‘आतंकवादियों’ से बचाया, तीन तलाक बिल को पास करके ‘महिलाओं की रक्षा की’, इत्यादि।

परन्तु आज दिल्ली के कोने-कोने से जनता अपनी आवाज़ बुलंद करके, भाजपा की इन “सफलताओं”, इस दमनकारी, सांप्रदायिक और बंटवारे की राजनीति का जमकर विरोध कर रही हैं। लोग समझ रहे हैं कि भाजपा की ये “सफलताएं” वास्तव में हमारी एकता और भाईचारे को तोड़ने के पैशाचिक क़दम हैं, हमारे एकजुट संघर्षों को कुचलने, हमारे शोषण, लूट और दमन को जारी रखने व और तेज़ करने के ही क़दम हैं।

बीते एक महीने से दिल्ली में, कई स्थानों पर, लाखों-लाखों महिलाएं और पुरुष, नौजवान, कालेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र सड़कों पर निकलकर, यह मांग कर रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून (सी.ए.ए.) को रद्द किया जाये, जो धर्म को नागरिकता का आधार बनाता है। अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ संघर्ष कर रहे हैं। देशभर के अनेक शहरों और गांवों में भी ऐसे आन्दोलन चल रहे हैं। लोग मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार देशभर में नागरिकता की राष्ट्रीय पंजी (एन.आर.सी.) तैयार करने के अपने फैसले को वापस ले, जिसके आधार पर यह तय किया जायेगा कि “कौन नागरिक है” और लाखों-लाखों निर्दोष लोगों को “घुसपैठिया” करार दिया जायेगा व जेल में बंद किया जायेगा या देश से बाहर निकाल दिया जायेगा। लोग सरकार को चुनौती देते हुए यह ऐलान कर रहे हैं कि “हिन्दोस्तान हमारा है, हम सब हिन्दोस्तानी हैं! इसका सबूत मांगने का अधिकार हम तुम्हें नहीं देंगे!”

भाजपा की केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया उसके बेहद जन-विरोधी चरित्र को दर्शाता है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने ऐलान किया है कि लोग चाहे कितना भी विरोध करें, “हम एक इंच पीछे नहीं हटेंगे”। जनता के इस विरोध को कुचलने के लिए भयानक आतंक की मुहिम चलायी जा रही है। प्रदर्शनकारी छात्रों को मारा-पीटा जा रहा है। सुरक्षा बलों और सरकारी एजेंटों द्वारा हिंसा भड़काने की कोशिशों के लिए लोगों को दोषी बताते हुए झूठा प्रचार किया जा रहा है कि सी.ए.ए. और एन.आर.सी. का विरोध करने वाले लोग “राष्ट्र-विरोधी”, “आतंकवादी”, “पाकिस्तानी एजेंट”, आदि हैं, ताकि उन पर राज्य के वहशी बल प्रयोग को जायज़ ठहराया जा सके। परन्तु लोग बहादुरी से अधिकारियों को चुनौती देते हुए, अपने विरोध को जारी रख रहे हैं।

5 अगस्त, 2019 को भाजपा सरकार ने संसद में एकमत से, दूसरे दलों के सांसदों से या कश्मीर और देश की जनता से कोई सलाह-मशवरा किये बिना, यह फैसला घोषित कर दिया कि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्ज़े को ख़त्म किया जायेगा और उसे दो केंद्र-प्रशासित प्रदेशों में बांट दिया जायेगा, तो उस समय और उसके बाद हजारों केन्द्रीय सशस्त्र सैनिकों को वहां तैनात किया गया। बीते साढ़े पांच महीनों से कश्मीर को एक कैद खाना जैसा बना दिया गया है। कश्मीर के लोगों के सारे जनवादी अधिकार, यहां तक कि इन्टरनेट इस्तेमाल करने का भी अधिकार, छीन लिए गए। कई सांसदों और भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों समेत, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता अभी भी जेल में बंद हैं। इस आतंक की मुहिम को ‘हिन्दोस्तान की एकता और अखंडता की रक्षा’ करने के नाम पर जायज़ ठहराया जा रहा है।

“महिलाओं की रक्षा” का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के शासन के चलते, पूरे देश में, महिलाओं को क़दम-क़दम पर बलात्कार, यौन हिंसा, छेड़छाड़ और हर प्रकार की बेइज्ज़ति व हिंसा का सामना करना पड़ता है। दिल्ली में महिलाओं पर हिंसा रोज़ की ख़बर बन गयी है। भाजपा के कई नेता महिलाओं पर हिंसा और बलात्कार के दोषी ठहराए गए हैं, परन्तु राज्य और प्रशासन उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। 

8 जनवरी, 2020 को 25 करोड़ लोगों ने मज़दूर ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर, एक-दिवसीय आम हड़ताल में भाग लिया था। उन्होंने सम्मानजनक मानव जीवन जीने लायक न्यूनतम वेतन की मांग की। उन्होंने ठेका मज़दूरी, निजीकरण और श्रम कानूनों के पूंजी-परस्त संशोधनों को ख़त्म करने की मांग की। उन्होंने किसानों के कर्ज़ों को माफ़ करने की मांग की। उन्होंने एक ऐसी सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की मांग की, जिसमें सभी ज़रूरत की चीजें सस्ते दामों पर उपलब्ध होंगी। उन्होंने किसानों के उत्पादों के लिए सरकारी ख़रीदी की व्यवस्था की मांग की, जो किसानों के लिए स्थाई और लाभदायक दामों को सुनिश्चित करेगी। दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों से, कई लाखों मजदूरों ने हड़ताल में भाग लिया। परन्तु मज़दूरों और किसानों की इन मांगों के लिए सरकार के कान बहरे हैं।

अच्छी और पर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की लोगों की मांग को अनसुना करके, सरकार देशी-विदेशी बड़ी-बड़ी इजारेदार पूंजीवादी अस्पतालों चेनों को पूरी छूट दे रही है कि दिल्ली व देश के अन्य शहरों को मेडिकल टूरिज्म के केंद्र बनाए जायें, ताकि पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को और बढ़ाया जाये तथा जनता को और लूटा जाये। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की हालत दयनीय है।

दिल्ली के विश्वविद्यालयों और देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राएं फीस बढाने और शिक्षा का निजीकरण करने की बढ़ती कोशिशों के ख़िलाफ़ भारी संख्या में निकलकर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, क्योंकि इससे अच्छी शिक्षा लाखों-लाखों नौजवानों की पहुंच के बाहर हो जायेगी। इस जायज़ संघर्ष को बदनाम करने और कुचलने के लिए भाजपा की सरकार छात्रों को “टुकड़े-टुकड़े गैंग” करार देती है और उन पर देश को तोड़ने व राजद्रोह करने का आरोप लगाती है, उन्हें पीटने के लिए नकाबपोश गुंडों को लामबंध करती है।

एक तरफ स्कूलों और कालेजों में शिक्षकों की नियुक्ति न किये जाने के कारण बच्चों और नौजवानों की पढ़ाई को नुक्सान हो रहा है, तो दूसरी तरफ गेस्ट टीचरों और एड-होक टीचरों द्वारा आधे से कम वेतन पर दुगुना काम करवाया जा रहा है। दिल्ली में गेस्ट टीचर और एड-होक टीचर बीते कई सालों से स्थाई नौकरी और पूर्ण वेतन की मांग को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं, परन्तु उनकी मांग पूरी नहीं की जा रही है। आज लाखों-लाखों शिक्षित-प्रशिक्षित नौजवान रोज़गार की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

दिल्ली में 4 लाख से ज्यादा मज़दूर परिवार झुग्गी-झोपड़ियों में, पानी, शौच प्रबंध, सीवर और बुनियादी सुविधायों के बिना, बीते 40-50 सालों से जीने को मजबूर हैं। यही हालत कच्ची-कालोनियों और पुनर्वास कालोनियों की है। फैक्ट्रियों में अग्निकांड या इमारतों के ढह जाने जैसी दुर्घटनाओं में हर साल सैकड़ों मज़दूर मर जाते हैं। सरकार और प्रशासन की पूरी जानकारी और सांठगांठ के साथ, लोगों को ऐसी ख़तरनाक हालतों में काम करने को मजबूर होना पड़ता है।

छोटे उद्योग-धंधे वालों तथा रेहड़ी-पटरी के दुकानदारों पर आए दिन पुलिस प्रशासन के हमलों और लूट के चलते, उनका जीना कठिन है। दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है। यह दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। इस समस्या की मूल वजह, सुगम और सस्ती सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का अभाव और मेट्रो का महंगा भाड़ा।

भाजपा के “अच्छे दिन” लाने और “सबका साथ, सबका विकास” करने के वादे बस कुछ ही सालों में खोखले दिखते हैं। नोटबंदी - जिसका घोषित मक़सद था भ्रष्टाचार, आतंकवाद और काला धन को ख़त्म करना - से न तो भ्रष्टाचार ख़त्म हुआ है, न ही आतंकवाद या काला धन। बल्कि, ख़त्म हुई है देश के करोड़ों-करोड़ों मेहनतकशों की रोज़ी-रोटी। अब भाजपा “देश की एकता और अखंडता” के नाम पर लोगों की एकता तो तोड़ने की बेतहाशा कोशिशों में लगी हुयी है ताकि टाटा, अम्बानी, बिरला आदि जैसे मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुकूमत बरकरार रहे।

दूसरी ओर, टाटा, अम्बानी, बिरला और दूसरे बड़े-बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों तथा तमाम बड़ी-बड़ी विदेशी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के ज्यादा से ज्यादा पूंजीवादी मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के लिए, हमारे श्रम और संसाधनों को लूटने की खुली छूट दी जा रही है। उन्हीं के साथ सलाह करके सारे फैसले लिए जाते हैं, सारी योजनायें बनाई जाती हैं।

हर पांच साल बाद करवाया जाने वाला यह “मुक्त और निष्पक्ष चुनाव” एक बहुत बड़ा फरेब है। इजारेदार पूंजीवादी घराने अपनी पसंद की पार्टियों के चुनाव अभियानों के लिए खुलेआम धन देते हैं और उनमें से किसी एक को सत्ता में लाते हैं। सत्ता में आकर ऐसी पार्टियां पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को वफादारी से लागू करती हैं। इस समय भाजपा सबसे ज्यादा धनवान पार्टी के रूप में जानी जाती है। इजारेदार पूंजीवादी घरानों के मनपसंद चुनाव परिणाम को सुनिश्चित करने के लिए हर प्रकार की धांधली की जाती है। पूरी चुनाव प्रक्रिया इजारेदार पूंजीवादी घरानों के पैसों से समर्थित पार्टियों के पक्ष में काम करती है और लोगों के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ काम करती है। चुनाव वास्तव में, हुक्मरान इजारेदार पूंजीपति वर्ग के अन्दर, अलग-अलग इजारेदार पूंजीवादी घरानों के आपसी अंतर्विरोधों को हल करने और यह तय करने के साधन हैं कि अगले पांच सालों तक कौन लोगों को बुद्धू बनाकर उन्हें ज्यादा से ज्यादा लूटकर अपनी अमीरी को बढ़ाएगा।

फैसले लेने में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती है। फैसले लेने की ताक़त प्रधानमंत्री की अगुवाई में मंत्रिमंडल के हाथों में संकेंद्रित है। मंत्रिमंडल हुक्म जारी करके शासन करता है। मंत्रिमंडल विधायिकी के प्रति जवाबदेह नहीं है और विधायिकी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है।

लोगों की भूमिका सिर्फ वोट डालने तक सीमित हैं। बाकी सारी ताक़तें चुने गए प्रतिनिधि को सौंप दी जाती हैं। लोग न तो उम्मीदवारों का चयन कर सकते हैं, न ही चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहरा सकते हैं। लोग चुने गए प्रतिनिधि को वापस नहीं बुला सकते हैं। लोग न तो कानून प्रस्तावित कर सकते हैं, न ही कानून में कोई संशोधन कर सकते हैं। ऐसा करने की ताक़त सिर्फ संसद के पास है।

यही कारण है कि चुनावों से हमारा जनमत कभी प्रकट नहीं होता है। चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने, वह बड़े-बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के हितों के लिए ही काम करेगी और लोगों की मांगों को अनसुना कर देगी, जैसा कि अब तक करती आई है।

हमारे देश में राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया ऐसी है कि इसमें फ़ैसले लेने का अधिकार, यानी संप्रभुता, लोगों के हाथ में नहीं है। यह हुक्मरान वर्ग, इजारेदार पूंजीपति वर्ग, के हाथों में ही है। उनके धन से समर्थित और सत्ता पर बिठाई गयी राजनीतिक पार्टियों की सरकारों के द्वारा उनकी मनमर्ज़ी को पूरे समाज पर थोप दिया जाता है।

तो आइये बहनों और भाईयों, सांप्रदायिकता और बंटवारे की राजनीति को चलाकर हमारी एकता को तोड़ने वालों को हराएं! लोगों की आवाज़ उठाने वाले उम्मीदवारों को जितायें! इसके साथ-साथ, अपने ऊपर हो रहे हमलों को रोकने के लिए, अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए, अपनी एकता को मजबूत करें और एक नयी लोकतान्त्रिक व्यवस्था और प्रक्रिया, जिसमें फैसले लेने की ताकत अपने हाथों में हो, उसके लिए अपने संघर्ष को आगे बढ़ायें!

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Feb 16-29 2020    Statements    Communalism     Privatisation    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

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