बजट 2020: लोकहित का ढोंग और सेवा पूंजीपति वर्ग की!

अर्थव्यवस्था में काफी मंदी के परिपेक्ष्य में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने वर्ष 2020-21 का बजट 1 फरवरी को पेश किया। साल दर साल पूंजीवादी नीतियां लागू करने से मेहनतकश और किसानों की क्रय शक्ति में गिरावट ही मंदी का कारण है। बजट पेश करते हुए उन्होंने दावा किया कि “यह बजट उनकी आमदनी ऊपर ले जाएगा और क्रयशक्ति बढ़ाएगा।” 

परन्तु बजट घोषणाओं ने मजदूरों और किसानों की आमदनी बढ़ाने के बजाय पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ावा दिया है। कंपनियों द्वारा अदा किये जा रहे लाभांश पर लगे कर को समाप्त करने से कंपनियों को 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त सालाना मुनाफा होगा। इससे पहले सितम्बर 2019 में घोषित कंपनी कर में 1,44,000 करोड़ रुपये की बड़ी छूट दी गई थी। कुल मिलाकर छह महीनों के अंदर पूंजीपतियों को 1,69,000 करोड़ रुपये की कर रियायतें भेंट दी गई हैं जबकि 2020-21 के बजट में खाद्य अनुदान में 69,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई है।

अतः उनके बजट में घोषित कार्यक्रम और बदलाव का उद्देश्य बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों को अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करना था।

बजट भाषण में उन्होंने दावा किया कि 2014-19 के दौरान समावेशी वृद्धि (इनक्लूसिव ग्रोथ) उनकी सरकार का केंद्र-बिंदु था। वास्तव में राजग सरकार के पहले राज्यकाल में एक तरफ देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों की दौलत में बहुत तेजी से बढ़त और दूसरी तरफ मजदूरों और किसानों की बढ़ती दरिद्रता देखी गई। यह इस तथ्य से विदित होता है कि 9 सबसे बड़े पूंजीपतियों की दौलत इतनी है जितनी देश के गरीब 50 प्रतिशत लोगों के पास है! राजग सरकार की नीतियों का परिणाम यह हुआ कि देश के सबसे बड़े पूंजीपति, अम्बानी की संपत्ति 2019 में 50 प्रतिशत बढ़ गई जिस वर्ष में अर्थव्यवस्था पिछले 15 वर्षों में सबसे कम दर से बढ़ी। टाटा, अम्बानी, बिरला, अदानी और अन्य पूंजीपतियों के लिए वित्त मंत्री की चिंता, उनकी इस घोषणा से उजागर होती है कि “देश में दौलत पैदा करने वालों को सम्मान दिया जायेगा” और उन्हें कर उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा। वास्तव में, समाज में दौलत मजदूरों और किसानों के श्रम और पसीने से पैदा की जाती है और वही वास्तव में सम्मान के अधिकारी हैं। यह अंदेशा दे कर कि पूंजीपति दौलत पैदा करते हैं, उन्होंने सत्य को उल्टा खड़ा कर दिया है।

वित्तमंत्री को उन लाखों मजदूरों की चिंता नहीं थी जिन्होंने आर्थिक मंदी और मजदूर-विरोधी नीतियों के कारण नौकरियां खो दी हैं। उनको उन करोड़ों किसानों की चिंता नहीं थी जो अपने उत्पाद के लाभदायक दाम न मिलने के कारण नुकसान भुगत रहे हैं। लोगों की निरंतर गिरती क्रय शक्ति आर्थिक संकट और मेहनतकशों की विपदा को और गंभीर बना रहा है। बढ़ती बेरोजगारी, मजदूरों के वास्तविक वेतन में स्थिरता और गिरावट भी, मेहनतकशों द्वारा वस्तुओं की खपत में गिरावट, ये सब बढ़ते संकट के लक्षण हैं। (बाॅक्स 1 देखिए) 

बाॅक्स 1

गंभीर आर्थिक मंदी

वृद्धि दर              

जी.डी.पी. : 11 वर्षों में सबसे कम
निजी खपत : 6 वर्षों में सबसे कम
उत्पादन :  15 वर्षों में सबसे कम
कृषि : 4 वर्षों में सबसे कम
निवेश : 17 वर्षों में सबसे कम

हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों को मालूम है कि मेहनतकशों के पास नई वस्तुओं को खरीदने के लिए कुछ बचत नहीं है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से घोषित किये गए अनेक प्रलोभनों और वित्त पूंजी की ब्याज दरों में गिरावट के बावजूद पूंजीपति नई उत्पादन क्षमता बनाने के लिए अपनी पूंजी लगाने का जोखिम लेने के लिए आगे नहीं आए हैं। अतः इजारेदार पूंजीपति चाहते थे कि निजी निवेश में वृद्धि की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अधिक कर्ज़ ले और आधारभूत तथा अन्य प्रोजेक्टों में सार्वजानिक निवेश बढ़ाए।

बजट पेश होने के पहले ही पूंजीपतियों ने मोदी सरकार को समझाने की कोशिश की कि निजी पूंजी चाहती है कि मूलभूत ढांचे में निवेश किया जाए जिसके लिए राज्य को अधिक कर्ज़ लेना मंजूर होना चाहिए। उनकी मांग थी कि फिलहाल सरकार को अपना खर्च कम नहीं करना चाहिए जैसा कि विदेशी पूंजीपति और मूल्यांकन संस्थाएं मांग कर रही हैं।

बाॅक्स 2

वित्तीय जिम्मेदारी

“वित्तीय जिम्मेदारी” एक ऐसी अवधारणा है जिसको कर्ज़ देने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्थाओं ने इजाद किया है। इसका मतलब है “राज्य” को एक “जिम्मेदार” लेनदार की भूमिका निभानी चाहिए। उसे अपने ऊपर बकाया कर्ज़ को नियमित रूप से और समय पर वापस करना चाहिए। राज्य को इतना ज्यादा कर्ज़ नहीं लेना चाहिए, जिसे वह वापस न कर सके। लेकिन साथ ही साथ राज्य को कर्ज़ लेना बंद नहीं करना चाहिए। हर साल बजट में एक निर्धारित सीमा तक वित्तीय घाटा और एक निर्धारित स्तर तक कर्ज़ बनाये रखने को तैयार रहना चाहिए। दूसरे शब्दों में “वित्तीय जिम्मेदारी” अवधारणा इस लोक-विरोधी दृष्टिकोण पर आधारित है कि राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी देश के सभी लोगों की जरूरतों को पूरा करना नहीं है, बल्कि कर्ज़ देने वाले साहूकारों की लालच को पूरा करना है।

वित्तीय जिम्मेदार कर्ज़दार जैसा पेश करने के लिए हिन्दोस्तान की सरकार ने 2003 में “वित्तीय जिम्मेदार और बजट प्रबंधन कानून” भी पारित किया।

इसके विपरीत, विदेशी पूंजी चाहती थी कि हिन्दोस्तानी सरकार अत्याधिक कर्ज़ लेने से बचे और विनिमय दर स्थिर रखने के लिए ‘वित्तीय उत्तरदायित्व’ को निभाए। इस उत्तरदायित्व को निभाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा लोगों की रोजमर्रा की अन्य जरूरतों के लिए पहले से ही कम हुए आवंटन में और कटौती की जाए। वह यह भी चाहती थी कि निजीकरण और विनिवेश से ज्यादा धन जुटाया जाए। इस तरह के उपायों से ही सार्वजानिक निवेश बढ़ाने की मांग और वित्तीय उत्तरदायित्व’ को निभाने की मांग को सरकार पूरा कर सकती थी। (बोक्स 2 देखिए)

बजट ने दोनों ही दावेदारों को संतुष्ट करने की कोशिश की। वर्ष 2020-21 के लिए सकल घरेलु उत्पाद का 3.5 प्रतिशत वित्तीय घाटा प्रस्तावित किया जो कि 2019-20 के बजट में प्रस्तावित 3.3 प्रतिशत से अधिक है लेकिन जो 2019-20 के 3.8 प्रतिशत के संशोधित अनुमान से कम है।

खाद्य अनुदान में कटौती के अलावा, बजट ने अनेक वस्तुओं के आयात पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने की घोषणा की है। इसकी वजह से लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली टिकाऊ वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी। अनुमान है कि इसका लोगों पर कुल बोझ करीब 20,000 करोड़ रुपये होगा।

बजट ने 15 लाख रूपये वार्षिक से कम आमदनी पर आयकर दर घटा कर मेहनतकश और अन्य करदाताओं के लिए सहानभूति दिखाने की कोशिश की है। परन्तु, एक हाथ से घटी दर का लाभ देते हुए दूसरे हाथ से विभिन्न बचतों और घर खरीदने पर मिलने वाले कर रियायतों को समाप्त कर दिया। उसने लोगों को पुरानी ज्यादा कर दरों और नयी बिना रियायत कम दरों के बीच चुनने की छूट दी है। हालांकि सरकार ने दावा किया है कि इससे लोगों को 40,000 करोड़ रुपये का फायदा होगा, अनेक लोग नयी कम दरों को नहीं चुनेंगे क्योंकि उससे उन्हें पहले से ज्यादा कर देना होगा। अतः लोगों को बहुत कम कुल लाभ होने का अंदाजा है।

यह प्रस्ताव भ्रामक और कपटी है। राज्य द्वारा किसी भी तरह के सामजिक सुरक्षा के अभाव में, लोगों को वृद्धावस्था के लिए नियमित रूप से बचत करना आवश्यक है। इस तरह की बचत पर कर रियायत वापिस लेकर राज्य लोगों को वृद्धावस्था के लिए बचत करने से निरुत्साहित कर रही है। वह चाहती है कि वे उस पैसे का वस्तुएं खरीद कर घटती हुई मांग के संकट पर काबू पाने के लिए पूंजीपतियों की मदद करें।

बजट ने हिन्दोस्तान में निवेश करने के वास्ते विदेशी पूंजी के लिए अनेक लुभावने प्रस्ताव रखे लेकिन देश के करोड़ों किसानों के संकट को हल करने के लिए कोई प्रस्ताव नहीं था। वित्त मंत्री ने पुनः किसानों की आमदनी 2022 तक दुगनी करने के खोखले वायदे की बात की। बजट ने कृषि से सम्बंधित जिन प्रस्तावों की घोषणा की वे पूंजीवादी कृषि को और बढ़ावा देंगे और किसानों की असली समस्याओं को हल नहीं करेंगे।

देश के करोड़ों युवकों के लिए जीने लायक वेतन पर नियमित नौकरियों के अभाव उनकी सबसे बड़ी चिंता है। बजट में युवकों को प्रदान करने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि पूंजीवाद के नीचे टपकने का सिद्धांत ही इस बजट का अन्तर्निहित सिद्धांत है। यह सिद्धांत दावा करता है कि जैसे जैसे पूंजीपतियों की दौलत बढ़ती है, उसमें से कुछ अंश लोगों के पास रिसाव से पहुंच जाता है।

वित्त मंत्री ने दावा किया कि बजट का उद्देश्य हमारे समाज के युवकों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रत्येक सदस्य, प्रत्येक महिला, प्रत्येक अल्पसंख्यक की तमन्नाओं को पूरा करना है। वास्तव में उनके बजट ने देश के पूंजीपतियों के सत्ताधारी वर्ग की तमन्नाओं और उम्मीदों को ही पूरा किया है।

किसानों, युवकों और मेहनतकशों द्वारा सामना किया जा रहा संकट, पिछले कुछ महीनों में खाद्य महंगाई के 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ने के कारण अधिक गंभीर हो गया है। बजट ने इस समस्या का जिक्र भी नहीं किया, उसे हल करने की बात तो अलग है।

इसके विपरीत, हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों की मांग के अनुसार सार्वजानिक धन से बनाई सरकारी संपत्ति को तेजी से बेचने की योजना बनाई गई है। अधिक से अधिक क्षेत्रों को हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के लिए खोला जा रहा है। बजट ने भारतीय जीवन बीमा निगम का निजीकरण की शुरुआत करने की घोषणा की है। इस कारण वे करोड़ों लोग चिंतित हो गए हैं जो आकस्मिक मृत्यू की आपदा से बचने के लिए अपनी बचत निगम में जमा करते आए हैं। जीवन बीमा निगम में लोगों की जमा बचत 27 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है जो देश की सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक में जमा कुल राशि के बराबर है। बजट ने निजीकरण और विनिवेश द्वारा अब तक का सबसे बड़ा 2,10,000 करोड़ रुपये का, लक्ष्य अगले वर्ष के लिए निर्धारित किया है। मजदूर यूनियनों, कम्युनिस्ट पार्टियों और अन्य सम्बंधित नागरिकों के विरोध के बावजूद, निजीकरण किया जा रहा है। सार्वजनिक निजी भागेदारी (पी.पी.पी.) सड़क, रेलवे, अस्पताल, गोदाम क्षेत्रों में निजीकरण का चहेता माध्यम होगा।

मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि प्रत्येक हिन्दोस्तानी के पास 2022 तक घर होगा। सरकार के अनेक भुलाए गए वायदों की तरह इस वायदे का बजट में जिक्र भी नहीं है।

पिछले वर्षों की तरह, केंद्र सरकार के कर राजस्व का आधे से ज्यादा भाग, उन दो विषयों पर खर्च होगा जो समाज को कुछ भी मूल्य प्रदान नहीं करते हैं - वित्त संस्थाओं को दिए जाना वाला ब्याज (7 लाख करोड़ रूपये) और रक्षा पर खर्च (4.7 लाख करोड़ रुपये)।

मोदी सरकार ‘सबका साथ सबका विकास’, ‘सब मिलकर एक मजबूत और सम्मलित भारत का निर्माण करेंगे” जैसे अनेक बड़े दावे करती आई है। लेकिन जब तक बजट के पूंजी-केद्रित रुझान में कोई बदलाव नहीं होता है, ये सब खोखले दावे रहेंगे। बजट के पूंजीवादी नुस्खे हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर नहीं निकाल सकते। बजट आर्थिक मंदी के मूल कारण की तरफ ध्यान भी नहीं देता है जो है मजदूरों के वास्तविक वेतन और किसानों की आमदनी में गिरावट। सत्य यह है कि इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग में मजदूरों और किसानों को और ज्यादा गरीब होने से रोकने की न तो इच्छा है और न ही क्षमता है। उनकी पूरी आर्थिक रणनीति मजदूरों के वेतन और कृषि उत्पादों की वसूली दाम कम से कम रखने पर आधारित है। हिन्दोस्तान की श्रम शक्ति व् किसानों की मेहनत के फल को कौड़ी के दाम प्रदान कर वे विश्व की सबसे बड़ी बहुदेशीय कंपनियों को आकर्षित करना चाहते हैं।

हिन्दोस्तानी सरकार का वार्षिक बजट बहुसंख्यक लोगों के हितों की बलि चढ़ा कर पूंजीवादी इजारेदार घरानों के नेतृत्व में अमीर अल्पसंख्यकों के हितों को बढ़ावा देने का हथियार है। जब तक बड़े पैमाने के उत्पादन साधन इजारेदार पूंजीपतियों की निजी मालिकी में रहते हैं, सभी निर्णय उनके मुनाफे अत्याधिक करने के उद्देश्य से लिए जाते हैं। बजट का असली उद्देश्य मजदूरों और किसानों की मदद करने का दिखावा करते हुए उनको और लूटना है। बजट विभिन्न हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीवादी गुटों के विरोधी दावों को हल करने की कोशिश भी करता है। 2020 के बजट ने बिलकुल यही किया है। उसने मंद आर्थिक विकास से उत्पन्न संकट का फायदा उठा कर पूंजीपतियों की उन मांगों को पूरा किया है जिनका लोग विरोध करते आए हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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