गुनहगारों को सज़ा देने के बहाने, बेकसूरों का उत्पीड़न:

‘न्याय दिलाने’ के नाम पर राजकीय आतंकवाद

12 मार्च को, जब संसद में फरवरी 2020 के अंतिम हफ्ते में दिल्ली में हुई वहशी हिंसा पर चर्चा चल रही थी, तो केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि दिल्ली में जो कुछ हुआ था, वह एक “सुनियोजित साज़िश” थी, जिसकी तहक़ीक़ात की जा रही है।

शाह ने दिल्ली पुलिस की भूमिका की सराहना की। उन्होंने यह घोषणा की कि उनकी सरकार ने ‘चेहरे की पहचान’ करने वाले सॉफ्ट वेयर के ज़रिये, 1100 लोगों की सूची बनाई है जिन्होंने हिंसा में भाग लिया था। उन्होंने ऐलान किया कि गुनहगारों को सज़ा दी जायेगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार हिंसा के दौरान नष्ट की गयी संपत्ति के लिए, हिंसा करवाने वालों से हर्जाना वसूलेगी।

अनेक पत्रकारों और आम नागरिकों ने कई दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह स्थापित किया है कि 24-26 फरवरी, 2020 के दरमियान पूर्वोत्तर दिल्ली में लगातार तीन दिन तक, मुसलमानों को निशाना बनाकर, जनसंहार किया गया। जनसंहार के दौरान, लोगों का क़त्लेआम किया गया, मस्जिद जलाये गए, हजारों-हजारों लोगों के घर-बार और सारी जायदाद जलाई गयी। भाजपा की केंद्र सरकार के एक नेता ने उच्च पुलिस अफ़सर की मौजूदगी में जो भड़काऊ भाषण दिया था, उसका खूब प्रचार किया गया।

दस्तावेज़ों से यह भी साबित किया गया है कि सैकड़ों गुंडों के कातिलाना गिरोह, हेलमेट से अपने सर-मुंह छुपाकर, जनसंहार को अंजाम देते रहे। चश्मदीद गवाहों के अनुसार, जब पीड़ितों ने पुलिस से मदद मांगी, तो उन्हें कोई मदद नहीं मिली। पुलिस या तो मूकदर्शक बनकर खड़ी रही या फिर, सक्रियता से क़ातिलों की सहायता करती रही। कई विडियो देखने में आये, जिनमें पुलिस वाले पत्थरबाजी कर रहे थे और नौजवानों को बेरहमी से पीट रहे थे, जिनमें से एक नौजवान घायल होकर मर गया। 

सत्ताधारी पार्टी के जिन जाने-माने नेताओं ने नफ़रत-भरे भाषण दिए और मुसलमानों पर हमलों को भड़काया था, उनके खि़लाफ़ दिल्ली पुलिस ने अब तक एफ.आई.आर. भी नहीं दर्ज किये हैं। दूसरी ओर, पुलिस ने सैकड़ों बेकसूर लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है। 

18 मार्च को दिल्ली माइनॉरिटीज कमीशन के अध्यक्ष, जफरुल इस्लाम खान ने दिल्ली पुलिस को कई पत्र लिखकर यह सूचना मांगी कि किन-किन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट से हर इलाके में पीड़ितों द्वारा भरी गयी मुआवजे़ की अर्जियों की सूचना मांगी। उन्होंने लिखा कि “हमें रिपोर्ट मिल रही है कि 20-30 साल के नौजवानों को मनमानी से गिरफ़्तार किया जा रहा है। आपके इलाके में प्रतिदिन, दर्जनों ऐसे नौजवानों को, बिना कोई चार्जशीट या वारंट के ही, गिरफ़्तार किया जा रहा है।” उन्होंने बताया कि कमीशन को खबर मिल रही है कि “गिरफ्तार किये गए नौजवानों पर दबाव डाला जा रहा है कि जिन अपराधों को उन्होंने किया ही नहीं है उनके लिए खुद को या दूसरों को दोषी बताएं”। खान का कहना है कि इन नौजवानों को छुटकारा पाने के लिए भारी रिश्वत देनी पड़ रही है।  

फर्जी आरोपों पर पकड़े गए मुसलमान नौजवानों के मामलों में एक मामला है उन दो मुसलमान नौजवानों का, जिन्होंने अपनी सड़क पर एक मंदिर की रक्षा की थी। उस इलाके के हिन्दू निवासियों ने उन नौजवानों को निर्दोष बताया है, परन्तु उसके बावजूद उन्हें गिरफ़्तार किया गया।

माइनॉरिटीज कमीशन के अध्यक्ष ने यह भी बताया कि उन तमाम मामलों में, जहां हिंसा करवाने वालों के स्पष्ट सबूत हैं, पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है। उन्होंने पत्र लिखकर पुलिस से पूछा है कि हर पुलिस स्टेशन पर हिरासत में रखे गए लोगों की सूची दी जाये, सभी दर्ज किये गए एफ.आई.आर. की कॉपी दी जाये और उन सारी शिकायतों की भी, जिनके एफ.आई.आर. अभी तक नहीं दर्ज़ किये गए हैं। कमीशन ने कहा है कि हिंसा पहले से सोची-समझी और सुनियोजित थी। खूब सारे लोगों को बाहर से लाकर, वहां के स्कूलों में ठहराया गया था और फिर बेसहारे नागरिकों पर हमले करवाए गए।

इससे पूर्व, 5 मार्च को तीन भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों - कुरिएन जोसफ, विक्रमजीत सेन और ए.के. पटनायक - ने पूर्वोत्तर दिल्ली के हिंसा-ग्रस्त इलाकों और मुस्तफाबाद में एक राहत शिविर का दौरा किया था। “जमीनी हालत बहुत ही दर्दनाक है”, कुरिएन जोसफ ने कहा। राहत शिविरों में काम करने वाले वकीलों ने जस्टिस सेन को बताया कि पुलिस ने पीड़ित मुसलमानों द्वारा दर्ज किये गये एफ.आई.आर. में दोषी बताये गए लोगों की सूची तक नहीं तैयार की है, हालांकि शिकायतकर्ताओं ने उनके नाम भी बताये हैं। जब जज ने वकीलों से यह बात अदालत के सामने लाने को कहा, तो सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने बताया कि वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। वकीलों ने अपने नाम भी बताने से इंकार किया, क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने की सज़ा भुगतनी पड़ेगी।

अमित शाह की बात तो सच है कि 24-26 फरवरी के दौरान पूर्वोत्तर दिल्ली में जो कुछ हुआ था वह एक “पूर्व नियोजित साज़िश” थी। परन्तु गृहमंत्री ने संसद में जो बयान दिए और उसके बाद हिन्दोस्तानी राज्य ने जो क़दम लिए हैं, उनसे यह साफ-साफ सामने आ रहा है कि न्याय दिलाने के नाम पर, पूरी कोशिश की जा रही है कि पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जाये और राजकीय आतंकवाद फैलाया जाये।  

केंद्र सरकार यह छुपाने की कोशिश कर रही है कि उन दिनों दिल्ली में जो हुआ था, वह मुसलमानों को निशाना बनाकर, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक जनसंहार था। पुलिस ने मुसलमानों पर हमला करने में सक्रियता से भाग लिया। वह दो समुदायों के बीच झगड़ा नहीं था। मुसलमानों पर हमले करने वाले गिरोह संगठित थे, पेट्रोल-बम व दूसरे हथियारों से लैस थे। तीन दिनों तक हिंसा इसलिए चली क्योंकि राज्य ने उसे आयोजित किया था और उसे पूरा समर्थन दिया था। कई वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अफ़सरों ने बताया है कि राज्य अगर सांप्रदायिक दंगों को रोकना चाहता है तो कुछ ही घंटों के अंदर वैसा कर सकता है।

परन्तु सरकार यह झूठी, मनगढ़ंत कहानी फैला रही है कि वह “राष्ट्र-विरोधी विदेशी ताक़तों की साज़िश थी, जो मुसलमानों को उकसा रही थीं”। तो सवाल यह उठता है, कि अगर सरकार के पास वाकई कोई ऐसा सबूत है कि कोई विदेशी ताक़त हिन्दोस्तान में अस्थायी हालतें पैदा करने का काम कर रही है, तो सरकार को उस विदेशी ताक़त के खि़लाफ़ कार्यवाही करनी चाहिए।

सच्चाई तो यह है कि राज्य मुसलमानों को राष्ट्र-विरोधी करार देने और राज्य की अपनी भूमिका से लोगों का ध्यान हटाने के लिए, इस “विदेशी हाथ” का हव्वा खड़ा कर रहा है। राज्य को यह उम्मीद नहीं थी कि मुसलमान लोग आत्म-रक्षा में वापस लड़ेंगे, जैसा कि उन्होंने कई जगहों पर किया। राज्य को यह उम्मीद नहीं थी कि सभी समुदायों के लोग एकजुट होकर एक दूसरे की रक्षा करेंगे, जैसा कि उन्होंने कई कलोनियों में किया। राज्य “विदेशी हाथ” का हव्वा खड़ा करके, पीड़ितों पर झूठे आरोप लगाकर और मनमानी से उन्हें गिरफ्तार करके, इस राजकीय आतंक को जायज़ ठहराने की कोशिश कर रहा है, जैसा कि इन घटनाओं से स्पष्ट होता है।

मुसलमानों, जिन्हें इन हमलों का मुख्य निशाना बनाया गया था, को अब “वापस लड़ने की जुर्रत करने के लिए”, आतंकित किया जा रहा है और सज़ा दी जा रही है। गृह मंत्री की घोषणा, कि सरकार “हिंसा करवाने वालों से हर्जाना वसूलेगी”, को इस सन्दर्भ में समझना होगा। जब राज्य खुद ही लोगों पर हमले आयोजित करता है, तो लोग राज्य से गुनहगारों को सज़ा देने की उम्मीद कैसे रख सकते हैं? बल्कि अब हम देख रहे हैं कि पीड़ितों को ही और पीड़ित किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में बीते तीन महीनों की गतिविधियां यह साफ-साफ दिखाती हैं। दिसम्बर में जब सी.ए.ए. विरोधी जन प्रदर्शनों ने अलीगढ़ और उत्तर प्रदेश की दूसरी जगहों को झकझोर दिया था, तब उत्तर प्रदेश की सरकार ने वहशी आतंक की मुहिम शुरू कर दी थी। जाने-माने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं समेत, हजारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिए अपराधी बताकर, उनके नाम और पते छापकर बड़े-बड़े होर्डिंग लगा दिए। जब इलाहाबाद उच्च अदालत ने आदेश दिया कि 16 मार्च तक ये होर्डिंग हटा दिए जाने चाहियें, तो उत्तर प्रदेश सरकार ने वैसा करने से इंकार कर दिया। इसके बजाय, उसने 15 मार्च को ‘सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान की वसूली’ पर अध्यादेश जारी कर दिया।

अध्यादेश के अनुसार, सरकार जिन-जिन पर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाती है, उनसे हर्जाना वसूलने के लिए अदालतें गठित की जायेंगी। इन अदालतों को निरंकुश ताक़तें दी जायेंगी। वसूली का आदेश जारी करने से पहले, आरोपियों को सुनवाई का मौका देना भी ज़रूरी नहीं होगा। अध्यादेश के अनुसार, इन अदालतों के आदेश बाध्यकारी होंगे, इनके द्वारा तय किये गए हर्जाने की रकम का फैसला अंतिम होगा और इन अदालतों के फैसलों के खि़लाफ़ किसी और अदालत में अपील नहीं की जा सकेगी। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन “जो खर्च उठाते हैं”, उसे भी आरोपियों से वसूलने की पूरी ताक़त इन अदालतों को दी गयी है। टाडा, पोटा, मकोका और यू.ए.पी.ए. जैसे अन्य काले कानूनों की तरह, तोड़-फोड़ के आरोपियों को खुद ही अपने आपको निर्दोष साबित करना होगा। यह साबित करना होगा कि संपत्ति को नष्ट करने वाले प्रदर्शन या हड़ताल से उनका कोई संबंध नहीं था। अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि हालांकि “तोड़-फोड़ करने वाले” से हर्जाना वसूला जायेगा, पर उसे उकसाने वालों को भी हर्जाने का कुछ हिस्सा देना होगा।

बीते दो महीनों से उत्तर प्रदेश में पुलिस हजारों बेकसूर लोगों को “अच्छा व्यवहार” बांड पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर रही है। इनमें ज्यादातर मुसलमान हैं। इनमें बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी किसी आन्दोलन में भाग नहीं लिया है। इनमें शिक्षक, छात्र, छोटे दुकानदार, आदि शामिल हैं। इनमें अधिकतम लोग गरीब हैं और झूठे इल्जामों पर गिरफ्तार होने से बचने के लिए बांड पर हस्ताक्षर करने को  मान जाते हैं। ये बांड उसी प्रकार के हैं, जिन पर आपराधिक मामलों के लिए गिरफ्तार लोगों को जमानत पर रिहा होने से पहले हस्ताक्षर करना पड़ता है।

संभल में लगभग 70 लोगों, अलीगढ़ में 2,000 और लखनऊ में 100 से अधिक लोगों को इस प्रकार के बांड पर हस्ताक्षर करने का आदेश दिया गया है। बांड की रकम एक लाख से लेकर 50 लाख रुपये तक है। जिन-जिन को आदेश जारी किया गया है, उन्हें बांड पर हस्ताक्षर करने के समय एक बार 300 रुपये जमा करना होगा और सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट या पुलिस कमीशनर के सामने पेश होना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन पर गिरफ्तारी का वारंट जारी हो सकता है। इन आदेशों का मकसद है लोगों को डराना-धमकाना और बेइज्जत करना। बेकसूर लोगों को अधिकारियों के सामने अपराधी बतौर पेश होना पड़ेगा। गिरफ्तार होने या सरकार द्वारा उनकी संपत्ति जब्त किये जाने का डर जीवन भर उन पर मंडराता रहेगा। हर दो हफ्तों बाद, उन्हें छुट्टी लेकर एस.डी.एम. के कार्यालय पर पेश होना होगा। “अच्छा व्यवहार” बांड पर हस्ताक्षर करने वालों को मालूम है कि वे इंसाफ की कोई उम्मीद नहीं कर सकते।        

इस बात का भरपूर सबूत है कि उत्तर प्रदेश और देश की अनेक जगहों पर, दिसंबर में सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनों के दौरान जो हिंसा हुयी थी, उसे राज्य ने आयोजित किया था। फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में मुसलमानों पर हमले भी राज्य ने ही आयोजित किये थे। हिंसा भड़काते हुए और भीड़ को उकसाते हुए पुलिस कर्मियों के कई चित्र देखने में आये हैं। लोग सी.ए.ए. और एन.आर.सी. का शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे। उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति नष्ट नहीं की। दिल्ली में हत्याकांड के पीड़ितों ने खुद अपनी संपत्तियां नहीं जलाईं। परन्तु गृह मंत्री ऐसा ही कह रहे हैं और राज्य ऐसा ही दिखाने की कोशिश कर रहा है।

न तो केंद्र सरकार को इंसाफ दिलाने और सार्वजनिक व निजी संपत्ति के नाश को रोकने में कोई रूचि है, और न ही उत्तर प्रदेश की सरकार को। बल्कि, इंसाफ दिलाने के नाम पर, लोगों के खिलाफ राजकीय आतंकवाद को बहुत बढ़ा दिया जा रहा है।  

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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