नर्सें भारी कठिनाइयों को झेलते हुए कोविड-19 संकट का सामना कर रही हैं

वर्तमान कोरोना वायरस महामारी (कोविड-19) के चलते, लोगों को ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं दिलाने में नर्सों की अहम भूमिका है। नर्सों की सेवाओं के बिना, अस्पताल में किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवा की कल्पना करना असंभव है।

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) ने यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एक जुझारू नेता व कार्यकर्ता, रि.जो. के साथ, देश में नर्सों की हालतों और इस संकट के समय पर नर्सों की कठिनाइयों के बारे में बातचीत की। वार्तालाप के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:

म.ए.ल.: वर्तमान कोरोना वायरस महामारी के दौरान देशभर के अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के सामने मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

रि.जो.: जब यह वर्तमान कोरोना वायरस महामारी शुरू हुयी, तब अधिकतम सरकारी व प्राइवेट अस्पताल इस संकट का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। यह सच्चाई है, चाहे प्रधानमंत्री और सरकार व प्रशासन के दूसरे वक्ता कुछ भी कहें।

सरकार ने अस्पतालों में खास अलगावकारी (आइसोलेशन) वार्ड बनाये हैं और अस्पताल के कुछ हिस्सों को कोरोना वायरस जांच (स्क्रीनिंग) व उपचार के लिए निर्धारित कर रखे हैं, परन्तु उनकी सीमित क्षमता है। हालांकि प्राइवेट अस्पतालों को कोविड-19 केंद्र स्थापित करने की इजाजत दी गयी है, परन्तु बहुत कम प्राइवेट अस्पतालों ने इस समय इसके लाइसेंस प्राप्त किए हैं। महामारी पर सरकार द्वारा जारी किये गए सारे निर्देशों का पालन करने के लिए उनके पास संसाधन नहीं हैं। इसके अलावा, प्राइवेट अस्पताल स्क्रीनिंग टेस्ट और बाकी उपचार के लिए काफी भारी कीमत वसूलते हैं। इसलिए प्राइवेट अस्पतालों में ज्यादातर अमीर मरीज ही जा सकते हैं, जो इस भारी कीमत को दे सकते हैं।

अस्पतालों में कोरोना वायरस से ग्रस्त मरीजों को अलग रखने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में वेंटीलेटर और दूसरे आवश्यक मेडिकल यंत्रों तथा डॉक्टरों, नर्सों व अस्पताल कर्मियों के लिए सुरक्षात्मक सामग्रियों की काफी कमी है, जो कि वर्तमान संकट का सामना करने के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

म.ए.ल.: इस संकट की घड़ी में नर्सों को अपने काम में किन-किन खास समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

नर्सें भारी कठिनाइयों को झेलते हुए कोविड-19 संकट का सामना कर रही हैं

कई अस्पतालों में नर्सों को लगातार 12 घंटे की पाली में काम करना पड़ रहा है। नर्सों की संख्या में कमी के कारण, अक्सर एक नर्स को पूरी पाली के दौरान अकेला ही कोरोना वायरस स्क्रीनिंग इलाके को संभालना पड़ता है। किसी प्राइवेट अस्पताल में एक जवान नर्स ने शिकायत की कि एक बार, रात्रि पाली के दौरान वह 12 घंटों तक शौचालय नहीं जा पाई क्योंकि वह काम पर अकेली थी।

नर्सों को अक्सर कई घंटों तक लगातार खड़े रहना पड़ता है, जिसकी वजह से उनकी टांगों और पांवों में सूजन हो जाती है। यूनिफार्म के साथ उन्हें जो जूते दिए जाते हैं, वे कई बार इतने लम्बे समय तक खड़े-खड़े काम करने के लिए आरामदायक नहीं होते हैं।

कोरोना वायरस की महामारी को लेकर लोगों में बहुत डर फैला हुआ है। नर्सों को मरीजों व उनके परिजनों के इस डर के साथ हर रोज़ आमना-सामना करना पड़ता है। नर्सों को अक्सर लोगों के गुस्से, गाली-गलोच और शारीरिक हमलों का भी शिकार होना पड़ता है।

सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में नर्सों को इस समय अतिरिक्त घंटों के काम के लिए कोई मुआवज़ा नहीं मिल रहा है। कई प्राइवेट अस्पतालों में प्रबंधकों ने चेतावनी दे दी है कि आर्थिक संकट के चलते, अगले कुछ महीनों तक शायद नर्सों को अपना मासिक वेतन भी नहीं मिलेगा।   

सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में नर्सों की छुट्टियाँ कैंसिल कर दी गयी हैं और उनके काम के घंटों को बढ़ा दिया गया है। गर्भवती महिला नर्सों को भी लम्बे समय तक काम करने को मजबूर किया जा रहा है, जो कि उनकी सेहत के लिए खतरनाक है।

म.ए.ल.: सुरक्षात्मक सामग्रियों की कमी के कारण नर्सों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है?

रि.जो.: नर्सों को कोरोना वायरस वार्ड में सही सुरक्षात्मक सामग्रियों के बिना ही काम करना पड़ रहा है। कई प्राइवेट व सरकारी अस्पतालों में दी जाने वाली सुरक्षात्मक सामग्रियां घटिया क्वालिटी की होती हैं। अंतर्राष्ट्रीय तौर पर माना गया है कि कोरोना वायरस के मरीजों पर काम करने वाले डॉक्टरों और नर्सों को भरोसेमंद श्वसन सुरक्षा के लिए एन-95 मास्क का ही उपयोग करना चाहिए। परन्तु देश में एन-95 मास्क की बहुत कमी है क्योंकि इनका उत्पादन यहाँ नहीं किया जाता है और इन्हें निर्यात करना पड़ता है। नर्सों को अक्सर सर्जिकल मास्क के साथ काम चलाना पड़ता है, जिससे संक्रमण का ख़तरा बहुत बढ़ जाता है। खास कर प्राइवेट अस्पतालों में, और कुछ सरकारी अस्पतालों में भी, स्क्रीनिंग इलाका में काम करने वाली नर्सों को पर्याप्त मात्रा में मास्क, ग्लव्स और आँखों की सुरक्षा के लिए सामग्री नहीं दी जाती है।

म.ए.ल.: किन हालतों में नर्सों को खुद को दूसरों से अलग (आइसोलेशन में) रखना पड़ता है? उस समय उन्हें क्या-क्या दिक्कतें होती हैं?

रि.जो.: कोरोना वायरस वार्ड में काम करने वाली नर्स के किसी मरीज की जांच या फिर उसकी अपनी जांच अगर पॉजिटिव (यानि संक्रमित) निकलती है, तो उसे दूसरों से अलग होना पड़ता है। अस्पतालों में अक्सर नर्सों के अलग रहने की जगह नहीं होती है, इसलिए उन्हें घर भेज दिया जाता है, जहां पूरे परिवार पर संक्रमण का ख़तरा मंडराता है।

जिन नर्सों को अस्पताल में ही अलग रखा जाता है, उन्हें खाना आदि देने में अस्पताल के अन्य कर्मचारी, संक्रमित होने के डर से, कतराते हैं। मिसाल के तौर पर, आर्तेमिस अस्पताल की एक शाखा में, एक जवान लड़की, जो कुछ ही महीने पहले नर्स बनकर ड्यूटी पर लगी थी, कोरोना वायरस से संक्रमित हो गयी और उसे अस्पताल के अन्दर ही, अलग रखना पड़ा। उसके परिजनों और मित्रों को उससे मिलने की इजाज़त नहीं दी गयी। अस्पताल अधिकारियों ने सिक्यूरिटी गार्ड को उसे खाना पहुंचाने को कहा। सिक्यूरिटी गार्ड ने संक्रमण के डर के मारे, खाना कमरे के बाहर रख दिया और उन्हें सूचित तक नहीं किया। तीन दिन तक नर्स को खाना नहीं मिला, और उसके बाद उसे समझ में आया कि क्या हो रहा है।   

म.ए.ल.: कोरोना वायरस के मरीजों के साथ काम करने वाली नर्सों पर इस समय किस प्रकार के सामजिक दबाव हैं?

रि.जो.: कोरोना वायरस के मामलों पर काम करने वाली नर्सों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। संक्रमण के डर से, कोई भी ऑटो रिक्शा या सार्वजनिक वाहन उन्हें नहीं लेना चाहता है। किराये पर रहने वाली नर्सों के मकान मालिक उन्हें फौरन घर खाली करने को कह रहे हैं और उन पर दबाव डालने के लिए बिजली-पानी की सप्लाई काट देते हैं, उनका सामान बाहर फेंक देते हैं, आदि।

म.ए.ल.: आम तौर पर, नर्सों की क्या-क्या समस्याएं हैं? इस संकट में ये समस्याएं किस प्रकार से बढ़ गयी हैं?

रि.जो.: नर्सों के बिना कोई भी अस्पताली उपचार संभव नहीं है, परन्तु नर्सों को अपनी निष्ठापूर्ण सेवा के लिए कभी भी कोई मान्यता नहीं दी जाती है। नर्सों को गुलामों की तरह काम करने को मजबूर किया जाता है। उन्हें न सिर्फ अपने इलाके के वरिष्ठ डॉक्टरों के आदेशों को मानना पड़ता है, बल्कि अस्पताल के अधकारियों के हुक्मों को भी मानना पड़ता है। अस्पताल अधिकारी नर्सों के साथ बदसलूकी करते हैं और उनके साथ इज्जतदार बरताव नहीं करते हैं।

किसी भी अस्पताल, सरकारी या प्राइवेट, की गवर्निंग बॉडी में नर्सों का कोई प्रतिनिधि नहीं होता है। इसलिए, नर्सों की हालतों के बारे में खास कोई प्रचार नहीं होता है और उनकी मांगें भी नहीं उठाई जाती हैं।

प्राइवेट अस्पतालों में नर्सों की नौकरियां ज्यादातर ठेके पर होती हैं। अधिकारी मनमर्जी से, किसी भी समय उन्हें निकाल सकते हैं। इसलिए नर्सें अपनी समस्याओं के बारे में शिकायत करने से डरती हैं।

अस्पताल अधिकारियों द्वारा दी गयी सुविधाओं के मामले में भी, डॉक्टरों और नर्सों के बीच में भेदभाव किया जाता है। सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में यह भेदभाव स्वाभाविक तौर पर होता है परन्तु वर्तमान संकट के दौरान यह और भी साफ-साफ देखने में आ रहा है। जब कि कोरोना वायरस पर दिन-रात काम करने वाले डॉक्टरों को सरकार ने द ललित  जैसे बड़े-बड़े होटलों में रहने की सुविधा दी है, तो दिन-रात काम करने वाली नर्सों को होस्टलों में बहुत ही साधारण सुविधाएं दी गयी हैं।

नर्सों को अस्पताल परिसर में आवास बहुत कम मिलता है। अधिकतम नर्सों को बाहर किराये पर रहना पड़ता है और आजकल की जैसी मुश्किल हालतों में दूर-दूर से काम पर आना पड़ता है। मिसाल के तौर पर, उच्चतम सरकारी अस्पताल, एम्स-दिल्ली में लगभग 5000 नर्सें काम करती हैं परन्तु कुछ दो-तीन सौ नर्सों को ही अस्पताल की ओर से आवास दिया जाता है। कई नर्सों को अस्पताल में आवास के लिए सालों-सालों तक इंतजार करना पड़ता है। कई नर्सों को लम्बे अरसे के लिए अपने परिजनों से अलग रहना पड़ता है। अकेलापन और सामाजिक अलगावपन के दबाव के तले, कई नर्सें अवसाद का शिकार बन जाती हैं और खुदकुशी कर लेती हैं। 

म.ए.ल.: देश में स्वास्थ्य सेवाओं में उन्नति लाने के लिए हमें वर्तमान कोविड-19 संकट से क्या सीख लेनी चाहिए?

रि.जो.: वर्तमान कोविड-19 संकट बहुत साफ-साफ दिखा रहा है कि स्वास्थ्य क्षेत्र के निजीकरण को फौरन वापस लेना चाहिए। यह साफ-साफ दिख रहा है कि राज्य को स्वास्थ्य सेवाओं को फौरन अपने हाथों में लेने की सख्त ज़रूरत है, ताकि सभी लोगों को सर्वव्यापक, अच्छी और मुनासिब कीमत पर पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा मिल सके। 

म.ए.ल. : देश के नर्सों की ओर से आप समाज को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

रि.जो. : हम यह कहना चाहते हैं कि नर्सों को “ताली बजाना” जैसा दिखावटी व्यवहार नहीं चाहिए। नर्सों को स्वास्थ्य क्षेत्र में उनकी अत्यावश्यक सेवाओं के लिए मान्यता चाहिए। उन्हें सम्मान और इज्जत चाहिए। नर्सें इंसान-लायक काम की हालतें चाहती हैं और शोषण व भेदभाव का अंत चाहती हैं। 

म.ए.ल. : नर्सों की कठिन हालतों और समाज की सेवा में उनके बहादुर काम के बारे में हमारे पाठकों को बताने के लिए, आपको बहुत, बहुत धन्यवाद। मज़दूर एकता लहर देश की स्वास्थ्य सेवाओं के इस अत्यावश्यक भाग, नर्सों के अधिकारों के लिए लगातार अपनी आवाज़ बुलंद करती रहेगी।

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Apr 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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