हिन्दोस्तान के पूंजीपति नहीं चाहते की देहाड़ी मज़दूर अपने घर वापस जायें

14 अप्रैल को मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन के बाहर 2000 से अधिक मजदूर इकठ्ठा हो गए और अपने घर वापस जाने के लिए ट्रेन की मांग करने लगे। लॉकडाउन के हालात में जब केंद्र सरकार व अनेक स्थानीय अधिकारियों द्वारा “सामाजिक दूरी” बनाये रखने का आदेश दिया गया है, इस जमघट को एक “बड़े गुनाह” की तरह देखा गया और मज़दूर पर लाठी चार्ज किया गया। कुछ मज़दूरों को गिरफ़्तार भी किया गया। पूंजीवादी मीडिया ने मज़दूरों को “समाज-विरोधी” करार देते हुए उनपर घटिया तरह से हमला किया। लेकिन कई मज़दूर संगठनों, जनतांत्रिक संगठनों, और कई पत्रकारों ने मज़दूरों के अपने घर वापस जाने के अधिकार की हिफाज़त में आवाज़ उठाई।

देश के कई हिस्सों से रिपोर्ट आ रही है कि दसियों हजारों मज़दूर अपने काम के ठिकानों से सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने शहरों और घरों को जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े हैं। रास्ते में सफर के दौरान भूख और थकान की वजह से 20 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार सरकार इन मज़दूरों को अपने घर वापस जाने से रोकने के लिए तमाम तरह के उपाय कर रही है।

ये सारी घटनाएं करोड़ों देहाड़ी मज़दूरों की बेचैनी और तकलीफों को उजागर करती हैं, जिसका सामना उन्हें देशभर में अचानक लागू किये गए लॉकडाउन की वजह से करना पड़ रहा है। इस लॉकडाउन की वजह से रातों-रात इन मज़दूरों की आजीविका के साधन खो गए हैं। जो कुछ थोड़े बहुत पैसे जमा थे वह कुछ ही दिनों में खत्म हो गए। इसलिए वे अपने घरों की सुरक्षा में पहुंचने के लिए बेचैन हैं। उनको यह भी डर है कि जिन हालातों में रिहायशी इलाकों में वे रहते हैं या कैम्पों में जहां कई लोगों को एक साथ रखा गया है, कहीं उनको भी वायरस का संक्रमण न हो जाये।

न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें इन मज़दूरों को घर वापस पहुंचाने के लिए सुरक्षित यातायात का इंतजाम कर रही है। सरकार का तर्क है कि इन मज़दूरों द्वारा संक्रमण को अपने साथ अपने गाँव ले जाने की संभावना है, जहां संक्रमित लोगों की देखभाल करना असंभव होगा। इसलिए उनको मौजूदा ठिकानों पर ही रखा जाना ज़रूरी है। लेकिन फंसे हुए हर एक मज़दूर की जांच के द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सकता था कि वापस जाने वाले मज़दूर संक्रमण को अपने गांव नहीं ले जायेंगे, इसके बाद उनका घर जाने का इंतजाम किया जा सकता था।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मज़दूरों को अपने घर न लौटने देने के पीछे असली कारण यह है कि पूंजीपति चाहते हैं कि जब आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू होती हैं तब ये मज़दूर उनके लिए उपलब्ध हों। उनको डर है कि यदि इन मज़दूरों को जाने दिया गया तो वे वायरस के डर से कई महीनों तक लौटकर नहीं आयेंगे। अब उनको यह भी डर है कि ये मज़दूर लॉकडाउन के दौरान हुए अपने कटु अनुभव के कारण वापस आने से कतरायेंगे, जब उन्हें अपने घर और परिवार से हजारों कोस दूर बेसहारा अकेले छोड़ दिया गया था। लॉकडाउन के तुरंत बाद पूंजीपतियों को अपने कारोबारों और फैक्ट्रियों को शुरू करने में बहुत दिक्कत आ सकती है, क्योंकि उनके सारे कारोबार इन देहाड़ी और ठेका मजदूरों पर निर्भर होते हैं, जिनको बड़े पैमाने पर नौकरी पर रखा जाता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इन प्रवासी मज़दूरों को अपने गांव वापस भेजने के लिए कोई भी इंतजाम नहीं कर रही हैं, और कभी-कभी बड़ी बेरहमी से उनको रोकने की कोशिश कर रही हैं।

इस बात को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि मज़दूरों को अपने घर लौटने के अधिकार के मुकाबले सरकार पूंजीपतियों के हितों को प्रधानता दे। आज हालात की यह मांग है कि सरकार इन प्रवासी मज़दूरों और अन्य मज़दूरों को अपने घर लौटने का सुरक्षित इंतजाम करे जो अलग-अलग स्थानों पर अटके पड़े हैं, और अपने घर लौटना चाहते है। इस बात का भी खयाल रखा जाना ज़रूरी है कि जब तक उनके घर जाने का इंतजाम नहीं होता तब तक इन मज़दूरों के लिए खाने और अन्य ज़रूरी चीजों का पर्याप्त इंतजाम किया जाये।

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May 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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