लेनिन की 150वीं सालगिरह के अवसर पर :

पूंजीवाद से समाजवाद तक परिवर्तन आज वक्त की मांग है

इस वर्ष 22 अप्रैल को दुनिया की सर्वप्रथम सफल समाजवादी क्रांति के मुख्य निर्माता, वी.आई. लेनिन की 150वीं सालगिरह है।

व्लादिमीर इलिच उल्यानोव का जन्म रूस के सिम्बिस्र्क में हुआ था। जार की सरकार द्वारा देश से निकाल कर साइबेरिया भेजे जाने के बाद, जब वे 1901 में वापस आये थे, तब उन्होंने पार्टी में लेनिन का नाम अपनाया था। उस समय से वे हमेशा लेनिन के नाम से जाने जाते रहे।

Lenin

लेनिन का काम शुरू से ही मार्क्सवाद के सैद्धांतिक निष्कर्षों से मार्गदर्शित रहा। उनके काम का यह पक्का आधार था कि समाज की प्रगति के लिए एकमात्र रास्ता श्रमजीवी वर्ग की हुकूमत स्थापित करने और पूंजीवाद से समाजवाद तक क्रांतिकारी परिवर्तन को क़ामयाब करने का रास्ता है। सामाजिक उत्पादन के सारे साधनों को निजी संपत्ति से बदलकर सामाजिक और सामूहिक संपत्ति बना देना होगा। जिस घटनाक्रम से सोवियत संघ ख़त्म हो गया, और उसके बाद की सारी गतिविधियों से, लेनिन के इन सैद्धांतिक निष्कर्षों को गलत नहीं साबित किया गया है। बल्कि, बीती सदी की सारी गतिविधियों से मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सभी निष्कर्ष सही साबित हुए हैं।

लेनिन की 150वीं सालगिरह के समय, आज यह बहुत स्पष्ट नज़र आ रहा है कि पूंजीवाद एक अमानवीय व्यवस्था है, जिसका मुख्य लक्ष्य है लाखों-लाखों लोगों को बरबाद करके, मुट्ठीभर अति अमीर इजारेदार पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ाते रहना। वर्तमान कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के चलते, यह साफ है कि अधिकतम पूंजीवादी राज्य समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली और सेहत की रक्षा करने में नाक़ामयाब हैं।

पूंजीपतियों की सेवा में काम करने वाली सरकारें कोरोना वायरस से जूझने में अगुवा भूमिका अदा करने वाले मज़दूरों को पर्याप्त रक्षा देने में असमर्थ हैं। वे स्वास्थ्य कर्मियों को वायरस से नहीं बचा पा रहे हैं। वे अपनी रोज़गार खोने वाले मज़दूर वर्ग के सबसे त्रस्त तबकों को रक्षा नहीं दे पा रहे हैं। आज हमारे जीवन का अनुभव लेनिन के उस निष्कर्ष की बार-बार पुष्टि कर रहा है कि पूंजीपति वर्ग अब समाज को चलाने के क़ाबिल नहीं रहा है।

मार्क्सवाद के सिद्धांत से मार्गदर्शित होकर, लेनिन ने बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों की ठोस हालतों का विश्लेषण किया। उस समय पूंजीवाद शोषण और लूट की एक वैश्विक व्यवस्था बन गया था और पूंजीवादी स्पर्धा इजारेदार कंपनियों की आपसी स्पर्धा बन चुकी थी।

लेनिन ने बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में विश्व पूंजीवादी व्यवस्था की पांच विशेषताओं को समझा और उजागर किया था। ये हैं: (1) जबकि 19वीं सदी में बहुत सारे छोटे उत्पादकों की आपसी स्पर्धा पूंजीवाद की विशेषता होती थी, तो 20वीं सदी में उत्पादन और पूंजी बहुत कम हाथों में संकेंद्रित हो गयी है और इजारेदार पूंजीपति हावी हो गए हैं (2) बैंकों की पूंजी का संकेन्द्रण और संकेंद्रित औद्योगिक पूंजी के साथ उसका विलयन हुआ है, जिसकी वजह से वित्त पूंजी का जन्म हुआ है और आज एक परजीवी वैत्तिक अल्पतन्त्र हावी है (3) विकसित देशों से पूंजी का निर्यात दुनिया के उन इलाकों को होता है जहां कच्चे माल और श्रम शक्ति सस्ती हैं (4) इजारेदार पूंजीपतियों के अंतर्राष्ट्रीय संघ गठित किये जाते हैं, जो बाज़ारों, प्रभाव क्षेत्रों और कच्चे माल के स्रोतों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिए आपस में लड़ते हैं, और (5) सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच में सारी दुनिया का बंटवारा पूरा हो चुका है, जिसकी वजह से दुनिया को फिर से आपस में बांटने के लिए अंतर-साम्राज्यवादी जंग अनिवार्य हो गए हैं।

लेनिन ने असमान पूंजीवादी विकास के नियम को खोज निकाला था। उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों के साथ यह समझाया था कि कारोबारों, न्यासों, उद्योग की शाखाओं और अलग-अलग देशों का विकास असमान गति से होता है, कभी तेज़ी से तो कभी धीरे। कभी किसी देश के विकास में रुकावट आ जाती है तो कभी किसी और देश का तेज़ी से विकास होता है। इसकी वजह से, साम्राज्यवादी ताक़तों का संतुलन बदलता रहता है और एक नए संतुलन को स्थापित करने के लिए साम्राज्यवादी राज्यों के बीच में जंग शुरु हो जाते हैं। इन हालतों में, साम्राज्यवाद के वैश्विक मोर्चे को क्रांति के ज़रिये भेदना मुमकिन हो जाता है।

लेनिन ने यह विश्लेषण किया कि साम्राज्यवाद एक ऐसा पड़ाव है जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था के सारे अंतर्विरोध बहुत तीखे हो जाते हैं। उन्होंने इन प्रमुख अंतर्विरोधों की परिभाषा इस प्रकार से दी: हरेक पूंजीवादी देश के अन्दर शोषकों और शोषितों के बीच अंतर्विरोध; साम्राज्यवाद और दबे-कुचले राष्ट्रों व लोगों के बीच अंतर्विरोध; और साम्राज्यवादी ताक़तों व प्रतिस्पर्धी इजारेदार घरानों के बीच अंतर्विरोध।

लेनिन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद का सर्वोच्च, सबसे परजीवी और अंतिम पड़ाव है। साम्राज्यवाद पूंजीवाद के समाजवाद में बदलने की पूर्वसंध्या है। समाजवाद पूंजीवाद से ज्यादा उन्नत सामाजिक व्यवस्था है।

तथ्यों और गतिविधियों से यह स्पष्ट होता है कि पूंजीवाद अभी भी अपने अंतिम पड़ाव में ही है, दिन-ब-दिन और ज्यादा परजीवी, तबाहकारी और संकट-ग्रस्त होता जा रहा है। इजारेदार घरानों का वर्चस्व, वित्त पूंजी द्वारा लूट और पूंजी के निर्यात से दुनिया की लूट अब अप्रत्याशित स्तरों तक पहुंच गई है। तेल और दूसरे कच्चे माल के स्रोतों को लेकर इजारेदार पूंजीपति गिरोहों की आपसी स्पर्धा बहुत तीखी हो गयी है। असमान पूंजीवादी विकास के नियम के उदाहरण हैं चीन का दुनिया में सबसे बड़े विनिर्माण उद्योग वाले देश के रूप में उभरना और हिन्दोस्तान समेत, दूसरी “उदीयमान” साम्राज्यवादी ताक़तों का आगे आना। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, अलग-अलग राज्यों के आपसी संबंधों के क्षेत्र में, अमरीका किसी भी क़ीमत पर खुद को सबसे आगे रखने के ढेर सारे हमलावर प्रयास कर रहा है, जिनका प्रतिस्पर्धी साम्राज्यवादी राज्य मुक़ाबला कर रहे हैं।

1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ था, तब दुनिया के पूंजीपतियों ने यह दावा किया था कि अब और जंग नहीं होंगे। उन्होंने दावा किया था कि पूंजीवाद अब एक नए पड़ाव, शांतिपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। परन्तु बीते तीस वर्षों में लगातार जंग होते रहे हैं, कई आज़ाद राष्ट्रों पर हथियारों के बल पर कब्ज़ा किया गया है, और दुनिया पर हावी होने के लिए साम्राज्यवादियों के आपसी झगड़े और तीखे हुए हैं।

हमारे जीवन का अनुभव लेनिन के इस निष्कर्ष को सही ठहराता है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद का अंतिम पड़ाव है। इससे आगे पूंजीवाद का कोई शांतिपूर्ण पड़ाव मुमकिन नहीं है। अगर जंग को ख़त्म करना है और स्थाई शांति क़ायम करनी है तो सारे देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को ख़त्म करना होगा और समाजवाद का निर्माण करना होगा।

लेनिन ने अपने तत्कालीन रूढ़ीवादी माक्र्सवादी विद्वानों से खूब संघर्ष किया, क्योंकि उन रूढ़ीवादी मार्क्सवादी विद्वानों का यह मानना था कि सिर्फ दुनिया के सबसे अगुवा पूंजीवादी देशों में ही श्रमजीवी वर्ग हुक्मरान वर्ग बन सकता है और समाजवाद का निर्माण कर सकता है। चूंकि रूस उस समय काफी पिछड़ा था तो उन रूढ़ीवादी मार्क्सवादियों का कहना था कि रूस में सिर्फ सरमायदारी लोकतांत्रिक क्रांति ही मुमकिन है। लेनिन ने साम्राज्यवाद को श्रमजीवी क्रांति और समाजवाद की पूर्व संध्या बताते हुए, उन विचारों का खंडन किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चूंकि पूंजीवाद सारी दुनिया में अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है, इसलिए किसी पिछड़े देश में भी क्रांति और समाजवाद मुमकिन है। उन्होंने श्रमजीवी वर्ग को रूस का हुक्मरान वर्ग बनने की तैयारी करने की ज़रूरत के बारे में बताया। 

लेनिन ने उन मौकापरस्तों का पर्दाफ़ाश किया जो यह प्रचार करते थे कि राज्य पूंजीपति वर्ग और श्रमजीवी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधों को हल करने का साधन हो सकता है। लेनिन ने राज्य के बारे में माक्र्स के सिद्धांत की हिफ़ाज़त की और यह समझाया कि राज्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अपनी हुकूमत को क़ायम करने का साधन है।

चूंकि पूंजीपति वर्ग के हित और मज़दूर वर्ग के हित एक दूसरे के खि़लाफ़ हैं, इसलिए इनमें से एक वर्ग के लिए लोकतंत्र का मतलब दूसरे पर अधिनायकत्व है। लेनिन ने समझाया कि जार की हुक्मशाही की जगह पर सरमायदार वर्ग का संसदीय गणराज्य नहीं बल्कि सोवियत गणराज्य स्थापित करना होगा।

लेनिन ने समझाया कि सरमायदारी लोकतांत्रिक गणराज्य पूंजीवाद का सबसे बेहतरीन कवच है। जब पूंजी इस कवच को धारण कर लेती है तो वह अपनी ताक़त को इतने पक्के तरीके से स्थापित कर लेती है कि लोगों, संस्थानों या पार्टियों में चाहे कोई भी परिवर्तन हो, वह पूंजी की इस ताक़त को नहीं हिला सकते। लेनिन ने लिखा था कि: “कुछ-कुछ साल बाद यह फैसला करना कि हुक्मरान वर्ग के कौन से सदस्य संसद के माध्यम से लोगों पर अत्याचार और दमन करेंगे - यही सरमायदारी लोकतंत्र का असली मकसद है,” (राज्य और क्रांति)

संसदीय लोकतंत्र के वर्ग चरित्र के बारे में लेनिन ने जो समझाया था, वह 1950 में हिन्दोस्तानी गणराज्य के संविधान के अपनाये जाने के बाद, हिन्दोस्तानी लोगों के जीवन के अनुभव से पूरी तरह सही साबित होता है। समय-समय पर चुनाव होते हैं, सत्ता में राजनीतिक पार्टियां बदल जाती हैं, सरकारें बदल जाती हैं, पुराने नारों की जगह पर नए नारे उछाले जाते हैं। परन्तु अर्थव्यवस्था की पूंजी-केन्द्रित दिशा नहीं बदलती है। बड़े पूंजीपति मज़दूरों और किसानों का खून चूसकर अपनी अमीरी बढ़ाते रहते हैं, जबकि मज़दूर-किसान ग़रीब ही रह जाते हैं और उनका शोषण और तीव्र होता रहता है। राज्य कभी मतपेटी तो कभी बन्दूक के ज़रिये, मेहनतकशों को बांटकर उन पर राज करने के लिए, पूंजीपति वर्ग का हथकंडा बना रहता है।

लेनिन ने सोवियतों के हाथों में पूरी सत्ता देने की ज़रूरत को पेश किया। मज़दूर प्रतिनिधियों का सोवियत औद्योगिक मज़दूरों का एक लोकप्रिय संगठनात्मक रूप था, जो 1905 में जार के खि़लाफ़ क्रान्तिकारी बग़ावत के दौरान रूस में उभर कर आया था। यह मज़दूर वर्ग के परखे हुए योद्धाओं की एक परिषद् थी, जिसके सदस्यों को मज़दूर खुद, अपने बीच में से चयनित करके चुनते थे। सोवियतों की धारणा मज़दूरों के मन में जीवित रही और फरवरी 1917 में जार का तख्तापलट करने वाली क्रान्तिकारी बग़ावत के दौरान उसे फिर से उजागर किया गया। प्रमुख शहरों में मज़दूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों के सोवियत बनाये गए तथा ग्रामीण जिलों में किसानों के प्रतिनिधियों के सोवियत बनाये गए।

सोवियतों के हाथों में पूरी सत्ता को देकर, अक्तूबर क्रांति ने मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के नए राज्य की नींव डाली थी। विशेष अधिकार और ऊंचे वेतन वाले अफसरों की जगह पर नागरिक सेवक बिठाये गए, जिन्हें किसी भी समय पर वापस बुलाया जा सकता था और जिन्हें कुशल मज़दूरों के बराबर वेतन दिए जाते थे। ज़ार की परजीवी सेना की जगह लाल सेना ने ले ली, जो शोषकों का तख्तापलट करने के क्रांतिकारी संघर्ष के दौरान पैदा और विकसित हुयी थी।

जब सोवियत संघ में कृषि का सामूहिकीकरण हो गया और मुख्य तौर पर समाजवाद के आर्थिक आधार का निर्माण पूरा हो गया, तो सोवियत लोकतंत्र के सिद्धांत और अभ्यास को और विकसित किया गया। 1936 में अपनाये गए संविधान के ज़रिये, सोवियतों के चुनावों में उम्मीदवारों के चयन के लिए मेहनतकशों और उनके जन संगठनों की व्यापकतम भागीदारी की हालतें पैदा की गयीं। शासन में लोगों की भूमिका को बढ़ाने की इस प्रक्रिया में दूसरे विश्व युद्ध के कारण रुकावट आ गयी। 1950 के दशक में यह दिशा बदल गयी जब सोवियत पार्टी का वर्ग चरित्र बदल गया और फ़ैसले लेने की ताक़त संशोधनवादी नेताओं के हाथों में संकेंद्रित होने लगी।

समाजवादी निर्माण की समस्याओं को हल करने में तथा सोवियत संघ व दूसरे भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूंजीवाद की पुनर्स्थापना के खि़लाफ़ संघर्ष में मार्क्सवाद-लेनिनवाद को लागू करने के अनुभव की समीक्षा से यह निष्कर्ष निकलता है कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक संविधान में संप्रभुता लोगों के हाथों में होनी चाहिए। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन न हो। आधुनिक लोकतंत्र में ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि लोगों के पास चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार हो, चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार हो और कानून प्रस्तावित करने का अधिकार हो। ये समकालीन मार्क्सवाद-लेनिनवाद के चिंतन के महत्वपूर्ण भाग हैं।

लेनिन ने एक ऐसी राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए डटकर लम्बा संघर्ष किया, जो रूस के श्रमजीवी वर्ग को सफलतापूर्वक सत्ता पर कब्ज़ा करने और अपने हाथों में सत्ता को क़ायम रखने में अगुवाई देने में कामयाब हुयी। लेनिन ने समझाया कि ट्रेड यूनियन संघर्ष अपने आप में सिर्फ सरमायदारी सुधारवादी चेतना ही पैदा कर सकता है। लेनिन ने कहा कि पेशेवर क्रांतिकारियों की एक ऐसी पार्टी बनाने की ज़रूरत है जो श्रमजीवी वर्ग को सत्ता पर कब्ज़ा करने और हुक्मरान वर्ग बनने के लिए आवश्यक राजनीतिक जागरुकता दे सकेगी। उन्होंने एक सर्व-रूस अख़बार की स्थापना के पक्ष में तर्क पेश किये, जो पार्टी-रूपी इमारत के निर्माण के लिए पाईट का काम करेगा।

लेनिन ने उन रूसी मार्क्सवादी-लेनिनवादियों के खि़लाफ़ कठोर विचारधारात्मक संघर्ष किया, जो पार्टी को समान विचार वाले सदस्यों के ढीले संघ के रूप में बनाना चाहते थे। उन्होंने समझाया कि पार्टी के सदस्यों के लिए पार्टी के कार्यक्रम से सहमत होना और नियमित चंदा देना काफी नहीं है, कि उन्हें किसी पार्टी संगठन के अनुशासन के तले काम करना पड़ेगा। इसके बिना, पार्टी में वह फौलादी एकता कभी हासिल नहीं हो सकती, जिसकी श्रमजीवी वर्ग को पूंजीपति वर्ग का तख्तापलट करने के लिए ज़रूरत है।

लेनिन ने लिखा था कि: “मज़दूर वर्ग की ताक़त संगठन में है। जब तक जनसमुदाय संगठित नहीं होगा, तब तक श्रमजीवी वर्ग कुछ नहीं कर सकेगा। जब जनसमुदाय संगठित हो जायेगा, तो श्रमजीवी वर्ग सर्व-शक्तिमान होगा”। (“पार्टी अनुशासन और कैडेट-पक्षीय सोशल डेमोक्रेटों के खि़लाफ़ संघर्ष”, संग्रहीत रचनाएं, ग्रन्थ 11, पृष्ठ 1972)।

लेनिन ने लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद के संगठनात्मक सिद्धांत का विस्तार किया और उस पर अमल किया। यह सामूहिक फैसले लेने और व्यक्तिगत जिम्मेदारियां निभाने पर आधारित है। रूसी श्रमजीवी वर्ग की हिरावल पार्टी इन असूलों की हिफ़ाज़त में अडिग संघर्ष के ज़रिये बनाई गयी और मजबूत की गयी। उस हिरावल पार्टी में मज़दूर वर्ग को किसानों व सभी दबे-कुचले लोगों के साथ मिलकर, सत्ता में लाने के लक्ष्य पर फौलादी एकता थी। वह सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) या बोल्शेविक पार्टी के नाम से जानी जाती थी।

मार्क्सवाद और साम्राज्यवाद की हालतों में उसके और अधिक विकास से मार्ग-दर्शित होकर, बोल्शेविक पार्टी ने महान अक्तूबर क्रांति को अगुवाई दी और सोवियत संघ के मज़दूर वर्ग व लोगों को समाजवाद का निर्माण करने में सफलतापूर्वक नेतृत्व दिया। मानव श्रम को सभी प्रकार के शोषण से मुक्त किया गया और मानव जाति के 1/6 भाग के जीवन स्तर में गुणात्मक प्रगति हुयी।

इन दिनों, साम्राज्यवादी तरह-तरह की रंग-बिरंगी “क्रांतियों” का प्रचार करते हैं, जिन्हें नौजवान सोशल मीडिया के ज़रिये तथाकथित क़ामयाब करते हैं, और जिनके लिए श्रमजीवी वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी की अगुवाई की कोई ज़रूरत नहीं है। परन्तु सभी तथ्यों और गतिविधियों से साबित होता है कि यह बहुत बड़ा भ्रम है। इन तथाकथित रंग-बिरंगी क्रांतियों और जन आंदोलनों से किसी भी देश में पूंजीवाद का तख्तापलट नहीं हुआ है। लेनिनवादी प्रकार की हिरावल श्रमजीवी पार्टी को बनाना और मजबूत करना आज लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए सबसे निर्णायक काम है। जैसा कि लेनिन ने बार-बार कहा था, क्रांतिकारी सिद्धांत और उससे मार्गदर्शित हिरावल पार्टी के बिना, क्रांति क़ामयाब नहीं हो सकती है।

हिन्दोस्तान की ठोस हालतों में मार्क्सवाद-लेनिनवाद को लागू करने के अनुभव की समीक्षा करते हुए, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ने इस मार्ग-दर्शक असूल को अपनाया है कि वह न तो चुनावी मशीन होगी और न ही भूमिगत फौजी मशीन होगी। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मज़दूर वर्ग का सबसे संगठित और जागरुक दस्ता बना रहेगा, मज़दूर वर्ग और सभी मेहनतकश व दबे-कुचले लोगों को सत्ता में लाने का साधन बना रहेगा।

अंत में हम यह कह सकते हैं कि सारी दुनिया में वर्तमान हालात, कोरोना वायरस के प्रसार से पैदा हुए संकट और पूंजीवादी राज्यों की प्रतिक्रिया से यह साफ हो जाता है कि पूंजीवाद अब साम्राज्यवाद के पड़ाव पर है और वह पूरी तरह मरणासन्न तथा परजीवी हो गया है। इस व्यवस्था में इजारेदार पूंजीवादी कम्पनियां एक वायरस को फैलाकर और फिर लोगों को उससे बचाने के लिए इंजेक्शन बनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े कमाती हैं। इस व्यवस्था में दुनिया को फिर से बांटने के लिए सैन्यीकरण और जंग तथा जैविक जंग के साम्राज्यवादी इरादों को पूरा करना वैज्ञानिक शोध का मक़सद बन गया है।

वर्तमान हालतों से लेनिन के निष्कर्ष की पुष्टि होती है कि मानव जाति को इस दुःख-दर्द से बचाने का एकमात्र रास्ता है मज़दूर वर्ग को सभी शोषितों के साथ मिलकर, अपने हाथों में राज्य सत्ता लेने के लिए और पूंजीवाद को ख़त्म करके समाजवाद की स्थापना करने के लिए संगठित करना।

हिन्दोस्तान में करोड़ों मज़दूर लॉकडाउन की वजह से बड़ी मुसीबत में हैं। कोरोना वायरस से जूझने वाले अगुवा योद्धाओं को पर्याप्त सुरक्षा सामग्रियां नहीं मिल रही हैं। लॉकडाउन के चलते, लोग सड़कों पर उतरकर जन प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं, इसलिए इन हालतों का फायदा उठाकर, केंद्र सरकार के अधिकारी उन सभी को गिरफ़्तार कर रहे हैं जो सरकार की आलोचना करने की हिम्मत करते हैं। वायरस के डर का फ़ायदा उठाकर, मोबाइल फोन डाटा के ज़िरये लोगों पर निगरानी खूब बढ़ायी जा रही है। अमरीकी इजारेदार कंपनी फेस बुक और हिन्दोस्तानी इजारेदार कंपनी रिलायंस जिओ के बीच एक विशाल सौदा किया गया है, जिसके सहारे दोनों कम्पनियां लॉकडाउन के खत्म होने के बाद, एक-दूसरे का डाटा प्राप्त कर सकेंगी और ई-व्यापर से ज्यादा से ज्यादा मुनाफे़ कमा सकेंगी।

मज़दूर वर्ग, किसान और सभी मेहनतकश लोग मौजूदा अमानवीय व्यवस्था से आज़ादी चाहते हैं। लोग पूंजीवादी शोषण से, जाति, राष्ट्रीयता और लिंग के आधार पर भेदभाव व दमन से, मजहब के आधार पर उत्पीड़न से और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजकीय आतंकवाद से आज़ादी चाहते हैं। इसके लिए, पूरी उपनिवेशवादी विरासत, पूंजीवादी व्यवस्था और वर्तमान राज्य को ख़त्म करना होगा। एक आधुनिक लोकतांत्रिक और समाजवादी हिन्दोस्तान की नयी नींव डालने की ज़रूरत है।

कम्युनिस्ट आन्दोलन के अन्दर, हमें उन सभी से लगातार संघर्ष करना होगा जो मौजूदा राज्य और संविधान को बचाने का नारा दे रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि सभी समस्याओं की जड़ एक खास पार्टी की विचारधारा में है। मार्क्सवाद-लेनिनवाद का पालन करने का मतलब है इस सच्चाई को समझना और मज़दूर वर्ग व मेहनतकशों को बताना कि मौजूदा राज्य और संविधान इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही के हथकंडे हैं। सभी आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं की जड़ इस इजारेदार पूंजीपति वर्ग की हुकूमत में है। इस समय हिन्दोस्तान का इजारेदार पूंजीपति वर्ग जंग-फरोश अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ गठबंधन बनाकर, ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। हमारा काम है इस वर्ग को सत्ता से हटाना, न कि इस वर्ग की एक पार्टी को हटाकर इसी वर्ग की किसी दूसरी पार्टी को सत्ता पर लाकर बिठाना।

लेनिन की सीख से मार्ग-दर्शित होने का मतलब है पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की जगह पर मज़दूर-किसान की हुकूमत स्थापित के संघर्ष को उठाना। इसका मतलब है नए हिन्दोस्तान की नींव डालने के संघर्ष को उठाना। 

कामरेड लेनिन के जन्म की 150वीं सालगिरह के अवसर पर, आइये हम यह कसम खाते हैं कि समाज को संकट से बाहर निकालने और समाज की सब-तरफा प्रगति का रास्ता खोलने के लिए, हिन्दोस्तान के श्रमजीवी वर्ग को अपना ऐतिहासिक लक्ष्य हासिल करने के लिए तैयार करने का काम पूरा करेंगे!

पार्टी के बुनियादी संगठनों तथा मज़दूर वर्ग और उसके मित्रों के जन संगठनों को बनाते और मजबूत करते हुए, लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद की हिफ़ाज़त करते हुए, आइये हम यह कसम खाते हैं कि हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की हिरावल भूमिका को स्थापित और मजबूत करेंगे!

मौजूदा राज्य और संविधान को बचाने की मौकापरस्त और पूंजीपति वर्ग के साथ समझौताकारी कार्यदिशा का विरोध करते हुए और हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के क्रांतिकारी कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूर वर्ग व मेहनतकशों को एकजुट करते हुए, आइये हम कम्युनिस्ट आंदोलन की एकता को पुनस्र्थापित करने के लिए संघर्ष करें!

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May 1-15 2020    Voice of the Party    History    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)


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