नर्सिंग सहायक कर्मियों के हालात 

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) ने तमिलनाडु के सरकारी अस्पताल के नर्सिंग सहायक और सुरक्षा कर्मियों के बारे में कामरेड शिवकुमार के साथ टेलीफोन पर बातचीत की। कामरेड शिवकुमार तमिलनाडु के सरकारी अस्पताल के औक्सिलरी वर्क वर्कर्स यूनियन के कानूनी सलाहकार हैं। यह यूनियन सेंट्रल आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस से संबंधित है। हम उनके साथ हुई बातचीत का सारांश पेश कर रहे हैं।

मज़दूर एकता लहर : सरकारी अस्पतालों में नर्सिंग सहायक और सुरक्षा कर्मियों के काम के हालात कैसे हैं?

कामरेड शिवकुमार : तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों में 50,000 नर्सिंग सहायक और सुरक्षा कर्मी काम कर रहे हैं। कुछ दशक पहले यह सभी मज़दूर अस्पतालों के नियमित कर्मचारी थे। इन दशकों में उनके कार्यों को आउटसोर्स करते हुए निजी कांट्रेक्टर को दे दिए गया है। इस दौरान इन पदों को खत्म कर दिया गया, और क्रिस्टल, पद्मावती जैसे संगठनों को दे दिया गया जो सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज को नर्सिंग और अन्य सहायक सेवाएँ देने का काम करते हैं।

इन मज़दूरों का वेतन प्रत्येक जिले में अकुशल मज़दूरों को दिए जाने वाले वेतन से निर्धारित किया जाता है। यह वेतन 4500 से 5000 रुपये प्रतिमाह के बीच होता है। शहरों में यह 6000 रुपये प्रति माह होता है। यह रकम नियमित सरकारी कर्मचारियों के लिए निर्धारित 18000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतन की रकम से बहुत कम है। ये मज़दूर हर रोज़ 8 घंटे की तीन शिफ्ट में काम करते है। इन मज़दूरों को शिफ्ट शुरू होने से एक घंटा पहले रिपोर्ट करना होता है। लेकिन, जब वे काम पर पहुंचते हैं, उन्हें इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि उन्हें उस दिन काम मिलेगा।

म.ए.ल. : इन मज़दूरों को किस तरह का काम करना होता है?

कामरेड शिवकुमार : नर्सिंग सहायक कर्मी अस्पताल के इलाके, वार्ड और शौचालय को साफ़ रखने का काम करते हैं। ये कर्मचारी मरीजों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड और विभागों में ले जाने का काम भी करते हैं। सुरक्षा कर्मी वार्ड  और गेट पर निगरानी रखने का काम करते हैं। इन कार्यों के अलवा इन मज़दूरों को मरीजों को दवाई देने और यहाँ तक कि इंजेक्शन लगाने का काम भी दिया जाता है, जो कि उनके काम के दायरे में नहीं आता है।

इन मज़दूरों के काम के हालात बहुत ही बदतर हैं। जबकि इनमें से अधिकांश मज़दूर महिलाएं होती हैं, लेकिन न तो उनके लिए शौचालय होते हैं और न ही कपड़े बदलने के लिए कोई कमरा। अस्पताल का प्रशासन उनके साथ बेहद अमानवीय बर्ताव करता है। उनका भयंकर शोषण किया जाता है।

इन कर्मियों के साथ देहाड़ी मज़दूरों जैसा बर्ताव किया जाता है। उनको साप्ताहिक छुट्टियाँ नहीं दी जाती हैं, और न तो प्रोविडेंट फण्ड या ई.एस.आई. की सुविधा दी जाती है। मज़दूर बतौर उनके जितने भी अधिकार हैं, उनसे उनको वंचित किया गया है। हमारी यूनियन ने उनके वेतन और काम के हालात को बेहतर बनाने के लिए कोर्ट में केस दायर किए है।

इन मज़दूरों को काम के बीच कुछ दिनों की छुट्टी कर दी जाती है या फिर उनका कांट्रेक्टर बदल दिया जाता है। इन तमाम हथकंडों से उनको अपने अधिकारों से वंचित किया जाता है।

इन मज़दूरों के साथ कोई भी आदर और गरिमा से पेश नहीं आता है। सरकारी अधिकारी भी इन मज़दूरों को धमकाते रहते हैं और उनके संगठित होने या अपनी यूनियन बनाने से रोकने की कोशिश करते हैं।

म.ए.ल. : कोरोना वायरस की स्थिति में इन मज़दूरों की क्या अवस्था है?

कामरेड शिवकुमार : नर्सिंग सहायक कर्मियों को कोविड-19 वार्ड में भी काम पर लगाया जाता है। लेकिन अक्सर उनको ज़रूरी सुरक्षा उपकरण (पी.पी.ई.) नहीं दिए जाते हैं, जो कि उनकी अपनी और मरीजों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं। अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि इन मज़दूरों के लिए सुरक्षा उपकरण दिलाने की ज़िम्मेदारी उनके कांट्रेक्टर की है। कांट्रेक्टर इन मज़दूरों को सुरक्षा उपकरण देने से इंकार कर रहे हैं, और यदि मज़दूर उसकी मांग करते हैं तो उनको नौकरी से निकाले जाने की धमकी दी जाती है। इन सब हालातों के चलते ये मज़दूर पर्याप्त सुरक्षा के बगैर ही काम कर रहे हैं। डॉक्टरों द्वारा इस्तेमाल किये गए सुरक्षा उपकरणों, संक्रमित चीजों, इत्यादि को ठिकाने लगाने का काम भी इन मज़दूरों को करना पड़ता है।

इन हालातों के चलते कम से कम 7 से 10 मज़दूरों को कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है। कुछ अस्पतालों में सफाई मज़दूरों को कोविड-19 पॉजिटिव लोगों को दवाइयां पहुँचाने और उनको इंजेक्शन लगाने के लिए भी भेजा जाता है। हमारी यूनियन ने अधिकारियों को ये सारी बातें बताई हैं, ताकि वह इसपर कोई उपाय कर सके। हमारे संघर्ष की वजह से कुछ अस्पतालों में नर्सिंग सहायक मज़दूरों को पी.पी.ई. किट दिए गए हैं।

सरकार ने कोविड-19 के मरीजों की देखभाल करने वाले कर्मियों के लिए बीमा पालिसी का ऐलान किया है। इस ऐलान में कहा गया है कि यदि किसी स्वास्थ्य कर्मी की मौत कोविड-19 के संक्रमण की वजह से होती है तो उनके परिजनों को 50 लाख रुपये का मुआवजा मिलेगा। लेकिन यहाँ भी इस योजना को केवल सरकारी अस्पतालों के नियमित कर्मचारियों और कुछ कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों तक ही सीमित रखा गया है। कितने कॉन्ट्रैक्ट मज़दूरों को बीमा की सुविधा मिलेगी इसकी सीमा भी राज्य सरकार निर्धारित करने जा रही है। डॉक्टरों को छोड़कर सभी नर्सों, और नर्सिंग सहायक कर्मियों और अन्य कर्मियों को अक्सर कॉन्ट्रैक्ट पर ही रखा जाता है। इसलिए इस मामले में जानबूझकर अनिश्चितता बरकरार रखी गयी है, और कोई भी निश्चित रूप से नहीं जानता की उसे इस बीमा योजना में शामिल किया गया है या नहीं, जबकि वायरस से घिरे होने की वजह से उन्हें संक्रमण का सबसे अधिक खतरा होता है।

म.ए.ल. : चूँकि यह मज़दूर कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के साथ काम कर रहे हैं, क्या सरकार ने इनके लिए कोई खास भत्ता या मेहनताना देने की कोई योजना बनायीं है? 

कामरेड शिवकुमार : कतई नहीं। इन मज़दूरों के लिए कोई ख़ास भुगतान या भत्ता देने की बात तो दूर, इनको तो अपना मासिक वेतन भी सही समय पर नहीं मिलता है। उदहारण के लिए तमिलनाडु के सभी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों के सफाई मज़दूरों को पिछले महीने का वेतन 25 दिन की देरी के बाद दिया गया, जब उन्होंने अपनी आवाज़ उठाई और हड़ताल की। तीन दिन पहले करुर मेडिकल हॉस्पिटल के सफाई मजदूर लॉक डाउन के दौरान मजबूरी में हड़ताल पर चले गए क्योंकि उन्हें पिछले कई महीनों से वेतन नहीं मिला है। सेलम मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में हमारी यूनियन के राज्य सचिव ने अपने बकाया वेतन के भुगतान के लिए संघर्ष किया। उनके इस कदम के लिए क्रिस्टल के मैनेजमेंट ने उन्हें इस महीने नौकरी से निकाल दिया है। साधारण परिस्थितियों में भी 4000 से 5000 रुपये मासिक वेतन में परिवार चलाना बहुत मुश्किल है। अब लॉक डाउन की स्थिति में जब उपभोग की सभी वस्तुएं, अनाज, सब्जियों से लेकर अन्य ज़रुरत की चीजें महंगी हो गयी हैं, और उपलब्ध नहीं हैं, और सार्वजनिक वाहन सेवा पूरी तरह से बंद है, तो हम इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनकी ज़िन्दगी किस तरह से कट रही होगी। नर्सिंग सहायक कर्मियों के हालात यह हकीकत है।

म.ए.ल. : एक तरफ तो सरकार यह जताने की कोशिश कर रही है, कि उसे लोगों के स्वास्थ्य की कितनी फिक्र है, और कैसे उनको बचाना चाहती है। हमारे प्रधानमंत्री लोगों को घरों की बालकनी में आकर स्वास्थ्य कर्मियों के सम्मान में तालियाँ बजाने को कह रहे हैं और खुद टेलीविज़न चैनल के सामने सफाई कर्मियों की पद पूजा करने का नाटक कर रहे हैं! तो दूसरी ओर यही सरकार इन स्वास्थ्य कर्मियों का कई महीनों से वेतन देने से इंकार कर रही है। इसके लिए स्वास्थ्य कर्मियों को संघर्ष करना पड़ रहा है। असलियत तो यह है कि हमारे हुक्मरानों को आम लोगों की बात तो छोड़ो, स्वास्थ्य कर्मियों की भी कोई फिक्र नहीं है। हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था का यह असली शोषक चरित्र है।

अस्पताल में काम कर रहे इन मज़दूरों की हालत में बारे में अपने विचार साझा करने के लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं। मज़दूर एकता लहर नर्सिंग सहायक कर्मी और सुरक्षा कर्मियों के संघर्ष और उनकी मांगों का पूरा समर्थन करता है।

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May 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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