घर लौटने के दौरान मज़दूरों की मौत :

अमानवीय प्रणाली और असंवेदनशील राज्य

16 मई की सुबह, लखनऊ से 200 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में ट्रकों के टकरा जाने की वजह से उनमें यात्रा कर रहे 24 मज़दूरों की मौत हो गई तथा कई गंभीर रूप से जख़्मी हो गये। यह इन दिनों में होनेवाली दुर्घटनाओं का सबसे हाल का मामला है जिनमें घर पहुंचने की कड़ी कोशिश करने वाले मज़दूरों की जाने गयी हैं।

14 मई को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 6 मज़दूरों के ऊपर बस चलने से उनकी मौत हो गई। वे मज़दूर बिहार में अपने घर पहुंचने के लिए पंजाब से पैदल निकले थे। इसी हफ्ते में, 4 मज़दूर जिनमें एक महिला और छोटी बच्ची भी शामिल थे, एक सड़क दुर्घटना में मारे गए।

हमें याद होगा की हाल ही में महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में, रेल की पटरियों पर सो रहे 20 मज़दूरों के समूह में से 16 मज़दूरों की मौत माल गाड़ी की चपेट में आने से हो गई।

हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने यह वादा किया है कि घर वापस जाने की इच्छा रखने वाले मज़दूरों के लिए बसों और रेलगाड़ियों का प्रबंध किया जाएगा, लेकिन यह साफ़ देखने को मिल रहा है कि व्यवस्थाएं अपर्याप्त हैं। कई जगहों पर जेब में बिलकुल भी पैसा न होने के बावजूद मज़दूरों से रेल टिकट का पैसा मांगा जा रहा है।

सवाल यह उठता है कि पूरे हिन्दोस्तान से लाखों मज़दूर पैदल चलकर, असहनीय गर्मी में, बिना पर्याप्त खाने-पीने या चिकित्सा की सुविधा के साथ कड़ी परिस्थितियों का सामना करते हुए क्यों अपने गांव पहुंचने की इतनी कोशिश कर रहे हैं? इसका कारण हमारे देश की अमानवीय पूंजीवादी व्यवस्था और असंवेदनशील राज्य है जो इस व्यवस्था को बनाए रखता है। ऐसी व्यवस्था जिसमें सम्पत्ति के निर्माताओं यानी कि मज़दूरों को कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है।

जैसे कि उम्मीद थी, उत्तर प्रदेश के मुख्यामंत्री ने एक बयान दिया जिसमें मौतों की निंदा की गई थी और घायलों को राहत और चिकित्सा सहायता का वादा किया गया था। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने भी घड़याली आंसू बहाए और भाजपा पर आरोप लगाया। परन्तु ये दोनों ही राजनीतिक पार्टियां पूंजीपति वर्ग के हितों को पूरा करने के लिए होड़ करती हैं।

कुछ ही दिनों पहले, उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया जिसमें सभी श्रम कानूनों को तीन साल की अवधि के लिए रद्द कर दिया गया है। इससे मज़दूरों के अधिकारों की सभी कानूनी सुरक्षा समाप्त हो गई है। अन्य राज्यों ने भी इस तरह के क़दम उठाए हैं, जैसे कि 12 घंटे प्रतिदिन की ड्यूटी की इजाज़त देना और ट्रेड यूनियन अधिकारों को रद्द करना। इनमें कांग्रेस पार्टी के सत्ता वाले राज्य भी शामिल हैं।

हाल ही में हिन्दोस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका को खारिज़ कर दिया जिसमें प्रार्थना की गयी थी कि केंद्र सरकार को मज़दूरों को खाना व पानी पहुंचाने के निर्देश दिए जाएं। हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने हाथ खड़े कर दिए कि इस समस्या के बारे में वे कुछ नहीं कर सकते।

ये घटनाएं सम्पूर्ण राज्य प्रणाली का पर्दाफ़ाश करती हैं, जिसमें कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका शामिल हैं, कि ये सभी अति शोषण करने वाली पूंजीवादी व्यवथा की सुरक्षा करने के लिए काम करते हैं न कि अधिकांश मज़दूरों के हितों के लिए।

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Jun 1-15 2020    Voice of Toilers and Tillers    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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