अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने हिन्दोस्तान और चीन के बीच "मध्यस्तता" करने का आग्रह किया :

अमरीकी दखलंदाज़ी का डटकर विरोध करें!

27 मई को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने खुलेआम ऐलान किया कि "हमने दोनों हिन्दोस्तान और चीन को बता दिया है कि उनके बीच में इस समय चल रहे सीमा विवाद को लेकर, अमरीका मध्यस्तता करने को तैयार, राज़ी और सक्षम है"।  

अमरीकी राष्ट्रपति की इन बातों से यह साफ़ पता चलता है कि हिन्दोस्तान और चीन के बीच में चल रहे सीमा विवाद का इस्तेमाल करके अमरीका इस इलाके में अपने हितों को बढ़ावा देना चाहता है। यह दोनों, हिन्दोस्तान और चीन के लिए तथा एशिया में शांति के लिए बहुत ख़तरनाक है। हिन्दोस्तान, चीन और इस इलाके के सभी देशों के लोगों को इसका डटकर विरोध करना चाहिए।

हिन्दोस्तान-चीन सीमा पर स्थिति अवश्य ही तनावपूर्ण है। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल – एल.ए.सी.) के कम से कम चार अलग-अलग स्थानों पर दोनों सेनाओं की आपसी झड़पें हुयी हैं। खास तौर पर, 5 मई को लद्दाख़ क्षेत्र में काफी गंभीर मुठभेड़ में दोनों देशों की सेनाओं के सौ से अधिक सैनिक घायल हुए। दोनों सेनाओं के हज़ारों सैनिक सीमा पर तैनात हैं।

बीते सात वर्षों में हिन्दोस्तान और चीन के बीच में सीमा को लेकर झगड़े बढ़ते रहे हैं। इसका दो कारणों से सीधा सम्बन्ध है। एक तरफ, हिन्दोस्तान और चीन, दोनों सीमा पर भारी वाहनों के लिए सड़कें बना रहे हैं, ताकि सैनिक और भारी सामान जल्दी से सीमा तक पहुंचाए जा सकें। दोनों पक्ष ज़मीन पर अपनी-अपनी सेनाओं को तैनात करके, विवादास्पद सीमा पर अपना-अपना दावा कर रहे हैं। दूसरा कारण है अमरीका की भूमिका और बढ़ता हिन्दोस्तान-अमरीका रणनैतिक सैनिक गठबंधन। अमरीका हिन्दोस्तान को चीन के ख़िलाफ़ भिड़ाने और हिन्दोस्तान व चीन को सीमा समेत सभी विवादास्पद मुद्दों को शांतिपूर्ण व दुतरफा तरीके से हल करने से रोकने के लिए, बहुत ही सुनियोजित रूप से काम कर रहा है।

इस महीने में दोनों सेनाओं के बीच झड़पें इसलिए हुईं क्योंकि चीन ने लद्दाख क्षेत्र में हिन्दोस्तान द्वारा रणनैतिक सीमावर्ती सड़कों के निर्माण का विरोध किया। 2017 में डोकलाम में हुए सीमा विवाद में हिन्दोस्तान ने भूटान-चीन-हिन्दोस्तान की सांझी सीमा के पास चीन द्वारा रणनैतिक सीमावर्ती सड़क के निर्माण का विरोध किया था। कालापानी, जिस पर हिन्दोस्तान और नेपाल दोनों अपने-अपने दावे ठोक रहे हैं, उससे सम्बंधित हिन्दोस्तान और नेपाल के बीच का विवाद भी हिन्दोस्तान-नेपाल-चीन की सांझी सीमा पर हिन्दोस्तान द्वारा हाल में एक सीमावर्ती सड़क को खोल देने से सम्बंधित है। नेपाल में इसे नेपाली इलाकों पर हिन्दोस्तान द्वारा एकतरफा कब्ज़ा माना जा रहा है और इसके ख़िलाफ़ कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं। नेपाल की सरकार ने एक नक्शा प्रकाशित किया है जिसमें उस इलाके को नेपाल का इलाका दिखाया गया है।

हिन्दोस्तान और चीन के बीच का सीमा विवाद उपनिवेशवादी काल की एक विरासत है और हिन्दोस्तान व नेपाल के बीच का सीमा विवाद भी। हिन्दोस्तान के बरतानवी हुक्मरानों ने तिब्बत के इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया और ऐलान कर दिया कि तथाकथित मैकमहोन लाइन तिब्बत और हिन्दोस्तान के बीच की सीमा है। कश्मीर के महाराजा ने बरतानवी समर्थन के साथ, लद्दाख क्षेत्र में चीन के इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया। बरतानवी उपनिवेशवादियों ने जंग छेड़कर और असमान समझौते करके, नेपाल के कई इलाकों को हिन्दोस्तान के अन्दर शामिल कर लिया।

जब हिन्दोस्तान 1947 में आज़ाद हुआ था और चीन 1949 में आज़ाद हुआ था, तब हिन्दोस्तान के लोगों ने यह उम्मीद की थी कि दोनों देश बरतानवी उपनिवेशवादियों द्वारा पैदा की गयी समस्याओं को आपस में हल कर लेंगे। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। हिन्दोस्तान और चीन के बीच में 1962 में युद्ध हुआ, क्योंकि दोनों पक्ष इस पर सहमत नहीं हो सके कि सांझी सीमा कौन सी है।

वह युद्ध तो ख़त्म हुआ पर सीमा विवाद तब से जारी है। दोनों देशों के बीच में उच्चतम स्तरीय समझौता हुआ है कि सीमा विवाद को वार्ता के द्वारा हल करने के प्रयास किये जायेंगे और यह सुनिश्चित किया जायेगा कि सीमा पर झड़पें बढ़कर युद्ध में न बदल जायें। यह सच है कि 1975 के बाद, सीमा पर हुयी झड़पों में दोनों देशों का कोई भी सैनिक नहीं मरा है। दोनों सेनाओं के बीच में अकथित समझौता था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा की कुछ दूरी तक, कोई स्थाई निर्माण कार्य नहीं किया जायेगा। हाल के वर्षों में यह हालत बड़ी तेज़ी से बदल रही है। दोनों देशों ने अब सीमा तक सैन्य सड़कें बना रखी हैं और एल.ए.सी. के बारे में एक-दूसरे के दावों को चुनौती दे रहे हैं।

सीमा पर यह वर्तमान स्थिति न तो चीन के हित में है और न ही हिन्दोस्तान के हित में। अगर सीमा पर हो रही झड़पें युद्ध में तब्दील हो जाती हैं तो उससे न तो हिन्दोस्तान को लाभ होगा और न ही चीन को। इसके साथ-साथ, अमरीका इस पूरे इलाके पर अपना वर्चस्व जमाने के इरादे से, इस हालत का फायदा उठा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के "मध्यस्तता" करने के आग्रह से एक हफ्ते पहले, दक्षिण एशिया के अमरीकी विशेष दूत ऐलिस वेल्स ने सीमा पर झड़पों के लिए चीन की निंदा की। "हिन्दोस्तान का समर्थन" करते हुए, उन्होंने हिन्दोस्तान से चीन का "मुकाबला" करने को कहा। यह हिन्दोस्तान को चीन के ख़िलाफ़ भिड़ाने के बराबर है।

हमें एशिया के सम्बन्ध में अमरीका की रणनीति को समझना होगा। अमरीका एशिया और पूरी दुनिया पर हावी होने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते में चीन को सबसे बड़ा रोड़ा मानता है। वह चीन को अलग-थलग करके सैनिक घेराबंदी में डालने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए अमरीका क्रमश: हिन्दोस्तान के साथ सैनिक रणनैतिक सांझेदारी बना रहा है। वह हिन्दोस्तान पर क्वैड सैनिक गठबंधन – जिसके अन्य सदस्य हैं अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया – में जुड़ने का दबाव डाल रहा है। अमरीका चाहता है कि हिन्दोस्तान ज़मीनी सरहद पर चीन के ऊपर दबाव डाले और साथ ही साथ, दक्षिण चीनी समुद्र में चीन की समुद्री घेराबंदी करने में उसके साथ जुड़ जाये। अमरीका सोच-समझकर हांगकांग और शिनजियांग प्रदेश में अशांति भड़का रहा है। अमरीका कोरोना वायरस वैश्विक महामारी का फायदा उठाकर, दुनिया में प्रचार कर रहा है कि चीन वायरस को फैलाने के लिए ज़िम्मेदार है। इस तरह से अमरीका चीन को अलग-थलग करके उस पर हमला करने की तैयारी कर रहा है।

इसीलिये इस समय अमरीका चीन के ख़िलाफ़ हिन्दोस्तान का "समर्थन" कर रहा है।

परन्तु लोगों को इतिहास का सबक नहीं भूलना चाहिए।

दूसरे देशों को आपस में लड़वाने और एक-दूसरे को कमज़ोर करने के लिए उन्हें आपस में भिड़ाने का अमरीका का लम्बा इतिहास है। इस प्रकार के युद्धों को भड़काकर अमरीका अपनी प्रधानता को बरकरार रखता है।

बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हिन्दोस्तान को बांटा और पाकिस्तान की स्थापना की, ताकि पाकिस्तान को सोवियत संघ की घेराबंदी करने का अड्डा बनाया जा सके और हिन्दोस्तान को कमज़ोर किया जा सके। शीत युद्ध की अवधि में, अमरीका ने चीन और सोवियत संघ, दोनों को कमज़ोर करने के इरादे से, उनके आपसी विवादों को और तीखा करने का काम किया।

अमरीका ने हमेशा सुनिश्चित किया है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान आपस में लड़ते रहें, ताकि दक्षिण एशिया पर अमरीका का वर्चस्व बना रहे। कश्मीर पर विवाद को भी इसी काम के लिए इस्तेमाल किया गया है।

अमरीका ने तिब्बत और सीमा के मामलों को लेकर, हिन्दोस्तान और चीन के बीच में, हमेशा आपसी शक पैदा करने की कोशिश की है, ताकि दोनों देशों को कमज़ोर किया जा सके। उसने 1958 में हिन्दोस्तान को अड्डा बनाकर, तिब्बत में बगावत करवाई थी। उसने हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग को चीन के साथ सीमा विवाद के मामले पर कट्टर रवैया अपनाने को उकसाया था और उच्च स्तरीय हथियारों के साथ हिन्दोस्तान का समर्थन करने का वादा किया था। 1962 में हिन्दोस्तान और चीन के बीच हुए युद्ध से एशिया के इन दोनों प्रमुख देशों के आपसी सम्बन्ध बहुत बिगड़ गए। साथ ही, एशिया में अमरीका का हस्तक्षेप और बढ़ गया।

बीते दशक के दौरान, अमरीका हिन्द-प्रशांत महासागर क्षेत्र में हिन्दोस्तान को अपना मुख्य मित्र बताता आ रहा है। हिन्दोस्तान और अमरीका की सेनाओं को एक सांझी कमान के तले जोड़ा जा रहा है। अमरीका और हिन्दोस्तान के बीच जो सैनिक रणनैतिक समझौते किये गए हैं, उनकी वजह से अमरीका के रणनैतिक हितों की सेवा में, हिन्दोस्तान के दूसरे देशों के साथ जंग में फंसने का ख़तरा बहुत बढ़ रहा है। हिन्दोस्तान-अमरीका रणनैतिक गठबंधन चीन, पाकिस्तान, रूस और इस इलाके के अन्य देशों को डराने-धमकाने के लिए बनाया गया है। अमरीका के साथ यह गठबंधन हिन्दोस्तान के लिए सुरक्षा का स्रोत नहीं बल्कि हिन्दोस्तान के प्रति दूसरे देशों के बढ़ते अविश्वास का स्रोत है।

हिन्दोस्तान और चीन के लोगों तथा एशिया के सभी देशों के लोगों को इस इलाके में अमरीकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का डटकर विरोध करना चाहिए, चाहे यह सैनिक-रणनैतिक गठबंधन के रूप में हो या सैनिक घेराबंदी या फिर "मध्यस्तता" के नाम से। हमारे इलाके के देशों के मामलों में हस्तक्षेप करने का अमरीका को कोई हक़ नहीं है।

अमरीकी साम्राज्यवाद, एशिया से बाहर निकलो!         

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Jun 1-15 2020    World/Geopolitics    War & Peace     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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